भारती
जल जीवन जैसी महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करने में गुणवत्ता और उपलब्धता की चुनौती

1 फरवरी को बजट प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि जल जीवन मिशन के लिए सरकार ने कुल 3.6 लाख करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में इस परियोजना के लिए 11,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 7,750 करोड़ रुपये केंद्रीय सड़क व इंफ्रास्ट्रक्चर कोष से इस योजना में लगाए जाएँगे।

जल जीवन मिशन का उद्देश्य 2024 तक हर घर तक पानी पहुँचाना है। इसके लिए स्थानीय जल स्रोतों की वृद्धि, वर्तमान स्रोतों के जल स्तर में बढ़ोतरी, जल-संचयन को बढ़ावा और जहाँ आवश्यक हो वहाँ अलवीकरण करना होगा।

जुलाई से दिसंबर 2018 के बीच किए गए एनएसएस के 76वें सर्वेक्षण में भारत भर के 4,66,527 लोगों का सर्वेक्षण किया गया था। स्वच्छता एवं पेयजल पर यह रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत के कुल 21.4 प्रतिशत लोगों के घर में ही नल से पानी आता है। इस प्रकार जल जीवन मिशन को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर प्रयासों की आवश्यकता होगी।

दूसरी चुनौती है कि इनमें से 65.3 प्रतिशत घरों में पानी का उपचार नहीं किया जाता, यानी वे पानी की गुणवत्ता के लिए आपूर्ति स्रोतों पर आश्रित हैं। इस प्रकार सिर्फ जल नहीं, स्वच्छ जल पहुँचाना सरकार का काम होगा। हालाँकि जल जीवन मिशन का लक्ष्य ही है कि भारतीय मानक-10500 के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 55 लीटर पेयजल पहुँचाया जाए।

जल की गुणवत्ता है चुनौती लेकिन अब तक नहीं हुआ काम

जल शक्ति मंत्रालय के केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार भारत की 85 प्रतिशत पेयजल आवश्यकता को भूमिगत जल पूरा करता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जल जीवन मिशन के अंतर्गत भी पानी की आपूर्ति में भूमिगत जल की बड़ी भूमिका होगी।

साथ ही स्वयं जल शक्ति मंत्रालय ने दिसंबर 2019 में संसदीय स्थाई समिति को सौंपी रिपोर्ट में स्वीकारा कि प्रदूषित भूमिगत जल जल जीवन मिशन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। विभाग के विश्लेषण में पाया गया कि 18 राज्यों के 56,788 ग्रामीण घरों में जल फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह, खारापन, नाइट्रेट और भारी धातुओं से प्रदूषित था।

जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत

हालाँकि विभाग इस रिपोर्ट को ही सर्वोपरि नहीं मान रहा और समिति ने सुझाव दिया, “हो सकता है कि पानी की गुणवत्ता ज़मीनी स्तर की परिस्थिति के गुरुत्व को नहीं दर्शाती। ऐसे में विभाग को एक समयबद्ध स्वतंत्र तकनीकी सर्वेक्षण करवाना चाहिए ताकि परिस्थिति का आँकलन किया जा सके और समस्या के समाधान के लिए उचित प्रयास किए जा सकें।”

इसी समस्या के परिप्रेक्ष्य में विभाग ने राष्ट्रीय जल गुणवत्ता उप-मिशन की शुरुआत 22 मार्च 2017 को की थी जिसका लक्ष्य था कि मार्च 2021 तक आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रदूषण से प्रभावित 28,000 घरों में स्वच्छ पेयजल पहुँचाया जाए।

हाल में सौंपी गई रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम को सबसे अधिक प्रभावित राज्य बताया गया है। उस समय भी यही माना गया था कि पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक और राजस्थान के जल में फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा होने से स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

लेकिन 2017 से इस योजना के लिए आवंटित 4,690 करोड़ रुपये में से मात्र 2,811 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए, जुलाई 2019 में राज्य सभा को बताया गया। पश्चिम बंगाल की समस्या को देखते हुए 1,305.7 करोड़ रुपये की सबसे बड़ी राशि इसे ही सौंपी गई थी मगर राज्य मात्र 552.4 करोड़ रुपये खर्च कर पाया। वहीं राजस्थान को मिले 895.5 करोड़ रुपये में से केवल 604 करोड़ रुपये खर्च हो सके।

