भारती
जेवार हवाई अड्डा- राजधानी दिल्ली की उड्डयन क्षमता बढ़ाने के लिए उपयुक्त इंफ्रास्ट्रक्चर

इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे (आईजीआईए) की व्यस्तता साल दर साल बढ़ती जा रही है। 2017 में जहाँ यह विश्व का 16वाँ से व्यस्त हवाई अड्डा था, वहीं 2018 में यह 12वें स्थान पर आ गया। लगभग 10 प्रतिशत वृद्धि दर के साथ यह सबसे तेज़ी से बढ़ता हवाई अड्डा है।

हालाँकि आईजीआईए की प्रति वर्ष यात्री क्षमता को बढ़ाकर 13 करोड़ करने पर कार्य किया जा रहा है लेकिन फिर भी 2023-24 तक यह अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच जाएगा जिसके बाद यह अधिक यात्रियों का भार नहीं ले पाएगा। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के विज़न 2040 के अनुसार दिल्ली को तीन हवाई अड्डों की आवश्यकता होगी।

इन सबको देखते हुए डेढ़ दशक पहले जेवार हवाई अड्डा परियोजना की परिकल्पना की गई थी और 10 वर्षों तक विचाराधीन रहने के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2018 में इसके कार्य को आगे बढ़ाया। एक सर्वे के अनुसार आईजीआईए के 57 प्रतिशत यात्री एनसीआर और 11-12 प्रतिशत उत्तर प्रदेश के जिलों से होते हैं। इस दृष्टि से जेवार उपयुक्त स्थान होगा।

प्रस्तावित स्थल

अब तक इस परियोजना के पहले चरण के लिए आवश्यक आधी से अधिक भूमि अधिग्रहित की जा चुकी है। कुल 1,334 हेक्टेयर के क्षेत्र में बनने वाले इस हवाई अड्डे के लिए 1,235 हेक्टेयर भूमि गाँवों से अधिग्रहित की जानी है। इनमें से 707 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हो चुका है। 15 सितंबर 80 प्रतिशत अधिग्रहण करने का दावा जिला मजिस्ट्रेट बीएन सिंह ने किया है।

दयनातपुर, रणहेरा, बनवारीबास, किशोरपुर, रोही और परोही नामक सात गाँवों से भूमि अधिग्रहित की जानी है। इनमें से दयनातुर में 125 हेक्टेयर, रणहेरा में 94 हेक्टेयर, बनवारीबास में 5.5 हेक्टेयर, किशोरपुर में 100 हेक्टेयर, रोही में 306.5 हेक्टेयर और परोही में 75 हेक्टेयर भूमि पर अधिग्रहण किया जा चुका है।

उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले में बनने वाला यह एयरपोर्ट ग्रेटर नोएडा जिला मुख्यालय के अंतर्गत आएगा। संयोजक इंफ्रास्ट्रक्चर को भी अन्य साधनों से संयोजकता की आवश्यकता होती है। जैसा कि हमने पहले चर्चा की कि इसका मुख्य उद्देश्य दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का भार बाँटना है तो यह कार्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक यह अन्य साधनों से न जुड़ा हो।

इस दृष्टि से इसे सड़क व मेट्रो रेल दोनों से संयोजकता उपलब्ध कराई जाएगी। इसकी सीधी पहुँच पूर्व निर्मित यमुना एक्सप्रेसवे से होगी। एक 100 मीटर चौड़ी सर्विस लेन यमुना एक्सप्रेसवे के समानांतर पर चलकर आपको जेवार हवाई अड्डे के द्वार तक पहुँचाएगी। परियोजना की साइट एक्सप्रेसवे से मात्र 700 मीटर ही दूर है।

दूसरी ओर दिल्ली मेट्रो रेल कोर्पोरेशन (डीएमआरसी) ने जेवार हवाई अड्डे को जोड़ने वाली मेट्रो लाइन परियोजना की विवरणात्मक रिपोर्ट यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (वाईईडा) को सौंप दी है। 5,708 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली इस मेट्रो लाइन पर 25 स्टेशन होंगे।

35.64 किलोमीटर लंबी इस लाइन के 17 स्टेशन यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में और आठ ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में आएँगे। यह लाइन परी चौक से शुरू होकर जेवार हवाई अड्डा टर्मिनल पर समाप्त होगी। ग्रेटर नोएडा नॉलेज पार्क 2 से यह लाइन यमुना एक्सप्रेसवे के समानांतर पर चलेगी। हवाई अड्डे पर यह भूमिगत होगी।

जेवार हवाई अड्डे के प्रथम चरण के अंतर्गत दो रनवे बनाए जाएँगे। कुल छह रनवे की परियोजना थी जिसे आठ करने का निवेदन किया गया है। ऐसा होने पर इसकी क्षमता इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से दोगुनी हो जाएगी। हालाँकि इस पूरी परियोजना हेतु 5,000 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता होगी और लगभग 16,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

