भारती
केदारपुरी- कैसे केदारनाथ का पुनर्विकास प्रकृति और परंपरा के पैमाने पर खरा उतरता है
मैसुरु - 12th August 2019

2013 की उत्तराखंड बाढ़ ने केदारनाथ के आसपास के क्षेत्र को नष्ट किया, केदारपुरी ग्राम लगभग पूर्णतः नष्ट हो गया था। इस क्षेत्र को पुनर्विकसित करने के लिए मोदी ने एक परियोजना शुरू की। अगर सबकुछ योजनानुसार हुआ तो यह विरासत स्थल वुनर्विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण होगा। यह परियोजना- पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी), परंपरा, मूल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वच्छता- सभी पैमानों पर खरी उतरती है।

समुद्र तल से 11,657 फीट ऊँचाई पर स्थित केदारनाथ हिंदुओं के तीर्थस्थलों में सबसे सुंदर और स्वर्गीय है। गाथाओं और अध्यात्म में गहराई वाले इस स्थल के रिकॉर्ड छठी शताब्दी से पाए जाते हैं और तबसे यहाँ केदारनाथ की पूजा लगभग निरंतर ही हो रही है।

भले ही यह स्थल हिमालय की घाटियों में स्थित है लेकिन इसके मुख्य पुजारी पारंपरिक रूप से कर्नाटक के वीराशैव समुदाय से होते हैं। इस तीर्थस्थल का उल्लेख तमिल भक्ति कार्यों में भी मिलता है। केरल में जन्म लेने वाले आदि शंकर, जो सबसे प्रभावशाली दार्शनिक हैं, के लिए माना जाता है कि उन्होंने यहीं पर समाधि ली थी।

इसके निकटवर्ती बद्रीनाथ के साथ इस तीर्थस्थल का मार्ग सबसे दुर्गम माना जाता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को 16 किलोमीटर की चढ़ाई करनी होती है।

केदारपुरी गाँव, जहाँ यह तीर्थस्थल स्थित है, का पुनर्विकास किया जा रहा है लेकिन इससे पहले 2013 में आई बाढ़ इतनी भयंकर थी कि गाँव में एक भी भवन उसे झेल नहीं पाया।

पुनर्विकास का ऊपर से दृश्य

पुनर्स्थापन के साथ यह परियोजना इस क्षेत्र के लाभों और सुरक्षाओं को भी सुनिश्चित करेगी। यह परियोजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निगरानी में हो रही है जिससे कई लोग संतुष्ट हो सकते हैं और कुछ आक्रोशित भी।

2013 की बाढ़ के बाद तत्कालीन राज्य सरकार ने विध्वंसकारी प्रबंधन के साथ पुनर्स्थापन किया जिसके बाद किसी भी हृदयवान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य था कि महादेव के इस विशेष निवास की भव्यता और गौरव लौटे। और मोदी यही कर रहे हैं लेकिन उससे पहले हमें इस क्षेत्र के भूगोल और 2013 की बाढ़ के कारणों को समझना होगा।

दूर से ऐसे दिखेगा केदारनाथ धाम

चार धामों में सबसे ऊँचाई पर स्थित केदारनाथ समुद्र तल से 11,600 फीट ऊपर है। मंदाकिनी नदी के पूर्व में स्थित इस मंदिर के दर्शन करने हेतु 2018 में 7 लाख श्रद्धालु आए थे (इस वर्ष बद्रीनाथ में 10 लाख श्रद्धालु गए थे) और इस वर्ष आषाढ़ के अंत तक 8 लाख श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे।

इस ऊँचाई पर यह एक आखिरी स्थान है जहाँ लोग निवास करते हैं जो इसे नीतिगत रूप से भी महत्त्वपूर्ण बनाता है। 1860 के दशक का यह चित्र इस स्थान के आकर्षण को बताता है। केदारपुरी ग्राम पंचायत है और यहाँ की स्थाई जनसंख्या भी है।

केदारनाथ का पुराना चित्र

मंदाकिनी नदी चोराबारी ग्लेशियर से निकलती है जो केदारपुरी के पश्चिमोत्तर में स्थित है बहुत बड़ा ग्लेशियर है। उत्तर-दक्षिण धुरी पर यह नदी मंदिर के पश्चिम से गुज़रती है। एक और प्रमुख धारा है सरस्वती नदी की चोराबारी के निकटवर्ती ग्लेशियर से निकलती है और मंदाकिनी में मंदिर से पहले मिलती है।

