भारती
खुसरो ने दर्ज की है एक अजीब-सी प्रेम कहानी जिसका अंत खूनी रहा- इस्लाम भाग 18

अमीर खुसरो पहला ऐसा शख्स है, जिसने दिल्ली पर मुस्लिम कब्ज़े के बाद हिंदू राजपरिवार की औरतों को उठाकर लाने के विवरण दर्ज किए। वह अलाउद्दीन खिलजी के समय 1,000 तनके की नौकरी पर था, जब गुजरात के राजा कर्ण की रानी कमला दी पहले ही हमले में लूट की दौलत के साथ दिल्ली लाई गई।

उसकी बेटी देवल दी को लाने के लिए दूसरी बार हमलावर गुजरात भेजे गए थे। देवल दी भी खिलजी के महल में आ गई। वह छोटी-सी बच्ची थी। फिर वह वहीं अपनी माँ के साथ रही। पली-बढ़ी। अलाउद्दीन खिलजी का एक लड़का था खिज्र खां। अमीर खुसरो बता रहा है

“एक दिन एकांत में सुल्तान ने खिज्र खां काे बुलवाया और मलिक-ए-जहां से कहा कि वह उसके और दिवल रानी के विवाह के बारे में उससे कहे। खिज्र खां यह खबर सुनकर शरमा गया और वहाँ से चला गया। वह दिवल रानी से काफी मुहब्बत करता था।”

खुसरो का दावा है कि खिज्र खां ने ही एक दिन उसे देवल दी के साथ अपने प्रेम का बयान किया था। देवल दी काे उसने हर जगह दिवल रानी लिखा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस वक्त अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के बेटे खिज्र खां और गुजरात के राज परिवार से लूट के माल में लाई गई रानी कमला दी की अबोध बेटी की यह तथाकथित प्रेम कहानी लिख रहा है।

उस समय खिज्र खां की उम्र नौ साल और दिवल रानी की उम्र आठ साल थी। इसका मतलब यह है कि माँ-बेटी को दिल्ली आए करीब इतने ही साल हो चुके थे। हम नहीं जानते कि सब कुछ लुट जाने के बाद गुजरात में राजा कर्ण ने क्या किया? उसने अपनी रानी और बेटी को वापस लाने के लिए क्या कोशिश की या नहीं कीं? गुजरात पर क्या बीती होगी?

अमीर खुसरो इस लव स्टोरी में यह दिलचस्प जानकारी भी देता है कि खिज्र खां की शक्ल दिवल रानी के भाई से मिलती थी इसलिए वह खिज्र खां से प्रेम करने लगी थी। वे दोनों एक साथ ही खेला करते थे। जब राय कर्ण की बेटी नौ साल की हुई और खिज्र खां भी नौजवान हुआ तो अलाउद्दीन ने मलिका-ए-जहां से खिज्र खां की शादी को लेकर मशविरा किया। जनवरी 1316 में अमीर खुसरो ने यह तथाकथित प्रेम कहानी फारसी में लिखी।

अलाउद्दीन खिलजी और मलिका-ए-जहां के बीच यह तय हो गया कि खिज्र खां का निकाह उसके मामा अलप खां की बेटी से किया जाए। अलप खां को जब इस होने वाले रिश्ते के बारे में मालूम हुआ तो उसने खुश होकर इसे मंज़ूर किया।

महल की औरतों ने तब खिज्र खां और दिवल रानी के बीच पनप रहे प्रेम पर बात की। इसलिए यह उचित माना गया कि दोनों को अलग कर दिया जाए। खिज्र खां की माँ को यह सुझाव पसंद आया कि जब अलप खां की बेटी से खिज्र खां का निकाह होगा तो खिज्र खां और दिवल रानी दोनों को अलग कर देना चाहिए। दोनों के घर अलग-अलग कर दिए गए। अब वे सिर्फ आठवें-दसवें दिन ही एक दूसरे को दूर से देख सकते थे।

मलिका-ए-जहां ने दिवल रानी को लाल महल (कूशके-लाल) में भिजवा दिया। खिज्र खां को जब यह जानकारी मिली तब वह अपने उस्ताद के साथ बैठा कुछ पढ़ रहा था। वह फौरन लिखना-पढ़ना छोड़कर भाग और दिवल रानी से मिला।

