भारती
जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान-2 अनुपूरक, प्रवासी श्रमिकों के लिए अवसर

आशुचित्र- जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान-2 कोविड-19 के कारण विस्थापित हुए प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देकर भारत की स्वच्छता आवश्यकताओं को कैसे पूरा कर सकते हैं।

महीने-डेढ़ महीने से प्रतिदिन प्रवासी श्रमिकों के घर लौटने के संघर्ष का समाचार हम देख-सुन-पढ़ रहे हैं। सरकार ने इस समस्या के प्रभाव को कम करने के लिए प्रयास किए हैं लेकिन सर्वप्रथम तो प्रयासों की पहल में देरी हुई और अब प्रवासी की बड़ी संख्या के सामने सरकारी प्रयास पूरे नहीं पड़ पा रहे हैं।

इसी बीच कई राज्यों ने निवेश आकर्षित करने और किसानों की आय को विकल्प देने के लिए कुछ सुधार किए जिससे घर लौट आए प्रवासियों को पुनः रोजगार की खोज में दूर न जाना पड़े। वित्त मंत्री की आर्थिक राहत पैकेज की घोषणाओं में भी रोजगार और आय बढ़ाने के विकल्पों पर ज़ोर था। ग्रामीण रोजगार देने वाले मनरेगा के बजट को 40,000 करोड़ रुपये बढ़ा दिया गया है।

रोजगार का एक और स्रोत है- जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान का दूसरा चरण जिसे 19 फरवरी को कैबिनेट स्वीकृति मिली थी। इन दोनों को रोजगार के बड़े स्रोत में देखे जाने का कारण है इनके लिए आवंटित राशि और इनके अंतर्गत किए जाने वाले कार्य का बड़ा लक्ष्य।

स्मरण हो कि 1 फरवरी को प्रस्तुत बजट में अगले पाँच वर्षों में जल जीवन मिशन पर कुल 3.6 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने की घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने की थी। साथ ही स्वच्छ भारत अभियान के द्वितीय चरण को भी अगले पाँच वर्षों के लिए 1.41 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यह राशि कुल 5 लाख करोड़ रुपये हो जाती है जो घोषित आर्थिक पैकेज का एक-चौथाई है।

कहा जा रहा है कि जल्द ही जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान-2 के अंतर्गत महामारी नियंत्रण और प्रवासी श्रमिकों के लिए रोजगार हेतु नए दिशानिर्देश जारी किए जाएँगे। जब ये दिशानिर्देश आएँगे तब हम इनका भी विश्लेषण करेंगे लेकिन इस लेख में इस सहक्रिया की आवश्यकता, लक्ष्य और लाभ पर चर्चा करेंगे।

जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान-2 एक-दूसरे के पूरक

जल जीवन मिशन का उद्देश्य 2024 तक हर घर तक पानी पहुँचाना है लेकिन पानी की उपलब्धता इसमें एक बड़ चुनौती है। यहीं पर स्वच्छ भारत अभियान द्वितीय की भूमिका बढ़ जाती है क्योंकि इसका चौथा स्तंभ है मलजल प्रबंधन। मलजल प्रबंधन करके उपचारित मलजल का उपयोग किया जा सकता है जिससे उपयोग के लिए हमारे पास स्वच्छ जल उपलब्ध रहे।

उपचारित मलजल का उपयोग कृषि, उद्योग और मत्स्यपालन जैसी गतिविधियों में हो सकता है। अकेले सिंचाई में ही 78 प्रतिशत जल का उपयोग होता है और भारत में 20 प्रतिशत से भी कम जल का उपचार हो पाता है। ऐसे में कार्य की आवश्यकता भी अधिक है और इसका विस्तार भी।

इसे कुशल रूप से क्रियान्वित करने का एक तरीका है विकेंद्रीकृत मलजल प्रबंधन। भारतीय शहरों के संदर्भ में मलजल बहाव मानकों के अनुसार यह प्रणाली आर्थिक रूप से व्यवहार्य, पर्यावरण की दृष्टि से दीर्घ समय के लिए उपयोगी और कम रखरखाव की माँग करने वाली है।

शहरी मामले एवं आवास मंत्रालय की तकनीकी इकाई केंद्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्था (सीपीएचईईओ) ने एक पुस्तिका जारी कर बताया है कि विकेंद्रीकृत सीवेज प्रणाली का निर्माण कैसे हो व इसके क्या लाभ होते हैं। निम्न चित्र में इस प्रणाली की चित्रात्मक रूपरेखा समझाई गई है-