2013 के बाद क्षेत्र का चित्र

यह सरस्वती का नया मार्ग है, इससे पहले यह मंदाकिनी के समानांतर में मंदिर के पूर्व से गुज़रती थी और मंदिर के बाद मंदाकिनी में मिलती थी। सरस्वती के मार्ग बदलने का कारण इसके निकट भवनों का अत्यधिक निर्माण है, इतना कि नदी को अपना मार्ग ही बदलना पड़ा।

सरस्वती का जलग्रहण (कैचमेंट) क्षेत्र काफी बड़ा है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि कई धाराओं को सरस्वती का नाम दिया जाता है, विशेषकर हिमालय में। एक और धारा सरस्वती को (अलकनंदा की सहायक नदी) माना गाँव (बद्रीनाथ से ऊपर स्थित इस ऊँचाई पर आखिरी बसावट) से ऊपर देखा जा सकता है। इसका उद्गम भारत-तिब्बत सीमा के निकट एक ग्लेशियर से हैं। 2013 की आपदा को समझने के लिए केदारपुरी के निकट स्थित नदियों को समझना होगा।

झील, ग्लेशियर और नदी को दर्शाता सैटेलाइट चित्र

उपरोक्त चित्र पूरे क्षेत्र का अनुपात दर्शाता है। ग्लेशियर काफी बढ़े हैं और नदी के उद्गम स्थल पर कई सेडिमेंट होते हैं। चित्र में अंडाकार की तरह चिह्नित क्षेत्र केदारपुरी ग्राम है। दूसरे चित्र में मंदाकिनी नदी का पोषण करने वाले ग्लेशियरों को देखा जा सकता है।

कहानी की खलनायिका चोराबारी झील उन दर्जनों ग्लेशियल झीलों में से एक है जो केदारपुरी से ऊपर मंदाकिनी नदी तंत्र का भाग हैं। औसत रूप से 20 मीटर गहरी यह झील मूल रूप से ग्लेशियर की टोंटी से जुड़ी हुई थी। हालाँकि ग्लेशियर के लगातार पिघलने से झील का क्षेत्र बढ़ा।

इसके अलावा मोटी मोराइन (असंपिंडित ग्लेशियल चट्टान जो अस्थिर होती है) की दीवार वार्षिक रूप से ग्लेशियर के पीछे हटने (रीट्रीट से बनती है। (ये न सोचें की ग्लेशियर मानव गतिविधियों के कारण पीछ हट रहा है। ग्लेशियल रीट्रीट हिम युग के अंत के बाद से हो रहा है और इसी कारण से इन पहाड़ों के बीच इतनी सारी झीलें स्थित हैं।)

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन ज्योलॉजी, देहरादून के अनुसार जून 2013 तक मोराइन निर्माण सर्वाधिक था (इस संस्थान की वेधशालाएँ चोराबारी ग्लेशियर और इससे कुछ किलोमीटर पूर्व में स्थित हैं)।

झील नदी से 2 किलोमीटर दूर है लेकिन 700 मीटर अधिक ऊँचाई पर। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि 2013 से पूर्व यह भौगोलिक क्षेत्र कितना खड़ा था। 2013 की बाढ़ के बाद कई लोगों ने इस झील को मृत घोषित कर दिया था। लेकिन कहानी में एक मोड़ है जो लेख में आगे समझाया गया है। अब हम समझ चुके हैं कि झील का मुख्य स्रोत बर्फ का पिघलना और वर्षा है।

2013 में रिकॉर्ड की गई वर्षा

2012 में पाँच वर्षों में सर्वाधिक वर्ष हुई थी। सरकार की उदासीनता के कारण इस विध्वंस से राज्य मुश्किल से उबरा ही था कि 2013 आ गया। सामान्यतया यदि वर्षा जून के आरंभ में ही शुरू हो गई तो अधिक वर्षा की संभावना बढ़ जाती है। सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है लंबे समय से सूखा और अचानक भारी वर्षा। 2013 में ऐसा ही हुआ था (कुछ शोधपत्र बताते हैं कि क्यों जून 2013 की वर्षा इतनी भारी थी)।

