भारती
खुसरो खां के दमन के साथ दिल्ली में हिंदुओं का संहार- भारत में इस्लाम की पड़ताल (27)

अलाउद्दीन खिलजी के मरने के चार साल चार महीने बाद ही दिल्ली से खिलजी नाम का एक क्रूर अध्याय का खात्मा हो गया। खुसरो खां नाम से मुसलमान था, लेकिन वह धर्मांतरित था और उसके आसपास ज्यादातर लोग हिंदू थे। लोग इस बात की खुशियाँ मनाने लगे कि दिल्ली में हिंदुओं का राज्य स्थापित हो गया और इस्लामी राज्य का अंत हो गया।

इस अप्रत्याशित बदलाव के समय दिल्ली के रंग-ढंग बारीकी से देख रहे जियाउद्दीन बरनी का विश्लेषण है कि खुसरो खां के काबिज होने से दिल्ली और आसपास के मुसलमान तीन श्रेणियों में बटे साफ नज़र आ रहे हैं। आइए उसी से पूछते हैं कि दिल्ली में मुसलमानों में खिलजी के खात्मे के समय क्या चल रहा है, ध्यान से सुनिए-

तीन तरह के मुसलमान नज़र आ रहे हैं। एक, वे जो लालच और ईमान की कमज़ोरी से खुसरो खां के दोस्त हो गए हैं। वे हिंदुओं की हुकूमत से संतुष्ट हैं। वे खुसरो खां की तरक्की और खुशी की ख्वाहिशें कर रहे हैं। उनकी नज़र अपने फायदे पर है। वे खुसरो से दौलत हासिल करते हैं।

दूसरे, वे जिन्हें खुसरो खां की तरफ से तनख्वाह या इनामों से नवाज़ा जा रहा है। इनमें वे कारोबारी लोग भी हैं, जिन्हें फायदे और मुनाफे हासिल हो रहे हैं। लेकिन ये लोग दिल से दिल्ली में आए इस बदलाव को इस्लाम का नुकसान मानकर मन मसोसकर बैठे सिर्फ फायदे बटोरने में लगे हैं।

तीसरा तबका उन मुसलमानों का है, जो हिंदुओं के उभरने और उनकी तरक्की से बेहद दुखी हैं। मायूस हैं। इस सत्ता परिवर्तन को मुसलमानों की मानहानि मानकर उनकी नींद उड़ी हुई है। वे दिन-रात हिंदुओं के विनाश की दुआएँ कर रहे हैं।

खुसरो खां ढाई महीने ही दिल्ली में रह पाया। इन ढाई महीनों में और क्या हुआ, एसामी बता रहा है- “खुसरो खां ने बादशाह की हत्या के बाद बचे हुए शहजादों और बादशाह की माँ को भी मरवा दिया। उसने बेहिसाब दौलत लुटाई और बड़ी तादाद में अपने सहयोगी बनाकर सिंहासन पर बैठ गया। उसने पराव जाति को खास इज्ज़त दी। मुसलमान कमज़ोर हो गए। फौज को दो साल की तनख्वाह दी गई। उसने खुद को नासिरुद्दीन की उपाधि दी। अपने भाई हुसामुद्दीन को खानेखाना की उपाधि दी। लेकिन दो-तीन महीने में ही उसकी किस्मत पलट गई।

खूनखराबे से भरी इस एक और सदी में हमारे भरोसेमंद सूत्रों ने भी खुसरो खां को सख्त नापसंद किया है और बरनी ने तो जमकर गालियाँ दी हैं। उसे बहुत भला-बुरा कहा है। हालाँकि वह मुसलमान बन चुका था, लेकिन एक धर्मांतरित हिंदू के हाथों खिलजी वंश के नामोनिशान मिटने से वे उससे बेहद नाराज हैं।

उनमें यह भेद बराबर बना रहा कि पराव या ब्रादो या बरवार जाति के हिंदुओं में से एक शख्स मुसलमान बनकर कैसे हमारी बराबरी में आ सकता है? वह कैसे दिल्ली के तख्त पर बैठ सकता है? उसकी क्या मजाल कि वह तुर्कों पर हाथ उठाए? और इनकी हिमाकत तो देखो, हसन नाम के इस धर्मांतरित खुसरो खां ने तो अलाउद्दीन खिलजी के खानदान के सारे चिराग ही बुझा दिए।

