भारती
तिरुकुरल के चयनित दोहे- भाग 2 में सदाचार और आत्म-नियंत्रण

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें सदाचार और आत्म-नियंत्रण के विषय में।

सदाचार

एक सरल व्यक्ति के अर्जन उसके बच्चों को बिना किसी कमी के चले जाते हैं और विपत्तियों से उनकी रक्षा करते हैं।

यह नैतिक नियमों के प्रोत्साहन के लिए मात्र एक अंधविश्वास नहीं है। इस कथन में व्यवहारिक बुद्धिमत्ता है क्योंकि अच्छे से कमाया गया धन स्थिर होता है, वहीं गलत माध्यमों से अर्जन की निंदा समाज भी करता है। प्राप्ति के साधनों की सरलता से अर्जन स्थिर होता है, वहीं टेढ़े मार्गों से अर्जित धन या तो हमारे लिए जाल होते हैं या उन्हें खोने का डर हमेशा बना रहता है। एक गृहस्थ के लिए अपने बाद अपने बच्चों को कुशलतापूर्वक रखने की अभिलाषा सबसे बड़ा उद्देश्य बनती है। तिरु-वल्लुवर कहते हैं कि सदाचार इसे सुनिश्चित करता है।

ऐसा लग सकता है कि सीधे मार्ग से भटकने के बाद अर्जित धन में कोई दोष नहीं है। लेकिन प्रलोभन में न आएँ। एक बार में ही इस विचार को त्याग दें।

किस व्यक्ति ने सरल जीवन जीया और किसने नहीं, इसे इससे देखा जा सकता है कि उनके बाद उनके बच्चों की क्या दशा है।

आपका जीवन आपके बच्चे के चरित्र पर एक छाप छोड़ेगा और कवि कहते हैं कि यदि आप अपने बच्चों का भला चाहते हैं तो सजग रहें और सरलता के मार्ग पर चलें।

परिमेलज़गर इस उक्ति का अर्थ बताते हैं कि अच्छे व्यक्तियों को संतान सुख मिलेगा और बुरे व्यक्ति इस सुख से वंचित होंगे। संतान प्राप्ति का सुख या संतान को जीवन में अच्छा करते देखने का सुख, इसके दोनों ही अर्थ हो सकते हैं। मेरा मानना है कि उपरोक्त अर्थ अधिक सरल है और यह तिरुवल्लुवर की तर्कसंगत नैतिकता से मेल खाता है।

यदि आपके विचार सरल मार्ग से भटक रहे हैं तो जान लीजिए कि आगे दुर्भाग्य आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

आपके मस्तिष्क के भटकने का पता किसी और से पहले आपको चलेगा। इसे दोषपूर्ण दृष्टि से देखें व सजग हो जाएँ।

सरलता के मार्ग पर चलते हुए यदि कोई व्यक्ति अपनी भौतिक वस्तुओं को खो भी दे तो उसकी निर्धनता दुनिया की दृष्टि में उसे नीचा नहीं गिराएगी। उसका समाज में वैसे ही दर्जा रहेगा जैसे कुछ हुआ ही न हो।

व्यापारी यह जान लें कि अपने हितों की रक्षा की तरह ही दूसरों के हितों की रक्षा भी व्यापार के हित में है।

‘ईमानदारी ही सर्वश्रेष्ठ नीति है’ को कहने का यह तिरुवल्लुवर का तरीका है। सरलता के वल धर्म ही नहीं है बल्कि एक अच्छी आर्थिक नीति भी है।

आत्म-नियंत्रण

आत्म नियंत्रण केवल एक वैरागी के लिए ही नहीं, एक गृहस्थ के लिए भी आवश्यक है। तमिल में अडक्कम का अर्थ आत्म-नियंत्रण अथवा विनम्रता हो सकता है। लोभ, क्रोध और अहं से बचने के लिए आवश्यक आत्म-नियंत्रण की चर्चा यहाँ पर हो रही है।

आत्म-नियंत्रण हमें ईश्वर के समीप ले जाता है। चाहत हमें अंधकार में धकेल देती है।

आत्म-नियंत्रण को अपने अधिकार में लेने से ज़्यादा मूल्यवान और कुछ नहीं है। खुद पर नज़र रखें, यह किसी खज़ाने पर नज़र रखने जैसा है।

सभी का नम्र होना अच्छी बात है लेकिन जो धन होने के बावजूद विनम्र है, यह उनका अतिरिक्त गुण है।

विद्या, अच्छे कुल में जन्म और संपत्ति घटते नहीं हैं, बल्कि विनम्रता से और बढ़ जाते हैं। विनम्र व्यवहार को यहाँ पणिदल कहा गया है जिसका शाब्दिक अर्थ आदर व्यक्त करने के लिए झुकना है।

यदि कोई व्यक्ति आत्म-नियंत्रण का जीवन जीता है और अपनी पाँचों इंद्रियों को प्रलोभित होने से रोकता है, तो वह उस कछुए के समान, जो खतरा भाँपने पर एक कछुआ अपने हाथ-पैर को अपने खोल में छिपा लेता है, स्वयं को अगले सात जन्मों के लिए दोषों से संरक्षित कर लेता है।

आप हर चीज़ को नज़रअंदाज़ कर सकते हो लेकिन अपनी जीह्वा को नियंत्रित करने के लिए सजग रहें। जो ऐसा करने में अक्षम होते हैं, वे बड़ी परेशानी का सामना करते हैं।

ऐसा नहीं है कि अन्य चीज़ों में नियंत्रण आवश्यक नहीं है लेकिन लापरवाही या क्रोध में कहे कथनों का खतरा हमेशा बरकरार रहता है और इसपर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

जलने से हुआ घाव भर जाता है लेकिन बिना सोचे-समझे कहे गए शब्द वह कभी नहीं भूलता जो उनसे आहत हुआ है। हमेशा एक बुरी याद की तरह वह उसके मस्तिष्क में रहता है।

लोग कई अन्याया भूल जाते हैं लेकिन किसी अपमान को वे शायद ही भुलते या क्षमा करते हैं।

यदि कोई व्यक्ति जानता है कि उ के मस्तिष्क में उठ रहे क्रोध को कैसे शांत करना है और अपना आपा खोने से बचता है तो सभी गुण उसकी ओर खींचे चले जाते हैं और उसे सुख प्रदान करते हैं।

एक गृहस्थ व्यक्ति को लापरवाही से या क्रोध में कुछ कहने से बचना चाहिए। शेष सब कुछ सरल होगा।

अगले अंक में जारी…