16-17 जून 2013 में सामान्य से अधिक वर्ष हुई थी। चोराबारी ग्लेशियर की वेधशाला 15 जून की शाम 5 बजे से 16 जून के सुबह 5 बजे तक 12 घंटों में 210 मीमी. बारिश हुई थी। 16 जून को सुबह 5 से शाम 5 बजे तक 115 मीमी. वर्षा हुई थी। इस प्रकार 24 घंटों में 325 मीमी. वर्षा हुई।

इस भारी वर्षा और अल्प हवा दबाव ने झील को इतना पोषित किया कि झील का जल स्तर 7 मीटर ऊपर उठ गया। इसके साथ ग्लेशियर भी पिघलने लगा। मोराइन दीवार जो ग्लेशियर और झील के बीच बनी थी, वह बढ़ते दबाव में टूट गई।

केदारपुरी के बाद मंदाकिनी घाटी संकड़ी हो जाती है और इसमें खड़ी ढलान भी आ जाती है। ऐसा सोनप्रयाग तक होता है जिसके बाद घाटी चौड़ी होती है और ढलान भी कम होती है। समझने के लिए नीचे का चित्र देखें।

क्षेत्र में ढलान

ग्लेशियर और झील को प्रभावित करने वाली भारी वर्षा के दो विनाशकारी परिणाम हुए।

16 जून को भारी वर्षा के कारण सरस्वती नदी ऊफान पर थी। घटना के बाद के सैटेलाइट चित्र दिखाते हैं कि पुराने-नए सभी जलमार्ग भरे हुए हैं। पुरानी धाराएँ सेडिमेंट से भरी थीं और नई धाराओं में कुछ मीटर बड़े तक के पत्थर बह रहे थे।

इस भारी-भरकम बहार ने केदारपुरी के उत्तर में हमला बोला और आदि शंकराचार्य समाधि, भरात सेवाश्रम और पुरानी सरस्वती नदी के निकट स्थित भवनों को नुकसान पहुँचाया। इस स्थान पर अभी तक का यह सबसे बड़ा विध्वंस था।

इससे ग्राम का उत्तरी भाग पूरी तरह बह गया था। भारी वर्षा, भारी सेडिमेंट के साथ संकड़ी घाटी की ढलान से रामबारा पहुँचा और जैसे पत्थरों की वर्षा हुई, वैसे पूरे क्षेत्र में 16 जून को विध्वंस मचाया।

दूसरी घटना 17 जून को हुई। भारी वर्षा ने झील को पूरी तरह भर दिया था और कमज़ोर मोराइन दीवार पर दबाव बनाया। वर्षा ने हिमखंड को भी जल्दी पिघलाया जिससे तीन दिनों में झील में पानी बहुत भर गया।

मोराइन दीवार दबाव को झेल नहीं पाई और अंततः 17 जून की सुबह को टूट गई। इससे सेडिमेंट सहित मंदाकिनी में अथाह पानी आ गया। चोराबारी झील से कुछ मिनटों में तीव्र वेग से लगभग 30 करोड़ लीटर पानी बहा (अब यह झील बंजर है और ग्लेशियर के टुकड़ों ने इसे भर रखा है, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि झील को पुनर्जीवित होने में लगभग शताब्दी भर का समय भी लग सकता है)।

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार जहाँ घाटी चौड़ी है, वहाँ नदी का जल स्तर 5-7 मीटर से बढ़ा और जहाँ संकड़ी है, वहाँ 10-12 मीटर से। इस घटना ने न सिर्फ केदारपुरी में विध्वंस मचाया बल्कि गौरिकुंड, सोनप्रयाग और फाटा में भी अभूतपूर्व विनाश हुआ।

भारी मात्रा के बहाव के कारण पहाड़ियों के आधार पर कटाव हुआ जिस कारण घाटी में कई भूस्खलन हुए। इसके बाद जान और माल का अभूतपूर्व नुकसान हुआ और सुरक्षाबलों द्वारा अविस्मरणीय बचाव कार्य किया गया लेकिन सरकार के राहत कार्य दीन रहे। यह आसान परिस्थिति नहीं थी।

17 जून 2013 के बाद केदारपुरी

उत्तराखंड और अन्य राज्य के लोगों, जिन्होंने अपने सगे-संबंधियों को इस आपदा में खोया, के मानस पटल पर 2013 की घटना का कभी न मिटने वाला घाव अंकित हो गया। इस पृष्ठभूमि और आपदा प्रबंधन के अपने ट्रैक-रिकॉर्ड के कारण मोदी ने केदारपुरी के पुनर्स्थापन और पुनर्विकास का दायित्व लिया।