बरवार, ब्रादो या पराव जाति के ये कौन हिंदू लोग थे? वे गुजरात में कहाँ से थे और दिल्ली तक कैसे चले आए? दिल्ली में आखिरी खिलजी सुलतान के इतना करीब वह कैसे आ गए कि सुलतान के बाद मलिक नायब के रूप में दूसरी बड़ी ताकत बन बैठे? क्या वे किसी प्रतिशोध के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे? वर्ना उन्होंने अपनी जाति को ही दाव पर क्यों लगा दिया?

जिस तरह से खुसरो खां ने कुतबुद्दीन मुबारक का खात्मा किया है, वह इससे पहले हुए दूसरे हिंसक तख्ता पलट जैसा ही एक और खूनी घटनाक्रम नहीं है। निश्चित रूप से गुजरात मूल के इन हिंदुओं के अचानक उभार के पीछे कोई कहानी होनी ही चाहिए। लेकिन वह क्या हो सकती है?

अब आप थोड़ा पीछे आएँ। गुजरात पर अलाउद्दीन खिलजी का हमला (सन् 1299 में) उसके दिल्ली पर कब्ज़े के तीन साल बाद का है, जब राजा कर्ण का राज्य लूटकर बुरी तरह से बरबाद कर दिया गया। उसकी इज्ज़त भी बुरी तरह लूट ली गई, जब रानी कमला दी और उनकी बेटी देवल को लूट के माल में दिल्ली लाकर अलाउद्दीन के सामने पेश किया गया।

मुमकिन है कि कमला दी और देवल के साथ राज परिवार के और सेवक भी गुलामों की शक्ल में दिल्ली लाए गए हों और उनसे इस हसन, उसके भाई हुसामुद्दीन और दोनों के मामा रंधौल का कोई नाता हो। कुतबुद्दीन मुबारक के कत्ल और गुजरात हमले के बीच लगभग 20 साल का फासला है। जब देवल दी को गुजरात लाया गया तब वह छह महीने की थी। वह खिलजी के हरम में ही बड़ी हुई और बचपन में खिज्र खां के साथ खेली। बाद में उसी के साथ उसका निकाह कर दिया गया था।

मुमकिन है हिंदू गुलाम के रूप में दिल्ली आए हसन और हुसामुद्दीन ने उसी दौरान इस्लाम कुबूल कर लिया हो। लेकिन वे अपने राज्य और राजा की बरबादी के ज़िम्मेदार इन दुर्दांत अपराधियों के बीच दम साधकर बैठे रहे हों। अलाउद्दीन के ज़िंदा रहते तो वे सिर उठा नहीं सकते थे। सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार ही करते रहे हों।

एक दिलचस्प संयाेग यह भी है कि जिस मलिक काफूर ने अलाउद्दीन खिलजी को मारकर उसके बेटों को अंधा करके कैद में डाला, वह भी गुजरात का ही था। अब यह भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि हसन-हुसामुद्दीन गुजराती होने के नाते इस मलिक काफूर के भी परिचित रहे हों और जब काफूर ने खिलजियों को निपटाकर खुद तख्त संभाला तब ये दोनों भाई भी कहीं किसी भूमिका में रहे हों।

ऐसी भी कोई कहानी हो सकती है कि हसन-हुसामुद्दीन और उनके मामा रंधौल के खानदान खिलजी के गुजरात हमलों के दौरान कहीं खुद किसी असरदार भूमिका में रहे हों और उनका अपना बहुत कुछ ऐसा खोया हो कि उसका बदला लेने के लिए वे दिल्ली में अपनी बारी का इंतज़ार करते रहे हों! आज हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं।

खुसरो खां का अचानक उभार हम कुतबुद्दीन मुबारक के ही दौर में देखते हैं। अजीब यह है कि खुसरो खां ने खुद तख्त पर बैठने का दुस्साहस क्यों किया, क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि उसके पास हुकूमत का कोई तजुर्बा था नहीं। वह बिल्कुल अज्ञात कुल गोत्र का था।

