भारती
“इच्छाओं से मुक्त होकर ही पवित्र हुआ जा सकता है”, कर्म के विधान पर कुरल भाग-14

इच्छाओं का त्याग

भारतीय दर्शनशास्त्र में जो इच्छाओं से मुक्ति की बात कही जाती है वह अपने कर्मों में आशा और विश्वास रखने वाले आधुनिक मस्तिष्क को आकर्षित नहीं कर पाती। धार्मिक रूढ़ियाँ परे रखकर भी मानवीय प्रयासों में विरक्ति को महान और आवश्यक गुण माना गया है। इच्छाओं के त्याग का दर्शन कर्म से विरक्ति में निहित है।

इच्छा ही वह बीज है जिससे जन्म और मृत्यु का अनंत चक्र उपजता है।

जन्मों के चक्र से मुक्ति से अधिक उपयोगी कोई वस्तु नहीं है जिसकी इच्छा रखी जाए और यह इच्छा तब ही पूरी होगी जब शेष सभी इच्छाओं का त्याग कर दिया जाए।

इच्छाओं के त्याग से बड़ी और किसी वस्तु की प्राप्ति न इस संसार में की जा सकती है न ही किसी और जग में।

इच्छाओं से मुक्त होकर ही पवित्र हुआ जा सकता है। और इच्छाओं से मुक्त तब ही हुआ जा सकता है जब मनुष्य के मन में वास्तविकता को पाने की कामना हो।

यदि सत्य को प्राप्त करने की कामना तीव्र हो तो सांसारिक कामनाओं का त्याग सरल हो जाता है।

जिन लोगों ने वस्तुओं का त्याग करने के साथ-साथ इच्छाओं का भी त्याग कर दिया है वे सचमुच विरक्त हो गए हैं। जिन्होंने ऐसा नहीं किया है, उन्होंने वास्तविक त्याग नहीं किया है।

केवल बाह्य त्याग पर्याप्त नहीं है। तिरुवल्लुवर के काल में जब ब्रह्मचर्य और सन्यास प्रचलित था, तब इच्छाओं के त्याग पर बल दिया जाता था। इसका संदर्भ गीता 2-59 में भी मिलता है।

इच्छा सबसे अधिक कपटी है। इससे बचकर रहें। यह निगरानी ही आचार संहिता का सार है।

यदि सभी दुखों में से प्रमुख दुख इच्छा को दूर रखा जाए तो अविरल सुख को प्राप्त किया जा सकता है।

कर्म का विधान

हिंदू शास्त्रों में प्रतिपादित धर्म को पूर्ण रूप से और बिना किसी परिवर्तन के कुरल में अपनाया गया है।

न कर्म और न इसके तमिल समकक्ष को भाग्य में अंधविश्वास समझा जाना चाहिए। हिंदू सिद्धांत के अनुसार पिछले जन्मों के अच्छे-बुरे कार्य कर्म से जुड़े हुए हैं। मनुष्यों को हर कर्म का उपयुक्त और प्राकृतिक प्रतिफल मिलता है तथा इसी के परिणाम स्वरूप उनकी प्रवृत्ति विकसित होती है।

यह विधान बिना विफलता के कार्य करता है। यह चक्र मृत्यु पर भी समाप्त नहीं होता और खाता अगले जन्म से फिर चलता है। जिन घटनाओं का कारण नहीं मिलता वह पिछले जन्मों में निहित होता है। हमें अतीत याद नहीं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

आपके इस जन्म के धन या आलस जिससे आपके बुरे दिन आ रहे हैं, का संबंध आपके पिछले जन्म से है।

कर्म का सिद्धांत कार्य और धन से भी अछूता नहीं रहता है। अगला कुरल इसे और स्पष्ट करता है।

बुद्धिमान व्यक्ति भी मूर्खता कर बैठता है यदि उसके कर्म में यह लिखा है और मूर्ख व्यक्ति चतुर बन जाता है जब उसके कर्म का फल पककर उसकी झोली में गिरने को आता है।

मनुष्य दो श्रेणी के होते हैं- एक जिन्हें कर्म ने समृद्ध बनाया है और एक जिन्हें बुद्धि का वरदान मिला है।

आवश्यक नहीं है कि समृद्ध व्यक्ति बुद्धिमान हो या बुद्धिमान व्यक्ति के पास धन हो।

समृद्धि पिछले जन्म के कर्मों से आती है। यदि कर्म में न लिखा हो तो हो सकता है इस जन्म के सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी हमें उत्तम परिणाम न दे पाएँ और यदि लिखा हो तो थोड़े प्रयास भी फलीभूत हो सकते हैं।

जिनके पास त्यागने के लिए कुछ नहीं है, वे भी त्याग करके त्याग का फल नहीं भोगते हैं क्योंकि पिछले जन्मों के कर्मों के कारण उन्हें ऐसी बुद्धि नहीं मिली है।

निर्धन और घर-विहीन व्यक्ति के लिए सन्यास लेना आसान होता है फिर भी वे निर्धनता के साथ संघर्ष करते हुए सांसारिक संबंधों और पीड़ा के पीछे स्वयं को कष्ट पहुँचाते रहते हैं क्योंकि अपने पिछले कर्मों के कारण उन्हें त्याग करने की बुद्धि नहीं मिली है।

जब पिछले जन्मों के अच्छे कर्मों के कारण मनुष्य को सौभाग्य मिलता है तो वे बिना प्रश्न किए उसे स्वीकार कर उसका भोग करते हैं। लेकिन जब दुर्भाग्य उनके जीवन में आता है तो शिकायत और प्रलाप करते हैं। वास्तम में, मनुष्य अतार्किक है!