एक विकेंद्रीकृत सीवेज प्रणाली में मलजल का स्थानीय रूप से एकत्रीकरण करके उसका शौचालय के स्थान पर ही उपचार कर दिया जाता है या निकटवर्ती मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) में भेजा जाता है जो भी स्थानीय उपचार का ही भाग है।

इस प्रणाली का डिज़ाइन सरल होता है क्योंकि मलजल परिमाण कम होने के कारण मात्रा का सही अनुान लगाया जा सकता है। छोटे आकार का होने के कारण इसका निर्माण और रख-रखाव भी आसान होता है। अनेक स्थानों पर एसटीपी के फैलाव के कारण उपचारित मलजल का उसी स्थान पर उपयोग करने का विकल्प रहता है व उपचारित मलजल के लिए एक पृथक पाइप एवं पंप तंत्र की लागत से बचा जा सकता है।

पर्यावरण के लिए यह लाभदायक इसलिए है क्योंकि नदी का अपना पारिस्थितिकी तंत्र होता है जो इसमें डाले जाने वाले मलजल का उपचार कर उसे अपने में समाहित कर सकता है परंतु इसकी एक सीमा होती है। ऐसे में जब उपचारित मलजल किसी एक स्रोत से नदी में मिलने की बजाय अलग-अलग स्थानों पर नदी से मिलेगा तो नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर कम प्रभाव पड़ेगा।

रोजगार के अवसर

जल जीवन मिशन और अटल भूजल योजना के संयुक्त प्रयासों के तहत वर्षा जल संचयन और भूजल की भराई जैसे कार्यों में तो श्रमिकों की आवश्यकता पड़ेगी ही। इसके अलावा जैसा कि हमने ऊपर समझा कि विकेंद्रीकृत सीवेज प्रणाली का डिज़ाइन और निर्माण आसान होता है तो कम कौशल वाले श्रमिक भी इसे कर पाएँगे। एक अतिरिक्त लाभ यह है कि विकेंद्रीकृत होने के कारण जगह-जगह एसटीपी बनाए जाएँगे और परियोजनाओं की संख्या अधिक होने से रोजगार के अवसर अधिक व घर के निकट ही होंगे।

इकोनॉमिक टाइम्स  की रिपोर्ट के अनुसार जिलावार कौशल-मानचित्रीकरण (स्किल मैपिंग) भी किया जा रहा है जिससे उपलब्ध श्रमिकों की संख्या एवं उनके कौशल के अनुसार उनका वर्गीकृत डाटा उपलब्ध रहे जिसका उपयोग सरकारी कार्यों में रोजगार देने के लिए किया जा सके।

प्रवासी श्रमिकों में से अधिकांश कौशल-युक्त हैं और निर्माण व अचल संपत्ति संबंधित कामों के करणे में निपुण हैं। जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान के लिए वे पाइप डालने, एसटीपी और शौचालयों का निर्माण करने में वे सक्षम होंगे। जल शक्ति मंत्रालय उन्हें बाज़ार के स्तर का ही वेतन देने के लिए तैयार है, ईटी द्वारा जुटाई जानकारी के अनुसार।

स्वच्छ भारत अभियान मलजल प्रबंधन के साथ कूड़ा प्रबंधन की भी बात करता है। पंचायत स्तर पर जो प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जाएगी उसमें द्वार से कूड़ा एकत्रित करने, उनका परिवहन कर उन्हें उपचार संयंत्रों या सुरक्षित फेंके जाने वाले स्थलों पर पहुँचाने में भी लोगों की आवश्यकता होगी। जैविक कूड़े से जैविक ईंधन बनाकर सीएनजी की तरह उपयोग पर भी विचार चल रहा है जो रोजगार के अन्य अवसर खोलेगा।

लगभग सभी नगरों में कूड़ा प्रबंधन का दायित्व नगर निगम का होता है। कूड़ा एकत्रीकरण के लिए शुल्क स्वच्छ भारत अभियान-2 में अनिवार्य कर दिया गया है जो वित्त मंत्री के नगर निगमों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के आह्वान में सहायक सिद्ध होगा। तय आय के साथ नगर निगमों को नवाचार अपनाकर अपने आय के स्रोत बढ़ाने होंगे तथा इन्हीं नवाचारों में रोजगार के और अवसर निहित हैं।