दिल्ली में दहशत का राज 125 साल पुराना हो चुका था। बिखरे हुए हिंदू राज्य पस्तदम थे और अपने हिस्से की अगली बेइज्ज़ती और लूट का ही इंतज़ार करते थे। दिल्ली में बैठा हर नया सुलतान उनके राज्यों से अपने हिस्से की लूट के लिए हमला करता ही था।

लूटमार, कत्लेआम की इस इस्लामी हुकूमत में टॉप लेवल पर खुसरो खां जैसे नौसिखिए क्या गुल खिलाने के मकसद से अपनी जान की बाजी लगा रहे थे? उनके ऑपरेशन का तरीका बताता है कि वे ज़रूर बदले की भावना से खिलजियों को मिटाने पर आमादा थे और यह उन्होंने कर भी दिखाया। लेकिन किस कीमत पर? ढाई महीने बाद उनमें से कोई नहीं बचा। पूरी जाति को मिटा डाला गया।

फिलहाल दिल्ली में कुतबुद्दीन मुबारक, उसके भाइयों और उसके करीबियों के कत्ल की खबरों के साथ ताज़ा खबर यही है कि खुसरो खां की ताजपोशी हो चुकी है। मुसलमानों का बड़ा तबका मन मसोसकर इसे अपने लिए अच्छे दिनों का अंत मान बैठा था।

खुसरो खां की मुस्लिम पहचान में भी उन्हें अपने लिए कोई राहत नज़र नहीं आ रही थी। वे धर्म परिवर्तन कर चुके इस हसन उर्फ खुसरो खां को अब भी पराव, ब्रादो या बरवार जाति के हिंदू के ही नज़रिए से देख रहे थे? उन्हें यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था कि एक धर्मांतरित हिंदू दिल्ली के तख्त पर बैठे? इस्लाम की बेहतरी की गारंटी विदेशी मूल के तुर्कों में ही थी।

खुसरो के सामने सबसे बड़ी चुनाैती मज़बूती से टिके रहने की रही होगी। लेकिन जो ब्यौरे उपलब्ध हैं, उनसे यह अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि नातजुर्बेकारी उसे ले डूबी। आसपास के बचे-खुचे हिंदू राज्यों से दिल्ली में अपने लिए समर्थन जुटाने के उसके किसी प्रयास का कोई जिक्र नहीं है।

एक बात तय है, दिल्ली के 125 साल के किस्से सुनने के बाद उन्हें इतना तो अंदाज़ा होगा कि वे मौत के मुँह में आ बैठे हैं। सब कुछ आत्मघाती था। एक पूरी हिंदू जाति ने यह दाव आखिर क्यों खेला था? क्या यह सिर्फ खिलजियों से लिया गया कोई प्रतिशोध था? यदि ऐसा नहीं था तो क्या वे नहीं जानते थे कि वे ज्यादा टिक नहीं पाएँगे और बुरी मौत मारे जाएँगे?

दिल्ली में मची इस उथलपुथल से दूर हम शाही अस्तबल में घोड़ों की देखभाल कर रहे एक नौजवान पर गौर करते हैं, जो खिलजियों के कत्लेआम के बाद ही कहीं भागने की फिराक में है। वह आखुरबक है, जिसका मतलब है अस्तबल की देखरेख करने वाला अधिकारी। उसका नाम है मलिक फखरुद्दीन जूना।

एक दिन वह दिल्ली से करीब 500 किलोमीटर दूर अपने बाप गाज़ी मलिक के पास भाग निकला ताकि यहाँ की दर्दनाक खबरें उसे सुना सके। वह जगह आज के पाकिस्तान के हिस्से में मौजूद पंजाब के अकोरा जिले की एक तहसील है दिपालपुर। लाहौर से मुल्तान के रास्ते में है यह पुरानी बस्ती, जिसे दिल्ली पर काबिज तुर्कों अपने किसी खासमखास को ही सौंपते थे।

