भारती
तिरुकुरल के चयनित दोहे भाग 4- सहनशीलता अपनाना तपस्वियों के व्रत के समान है

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें सहनशीलता और ईर्ष्या के विषय में।

सहनशीलता

क्या पृथ्वी उस व्यक्ति का सहयोग नहीं करती जो इसे खोदता है? उसी प्रकार हमें भी उस व्यक्ति को सहना चाहिए जो हमारे साथ गलत करता है।

यदि कोई आपके साथ गलत करता है तो आप उसे याद रखते हैं लेकिन यह फिर भी बेहतर होगा कि आप उसे भूल जाएँ, यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो।

किसी बुरे कृत्य का बदला लेना कोई उपलब्धि नहीं है। बल्कि स्वर्णिम उपलब्धि वह होगी जब एक बलशाली व्यक्ति अपने साथ किए गए बुरे को सह जाए और यह सहनशीलता जनमानस पर भी अपनी छाप छोड़ेगी।

प्रतिकार एक दिवस का सुख देता है। जबकि सहनशीलता जीवन भर का यश।

पीड़ा मिलने पर दूसरे को पीड़ित करने में क्षणिक संतुष्टि मिलती है। लेकिन सहनशीलता के फलस्वरूप सदैव के लिए एक सज्जन पुरुष के समान आदर मिलता है। इसलिए हम छोटे सुख के लिए बड़े सुख का बलिदान नहीं देना चाहिए।

अहंकार के कारण कोई व्यक्ति आपके साथ बुरा करता है। लेकिन जब आप अपनी सहनशीलता से उसे पराजित करते हो तो गर्व के पात्र बनते हैं।

आपकी सहनशीलता आपका उच्चतर मूल्य दर्शाएगी और उसके अहंकार को भंग करेगी। सहनशीलता कोई नकारात्मक वस्तु नहीं है। यह गलत करने वाले के अहंकार की क्षति करने वाला महत्त्वपूर्ण हथियार है। और इसी पराजय की बात उपरोक्त कुरल में कही गई है। यह कोई साधारण बात नहीं है। यह भेदक तर्कवादी तरीका तिरुवल्लुवर और मार्कस ऑरेलिअस में समानता है।

जो व्यक्ति अपमान के समक्ष भी सहनशीलता अपनाता है, उसका अनुशासन गृहस्थ होने के बावजूद सन्यासियों जैसा है।

तपस्वी भोजन के बिना रहते हैं और पश्चाताप करते हैं लेकिन ऐसे नासमझी भरे प्रहारों के समक्ष सहनशीलता अपनाने वाले व्यक्ति का पश्चाताप व्रत से भी अधिक है।

ईर्ष्या

जो मस्तिष्क ईर्ष्या से मुक्त है, ऐसे मस्तिष्क के स्वामित्व से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है।

दूसरों की वस्तुओं से ईर्ष्या करना निर्धनता के समान है। यह किसी धनवान व्यक्ति को भी वही संताप देती है जो एक निर्धन व्यक्ति झेलता है। यह पीड़ा किसी भी धन या सुख के ग्रहण से नहीं मिट सकती क्योंकि यह पीड़ा बाहरी वस्तु, यानी कि दूसरे के धन से उत्पन्न हुई है। इसलिए एक ऐसी मनोवृत्ति का उपहार पाना जो ईर्ष्या से मुक्त है, विश्व में सबसे बड़ा आशीष है।

दूसरों की कुशलता देखकर प्रसन्न होने की बजाय जो अपने मस्तिष्क में ईर्ष्यालु विचार आने देता है, वह अपने मस्तिष्क की आध्यात्मिक और भौतिक कुशलता की परवाह नहीं करता।

बाहरी संसार में किसी शत्रु के न होने पर भी ईर्ष्या व्यक्ति से उसका सुख छीन लेती है। हानि पहुँचाने के लिए व्यक्ति की ईर्षा ही काफी है।

आपका मस्तिष्क ही आपका सबसे बड़ा शत्रु हो सकता है। धन होने के बावजूद ईर्ष्या आपको निर्धन बनाती है और उस वस्तु से दुख पहुँचाती है जो वास्तव में सुखदायक है। आपका धन लूटने के लिए किसी चोर की आवश्यकता नहीं है, ईर्ष्या ही वह काम कर देती है क्योंकि आप अपने धन का सुख भोगने की अवस्था में नहीं रहते हैं।

सौभाग्य की देवी उनके साथ अधिक समय तक नहीं रहती जो दूसरे के सौभाग्य से ईर्ष्या करते हैं। वे ऐसे व्यक्तियों को अपनी बड़ी बहन को सौंप देती हैं।

भारत की लोकमान्यताओं में, जो वेदांत से उपजी हैं, सौभाग्य की देवी की बड़ी बहन दुर्भाग्य की देवी को माना जाता है। ये दोनों बहने हैं और ऐसा ही हम वेदांत में भी देखते हैं जहाँ सुख और दुख को समान माना जाता है।

भले ही आपको सद्गुणों और सौभाग्य का आशीष मिला हो लेकिन ईर्ष्या का कलंक आपको नरक की आग में धकेलने के लिए काफी है।

ईर्ष्या करने से कोई धनवान नहीं बना है। ईर्ष्या न करने वाले ने कुछ नहीं खोया है।

यह एक सत्य है लेकिन हम दूसरे के धन को देखकर इसे भूल जाते हैं। कवि कहते हैं कि दुर्भाग्य है कि अनेक मनुष्य ईर्ष्यालु प्रवृत्ति को पालते हैं और बिना कुछ पाए स्वयं को ही दुख पहुँचाते हैं।

अगले अंक में जारी…