भारती
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर उनकी बाँसुरी की समृद्ध, शुद्ध अभिव्यक्ति का स्मरण

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर विष्णु के लोकप्रिय अवतार श्री कृष्ण के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति अवसर पर आप कल्पना कीजिए एक किशोर की- गंदुमी रंग, शुभ लक्षणों से भरा-पूरा सुडौल शरीर, घुंघराले बालों में टंका ब्रज-मथुरा में बहती यमुना के तट पर नाचते मोरों से चुराया एक पंख, थोड़ी मटमैली पीली धोती, आत्मविश्वास से चमकता सुंदर चेहरा, और लंबी-लंबी उंगलियों में फँसी एक बाँसुरी। आपके लिए बेटा, भाई, प्रियतम, जो भी हो, श्री कृष्ण का वह मोहक रूप बाँसुरी के बिना अधूरा है।

श्री कृष्ण की भारत में छब निराली है। इतिहासकार कहते हैं कि महाभारत इत्यादि में स्पष्ट पता चलता है कि एक वासुदेव प्रचंड बलशाली, युद्ध के युद्ध, संसार के संसार अपने बस में रखने वाले, धीर-गंभीर कूटनीतिज्ञ थे। एक अन्य वासुदेव थे प्रजा को अपनी संतान मानने वाले रणछोड़श्री, नितांत दयालु राजा, स्नेही पति, रक्षक पिता। तीसरे वासुदेव थे नटखट, बालावस्था से कैशोर्य तक भारतीय ग्रामीण परिवेश में पाए जाने वाले समस्त पेड़-पौधों और मूक पशुओं के पालक, वंचित बालकों के घनिष्ट मित्र।

इस स्वरूप में कृष्ण के गोवर्धन पर्वत धारण करने, आस-पड़ोस से माखन चुराने, और पिता के गो-धन को चराने के बहाने गाँव-भर को छकाने की अनगिनत कथा-कहानियाँ हैं। कृष्ण के ये बाल्यकाल के लड्डूगोपाल और नंदकिशोर रूप विशेषकर बच्चों, युवाओं और माताओं में बहुत लोकप्रिय हैं। इसी कारणवश समूचे भारत में तैनात मिशनरियों की सेना श्री कृष्ण से घबराती ही नहीं, उनको अपने नाना प्रकार के पैगंबरों से हिला-मिला कर भोली जनता को भ्रमित करने का लगातार प्रयत्न करती रहती है।

भारत वर्ष में जन्माष्टमी के अनुष्ठान अत्यंत हर्षोल्लास से मनते हैं. दही हांडी तोड़ने से ले कर नन्हें कान्हा के चरण कमलों के छाप बनाना , रास लीला के अभिनय से ले कर पतंग उड़ाना, और बच्चों का कृष्ण रूपी शृंगार करना- ये सभी संस्कार पूरे भारत के वैष्णवों को प्रिय हैं। (कलियुग के चलते अगर आप पटना में श्री लालू यादव के पड़ोसी हैं, तो आपको उनके बड़े सुपुत्र श्री कृष्ण या राधा के वस्त्र पहने, मवेशियों के बीच फ़ोटो खिंचवाते भी दिख सकते हैं)।

कृष्ण की जन्म-तिथि पर जानें कि देवकी और वसुदेव की काल कोठरी में खिले इस नन्हे नीलकमल के हाथों में कैसे आई यह बांसुरी?

लगभग हर भारतीय देवी-देवता किसी ना किसी वाद्य यंत्र के साथ जुड़े हुए हैं। देवी सरस्वती के हाथों में वीणा है, विष्णु शंख धारण करते हैं और शिव डमरू। संगीत ग्रंथों में ऋषि नारद की 21 तार वाली वीणा का वर्णन है। रामायण और महाभारत में नाना प्रकार के वाद्ययंत्रों का विस्तृत उल्लेख है। युद्ध के आरंभ, अंत और हर छोटी-बड़ी विजय का उद्घोष वीर अपने-अपने शंख बजा कर करते थे।