दिपालपुर में गाज़ी मलिक का कब्ज़ा है, जो खिलजियों के अंत की लाइव स्टोरी सुनकर आपे से बाहर है। फखरुद्दीन जूना उसका बेटा है, जो खिलजियों के घोड़े साफ करने के काम में लगा था। इस फखरुद्दीन जूना से हम जियाउद्दीन बरनी के साथ कुछ साल बाद दिल्ली में ही मिलने वाले हैं। अभी आप यह जानकर चौंकेंगे कि इस वक्त घोड़ों की खिदमत छोड़कर दिपालपुर भागकर आया फखरुद्दीन ही दिल्ली का एक और अगला सुलतान मुहम्मद तुगलक है, जो अपने अजीबो-गरीब फैसलों और खिलजी जैसी बेरहमी के लिए इतिहास में सबसे कुख्यात है।

गाज़ी मलिक आग-बबूला है। वह शहजादों की मौत का बदला लेने की कसम खाता है। उसने दिल्ली पर हमले के लिए सेना की तैयारी की। एक बार फिर कुछ हिंदू नज़र आते हैं। ये हैं खुख्खरों के सरदार गुलचंद-सहजराय। ये ताकतवर हिंदू गाज़ी मलिक के साथ हैं।

इससे यह भी पता चल रहा कि मुसलमानों के कब्जे के 125-150 साल बाद भी इस इलाके में ऐसे हिंदू सरदार थे, जिनकी ताकत थी और जिन्हें एसामी जैसे हमारे भरोसेमंद सूत्र ने अपनी डायरी में दर्ज करना नहीं भूला। इन हिंदुओं के साथ कई मुस्लिम सरदारों की एक सेना खुसरो खां का हिसाब चुकता करने के लिए दिल्ली की तरफ कूच करती है।

खुसरो खां भी अपने भाई हुसामुद्दीन को एक फौज के साथ रवाना करता है। वे हांसी तक आ पहुँचते हैं। सरसुती नाम की जगह पर दोनों फौजें टकराती हैं। अजीबो-गरीब दुश्मन आमने-सामने हैं। एक तरफ हैं गाजी मलिक और बहराम एबा जैसे खूंखार कट्‌टर मुस्लिम, काफिरों के कत्लेआम के लिए जिनका जमकर गुणगान तमाम मुस्लिम लेखकों ने किया है।

इनकी फौज के आगे हैं गुलचंद-सहजराय के हिंदू जत्थे। यह एक ऐसी जंग है, जिसके लाइव कवरेज हमारे पास हैं। गाज़ी मलिक दिल्ली कूच करता है। यहाँ से भी हम देखते हैं कि गुलचंद-सहजराय खुख्खरों के साथ सबसे आगे चल रहे हैं।

दिल्ली से खुसरो खां की फौज में कच, ब्रह्म और रंधौल के नाम खास हैं। यह जत्था गाज़ी मलिक के खेमे में मौजूद फखरुद्दीन जूना की टुकड़ी पर धावा बोलता है और उसे भागने पर मजबूर कर देता है। एसामी के शब्द हैं- “तुगलक की सेना की कमज़ोरी देखकर पराव सेना उसपर टूट पड़ी।”

खुसरो खां ने तुगलकों में भगदड़ देखी तो कर्कमाज नाम के एक सरदार को तुगलक के शिविर पर हमले का हुक्म दिया। एक ने आगे बढ़कर तुगलकों के शिविर की रस्सियाँ काट दीं। औरतों ने शोर मचाना शुरू कर दिया कि तुगलक तो भाग गया।

तुगलक ने शोर सुना। उसने 100 बहादुरों को चुनकर गुलचंद के हवाले किया और कहा कि खुसरो खां की सेना के बीच में घुस जाओ। गुलचंद बहुत बढ़-चढ़कर तुगलकों के साथ है। उसके हमले ने खुसरो खां के इरादों पर पानी फेर दिया। उसकी फौज बिखर गई। खुसरो भाग निकला। गुलचंद के लोग उसका पीछा कर रहे हैं।

