भारती
जलालुद्दीन खिलजी ने खोद डाले रणथम्बौर के मंदिर- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग 13

दिल्ली पर इस्लामी कब्ज़े की पहली सदी बीत रही थी। वह 1291 का साल था। अब जलालुद्दीन खिलजी नाम का एक शख्स दिल्ली में उभरता है। वह बलबन का सरजानदार रहा था। उसे कैथल और सामाने की अक्ता सौंपी गई थी।

दिल्ली पर कब्ज़ा करते ही उसने सबसे पहले रणथम्बौर पर हमले का फैसला लिया। बेटे अरकली खां को दिल्ली सौंपकर उसने राजस्थान का रुख किया। पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद दिल्ली पर तुर्कों का कब्जा हुआ तो पृथ्वीराज के बेटे गोविंदराज ने रणथम्बौर से ही अपना राजपाट कायम रखा था। उसके बाद लगातार कुतबुद्दीन एबक, इल्तुतमिश और बलबन के हमले यह किला झेल चुका था। अब खिलजी की बारी थी…

जियाउद्दीन बरनी हमें उस समय की ग्राउंड-रियलिटी बताएगा। बरनी के रिश्ते भी पावर-सर्कल में थे। उसका नाना हुसामुद्दीन बलबन का भरोसेमंद सिपहसालार था। उसका बाप मुईदुलमुल्क जलालुद्दीन खिलजी के बेटे अरकली खां का नायब था। उसका चचा अलाउलमुल्क दिल्ली का कोतवाल बनने के पहले कड़ा में अलाउद्दीन खिलजी का भरोसेमंद आदमी था और हम आगे देखेंगे कि किस तरह अपना भरोसेमंद संवाददाता बरनी भी मोहम्मद बिन तुगलक के समय कितना ताकतवर होता है।

इस तरह बरनी को अपने नाना, पिता, चचा और खुद अपनी तरफ से पूरी सदी के वाकए बहुत करीब से पता थे। दिल्ली से बाहर जलालुद्दीन खिलजी के पहले हमले के बारे में बरनी ने लिखा है

झायन पहुँचकर सुलतान ने उस पर कब्ज़ा किया। वहाँ के मंदिरों को तुड़वाया गया। मूर्तियाँ तुड़वा डाली गईं, उन्हें जलवाया गया। झायन और मालवा की विलायत को उसने तहस-नहस कर डाला।

अत्यधिक धन-दौलत उसके हाथ लगी, जिसे उसने अपनी सेना में बांट दिया। रणथम्बौर का राय, राजकुमार, मुकद्दम और प्रतिष्ठित लोगों के साथ सपरिवार अपने किले में बंद हो गया। जलालुद्दीन खिलजी चाहता था कि रणथम्बौर पर भी कब्जा हो। उसने किले को घेरने का हुक्म दिया।”

हमले और कब्ज़े की तैयारियाँ शुरू हो गई थीं। चारों तरफ ऐसे मचान तैयार होने लगे, जिनपर चढ़कर किले के भीतर हमले हो सकें। 80 साल का जलालुद्दीन खिलजी झायन से रणथम्बौर पहुँचा। किले का दूर से मुआयना किया। किले के भीतर हिंदू राजा, उनके अधिकारी और खास लाेगों के परिवार मौजूद थे। खिलजी ने किले के चारों तरफ फैली अपनी ताकत का अंदाज़ा लगाया। दूसरे ही दिन अपनी हमलावर फौज के गुर्गों को बुलाकर वह कहता है-

किले को देखने के बाद मेरी समझ में आया कि यह उस समय तक कब्ज़े में नहीं आ सकता, जब तक मुसलमानों की बहुत बड़ी तादाद अपनी जान की बाजी लगाने तक टिकी न रहे। मैं ऐसे दस किलों को भी मुसलमानों के एक बाल के बराबर नुकसान पहुँचाकर हासिल करने के हक में नहीं हूँ।

खिलजी को अहसास हो गया था कि रणथम्बौर पर कब्ज़े की लड़ाई में उसकी फौज के मुसलमान बड़ी तादाद में मारे जाएँगे। राजा से यह लड़ाई आसान नहीं होगी। इसलिए वह पीछे हट गया। अगले ही दिन उसने डेरा उठाने का हुक्म दिया।

अहमद चप जैसे करीबी मलिक उसे समझाते ही रह गए कि जनाब, इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। जब भी हम कहीं हमले का इरादा तय होता था तो फतह के बगैर वापस नहीं होते थे। अगर हमने ऐसे मौके पर पीठ दिखाई तो इस किले का राजा अभिमानी हो जाएगा। वह समझेगा हम डर गए और ऐसे में हमारे यहां आने से जो डर लोगों में बैठा है, वह भी कम हो जाएगा। अपनी सीमित ताकत पर जलालुद्दीन खिलजी उससे कहता है

“ऐ मूर्ख, तू अपने आपको बड़ा बहादुर समझता है और यह नहीं देखता कि हर दिन हिंदू जो खुदा और मुस्तफा के दुश्मन हैं, बड़े ठाट-बाट और शान से मेरे महल के नीचे से होकर यमुना के किनारे तक जाते हैं, मूर्तिपूजा करते हैं, शिर्क और कुफ्र का हमारे सामने ही प्रचार करते हैं और हम जैसे बेशर्म जो कि अपने आपको मुसलमान कहते हैं, कुछ नहीं कर सकते। उन्हें हमारी ताकत का कोई भय नहीं है!