नागरिक जीवन में दुंदुभि, भेरी, ढोल का भी प्रयोग होता था। यज्ञादि के चलते ऋषि-पत्नियाँ मंत्रोच्चारण के साथ वीणा वादन करती थीं। सबसे मुख्य यह बात है कि हर मंदिर, गुफा और स्तूप में वाद्ययंत्र लिए मूर्तियाँ विराजमान हैं। भारतीय ग्रंथों में वाद्ययंत्रों के उपचारात्मक उपयोग को आरंभ से ही समझाया गया है। भरत मुनि द्वारा रचित प्राचीनतम हिंदू ग्रंथ नाट्य शास्त्र वीणा और बाँसुरी का उल्लेख करता है। बाँसुरी को मानव ध्वनि (गीत) और वीणा का पूरक माना जाता रहा है। 

उदाहरणार्थ, महेश्वर सूत्र सबसे प्राचीन संस्कृत वर्णमाला का क्रम है। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके 14 सूत्र मिलाकर अपने आप में एक शक्तिशाली मंत्र भी हैं। इस मंत्र के दोषरहित उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि-कंपन कई व्याधियों के उपचार में लाभदायक है। ऋग्वेद के अनुसार भगवान शिव इस संस्कृत वर्णक्रम को पृथ्वी पर लाए, जब उनके डमरू बजाने से चौदह सूत्रों की ध्वनियाँ उत्पन्न हुईं।

शिव के औघड़, सरल, तपस्वी स्वभाव से उनका वाद्य मेल खाता है। सुधी टीकाकार उनके अर्द्धनारीश्वर रूप से डमरू के आकार का मिलान करते हैं। परम ज्ञानी नारद की जटिल वीणा सदियों पश्चात जब तानपुरा बन गई, तो घुमक्कड़ साधुओं ने उसे अपना कर जन-जन में कभी भक्ति, कभी विद्रोह की अलख जगाई।

विद्या की देवी सरस्वती ध्यानमग्न हो कर वीणा के तारों को झंकृत करती हैं, जिस से उनके विचारों को संबद्धता और लय मिलती है। हल्के पार्श्व संगीत के साथ गूढ़ विषयों पर चिंतन-मनन करना करना इस सदी में विचारकों की प्रिय पद्धति है। 

ये तो भगवान का हुआ। मनुष्यों में संगीत कला कैसे पहुँची, इसके भी बड़े उल्लेख हैं। समस्त काल्पनिक और सच्चे राजाओं में कई संगीत प्रेमी थे और स्वयं वाद्य यंत्र बजाने की क्षमता रखते थे। इनमें महान गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त एवं उनके वंशज, और भारतीय साहित्य के छैल-छबीले, कामदेव-रूपी महाराज उदयन अग्रणी हैं।

उदयन की शक्ति थी उसका वीणा वादन, जो मदांध हाथियों और शेरों तक पर मायावी असर करता था और उन्हें पूरी तरह शांत कर देता था। उदयन के रोमांचक जीवन पर इतना साहित्य रचा गया कि सत्य-असत्य का भेद कर पाना कठिन है, पर उसके संगीत प्रेम और उसके वीणा वादन का पशु-पक्षियों पर प्रभाव, दोनों सर्वविदित हैं। उसी क्रम में, अपनी सत्ता की वैधता को और पुष्ट करने के लिए समुद्रगुप्त ना सिर्फ़ अपनी लिच्छवि रानी के साथ सिक्कों पर दिखाई दिए, बल्कि स्वयं को राज गुण संपन्न दिखाने के लिए वीणा का सहारा लिया।

श्री कृष्ण भगवान का धरती पर मनुष्य अवतार हैं। तो क्या कैशोर्य में बजी बाँसुरी उनके आनेवाले राजसी काल का सूचक है? अथवा उसके प्रयोग से वे ग्राम्य-प्रवास में विचलित मनुष्यों और पशु पक्षियों को मोहित एवं शांत करते हैं? क्या लंबी, छरहरी, सुरीली बाँसुरी उनके व्यक्तित्व से मेल खाती है? या फिर उनके बाँसुरी वादन की कथाएँ पढ़ने-सुनने वालों को यह वाद्य यंत्र उनके अंदर बैठे भगवान का आभास देता है? 