पहले चरण में सर्वाधिक व्यय यात्री टर्मिनल भवन पर 1080 करोड़ रुपये होगा और इसके बाद रनवे, टैक्सीवे, एप्रन आदि पर 600 करोड़ रुपये खर्च होंगे। प्रथम चरण में 20 एमवीए बिजली आवश्यकता का आँकलन किया गया है। इसके अलावा 60 प्रतिशत लोड के लिए आपातकालीन बिजली हेतु जेनरेटर की व्यवस्था रहेगी। 9.5 हेक्टेयर क्षेत्र में सौर्य पैनलों के साथ भवनों की छतों पर भी सौर्य पैनल लगाए जाएँगे। एलईडी प्रकाश के उपयोग से इसे ऊर्जा कुशल बनायाय जाएगा।

उत्तर प्रदेश सरकार के नेतृत्व में नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा लिमिटेड ने दो रनवे वाले हवाई अड्डा के निर्माण हेतु वैश्विक टेंडर 30 मई को निकाला था। अधिकारियों ने बताया कि 29 नवंबर तक वे अनुबंध आवंटित कर दिए जाएँगे और 2020 की शुरुआत से इस हवाई अड्डे का निर्माण कार्य प्रारंभ हो जाएगा। इसके प्रथम चरण के 3,745 करोड़ की लागत से 2023 तक पूरा होने की उम्मीद है।

अनुमानित ट्रैफिक

फीज़िबिलिटी रिपोर्ट के अनुसार 2023 से 50 लाख यात्री इसकी सेवा का लाभ उठाएँगे व 2029-30 तक यात्री संख्या बढ़कर 1.6 करोड़ प्रतिवर्ष हो जाएगी। साथ ही पीपीपी मॉडल के तहत बनने के कारण इसका गैर-उड्डयन राज्सव भी एएआई की तुलना में अधिक होगा। प्रति यात्री 145 रुपये के गैर-उड्डयन राजस्व के साथ इसकी शुरुआत होकर, यह राशि 200 रुपये प्रति यात्री के पार जाएगी।

गैर-उड्डयन राजस्व

पीपीपी मॉडल का होने के कारण इसकी क्रियान्वयन लागत भी कम होगी। जहाँ एएआई के हवाई अड्डों पर हर कर्मचारी 16,000 यात्रियों को संभालता है, वहीं इसमें हर कर्मचारी 20,000 यात्रियों को सेवा दे पाएगा।

इस परियोजना में सरकार को केवल भूमि अधिग्रहण और संयोजकता बढ़ाने जैसे रेल, मेट्रो व सड़कों के विकास हेतु पैसा खर्च करना होगा। इसके लिए 2019 के बजट में योगी सरकार 800 करोड़ रुपये आवंटित कर चुकी है। वित्तीय वर्ष 2018-19 में राज्यपाल ने भूमि अधिग्रहण के लिए 1,259 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी थी।

परियोजना स्थल की 94 प्रतिशत भूमि खेतीहर ज़मीन है इसलिए पर्यावरण अनुमति में अधिक परेशानी नहीं हुई। हालाँकि 4 किलोमीटर दूर ही एक वनभाग है। ध्वनि प्रदूषण पर काबू पाने के लिए ध्वनि अवरोधक व वृक्ष गलियारा लगाया जाएगा। अप्रैल 2019 से किसानों को उनकी भूमि के लिए मुआवज़ा मिलना शुरू हो गया था। इस कार्य के लिए ग्रेटर नोएडा प्रशासन ने कुल 2,850 करोड़ रुपये रखे हैं।

यमुना नदी से 3 किलोमीटर दूर होने के कारण यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित इलाका नहीं है। साथ ही प्राकृतिक रूप से यहाँ कोई जल निकाय या धारा नहीं है। हालाँकि खेती के लिए प्रयुक्त की जाने वाली कुछ नहरें हैं जिनमें से पथवाया नाला का मार्ग बदलना होगा। इस क्षेत्र को सींचित करने वाली दो छोटी नहरों- करोली और किशोरपुर को बंद कर दिया जाएगा।

वित्तीय दृष्टि से यह परियोजना लाभकारी है। लागत से 3.25 गुना लाभ मिलेगा और वित्तीय रूप में यह लाभ लागत का 1.6 गुना होगा। साथ ही यह रोजगार को भी बढ़ावा देगा। ग्रीन-सी-इंडिया द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार हर 10 प्रत्यक्ष नौकरियों के कारण 61 अप्रत्यक्ष रोजगार इसके कारण उत्पन्न होंगे।

यह परियोजना राजधानी दिल्ली की उड्डयन क्षमता को बढ़ाने के लिए अति आवश्यक है व भूमि अधिग्रण के हो रहे अबाधित कार्य को देखकर लगता है कि इसी प्रकार बिना खलल के इस परियोजना को समय पर पूरा किया जा सकेगा।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree द्वारा ट्वीट करती हैं।