अब खिज्र खां के निकाह की तैयारियाँ जोरशोर से शुरू हो गईं। महल के चारों तरफ सजावट की गई। गलियों और बाज़ारों को भी सजाया गया। दीवारों पर चित्रकारी की गई। शानदार खेमे और शामियाने लगाए गए।

ज़मीन कहीं दिखाई ही नहीं देती थी, सब तरफ फर्श बिछा दिए गए। ढोल और बाजे गूंजने लगे। तलवारबाज तलवार के ऐसे करतब दिखाने लगे कि वे बाल को भी बीच में से दो टुकड़े कर सकते थे। नट तमाशे दिखाने लगे।

बाजीगर गेंद को आसमान में उछालते और कोई तलवार को पानी की तरह निगल जाते। तरह-तरह के स्वांग होने लगे। कोई परी बन जाता, कोई देव। गायकों की मधुर तानें गूंजने लगीं। कद्दू के तंबूर बजते तो लोग मस्त हो गए।

तरह-तरह के हिंदुस्तानी बाजे बजने लगे। तांबे का ताल नाम का एक बाजा, सुंदरियों की उंगलियों पर ही रहता। हिंदुस्तानी सुंदरियों ने अपने होठों से पागलपन के द्वार खोल दिए। वे देवगिरि और दूसरी जगहों के रेशमी वस्त्र धारण किए थीं। संगीत के मधुर स्वरों पर नाचने वालीं नृत्य पेश करती थीं। जगह-जगह सोना लुटाया जा रहा था

अमीर खुसरो देख रहा है कि खिज्र खां की शादी की ऐसी तैयारियों का माहौल तीन साल तक चलता रहा। दिल्ली को जश्न में डूबा हुआ देखकर यह वहम नहीं पालना चाहिए कि बाकी मुल्क में सब अमन और खैरियत होगी। जिन तीन सालों में दिल्ली के गली-बाज़ारों और खिलजी के महलों में यह रौनक बरस रही थी, उस दौरान खिलजी के लुटेरे हमलावर दिल्ली से बाहर हर तरफ लूटमार मचाए रहे थे। हिंदुस्तान का सुख-चैन लुट चुका था। ज्योतिषियों ने खिज्र खां के निकाह की तारीख 2 फरवरी 1312 तय की। 

अमीर खुसरो एक कवि है। वह खिलजी की नौकरी में है। दिल्ली की रौनक में वह बेहद करीबी हिस्सेदार भी है। किस्मत हर तरफ से मेहरबान है। 1312 की इस शादी तक अलाउद्दीन खिलजी ने देवगिरि पर फिर हमले किए।

देवगिरि की मदद से तेलंगाना में लूटमार मचाई। तमिलनाडू में मदुरई तक उसके लुटेरे भूखे भेड़ियों की तरह हजारों की भीड़ में झपटे। राजस्थान में चित्तौड़गढ़, रणथंभौर और सिवाना बरबाद किए गए। हर तरफ से हिंदुस्तान के तबाह होने की खबरें दिल्ली में आ ही रही होंगी।

लेकिन हर बार लूट के माल में आया बेहिसाब सोना, चांदी, जवाहरात और लड़कियाँ इस्लाम के इन अनुयायियों के लिए तो नेमत ही थीं। चित्तौड़ पर कब्ज़े के बाद इस शहर का नाम अलाउद्दीन खिलजी ने इसी खिज्र खां के नाम पर ही खिज्रबाद रखा था और उसे ही सौंपकर दिल्ली लौटा था।

अमीर खुसरो भी आखिरकार एक मुसलमान ही था। उसका काम लिखना था। स्वभाव से वह कवि था तो ऐसे रौनकदार माहौल में उसने लिखा है– “शहज़ादा एक घोड़े पर सवार हुआ और बिस्मिल्लाह की आवाज़ चांद तक पहुँची। सितारों ने अलहम्दोलिल्लाह के नारे लगाए। शनिश्चर ने हिंदुओं के लिए हदकल्लाह कहा। सारे अमीर सवारी के साथ पैदल निकले।