श्री केदारनाथ उत्थान चैरिटेबल न्यास पर विशेष रूप से इस पुनर्स्थापन कार्य का भार डाला गया। सीएसआर के द्वारा एक बड़ी कंपनी भी इसमें सहयोग के लिए तैयार हो गई। मुख्य उद्देश्य था कि केदारपुरी ग्राम को बाढ़-रोधक बनाया जाए।

केदारपुरी से 35-40 किलोमीटर नीचे मंदाकिनी (जून 2013 में)

मुख्य रूप से निर्माण कार्य में ध्यान गुफाएँ, पहाड़ के आधार स्थल पर स्मारक, सड़क निर्माण एवं चौड़ीकरण, घाट निर्माण और सरस्वती नदी के किनारे रिटेनिंग दीवार बनाई जानी हैं।

इनके अलावा इस परियोजना में केदारपुरी की मध्य सड़क का चौड़ीकरण, आदि शंकर समाधि और वर्चुअल संग्रहालय, विश्राम गृह, केदारपुरी में तीर्थ पुरोहित के लिए गृह, लेज़र शो और प्रवेश प्लाज़ा पर एक भवन का निर्माण किया जाएगा।

महत्त्वपूर्ण यह है कि इस परियोजना के अंतर्गत रिटेनिंग संरचनाएँ भी बनाई जा रही हैं जो केदारपुरी को संरक्षण प्रदान करेंगी। केवल एक ही चीज़ है जिससे एक पारंपरिक व्यक्ति असहज है- वह है लेज़र व लाइट-साउंड शो। इसे अस्वीकृत करना चाहिए क्योंकि यह इस स्थान की पवित्रता से मेल नहीं खाता है।

सड़क चौड़ीकरण और नई सड़कों का निर्माण (फुटपाथ) आवश्यक है क्योंकि 2013 में ये पूरी तरह नष्ट हो गए थे। नए मार्ग ढलान और जलनिकास को ध्यान में रखकर बनाए जो रहे हैं, यह व्यवस्था पहले नहीं थी।

निर्माणाधीन रिटेनिंग दीवार, चित्र श्रेय- हृदयेश जोशी

घाट और इनके निकट रिटेनिंग दीवार आवश्यक इसलिए हैं क्योंकि इससे पहले नदी तक पहुँचना बहुत कठिन था क्योंकि इसके लिए सीढ़ियाँ नहीं थीं। सीढ़ियों द्वारा औप मंदाकिनी और सरस्वती के जल को स्पर्श कर सकते हैं। ऐसे पौराणिक क्षेत्र पर जाकर नदी का स्पर्श न करना, कैसे हो सकता है।

कुछ विश्राम गृह भी बनाए जा रहे हैं। ये विश्राम गृह योजनाबद्ध तरीके से बनाए जाएँगे, पुराने भवनों की तरह बेतरतीब नहीं। इन विश्राम गृहों का उद्देश्य पर्यटन का प्रोत्साहन नहीं है।

जो भी लोग यहाँ गए हैं, उन्हें अनुमान है कि मौसम की कितनी भूमिका है। आवश्यक है कि श्रद्धालुओं को बुरे मौसम से बचाया जाए। जो श्रद्धालु कई किलोमीटर चढ़कर पहुँचते हैं, उन्हें विश्राम की आवश्यकताहोती है और श्री केदारनाथ के दर्शन से पूर्व स्नान करना चाहते हैं। ये विश्राम गृह उनकी सुविधा के लिए हैं।

भीड़ से बचाने के लिए मंदिर के निकट के अतिक्रमणों को हटाया जा रहा है। प्रवेश पर एक बड़ा वृत्तिकार प्लाज़ा है जहाँ तीर्थयात्री बैठ सकते हैं और अपनी बारी की प्रतीक्षा कर सकते हैं। यह प्लाज़ा और चौड़ा मार्ग श्रद्धालुओं के दर्शन को सुगम बनाता है। इस वर्ष भीड़ को नियंत्रित करने के लिए टोकन प्रणाली का भी प्रयोग किया गया है।

