भारती
जियो ग्लास क्यों मुकेश अंबानी की एक बड़ी घोषणा, भविष्य पर कैसा होगा प्रभाव

सतही तौर पर देखें तो विश्व के अग्रणी टेक निगम जैसे ऐप्पल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़ॉन और फ़ेसबुक एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं। वे अपने-अपने क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्हें अधिपति कहा जा सकता है।

ऐप्पल विश्व में सर्वश्रेष्ठ मोबाइल फ़ोन बनाता है। गूगल से बेहतर खोज इंजन और कोई नहीं है। अमेज़ॉन ई-व्यापार में सर्वोच्च है और माइक्रोसॉफ्ट एक बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनी है।

लेकिन इन सभी बड़ी कंपनियों में एक समानता है। ये सभी वर्चुअल रियलटी (वीआर) और ऑगमेंटेड (संवर्धित) रियलटी (एआर) तकनीक पर आधारित उत्पाद बनाना चाहते हैं। इन तकनीकी कंपनियों ने पिछले दशक में अरबों डॉलर मिक्स्ड (मिश्रित) रियलटी (एमआर) के शोध एवं विकास पर खर्च किए हैं।

ऐप्पल का ग्लास, गूगल का वीआर, फ़ेसबुक का ओकल्ट और माइक्रोसॉफ्ट का हैलो-लेन्स विकास के विभिन्न स्तरों पर हैं और एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए होड़ कर रहे हैं। दूरद्रष्टा तकनीकी नेताओं के लिए एमआर की प्रतिस्पर्धा जीतने का लाभ प्रत्यक्ष है, हर क्षेत्र में इसका बड़ा प्रभाव होगा।

जो कंपनी एमआर को जल्द विकसित कर एवीआर उत्पाद बना सकेगी, वह अपने प्रतिस्पर्धियों पर हावी हो जाएगी और आने वाले दशकों में वैश्विक तकनीक पर आधिपत्य स्थापित कर लेगी। साथ ही यूनाइटेड स्टेट्स और इसके लोग तकनीक का सबसे पहले और सर्वाधिक लाभ उठा सकेंगे।

सामान्यतः लोगों को लगता है कि भारत में आईटी कंपनियाँ एमआर विकसित करने पर ध्यान नहीं दे रही हैं। तकनीकी संसार शीघ्रता से आगे बढ़ रहा है यदि इसके वित्तीय लाभ उठाने में भारत विफल हो जाएगा तो वैश्विक शक्ति बनने का स्वप्न इसे त्याग देना चाहिए।

इसलिए रिलायंस उद्योग लिमिटेड की वार्षिक महाबैठक (एजीएम) में बुधवार (15 जुलाई) को जब जियो ग्लास की घोषणा की गई तो मुझे आश्चर्य हुआ। जियो स्वदेशी रूप से 5जी तकनीक विकसित कर रहा है और गूगल के साथ मिलकर एंड्रॉइड आधारित सस्ते स्मार्टफ़ोन पर भी काम कर रहा है लेकिन एमआर इसे सबसे ऊपर ले जाता है।

संदेहवादी एमआर के सामर्थ्य को कम आँकते हैं। कुछ तकनीक पर ही प्रश्न उठाते हैं। कुछ मानव पर इसके प्रभाव को लेकर शंकित हैं। लेकिन जब मुकेश अंबानी इसपर ध्यान दे रहे हैं और इसे बाज़ार में भी ला रहे हैं, तो संदेहवादियों को भी इस तकनीक को गंभीरता से लेना शुरू कर देना चाहिए।

शिक्षा क्षेत्र का उदाहरण लें जिसपर एजीएम की जियो ग्लास की प्रस्तुति में भी बात की गई थी। इस वैश्विक महामारी ने हमें बता दिया है कि “विद्यालय सीखने के लिए नहीं हैं। कार्यालय काम करने के लिए नहीं हैं। चर्च प्रार्थना करने के लिए नहीं हैं। भोजनालय खाने के लिए नहीं हैं।”, जैसा कि नवल रविकांत ने कहा।