खुसरो खां के भाई हुसामुद्दीन को आधी रात को पकड़ लिया गया है। उसे तुगलक के सामने पेश किया गया। हुक्म हुआ कि उसे शहर में घुमाया जाए। फिर कत्ल कर किले के फाटक पर लटकाया जाए। इसके बाद पूरी पराव जाति को कत्ल कर दिया जाए। सुबह से शाम तक पराव जाति के लोगों की हत्याएँ होती रहीं। पराव जाति की बहुत बड़ी तादाद मार डाली गई और बहुत सारे बंदी बनाए गए।

गाज़ी मलिक की फौज संख्या में कम थी, लेकिन उनके पास तुर्क, मुगल, ताजिक, खुरासानी और हिंदू खुख्खर जैसे लड़ाका जातियों के युद्धप्रिय लोग थे। खुसरो खां की दिल्ली की फौज संख्या में ज्यादा थी, लेकिन उसकी कमान ढीली थी और वे दिल से उसके साथ भी नहीं थे। उनमें भी हिंदू और मुस्लिम दोनों थे। आखिरी आमने-सामने की लड़ाई दिल्ली के पास इंद्रप्रस्थ के इलाके में हुई। गाजी मलिक हांसी, रोहतक और लहरावत होता हुआ यहाँ आया। अमीर खुसरो ने लिखा है

10,000 ब्रादों जाति के सवार मरने की ठानकर रेशमी रूमाल बांधकर आए। उनके नाम हैं- अहरदेव, अमरदेव, नर्सिया, परसिया, हरमार और परमार आदि। उनकी सूरतें काली थीं। वे कुछ झंडों में गाय की दुम बांधकर आए। आगे जंगली सुअरों के दाँत लटके हुए थे। इस तरह आधी हिंदू, आधी मुस्लिम सेना और अत्यधिक सामान के साथ खुसराे मैदान में पहुँचा।

मैदान में मारकाट मच गई। तुगलक की सेना के मुसलमान सैनिकों ने दिल्ली के मुसलमान सैनिकों के साथ थोड़ी रियायत भी की लेकिन बड़ी तादाद में हिंदू खुख्खरों ने मुस्लिमों का बुरी तरह संहार किया।

एक भगदड़ होती है। खुसरो खां का ख्वाब बिखर जाता है। फतह होने पर गाज़ी मलिक का भाषण है- “मैं आम इंसान था। सुलतान जलालुद्दीन ने अपना भरोसेमंद मुझे बनाया। फिर अलाउद्दीन की खिदमत की। उसका मुझपर बड़ा हक है।

जब मैंने सुना कि खुसरो खां ने अपने मालिक कुतबुद्दीन को कत्ल कर दिया है तो मैंने विलाप किया और तीन कसमें खाईं-इस्लाम के लिए जिहाद करूँगा, इस राज्य को इस तुच्छ हिंदू से मुक्त कराऊँगा और जिन काफिरों ने शाही वंश का नाश किया है, उन्हें सज़ा दूँगा।

खुसरो खां को भी पकड़कर गाज़ी मलिक के सामने लाया जाता है। अमीर खुसरो ने दोनों के बीच हुई बातचीत भी रिकॉर्ड की है। आखिर में जल्लादों को हुक्म होता है कि जिस जगह पर कुतबुद्दीन मुबारक को कत्ल किया गया था, उसकी जगह पर खुसरो खां का सिर कलम कर दिया जाए। खुसरो खां का कटा हुआ सिर लोगों के पैरों तले रौंदने के लिए खुले में फिंकवा दिया गया। देखिए बरनी कितना खुश है, बता रहा है-

“इस्लाम में नई जान आ गई है। इस्लामी कायदे ताजा हो गए हैं। कुफ्र की बातें जमीन में दफन हो चुकी हैं। हम सबके दिल शांत हैं।

अगले भाग में हम गाजी मलिक को गयासुद्दीन की उपाधि सहित दिल्ली पर काबिज होता हुआ देखेंगे। दिल्ली के रंगमंच पर अब तुगलक खानदान आ रहा है।

पिछला भाग- कुतबुद्दीन के खास हसन के नेतृत्व में दिल्ली पर धर्मांतरित हिंदुओं का कब्ज़ा- भाग 26

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com