लक्षित घरों में से 11,884 घरों तक यह योजना पहुँच पाई है और 4,100 घरों की जल गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत जल गुणवत्ता की समस्या का सामना कर रहे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।

जल उपलब्धता पर पहले करना होगा कार्य

जल गुणवत्ता की बात तब आएगी जब हमारे पास पानी उपलब्ध होगा। मई 2019 में 12 राज्यों द्वारा जल संरक्षण पर एक प्रेज़ेंटेशन जल शक्ति मंत्रालय को सौंपी गई थी। इसमें संसाधनों के उचित उपयोग, जल संचयन, भूजल की अप्राकृतिक भराई जैसे विषयों पर अपने प्रयासों को इन राज्यों ने सामने रखा।

इसके बाद 25 दिसंबर 2019 को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर अटल भूजल योजना शुरू की गई जिसका उद्देश्य सामुदायिक स्तर पर व्यवहार परिवर्तन करके भूमिगत जल का दीर्घ अवधि तक प्रबंधन करना है। यह योजना सात राज्यों- गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश- पर केंद्रित है।

अटल भूजल योजना की शुरुआत करते प्रधानमंत्री मोदी

आशा है कि इन राज्यों के 78 जिलों के 8,350 ग्राम पंचायतों तक इस योजना का लाभ पहुँचेगा। इसके लिए 2020-21 से 2024-25 तक योजना पर कुल 6,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे जिसमें से आधी राशि वर्ल्ड बैंक ऋण के रूप में देगा व इसे केंद्र सरकार चुकाएगी।

मनरेगा के साथ मिलकर वर्षा जल संचयन, भूजल की भराई जैसे प्रयास जल स्रोत को लंबे काल तक बचाए रखने के लिए अनिवार्य रूप से जल जीवन मिशन के अंतर्गत करने होंगे। उपलब्धता व गुणवत्ता पर नज़र रखने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) के उपयोग का उल्लेख भी मिशन के दिशानिर्देश में है।

भूमिगत जल की महत्ता को देखते हुए केंद्रिय भूजल बोर्ड इसका संपूर्ण मानचित्रिकरण कर रहा है। 78 प्रतिशत क्षेत्र के मानचित्र तैयार हो चुके हैं और 54 प्रतिशत क्षेत्र के लिए भूजल प्रबंधन योजना भी विकसित की जा चुकी है।

जिन क्षेत्रों में भूजल प्रदूषित है वहाँ उसका उपचार किया जा सकता है लेकिन यह आर्थिक भार बढ़ाता है इसलिए ऐसे क्षेत्रों में सतही जल को प्राथमिकता दी जाती है। कोलकाता के दक्षिणी उप-नगरीय क्षेत्रों में जल समस्या सबसे अधिक है जहाँ जल आपूर्ति पर्याप्त न होने के कारण नागरिकों को भूमिगत जल पर आश्रित होना पड़ता है।

एक तरफ कोलकाता नगर निगम का दावा है कि यह नागरिकों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए पर्याप्त जल आपूर्ति करता है लेकिन अस्थाई जनसंख्या के कारण समस्याएँ उत्पन्न हो रहीं हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि ममता सरकार के जल शुल्क हटाने से जल का दुरुपयोग बढ़ जाने से समस्या उत्पन्न हो रही है।

इस बात को समझते हुए जल जीवन मिशन के अंतर्गत उपभोक्ताओं से शुल्क वसूली को अनिवार्य करने का विचार है। इसके लिए राज्यों को संचालन एवं प्रबंधन की ऐसी नीति तय करनी होगी जो सार्वजनिक कोष पर अधिक भार न डाले।

हिमालय व पूर्वोत्तर राज्यों में जल जीवन मिशन को परियोजना को पहुँचाने के लिए केंद्र सरकार 90 प्रतिशत खर्च करेगी और राज्य सरकारें 10 प्रतिशत, वहीं अन्य राज्यों में केंद्र और राज्य सरकारें आधी-आधी लागत उठाएँगी।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।