वह आगे लिखता है, हाथियों पर सुनहरे हौदे कसे थे। रास्ते में जवाहरात, मोती और सोना लुटाए गए। यह जुलूस अलप खां के घर तक पहुँचा। शहजादा गद्दी पर बैठा। सद्रेजहां ने खुत्बा पढ़ा। लोगों को बेशकीमती तोहफे दिए गए। निकाह के बाद जैसे लोग आए थे, वैसे ही विदा हुए। लेकिन शहजादा अपनी प्रिया की याद में दुखी था।

खिज्र खां अपने मामू अलप खां की बेटी यानी अपनी ममेरी बहन से निकाह के वक्त अपनी प्रिया की याद में दुखी था, ऐसा अमीर खुसरो बयान कर रहा है। प्रिया मतलब दिवल रानी। वह जलवे की रस्म के समय भी बहुत बेचैन था।

इस निकाह के बावजूद खिज्र खां और दिवल रानी के बीच मुहब्बत कम नहीं हुई। एक दिन खिज्र खां ने मलिका-ए-जहां यानी अपनी अम्मी को एक संदेश भेजा। उसने कहलवाया कि पुरुष चार निकाह कर सकते हैं। बादशाहों के लिए तो बहुत बड़े परिवार और कई रानियों की ज़रूरत होती है। अमीर खुसरो ने लिखा

लाल महल से दिवल रानी को हाज़िर किया गया। दोनों का विवाह बिना किसी समारोह के गोपनीय तौर पर ही कर दिया गया। शहजादे की ज़िंदगी में इसके बाद बड़ा बदलाव आया। वह शेख निज़ामुद्दीन औलिया का मुरीद बन गया। वह नमाज़ पढ़ने और अल्लाह की इबादत में खो गया। बुरी बातों से तौबा कर ली।

गुजरात के राजपरिवार की रानी कमला दी अलाउद्दीन खिलजी के कब्ज़े में थी। उसकी बंधक बेटी दिवल रानी के सामने विकल्प ही क्या थे? कौन उसकी शादी के बारे में सोचता, किससे सोचता? खिलजी के लिए वह मासूम भी माले-गनीमत का हिस्सा थी।

खिज्र खां का निकाह उसके मामा अलप खां की बेटी से किया गया और इसकी तीन साल तैयारियों में दिल्ली के गली-कूचे सजाए गए। लेकिन एक दिन गुमनामी में दिवल रानी को बुलाकर उसे भी खिज्र खां के साथ बांध दिया गया।

यह कैसी मोहब्बत थी? अगर खिज्र खां को निश्छल प्रेम था दिवल रानी से तो उसने उसे भी अलप खां की बेटी की तरह शान-शौकत से क्यों नहीं अपनाया? हिंदू राजपरिवार की एक गुलाम और बदकिस्मत लड़की के साथ वही हुआ, जो उसकी माँ के साथ हुआ था। 

खिज्र खां और दिवल रानी के गुमनाम विवाह के बाद ही अलाउद्दीन खिलजी बीमार पड़ जाता है। तब तक गुजरात की पहली लूट में खंभात से लाए गए 1,000 दीनारी गुलाम मलिक काफूर का सितारा बुलंद हो चुका था।

बीमार अलाउद्दीन उसके कब्ज़े में था। खून की फसल काटने का समय आ चुका था। एक दिन मलिक काफूर ने अलप खां की हत्या करा दी। अब खिज्र खां की बारी थी। उससे शाही छत्र ले लिया गया और बीमार बाप के नाम से उसके अमरोहा जाने का हुक्म करा दिया गया।

खिज्र खां ने हुसामुद्दीन नाम के आदमी को शाही छत्र और दूरबाश दे दिए और मेरठ से अमरोहा चला गया। लेकिन एक दिन हिम्मत करके वह दिल्ली लौटता है। अपने बीमार बाप से मिला। लेकिन ताकतवर और क्रूर मलिक काफूर ने उसे कैद कराकर ग्वालियर के किले में भेज दिया।

20 साल तक हिंदुस्तान को बुरी तरह घायल करने के बाद दिल्ली में 4 जनवरी 1316 को अलाउद्दीन खिलजी मर गया। मलिक काफूर ने सुंबुल नाम के एक आदमी को ग्वालियर भेजा। उसे हुक्म था कि वह खिज्र खां को अंधा कर दे।