प्रवेश प्लाज़ा से मंदिर का दृश्य

मंदिर जाने का मार्ग दुकानों और होटलों से बाधित था, इनमें से अधिकांश 2013 में बह गए थे। इन भवनों के कारण दूर से मंदिर को देखा नहीं जा सकता था। यह परियोजना सुनिश्चित कर रही है कि मंदिर दूर से ही दृष्टिगोचर हो।

विश्राम गृह, निवास भवन और घाट थोड़ी ऊँचाई पर नदी के मार्ग को ध्यान में रखकर बनाए जाएँगे। उदाहरण के लिए रिटेनिंग दीवार का निर्माण देखें। गेबियन (जाली के भीतर रखे गए पत्थर) दीवार संरचना को सहारा देने के लिए कॉन्क्रीट की बट्रेस दीवार भी बनाई जाएगी जो केदारपुरी में मलबे को आने से रोकेंगे।

ये दीवार भारी मात्रा के बहाव और मलबे का मार्ग भी मोड़कर नदी के मार्ग में जोड़ सकेगी। नदी की किसी धारा को केदारपुरी में आने से भी इस दीवार के माध्यम से रोका जा सकेगा। बहाव को धीमा करके, ये दीवार गतिरोधक का काम भी करेगी।

कुछ लोगों ने परियोजना पर निशाना साधने के लिए इन दीवारों का सहारा लिया है। वे कहते हैं कि ऊपर स्थित झील मृत हो चुकी है इसलिए बाढ़ निरोधक तंत्र की आवश्यकता नहीं है। लेकिन कुछ रिपोर्टें ऐसा भी कहती हैं कि यह झील पुनर्जीवित हो रही है, हालाँकि इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

इस परियोजना में कभी अस्तित्व में न रही सेवाओं का भी निर्माण हो रहा है जो मानव बसाहट के लिए आवश्यक हैं- कुछ ऐसी मूल आवश्यकताओं के निर्माण को अब स्मार्ट कहा जाने लगा है। ये सभी मौसमों के उपयुक्त उच्च क्षमता वाली सुविधाएँ हैं जो घनी सर्दी में भी सहायक बनेंगी।

अभी तक (2013 में नष्ट हो जाने के बावजबद) केवल दो लो-रेटेड सब-स्टेशन थे, अब पाँच 63 और 100 केवीए के सब-स्टेशन जोड़े जा रहे हैं। सभी बिजली केबल भूमिगत होंगे और ऐसा ही होना भी चाहिए।

एक सुनियोजित सीवेज नेटवर्क भी निर्माणाधीन है, वे भी भूमिगत होंगे और खुले नहीं होंगे। पूरे गाँव का सीवेज गाँव के दक्षिणी छोर पर एकत्रित किया जाएगा और वहाँ से निष्कासन या उपचार के लिए पंप किया जाएगा। कूड़ा एकत्रित करने और निपटान की भी प्रभावशाली प्रक्रिया लाई जाएगी।

वर्षा के पानी के प्रबंधन के लिए एक अतिरिक्त नेटवर्क लाया जा रहा है। देश में कई स्थानों पर सीवेज और वर्षाजल का नेटवर्क एक ही होता है लेकिन वैसा केदारपुरी में नहीं होगा। केवल वर्षा का जल ही सीधे नदीं में मिलेगा। पीने के जल के लिए भी भूमिगत पाइपलाइन डाली जा रही है। जन संबोधन प्रणाली और मुख्य स्थानों में सीसीटीवी नेटवर्क भी लगाया जा रहा है।

आदि शंकराचार्य की समाधि जो बह गई थी, वह उसी स्थान पर पुनर्निर्मित की जा रही है। शंकर के जीवन और कार्यों पर उसी कॉम्प्लैक्स में एक वर्चुअल संग्रहालय होगा।

लामगोंडी, सिंगोली, गुप्तकाशी कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ से पुरोहित आते हैं और वे यात्रा अवधि का पूरा समय केदारनाथ पर ही व्यतीत करते हैं। इन परिवारों के वर्षभर का खर्चा अधिकांश रूप से यात्रा अवधि में मिली दक्षिणा से ही चलता है। जब यात्रा अवधि नहीं होती तब ये पुरोहित भक्तों द्वारा बुलाए जाने पर विभिन्न स्थानों पर जाते हैं। समय बदल रहा है, नई पीढ़ी के युवा तकनीकी नौकरियों की ओर रुख कर रहे हैं।