9 से 2 का विद्यालय, 9 से 5 का कार्यालय, चार वर्षों की महाविद्यायलयी डिग्री, सोमवार से शुक्रवार तक काम, आदि औद्योगिक काल के कुछ अवशेष हैं लेकिन कुछ लोग अभी तक इस प्रणाली से मंत्रमुग्ध हैं।

एमआर इन्हें जल्द रही अप्रासंगिक बना देगा। प्रतिष्ठित आईआईटी से लेकर स्थानीय महाविद्यालय के किसी भी प्रोग्रामर ने कोडिंग स्वयं ही सीखी है, ऑनलाइन माध्यम से। बाइजूज़ और अनअकेडमी जैसे स्टार्ट अप विद्यालय को अप्रासंगिक (विशेषकर कक्षा 9 से 12 जब शिक्षा को गंभीरता से लिया जाता है) बना रहे हैं।

एमआर के साथ ऑनलाइन शिक्षा उतनी उबाऊ नहीं होगी जितनी ज़ूम या गूगल क्लासरूम पर होती है। यह आपको चारों ओर से घेरकर वर्चुअल और रियल के बीच का अनुभव देगी। वीआर हेडसेट पहनकर आप वर्चुअल कक्षा में पहुँच जाएँगे जहाँ एआर के माध्यम से सीखना परस्पर संवादात्मक (इंटरैक्टिव) बन सकेगा।

लाखों बच्चे हर साल विद्यालयी शिक्षा पूरी करते हैं लेकिन वे उस वस्तु की दृश्य के रूप में कल्पना नहीं कर पाते हैं जो उन्होंने पढ़ी है, विशेषकर गणित और विज्ञान में। अब ऐसा नहीं होगा।

अवश्य ही इसका अर्थ हुआ कि अधिकांश शिक्षकों की आवश्यकता नहीं रहेगी। वे सिर्फ विद्यालय नामक संस्थान के कारण टिके हुए थे। अब शिक्षकों की संख्या में भरी गिरावट आएगी। लेकिन बच्चे बेहतर सीख पाएँगे। शिक्षा प्रणाली के बेहतर होने से देश को क्या लाभ होगा यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

अब बात करते हैं कौशल में कमी की समस्या की। क्षीण शिक्षा प्रणाली के बाद यह दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। इस दिशा में सिर्फ खराब शिक्षा व्यवस्था ही बाधा नहीं है। नौकरियों का परिदृश्य अब हर कुछ वर्षो में बदल रहा है इसलिए अब जीवनभर सीखते रहने और पुनः प्रशिक्षण पर ध्यान देना चाहिए।

यहीं पर एमआर अपनी भूमिका निभाएगा। इस तकनीक से जटिल कौशल प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है क्योंकि यह आपको वर्चुअल अनुभव देगा। एमआर ऑनलाइन पाठ्यक्रम में शिक्षक कक्षा में परमाणु को तोड़कर दिखा सकेगा, कोई प्रशिक्षक अपने भावी कर्मचारी को कार के पुर्जे दुरुस्त करना सिखा सकेगा।

एमआर सिम्युलेटर पाइलय बनने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे लोगों को विमान उड़ाना सिखा सकेगा और भी बहुत कुछ। मैं एमआर के उपयोग के दो उदाहरण दूँगा ताकि पाठक इस तकनीक के सामर्थ्य का परिप्रेक्ष्य समझ पाएँ।

पहला, चेन्नई आधारित चिकित्सकों ने मिस्र के एक युवक का हृदय पम्प प्रत्यारोपित (इंप्लान्ट) किया आईआईटी मद्रास के दल के वर्चुअल रियलटी मॉडल के माध्यम से। उस युवक की आवश्यकताओं के तहत यह मॉडल तैयार किया गया था। इससे न सिर्फ चिकित्सकों का समय बच सका बल्कि इंप्लान्ट भी एक बार में ही सही हो गया, और इस पूरी प्रक्रिया को और सुरक्षित बनाया जा सका।

