भारती
तिरुकुरल के चयनित दोहे- भाग 3 में नियमित जीवन और अनैतिक प्रेम

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें नियमित जीवन और अनैतिक प्रेम के विषय में।

नियमित जीवन

जीवन से भी अधिक अमूल्य है जीवन में अनुशासन क्योंकि यही अनुशासन हमारे जीवन का मूल्यवर्धन करता है।

कोई व्यक्ति भले ही अनेक दर्शनशास्त्र पढ़कर अपनी शंकाओं को दूर कर ले लेकिन सुनियमित जीवन ही होता है जो अंततः लाभ पहुँचाता है, और कुछ नहीं। इसलिए कितनी ही परेशानियाँ हों लेकिन इस नियम का संरक्षण करें।

यह उपनिषद में भी कहा गया है (कठोपनिषद 2, 24)

आप जीवन में किसी भी दर्जे पर हों लेकिन सुनियमित जीवन आपको भिजात वर्ग का बनाता है। यदि आप इसमें विफल हुए तो अच्छा पितृत्व या श्रेष्ठ कुल भी आपको बचा नहीं पाएगा।

धार्मिक ग्रंथों की भूली हुई बातों को ब्राह्मण पुनः पढ़कर याद कर सकता है लेकिन यदि वह जीवन के नियम को भूल जाता है तो वह अपने जन्म के इस लाभ को गँवा बैठता है।

शिक्षा में भुलाई गई चीज़ों की पूर्ति की जा सकती है लेकिन जीवनशैली में यदि कुछ खो गया तो वह हमेशा के लिए खो गया। हमारे कवि के काल में समाज जाति द्वारा नियमित था। ब्राह्मण का कर्तव्य अध्ययन और अध्यापन था। यदि वह धर्मग्रंथ भूल गया तो उसके जीवन का उद्देश्य खो गया। लेकिन कवि कहते हैं कि इसे पुनः अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकता है। हालाँकि वे कहते हैं कि यदि जीवन का नियम खो गया तो वह समाज में पुनः अपना स्थान नहीं पा पाएगा। निर्धारित अध्ययन के प्रति उदासीनता या अज्ञान ब्राह्मण का सबसे बड़ा अपराध माना जाता था। लेकिन उससे बड़ा अपराध था, उसके लिए निर्धारित अनुशासन का पालन न करना।

एक सुनियमित जीवन प्रतिष्ठा लाता है। इसकी उपेक्षा अथाह अपमान का कारण बनती है।

यदि सामाजिक समन्वय के सिद्धांत के आधार पर विद्वान जीवन को नियमित नहीं करते हैं तो अपनी विद्या के बावजूद वे उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं।

शिक्षा निरर्थक है यदि कोई आचार-व्यवाहर को आत्म-नियंत्रित नहीं कर सकता। नियमित जीवन और सामाजिक समन्वय, शास्त्रीय और दार्शनिक ज्ञान से अधिक आवश्यक हैं।

अनैतिक प्रेम

कोई व्यक्ति, जो किसी और का है, के लिए कामुक विचार रखना मूर्खता है। कोई भी व्यक्ति जो धर्म का मार्ग जानता है या सांसारिक समझ रखता है, वह ऐसी मूर्खता से बचेगा।

उन लोगों में से, जो धर्म के मार्ग से भटक जाते हैं, सबसे बड़ा मूर्ख वह है जो दूसरे के घर में घुसता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि इस परिकल्पित अपराध में उसे कोई सुख नहीं मिलेगा, बल्कि वह हमेशा अपमान और दंड के भय में जीएगा।

जहाँ किसी पर विश्वास किया गया है, वहाँ दुष्ट विचारों से प्रलोभित होने से बेहतर है मृत होना।

किसी भी व्यक्ति की महत्ता किसी काम की नहीं रहेगी यदि वह विचारहीन है और दूसरे का घर नष्ट न करने की सांसारिक समझ नहीं रखता है।

उसकी महत्ता के आगे उसका अपमान बड़ा हो जाएगा।

दूसरे की पत्नी से संबंद बनाना आसान लग सकता है लेकिन इससे हुए अपमान से कभी उबरा नहीं जा सकता है।

आकर्षित मूर्ख को लग सकता है कि यह सब बहुत आसान है और ऐसे ही इसका अंत हो जाएगा। लेकिन अपमान उतना ही सथाई रहेगा जितना क्षणिक सुख था।

जो दूसरे के घर की पवित्रता भंग करता है- शत्रुता, पाप, भय और अपमान हमेशा उसके रास्ते का काँटा बने रहते हैं।

जिनके पास इस अपराध का निजी अनुभव है, वे यहाँ उल्लेखित भावार्थों और कवि के मन की बात की प्रशंसा करेंगे।

वह सच्चा गृहस्थ नहीं है जो अपने कामुक विचार उनपर जाने देता है जो किसी और के हैं। वह एक अच्छे पति या अच्छे पिता की तरह आचरण कर सकता है लेकिन ऐसा विचार मात्र ही इन सबको अवास्तविक बना देता है।

अपने मन को नियंत्रित करने और किसी दूसरे से संबंधित स्त्री के प्रति कामुक विचारों के निरोध के सामर्थ्य में ही सच्चा पुरषत्व निहित है। यह धर्म परायणता और सामाजिक संस्कार दर्शाता है।

आत्म-नियंत्रण की क्षीणता और अवैध कामना में आसक्ति में पौरुष नहीं है।

अगले अंक में जारी…