भारती
तिरुकुरल से चयनित दोहे- भाग 1 में धर्म और गृहस्थ जीवन

कवि तिरुवल्लुवर ने तिरुकुरल नाम से एक पुस्तक की रचना की थी। इस पुस्तक में 1,330 दोहे हैं जिन्हें तमिल भाषा में कुरल कहा जाता है। सी राजगोपालाचारी (राजाजी) ने स्वराज्य के 1969 के अंकों में इस पुस्तक के कुछ चयनित दोहों का भावार्थ लिखा था जिसका अब हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है।

धर्म

धर्म से बड़ी कोई संपत्ति नहीं है जिसे मनुष्य प्राप्त कर सकता है और इसके अभाव से बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं है। धर्म को भूलना, धर्म के अनुसार अपने कर्तव्यों से चूकने के समान है।

संस्कृत शब्द धर्म के लिए तमिल भाषा में अरम शब्द है, वहीं अंग्रेज़ी भाषा में इसके लिए कोई शब्द नहीं है। कर्तव्य, सदाचार आदि ऐसे शब्द धर्म के संपूर्ण विस्तार को स्वयं में समेट पाने में अक्षम हैं।

तुम्हारी क्षमता और उपलब्ध संसाधन तुम्हें जितना आगे तक ले जा सकें, जाओ लेकिन अपने धर्म से डिगे बिना।

हर वस्तु को आदर्श से भटके बिना व्यवहारिक स्तर पर लाकर समझाने की तिरुवल्लुवर की यह विलक्षण प्रतिभा है।

मस्तिष्क को बुरे विचारों से मुक्त रखो। यही धर्म का सार है। बाकी सब सुनने-देखने योग्य है।

कृत्यों की शुद्धता का मार्ग है, विचारों की शुद्धता। एक धार्मिक जीवन का उद्देश्य है बुरे विचारों से मुक्त मस्तिष्क की प्राप्ति और यह एक शांत प्रक्रिया है। बाहरी संस्कार केवल देखने-सुनने के लिए हैं।

सच्चे धार्मिक जीवने के लिए इन चार चीज़ों से बचना चाहिए- ईर्ष्या, काम, क्रोध और कटु वचन।

अपने आपसे कभी यह न कहें कि जब मैं योग्य होऊँगा तब इसे करूँगा। अभी से सच्चा धार्मिक जीवन जीएँ। जब सारी चीज़ें अयोग्य और अदृश्य हो जाएँगी तब यही एक स्थिर सामर्थ्य आपके पास होगा।

सदाचार से जो सुख मिलता है, वही सच्चा सुखा है। अन्य सुख वास्तविकता में दुख और लज्जा के स्रोत हैं।

आनंद का फल लज्जा और दुख होगा यदि इसकी प्राप्ति का माध्यम अपवित्र होगा। इसलिए सदाचार न सिर्फ सही है बल्कि इसी में बुद्धिमता भी निहित है।

अच्छा गृहस्थ

एक गृहस्थ कर्तव्य परायण बनने में दूसरों की भी सहायता करता है।

एक अविवाहित छात्र जो सक्रिय जीवन त्यागकर जंगल जाकर सन्यासी बन जाता है, वह ऐसा करने में सिर्फ इसलिए समर्थ है क्योंकि कई अन्य लोग एक अच्छे गृहस्थ का जीवन निर्वहन कर रहे हैं। इसलिए एक गृहस्थ को सुख के लिए स्वार्थी की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। एक गृहस्थ उनके लिए भी कार्य करता है जो कर्म त्याग चुके हैं।

प्रेम और सदाचार ही एक गृहस्थ के जीवन को सच्चा चरित्र और उद्देश्य देते हैं।

गृहस्थ जीवन सुखद और उद्देश्यपूर्ण तब ही है जब इसमें प्रेम और धर्म हो। प्रेम इसे सुंदर बनाता है और धर्म इसे उद्देश्यपूर्ण। यदि धर्म के पथ पर चलकर कोई व्यक्ति गृहस्थ जीवन जीता है तो वैरागी बनकर या जंगल में जाकर उसके प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं बचता।

सभी वर्गों के धर्म के अभिलाषियों में से मानकों पर चलने वाला गृहस्थ ही सबसे आदरणीय है।

एक ऐसे गृहस्थ का जीवन, जो वह सब करता है जो किया जाना चाहिए और धर्म से डिगता भी नहीं, किसी एकांतवासी की तुलना में अधिक तपस्यापूर्ण होता है।

जो व्यक्ति अपना जीवन ऐसे जीता है जैसे जीया जाना चाहिए, उसका दर्जा स्वर्ग में देवताओं के समान होता है।

अगले अंक में जारी…