भारती
जगन्नाथ पुरी के दर्शन- मंदिर से जुड़ी विशिष्ट प्रथाएँ व पुरोहित परंपरा

एक साल पहले जून के आखिर में एक दिन हम कटक में थे और यहाँ से एकाध दिन बाद पुरी जाने का इरादा था। लेकिन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वॉर्डन मनोज रथ ने जोर दिया कि पुरी आप अभी तत्काल निकल जाएँ, क्योंकि इसके बाद देवदर्शन अगले पंद्रह दिन के लिए बंद हो जाएँगे और आज कोई बड़ा उत्सव भी है। मंदिर बंद होने का एक रोचक कारण उन्होंने बताया कि भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं। यह सालाना रस्म है और इस कारण उत्सव में दूर-दूर से हजारों लोग शिरकत करते हैं। हमने उनकी सलाह के मुताबिक उस दिन के बाकी कार्यक्रम रद्द किए और फौरन पुरी की तरफ कूच किया। शाम होने तक चहल-पहल से भरे इस रौनकदार तीर्थक्षेत्र में हम दाखिल हुए। रिक्शे ने एक भीड़ भरे चौराहे तक छोड़ा और इशारा किया कि यहाँ से कार या रिक्शे जाने की मनाही है। मंदिर पैदल दूरी पर ही है। सारी भीड़ उसी तरफ जा रही है। काफी चौड़ी सड़क पर लकड़ी के विशाल और भव्य रथों का निर्माण चल रहा था। पुरी के मंदिर का ऊँचा शिखर दूर से ही नजर आ रहा था।

भीड़ में धीरे-धीरे हम आगे बढ़े और अचानक बीसेक साल के एक युवक ने रास्ता रोककर चेताया कि आज उत्सव के कारण भीड़ है और मंदिर में अंदर जाना बहुत मुश्किल है। आप कहें तो पीछे के दरवाज़े से 10 मिनट में अंदर जाया जा सकता है। इसकी एवज में उसने 100-150 रुपए की दक्षिणा की बात की। मैंने उसे यह सोचकर साथ ले लिया कि स्थानीय आदमी है। कुछ जानकारियाँ भी मिल जाएँगी। वह एक संकरी गली से होकर पिछले दरवाजे की तरफ बढ़ा। मोबाइल फोन वगैरह एक दुकान के स्टोर में रखवा दिए और अंदर जाने के लिए भारी मशक्कत कर रही भीड़ के पीछे इस जुगत में खड़ा हो गया कि कैसे अपने यजमानों को अंदर ले जाया जाए। पुलिस जबरन दाखिल होने की कोशिश करने वालों पर गुस्सा कर रही थी और वह सुरक्षित हमें भीतर करने की घात में था। उसके हावभाव से लग गया था कि भीतर ले जाने के लिए उसके पास कोई अलग और विशेष अधिकार नहीं थे। वह अफरातफरी का तत्काल लाभ उठाते हुए, आ जाइए, आ जाइए, रुकिए मत, आ जाइए… कहता हुआ, भीड़ के भभके में एक भारी जोर-आजमाइश के बाद हमें भीतर पहुँचाने में कामयाब हो गया।

अब वह एक नए रूप में था। उसने एक महत्त्वपूर्ण सालाना उत्सव के शुभ मुहूर्त में हमारे पुरी आगमन को सौभाग्य का सूचक घोषित किया और ऐसे मौके पर भी मंदिर परिसर में होने का श्रेय देवयोग को दिया। यह उसका एक तरीका था यह बताने का ताकि दक्षिणा उदारतापूर्ण माहौल में मिले। हमने सोचा कि अब वह अपनी दक्षिणा प्राप्त करके प्रस्थान करेगा और अपने अगले यजमान को भीड़ में से खोजकर यहाँ लाएगा। अगर दिन में वह ऐसे दस यजमानों को भी लाता होगा कि चार-छह घंटे में 1000-2000 रुपए की कमाई का यह काम बेहद फायदे का था। उसने बताया कि इतने विशाल मंदिर परिसर में उस जैसे 200 से ज्यादा कार्यकर्ता बाहर तैनात रहते हैं और दूर से आने वालों पर नजर रखते हैं। समय सबके लिए कीमती है। घंटों भीड़ भरी कतारों में खड़े रहने की बजाए 100-200 रुपए देकर सीधे प्रवेश करना श्रद्धालुओं को भी ठीक लगता है।