प्राचीन भारतीय परंपरा में वाद्ययंत्रों को उनके ध्वनिक सिद्धांत के आधार पर चार समूहों में वर्गीकृत किया गया था जिसका आधार उनके काम करने के ढंग पर था, ना कि वे किस सामग्री से बने हैं। ये थीं एक-एक तार वाले वाद्ययंत्र, खोखले वाद्ययंत्र, ठोस वाद्ययंत्र, और ढके हुए यंत्र।

जिसे हम बाँसुरी समझते हैं, वह असल में कई प्रकार की होती हैं। जैसे उत्तर की विचित्र वीणा में दो और दक्षिणी सरस्वती वीणा में एक तुंबी होती हैं, वैसे ही उत्तर भारतीय अथवा हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त छह छिद्र वाली बांसुरी, दक्षिण भारतीय अथवा कर्नाटक संगीत की बाँसुरी, जिसे वेणु कहते हैं, उससे संरचना और स्वर दोनों में भिन्न है। आधुनिक शंख बाँसुरी 30 से 40 इंची होती है और गहरे स्वरों के लिए उपयुक्त है। 

पौराणिक दृष्टिकोण से भी श्री कृष्ण की अलग-अलग बाँसुरियाँ हैं और वे अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न धुनें बजाते हैं-

1) वेणु- इस बाँसुरी में आठ छिद्र हैं, और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त इस बाँसुरी को लिए श्री कृष्ण वेणुगोपाल कहलाते हैं। 

2) मुरली- इस 18 इंची बाँसुरी के अंत में एक छेद होता है, और शरीर पर चार छेद होते है। इसे सीधा बजाते हैं। अंतरंग स्वर पैदा करने वाली इस बाँसुरी को लिये श्री कृष्ण मुरलीधर कहलाते हैं। 

3) वम्सी- 15 इंची इस बाँसुरी के शरीर पर नौ छिद्र होते हैं। बोलचाल की भाषा में बंसी कहलाने वाली इस बांसुरी को श्री कृष्ण अपने बंसीधर स्वरूप में धारण करते हैं. इससे लंबी हो तो सम्मोहिनी, और भी लंबी हो तो आकर्षिणी, और सबसे लंबी को आनंदिनी कहते हैं।

मेरा मानना है कि श्री कृष्ण ने अपने जीवन में हर बदलते काल की घोषणा बाँसुरी वादन कर के की थीँ ये एक महा-संकट या महा-विपदा पर विजय प्राप्ति भी हो सकती है, जैसे कालिया-मर्दन पर अदम्य शिशु का लयबद्ध नृत्य, गोवर्धन पर्वत उठा कर भयभीत ग्रामीणों को शरण देना, या किशोरावस्था में प्रवेश की रासलीला द्वारा घोषणा। श्री कृष्ण की सरला नामक कोकिलकंठी बाँसुरी मृदु स्वर में स्त्री-पुरुषों और समस्त जीव जगत को मोह लेती थी। वहीं महानंदा नामक वम्सी का प्रयोग वे केवल राधा को बुलाने के लिए करते थे। 

बाँसुरी धारण किए विष्णु के अवतार अधूरे रहते हैं जब तक उनके सान्निध्य में राधा न हो। भारतीय ग्रंथावलियों, कथा-सागरों, महाकाव्यों में राधा का स्थान विचित्र है। किशोरावस्था की ड्योढ़ी पार करती सुंदर नवयौवना आयु में छोटे पर कहीं अधिक समझदार, बलशाली, और ग्रामीण परिवेश से बहुत, बहुत बड़े संसार के लिए बने अपने सखा के लिए मिश्रित भाव रखती है।

लड़कपन का स्नेह और स्पर्धा कब गहन आकर्षण में बदल गए, यह कोई समकालीन अथवा आधुनिक कथाकार समझ नहीं पाया, क्योंकि श्री कृष्ण और राधा ने उस आकर्षण पर कभी भी अमल नहीं किया। अपनी मर्यादा में रहते दोनों ने अपने सांसारिक जीवन को जीया और अंत में मानव जाति का भला कर वैकुंठ लोक चले गए।