खिलजी का यह बयान गौरतलब है। यह दिल्ली में कब्जे के 100 साल बाद के हिंदुओं के हौसले का खुलासा करता है। जबकि इस समय तक मौजूदा कुतुबमीनार इलाके के सारे मंदिर तोड़ डाले गए थे और उसके मलबे से कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण भी काफी हद तक हो चुका था।

इल्तुतमिश और बलबन के समय हिंदू राज्यों की बेतहाशा लूटमार के नज़ारे और किस्से भी दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई-सुनाई दे रहे थे। लेकिन ऐसे विकट समय भी दिल्ली के स्थानीय निवासी हिंदू नदी किनारे स्नान-पूजा के लिए आते-जाते रहे थे और अपने महलों पर से खिलजी उन्हें लाचारी से देखता होगा।

बूढ़े सुलतान जलालुद्दीन खिलजी ने इस मौके पर अहमद चप से लंबी बात की है। बरनी ने उसका बयान विस्तार से इन शब्दों में दर्ज किया-

“अगर मैं इस्लामी बादशाह होता और दीन की हिफाज़त की ताकत होती तो मैं हिंदुओं को जो मुस्तफा के मजहब के सबसे बड़े दुश्मन हैं, बेफिक्र होकर पान का बीड़ा न खाने देता, न सफेद कपड़े पहनने देता और न ही मुसलमानों के बीच ठाट-बाट से जीने देता।

मुझे शर्म आनी चाहिए कि जुमे के दिन मिम्बरों से हमारे नाम का खुत्बा पढ़ा जाए, खुत्बा पढ़ने वाले झूठ-मूठ हमें इस्लाम का रक्षक बताएँ। जबकि हमारी हुकूमत में हमारे सामने हमारी राजधानी में मुस्तफा के मजहब के दुश्मन शानो-शौकत से धन-दौलत से संपन्न जीवन जीते हैं, भोग-विलास में रहते हैं, हमारे बीच अपने ऊपर गर्व करते हैं, खुल्लमखुल्ला मूर्तिपूजा करते हैं, ढोल पीट-पीटकर कुफ्र और शिर्क का प्रचार करते हैं।

हमारे सिर पर, हमारी बादशाही पर और हमारे दीन की रक्षा करने पर थू है। खुदा और रसूल के दुश्मन बड़े ठाट से जी रहे हैं जबकि उनके लहू की नदी बहाई जा सकती है। लेकिन हम कुछ तनके न्यौछावर के रूप में लेकर खुश हो जाते हैं।

आइए अब मिलते हैं अमीर खुसरो से। उसकी प्रसिद्धि एक कवि की है। कव्वालियों में उसके कई कलाम आज भी गाए जाते हैं। अमीर खुसरो आज के उत्तरप्रदेश के एटा जिले में किसी पटियाली नाम की जगह पर पैदा हुआ मूल रूप से तुर्क ही था। दिल्ली पर खिलजी के कब्ज़े के समय वह 37 साल का था। उसका बाप अमीर सैफुद्दीन इल्तुतमिश के समय ऊँचे ओहदे पर था। अमीर खुसरो खिलजी और तुगलकों के कई सुलतानों का समकालीन रहा।

जियाउद्दीन बरनी के अलावा अमीर खुसरो भी अपने समय की सब हलचल को अपनी आँखों से देख रहा है। कानों से सुन रहा है। लेखक और कवि तो वह है ही। उसने 92 किताबें लिखीं। वह निजामुद्दीन औलिया का चेला था। 1325 में उसने आखिरी साँस ली। खिलजियों की बेरहमी के बेशकीमती सबूत उसने हमें दिए हैं। रणथम्बौर के इस हमले को भी अमीर खुसरो ने अपनी डायरी में दर्ज किया। वह बता रहा है

“दो सप्ताह की यात्रा करके सुलतान रणथम्बौर की पहाड़ियों के पास पहुँचा। तुर्कों ने देहातों का विनाश शुरू कर दिया। आगे की टुकड़ियों के सवार भेजे जाने लगे और हिंदुओं की हत्या होने लगी। सुलतान खुद चार फरसंग की दूरी पर रहा।

कुछ सवार दुश्मनाें की जानकारियाँ जुटाने भेजे गए। उन्हें 500 हिंदू सवार दिखाई दिए। दोनों तरफ से लड़ाई शुरू हो गई। हिंदू मार-मार का नारा लगाते थे। एक धावे में 70 हिंदुओं की हत्या हुई। वे लोग भाग निकले।