इससे न सिर्फ चिकित्सा उद्योग में हम एमआर के सामर्थ्य का अनुमान लगा सकते हैं बल्कि चिकित्सा शिक्षा में भी आने वर्षों में इसका प्रभाव दिख सकता है (कम से कम स्वास्थ्य कर्मचारियों को इससे प्रशिक्षण दिया जा सकता है, यदि डॉक्टर को नहीं तो)।

दूसरा उदाहरण है कि यूनाइटेड स्टेट्स की सेना ने 1 लाख एमआर हेडसेट हैलो-लेन्स खरीदने के लिए 2018 में 47.8 करोड़ डॉलर का अनुबंध माइक्रोसॉफ्ट से किया था। 2022 तक यूएस सेना का विचार है कि वह सहस्रों सैनिकों को तकनीक से लैस करे।

“पूरा अनुभव मुझे प्राकृतिक लगा, मैंने बहुत सारे प्रथम-व्यक्ति शूटर गेम खेले जो मुझे दिखाते थे कि मानचित्र पर मैं कहाँ हूँ, मेरे साथी कहाँ हैं और शत्रु कहाँ हैं। यह मुझे वास्तविक जीवन के ‘कॉल ऑफ़ ड्यूटी’ जैसा लगा।”, एमआर हेडसेट पर एक सैनिक ने अपने अनुभव में कहा।

इन उदाहरणों से हम शिक्षा से स्वास्थ्य सेवा से कौशल विकास से युद्ध तक एमआर का सामर्थ्य देख सकते हैं, और क्या कुछ नहीं। कार्यालय के लिए एमआर कुछ इस प्रकार का दिखेगा जहाँ आपका कार्य स्थान आपके घर से वर्चुअल पहुँच में होगा।

शहरीकरण और वैश्वीकरण के सिद्धांतों पर इस तकनीक का क्या प्रभाव पड़ेगा? वैश्वीकरण पूर्ण रूप से वर्चुअल हो जाएगा। हम सामाजिक रूप से अधिक निकट होंगे लेकिन भौतिक रूप से दूर ही रहेंगे।

यदि आपको उत्तर प्रदेश या बिहार के किसी दूरस्थ गाँव में बैठे-बैठे शिक्षा मिल जाएगी और आप वहीं से काम भी कर सकेंगे तो नोएडा या बंगलुरु क्या, सिलिकॉन वैली में भी इसका बड़ा प्रभाव होगा। यह शहर सिर्फ उन लोगों का रह जाएगा जो शारीरिक रूप से वहाँ काम करते हैं।

कम ट्रैफिक? सस्ते आवास? एमआर क्रांति असंख्य समस्याओं को सुलझाएगी जिसपर अभी कल्पना करना कठिन है। लेकिन कम से कम इस बात की आशा है कि भौतिक बैठकें, सम्मेलन, रैली, खेल समारोह- यानी कि वह जो कोरोनावायरस के कारण प्रतिबंधित हैं- नहीं होंगे।

हम एमआर की ओर बढ़ जाएँगे और बड़े मेट्रो में रहने के कारण होने वाली अनावश्यक यात्रा व अनावश्यक खर्चे नहीं होंगे। सेवा उद्योग पूर्ण रूप से और विनिर्माण उद्योग आंशिक रूप से एमआर पर आधारित हो सकता है।

जल्द ही हम मोदी की किसी रैली में भी एमआर के माध्यम से जाएँगे। हो सकता है यह 2024 के लोकसभा चुनावों तक ही हो जाए लेकिन 2029 तक तो ऐसा अवश्य हो जाएगा।

इस लेख का उद्देश्य मात्र इतना था कि रिलायंस द्वारा विकसित एमआर हेडसेट का महत्त्व बड़े परिप्रेक्ष्य में समझाया जा सके। दूरभाष या इंटरनेट के कारण आए परिवर्तन जितना ही बड़ा परिवर्तन एमआर लाएगा। इसलिए एमआर क्रांति में पीछे रह जाना भारत के पक्ष में नहीं था। मुकेश अंबानी को आभार कि संभवतः हम पीछे नहीं रहेंगे।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।