साथ गाँव में रहकर भी केवल गीत-संगीत और नृत्य के माध्यम से बहुत कुछ कहना लेकिन कभी भी शब्दों का उपयोग कर उस भावना को नष्ट न कर देना- इस को जैसे-जैसे वैष्णव संप्रदाय के भक्त समझते चले गए, राधा और श्री कृष्ण उनके लिए कच्ची उम्र के अनकहे, अविस्मरणीय, प्रथम-प्रेम का पर्याय बनते चले गए।

इस समूचे कथानक में श्री कृष्ण की बाँसुरी के स्वर जैसे एक मोहपाश हैं, एक ऐसा संकेत जिसे केवल राधा ही समझ सकती है, और जिन्हें सुन कर उसकी प्रतिक्रिया दूसरों के लिए अबूझ है। ठीक वैसे ही, मात्र एक वैष्णव भक्त ही बाँसुरी की धुन के माध्यम से श्री कृष्ण के स्वरूप को आत्मसात कर सकता है। 

श्री कृष्ण ने अपने किशोर अल्हड़पन के परित्याग की घोषणा भी बांसुरी बजा कर ही की। जब वे ब्रज छोड़कर मथुरा की ओर प्रस्थान कर रहे थे, उन्होंने बाँसुरी बजाई, पर उसे सुन कर भी राधा बाहर न निकली।

वैष्णव संप्रदाय का मानना है कि जब वे वैकुंठ की ओर प्रस्थान कर रही थीं, तब श्री कृष्ण मन की गति से चल कर उनके पास पहुँचे और उनके लिए अंतिम बार बाँसुरी वादन किया। परम आनंद में डूबी राधा के परलोक सिधारने के पश्चात श्री कृष्ण ने खिन्न हो कर महानंदा बाँसुरी तोड़ डाली, और जीवन के अपने उस हिस्से पर हमेशा के लिए चुप्पी साध ली।

परंतु समस्त ब्रह्मांड को अपने मुँह में दबाए हुए विष्णु के सर्व शक्तिशाली अवतार को भी मनुष्य रूप में मनुष्यों की दुविधाएँ नहीं छोड़तीं। भगवान शिव, जो रमते जोगी होने के कारण सांसारिक बातों से पूर्णतः अनभिज्ञ रहते हैं, श्री कृष्ण से मिलने भू-लोक पधारे।

आने से पहले उन्होंने बहुत सोचा कि जिसके पास सब कुछ है, उसे क्या भेंट किया जाए। तभी शिव को ध्यान हुआ कि उनके पास ऋषि दधीचि की एक हड्डी शेष है। ऋषि दधीचि की हड्डियों से विश्कर्मा ने तीन धनुष पिनाक, गांडीव, शारंग, तथा इंद्र के लिए वज्र का निर्माण किया था। शिव ने उस हड्डी से एक बाँसुरी का निर्माण किया, और श्री कृष्ण से मिल कर उन्हें वह बंसी दी। अपनी बाँसुरी तोड़ चुके श्री कृष्ण ने उसे अपना प्रारब्ध जानकर कृतज्ञता से स्वीकार किया, और आजीवन अपने पास रखा।

पारंगत हाथों में बाँसुरी शुद्ध, स्पष्ट, विविध और मधुर स्वर उत्पन्न करती है, अधीर मन को शांत करती है और दिन भर की भागदौड़ से आपका मन हटा देती है, फिर चाहे आप 21वीं सदी की कामकाजी महिला हों या नंदगांव की कार्यकुशल गोपी। माटी से आने के कारण उसमें माटी की सुगंध बसती है, और हल्के संगीत को कहीं भी बजा लेने के कारण नीरस परिश्रम करने वालों के लिए दिन की थकान उतारने का चुना हुआ साधन है। इसकी समृद्ध, शुद्ध अभिव्यक्ति को आइए जन्माष्टमी के पावन अवसर पर पुनः स्मरण करें।