भारत-तिब्बत सीमा के निकट इस ऊँचाई पर स्थित यह एकमात्र स्थान है इसलिए नीतिगत दृष्टि से यहाँ ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है जो सीमा पर सुरक्षाबलों के त्वरित परिवहन को सहायता प्रदान कर सके।

साथ ही प्रकृति के कारण किसी आपातकालीन स्थिति में भी तीर्थयात्रियों को बाहर निकालने के लिए भी इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है। इसलिए हेलीपैडों का सुधार किया जा रहा है। सुरक्षाबल (मुख्यतः आईटीबीपी) वहाँ वर्षभर तैनात रहते हैं इसलिए बेहतर होगा कि इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति की जाए।

आपदा प्रबंधन की योजनाओं से लैस मोदी की यह परियोजना प्रभावशाली है और यह गाँव व मंदिर के निकट अधिक खुले स्थान रखने पर ध्यान दे रही है जिससे मंदाकिनी और सरस्वती के प्राकृतिक मार्ग हेतु जगह रहे। साथ ही तीर्थयात्रियों को बेहतर दर्शन अनुभव प्रदान करने पर भी कार्य किया जा रहा है।

कहा जाता है कि इस मंदिर को पांडवों ने बनाया था और इसका पुनर्निर्माण आदि शंकर ने किया था। क्या इस पुनर्विकास से मंदिर से जुड़ी परंपराएँ आहत होती हैं?

2014 के बाद भी केदारनाथ की उत्सव मूर्ति को उनके शीत गृह ऊखीमाता से 60 किलोमीटर लाया जाता है। वेद मंत्रों और पारंपरिक संगीत के साथ यह शोभायात्रा सैन्य सुरक्षा में होती है। 2014 के बाद भी यह पालकी स्थानीय श्रद्धालुओं के कंधों पर सवार रावल और मंत्र पढ़ते अन्य पुरोहितों के निर्देशानुसार चलती है।

आज भी पालकी विशिष्ट स्थानों पर रुकती है और परंपरा अनुसार उन स्थानों पर पूजा होती है। 2014 के बाद भी मंदिर के द्वार का खुलना-बंद होना, ऊखीमाता से केदारपुरी तक की यात्रा, मंदिर पर पूजा-अर्चना उसी प्रकार होती है जैसे सदियों से होती आ रही है- बारिश, बाढ़ और भूस्खलन में भी।

यात्रा की पवित्रता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाता है, थोड़ा भी नहीं। इस परियोजना ने इस यात्रा की पवित्रता और सौंदर्य में कुछ जोड़ा ही है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह परियोजना पर्यावरण के लिए हानिकारक है। यह तर्क उतना ही खाली है जितना पवित्रता वाला तर्क।

तथ्य यह है कि नदी के निकटवर्ती भवनों को हटाया जाना नदी के मार्ग में मानवीय हस्तक्षेप को घटाता है और अच्छे घाटों का निर्माण दर्शाता है कि नदी को जिस सम्मान की आवश्यकता है, वह उसे मिल रहा है। तथ्य यह है कि सीवेज व कूड़ा प्रबंधन योजनाएँ क्रियान्वित की जा रही हैं और क्षेत्र को गंदगी मुक्त करना पर्यावरण को दिए जा रहे सम्मान का उदाहरण है।

तथ्य यह है कि स्नान के लिए विश्राम गृहों और निवास इकाइयों में दी जा रही सुविधा तीर्थस्थलों पर स्वच्छता संकल्प को दर्शाती है। निर्माण कार्य में अधिकांश रूप से उन्हीं वस्तुओं का उपयोग किया जा रहा है जो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध हैं जैसे पत्थर, सेडिमेंट, लकड़ी, आदि।

पुरोहितों के लिए निवास स्थानों और विश्राम गृहों का वास्तु उत्तराखंड के पारंपरिक निर्माण सिद्धांतों पर आधारित है, साथ ही भूकंप के प्रति इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखा गया है।

ये पाँच वर्षों की परियोजना जिसे पूरा करने की समय सीमा 2022 रखी गई, अस्तित्व में आने के बाद हिंदू तीर्थस्थलों के विकास के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करेगी जिसमें परंपराओं, पवित्रता और प्रकृति का ध्यान रखा गया होगा।

मैसुरु एक जनपद अभियंता हैं और शास्त्रीय संगीत, कॉफी, कैमरा व कॉन्क्रीट में रुचि रखते हैं।