ग्वालियर के किले में सुुंबुल के गुर्गों ने शहजादे को नीचे पटक दिया और उसकी आँखों में सलाई फेर दी। सुंबुल को दिल्ली में इस काम के लिए काफूर ने बड़ी इज्ज़त बख्शी। मलिक काफूर ने खिलजी के बाकी बेटों को भी कैद में रखा और अलाउद्दीन के नाममात्र के उत्तराधिकारी के रूप में छह साल के शहाबुद्दीन को तख्त पर बैठा दिया।

इसके बाद दिल्ली के इतिहास में खून से सने 35 भयावह दिन हलचल से भरे हैं। हर दिन किसी का कत्ल, किसी की आँखें निकलवाना। आखिरकार खिलजी के बचे-खुचे भरोसेमंद लोगों ने एक दिन मलिक काफूर का ही कत्ल कर दिया।

दिल्ली में अब अलाउद्दीन खिलजी का एक और बेटा खिज्र खां का हमउम्र कुतबुद्दीन मुबारक शाह तख्त पर आता है। अंधा खिज्र खां ग्वालियर में कैद है। मुबारक शाह उसके पास संदेश भेजता है, मेरा ख्याल है कि मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँ और कोई राज्य प्रदान कर दूँ। लेकिन मुझे पता चला है कि तू दिवल रानी के कदमों में अपना सिर रखता है, जो कि एक गुलाम औरत है। यह मुनासिब नहीं। तू उसे मेरे दरबार में भेज दे।

खिज्र खां अपने भाई का यह प्रस्ताव सुनकर गुस्से में आ गया। उसने जवाब भेजा, तुम्हें राज्य मिल गया है। दिवल रानी को मेरे ही पास रहने दो। दिवल रानी ही मेरी धन संपत्ति है। यदि यह मुझसे छीन ली गई तो मैं पूरी तरह से गरीब हो जाऊँगा। उसे मेरे कत्ल के बाद ही हासिल किया जा सकता है।’

मुबारक शाह की नज़र अपने भाई की पत्नी (या सिर्फ एक काफिर गुलाम लड़की) दिवल रानी पर थी। उसे अंधे और कैद में पड़े खिज्र खां का यह जवाब पसंद नहीं आया। अब एक शख्स ग्वालियर भेजा जाता है। उसके पास खिज्र खां का सिर काटने का हुक्म है।

वह एक दिन और एक रात में ही दिल्ली से चलकर ग्वालियर पहुँचता है। किले के कोतवाल को मुबारक शाह का आदेश बताया जाता है। एक हिंदू ने तलवार से खिज्र खां काे कत्ल कर दिया। उसके छह साल के भाई शहाबुद्दीन को भी कत्ल कर दिया गया। लाशों को किले में विजय मंदिर नाम के बुर्ज में दफन कर दिया गया। 

अमीर खुसरो की लिखी खिज्र खां और दिवल रानी की यह प्रेम कहानी इस्लामी हुकूमत में खून से सनी दूसरी सदी की शुरुआत की एक रोंगटे खड़े करने वाली झलक पेश करती है। इसमें आप हिंदू राजघरानों से लूटकर लाई गई मजबूर औरतों और बच्चियों की नर्क हो चुकी ज़िंदगी को उतार-चढ़ावों से भरा हुआ देखते हैं। उस दिन जब खिज्र खां को मारा गया, खिलजी खानदान की औरतों ने रोना-चिल्लाना मचाया। लेकिन उनकी चीख पुकार ग्वालियर के किले में ही गूंजती रही।

हम नहीं जानते कि कमला दी का बाद में क्या हुआ और दिवल रानी कहाँ गई? कमला दी और दिवल रानी, भारत की कटु स्मृतियों में ही दो गहरे जख्म हैं, जो खिलजी ने छोड़े और ऐसे लाखों दाग हैं। हम नहीं जानते कि दिवल रानी और खिज्र खां के रिश्ते पर कमला दी ने क्या कहा होगा? उसे खिलजी के महलों के एकांत में गुजरात से आखिरी खबर क्या मिली होगी और कब किन हालात में कहाँ उसने आखिरी साँस ली होगी? 

अगले अंक में पढ़िए देवगिरि, तेलंगाना, मालवा और राजस्थान में अलाउद्दीन खिलजी के भीषण हमलों की लाइव दास्तान।

पिछला भाग- गुजरात पर भीषण हमला, सोमनाथ-पाटन तबाह, मुसलमान बने मुगल- इस्लाम भाग 17

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com