भारती
टीएसआरटीसी की हड़ताल पर केसीआर का कड़ा रुख, कर्मचारियों का भविष्य अंधकार में

तेलंगाना राज्य सड़क परिवहन निगम (टीएसआरटीसी) कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल जो इस साल 5 अक्टूबर से शुरू हुई थी फिलहाल खत्म होती नहीं दिख रही है।

टीएसआरटीसी के कर्मचारी चाहते हैं कि तेलंगाना सरकार उनके निगम को अपने अधीन या सरकारी मान्यता दे क्योंकि निगम बेहद बुरी स्थिति में है।

दरसल टीएसआरटीसी को 2018-19 वित्तीय वर्ष में करीब 984 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था जबकि कर्मचारी संंघ के अनुसार टीएसआरटीसी को हर वर्ष 1,100 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हो रहा है।

टीएसआरटीसी कर्मचारियों ने 2017 से लंबित पड़े निगम के खाली पदों को भरने और उनके वेतन को बढ़ाने की भी मांग की है। इसके अलावा परिवहन निगम की अन्य परेशानियाँ हैं- बूढ़े होते इसके वाहन, मानवीय संसाधनों की कमी, अक्षमता एवं निजी बस कंपनियों से मिल रही चुनौतीयाँ।

अनिश्चितकालीन हड़ताल का यह विषय अब केंद्र तक पहुँच चुका है। टीएसआरटीसी कर्मचारियों की संयुक्त कार्रवाई समिति (जेएसी) ने पिछले बुधवार (6 नवंबर) को नई दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के कार्यकारिणी अध्यक्ष जेपी नड्डा से भेंट की।

जेएसी लगातार इस बात पर ज़ोर दे रही है कि मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव उनसे बात करें और इस बढ़ते गतिरोध को खत्म करें। बीते कुछ दिनों में करीब तीन टीएसआरटीसी कर्मचारियों ने आत्महत्या कर ली क्योंकि इस हड़ताल ने कर्मचारियों की आर्थिक अवस्था बहुत बिगाड़ दी है।

तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की सरकार ने पहले ही दो बार चेतावनी जारी की थी (5 नवंबर सबसे नई तारीख है) जिसमें कर्मचारियों से अनुरोध किया गया था कि वे अपने काम पर वापस लौटे पर इसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। राज्य सरकार के सख्त रवैया के बावजूद 50,000 कर्मचारियों में से सिर्फ 500 ने ही चेतावनियों पर ध्यान दिया।

हड़ताल के जारी रहने के बावजूद परिवहन निगम के ऊपर बकाया राशि बढ़ती ही जा रही है। निगम को अतिरिक्त 453 करोड़ रुपये राज्य परिवहन विभाग को मोटर वाहन कर के रूप में देने होंगे। उच्च न्यायालय ने निगम से छह हफ्तों के भीतर 200 करोड़ रुपये का बकाया परिवहन कर्मचारियों के कल्याणकारी विभाग को जमा कराने को कहा है।

इस एक महीने से भी ज्यादा लंबी परिवहन हड़ताल ने यात्रियों को काफी बुरी तरह प्रभावित किया है खासकर कि छात्र जो सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर हैं।

आपको बता दें कि इस हड़ताल के चलते केवल बाहरी मार्गों पर बसें चलाई जा रही हैं जबकि दूरदराज़ और अंदर के इलाकों के लोगों के लिए यह सेवा पूर्ण रूप से स्थगित है।

दरसल श्रमिक संघ के टीआरएस से मतभेद के बाद से ही परिवहन कर्मचारी हड़ताल पर हैं। खास बात यह है कि इन्हीं श्रमिक संघ के बल पर टीआरएस बनी थी, जब अलग तेलंगाना राज्य की मांग ज़ोरों पर थी।

आंदोलन के वक्त टीआरएस और चंद्रशेखर राव दोनों ने कहा था यदि उनकी सरकार बनती है तो कर्मचारियों की मांगो एवं अपेक्षाओं को पूरा करेंगे।

मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव

तेलंगना मजदूर संघ के तत्कालीन अध्यक्ष थॉमस रेड्डी के अनुसार टीआरएस और चंद्रशेखर राव द्वारा किए हुए वादों में से एक भी अभी तक पूरा नहीं हुआ है।

आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम को आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा अपने अधीन किए जाने के निर्णय के बाद टीएसआरटीसी का आंदोलन और भी बढ़ गया था।

टीएसआरटीसी को 365 करोड़ रुपये का ब्याज हर साल देना पड़ता है जो टीएसआरटीसी के लिए किसी बड़े वित्तीय संकट से कम नहीं है। इन सबके अलावा छात्रों एवं वृद्ध जनों को राज्य सरकार की अनुवृत्ति के लिए कम दरों पर या निशुल्क सेवा देनोे जैसी परेशानियाँ भी टीएसआरटी के हिस्से में है।

इन समस्याओं से निपटने के लिए राज्य सरकार की तरफ से टीएसआरटीसी को महज 114 करोड़ रुपये की ही मदद दी गई है। तेलंगना सरकार के ऊपर टीएसआरटीसी का 2,100 करोड़ रुपए बकाया है।

कर्मचारियों के वेतन में हो रही देरी के साथ डीज़ल पर कोई भी वित्तीय सहायता ना मिलने के कारण कर्मचारियों के ऊपर यह संकट और गहराता जा रहा है। प्रति लीटर की दर से डीज़ल के मूल्य में हर 1 रुपये की बढ़ोतरी पर टीएसआरटीसी को रोजाना अतिरिक्त 25 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे।

परिवहन निगम के कर्मचारियों की यह हड़ताल अनेपक्षित नहीं है। कर्मचारी संघ ने सितंबर माह में ही राज्य सरकार को 27 बिंदुओं वाला मांग-पत्र सौंप दिया था और सूचित कर दिया था कि यदि उनकी मांगे नहीं मानी गई तो निगम हड़ताल करेगा।

राज्य सरकार यह मान के चल रही थी कि 2016, 2017 और 2018 की तरह ही इस वर्ष भी कर्मचारी हड़ताल नहीं करेंगे क्योंकि वे पहले आंदोलन की धमकियों पर आगे नहीं बढ़े थे।

इससे भी अधिक वे आक्रोशित इसलिए हुए क्योंकि राज्य ने उन्हें 3 अक्टूबर को ही बातचीत के लिए बुलाया जबकि 5 अक्टूबर से उनकी हड़ताल पूर्व निर्धारित थी। तेलंगाना के परिवहन मंत्री पुव्वदा अजय कुमार ने सितंबर में बातचीत की मांग लेकर आए कर्मचारी संघ को यह कहकर लौटा दिया था कि मुख्यमंत्री ही इस मामले में निर्णय लेंगे।

इस मुद्दे पर अपने दृढ़ रुख पर राज्य सरकार को कर्मचारियों के रोष का सामना करना पड़ा था। मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने कर्मचारियों से कहा था कि 6 अक्टूबर तक काम पर वापस लौट जाएँ नहीं तो उन्हें उनकी नौकरी में से निकाल दिया जाएगा।

राव ने कर्मचारियों के जख्मों पर नमक तब छिड़का जब 7 अक्टूबर को मीडिया के सामने उन्होंने कहा कि अब कर्मचारियों की कुल संख्या सिर्फ 1,200 ही है। इसका अर्थ यह निकला कि बाकी 48,000 कर्मचारियोंं ने अपनी नौकरियाँ खो दी हैं।

इसके आगे चंद्रशेखर राव ने बताया कि कर्मचारियों ने अपनी नौकरी स्वयं ही खो दी है। तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई सौंदरराजन के इस समस्या के समाधान के हर प्रयास असफल रहे।

वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार ने परिवहन निगम के 5,100 परमिटों को निजी बनाकर इस मामले को और भी जटिल बना दिया है। राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ तेलंगाना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) भी दायर हुई है जो यह दावा करती है कि राज्य सरकार ने कानून का पालन नहीं किया

तेलंगाना उच्च न्यायालय

राज्य सरकार ने टीएसआरटीसी की कुछ हज़ार बसों को चलाने के लिए कुछ चालकों की भी भर्ती की है पर इससे यात्रियों की भारी मांगों को पूरा नहीं किया जा सकता।

प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ लोग टीएसआरटीसी की बसों का उपयोग करते हैं जिससे 9,300 गाँवों और प्रमुख शहरी क्षेत्रों से 840 बस्तियों को जोड़ता है। निगम करीब 10,400 बसों का संचालन करता है जिसमें से 2,000 बसें किराए की हैं।