फौज से झायन की दूरी दो फरसंग थी। बीच में कठिन पहाड़ी थी लेकिन शाही सेना एक ही धावे में पहाड़ियों में दाखिल हो गई। राय को जब सूचना मिली तो उसके हाथ-पैर फूल गए। उसने साहिनी को बुलवाया, जो हिंदू नहीं बल्कि लोहे का पहाड़ था। उसके मातहत 40,000 सैनिक थे, जो गुजरात और मालवा तक लड़े थे। उसने 10.000 सैनिकों के साथ हमला किया।

तुर्क धनुर्धारियों ने बाणों की बरसात कर दी। साहिनी भाग गया। हज़ारों हिंदू रावत मारे मारे गए। रातों-रात राय और उसके पीछे बहुत से हिंदू रणथम्भौर की पहाड़ियों की तरफ भाग निकले। बंदी रावतों को सुलतान के सामने पेश किया गया। लूट में मिली दौलत को देखकर सुलतान खुश हो गया।

बरनी की तुलना में अमीर खुसरो ने रणथम्बौर की मुहिम को तफसील से लिखा है। ये विवरण हमें बताते हैं कि ये विदेशी मूल के हमलावर जब किसी हिंदू राज्य पर हमला करते थे तो उनकी रणनीति क्या होती थी? वे करते क्या थे? कैसे पेश आते थे? उनके युद्ध के तौर-तरीके क्या थे?

21 मार्च 1291 को दिल्ली में दरबार के बाद निकले खिलजी का लहरावत में पहला पड़ाव हुआ, फिर चंदावल में नदी किनारे विश्राम, रेवाड़ी, नारनौल होकर वह रणथम्बौर पहुँचा। इन रास्तों से पहले भी कुतबुद्दीन, इल्तुतमिश और बलबन भी जबर्दस्त हमले कर चुके थे। ज़रा रुकिए। इस समय अमीर खुसरो बता रहा है

तीसरे दिन दोपहर सुलतान झायन पहुँचा और राय के महल में उतरा। महल की सजावट और कारीगरी देखकर वह हैरान रह गया। वह महल हिंदुओं का स्वर्ग जैसा था। चूने की दीवारें आइने जैसी थीं। उसमें चंदन की लकड़ियाँ लगी थीं।

सुलतान कुछ देर वहाँ रहकर बहुत खुश हुआ। वहाँ से निकलकर वह बागीचों और मंदिरों में गया। मूर्तियों को देखकर भी वह चकित हो गया। उस दिन तो वह मूर्तियों को देखकर वापस आ गया। दूसरे दिन उसने सोने की मूर्तियाँ पत्थर से तुड़वा डालीं। महल, किला और मंदिर तोड़ डाले गए। लकड़ी के खंभों को जला दिया गया।

झायन की नींव इस तरह से खोद डाली गई कि सुलतान के सैनिक धन-दौलत से मालामाल हो गए। मंदिरों से अजीब आवाजें आने लगीं कि शायद कोई और महमूद जिंदा हो गया है। दो पीतल की मूर्तियाँ जिनमें से प्रत्येक एक-एक हज़ार मन की थी, तुड़वा दी गईं और उनके टुकड़े लोगों को दे दिया गया कि वे दिल्ली लौटकर मस्जिद के दरवाजे पर फैंक दें।”

यह दिल्ली में एक नए राजवंश की शुरुआत का पहला साल है। झायन को लूटकर बरबाद करने के बाद खिलजी के फौजियों की टुकड़ियों ने अलग-अलग दिशाओं में लगातार धावे बोले। उन्होंने पहाड़ों में जा छिपे हिंदुओं का पीछा किया गया। उन्हें बड़ी तादाद में गुलाम बनाकर सुलतान के सामने पेश किया गया।

एक टुकड़ी ने चंबल और कुंआरी नदियों को पारकर मालवा की सीमा तक हमला किया और बहुत लूटमार की। अहमद चप नाम का मलिक तो एलोरा तक हमले करने गया। लेकिन रणथम्बौर के अजेय किले से बूढ़ा सुलतान पीठ दिखाकर लौटा।

रणथम्बौर में हिंदू राजा और उन सबके परिवार इस बार तो बच गए थे, लेकिन जब वे इस हमले के बाद किले से उतरकर अपने राज्य में निकले होंगे, जब झायन में दाखिल हुए होंगे तो उनकी आंखों के सामने बरबादी के निशान वैसे ही होंगे, जैसे हमने 9/11 को न्यूयार्क के ट्विन टावर को देखा…

अगले अंक में देखिए, रमजान के महीने में इफ्तार के वक्त जलालुद्दीन खिलजी के कत्ल के दृश्य। तब परदे पर आएगा भारत के इतिहास का एक और दुर्दांत अपराधी अलाउद्दीन खिलजी। उसने 20 साल के कब्जे में भारत के दूर-दूर इलाकों में ऐसी ही लूट और कत्ल मचा दी थी।

पिछला अंक- दिल्ली के आसपास काफिरों के कटे सिर पर इनाम- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग 12

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com