लेकिन वह गया नहीं बल्कि अब उसकी ड्यूटी का दूसरा चरण शुरू हुआ। जगन्नाथ पुरी मंदिर परिसर में एक अकेला मंदिर नहीं है। अलग-अलग कालखंडों में वहां कई निर्माण हुए हैं और हरेक की अपनी पौराणिक पृष्ठभूमि है। जैसे 52 में से एक शक्तिपीठ भी मंदिर के पिछले हिस्से में है। वह जहां भी हमें लेकर गया, वहाँ मंदिर के पुरोहितों के आसन सजे थे। हरेक आसन के पीछे लंबी सूचियाँ थीं, जो बता रही थीं कि आप किस तरह यहाँ के उत्सवों और नियमित क्रियाकलापों में कितना दान देकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। 5100 से शुरू होकर 11, 21 और 51 हज़ार के ऊपर तक की कई श्रेणियाँ थीं। अधिकतम की कोई सीमा नहीं थी। पुरोहितों के तर्क और उनकी उपस्थिति इतनी प्रभावशाली थी कि आप हाथ जोड़कर फारिग हो नहीं सकते थे।

अंतत: आज के उत्सवों के लिए एक प्रसाद के पैकेज को स्वीकार कर आगे बढ़े और उस युवक को चेता दिया कि वह सीधे जगन्नाथ के मूल मंदिर में हमें ले चले, हम वहीं गर्भगृह में कुछ समय बैठना चाहेंगे। आखिरकार वह मंदिर परिसर की ही विशाल रसोई में पकने वाले भगवान के प्रसाद का एक पैकेज लेकर आया, जो किसी पत्ते की छाल से बने खूबसूरत बास्केटों में था। खाली प्रसाद भगवान को चढ़ाना ठीक नहीं इसलिए हम इनके साथ कुछ नकदी आवश्यक थे। आखिरकार हमने खुद को भगवान भरोसे छोड़ दिया और जैसा वह कहता गया, हम करते गए। हाँ, हम किसी और मजबूत आसनधारी पुराेहित की शरण में नहीं गए। वहां कदम-कदम पर वे थे। उनके आसपास नोटों के ढेर थे। नोटों में भी बड़े नोट सबसे ऊपर थे ताकि आप जेब में हाथ डालने के पहले सोच लें कि दस या पचास के नोट वहाँ न के बराबर हैं।

मैं देश के ज्यादातर बड़े मंदिरों और तीर्थों में कई-कई बार गया हूँ। लेकिन पुरी का यह अनुभव एकदम अलग था। पुरोहित वर्ग की प्रभावी परंपरा यहाँ काफी पुरानी थी और कई रिवाज भी ऐसे हैं, जो और कहीं नहीं होंगे। यह दुनिया का इकलौता मंदिर होगा, जहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएँ धातु या पाषाण की नहीं बल्कि एक खास किस्म की लकड़ी की हैं। ये स्थाई नहीं हैं कि एक बार बनने के बाद दशकों या सदियों से स्थापित हों। एक वरिष्ठ पुरोहित ने बताया कि  बारह साल में लकड़ी के ये विग्रह अपनी उम्र पूरी करते हैं और विधिवत इनका अंतिम संस्कार करने की परंपरा है। जब ऐसा किया जाता है तो पुरोहित वर्ग बाकायदा अंतिम संस्कार के समय पालन किए जाने वाले सारे नियमों का पालन करते हैं। जैसे मुंडन संस्कार आदि। जब नए विग्रह स्थापित होते हैं तो ब्रह्म स्थापना की एक गोपनीय रस्म एक खास समय में पूरी की जाती है।

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्ति (अहमदाबाद)

साल में एक बार बट सावित्री के दिन इनके पूर्ण स्नान होते हैं। वैसे हर 45 दिन में मंत्र स्नान। भगवान के अपने रिवाज हैं। वे नरेंद्र पुष्करिणी में नौका विहार करने निकलते हैं। हर दिन उनका प्रसाद एक विशाल रसोई में लकड़ी के चूल्हे पर पकता है। मिट्‌टी के बर्तन हर दिन नए ही आते हैं। वे कुएं का पानी ही ग्रहण करते हैं। देवालय के पट खोलने से लेकर देवताओं के पूजा, पाठ, स्नान, ध्यान, भोग, प्रसाद, उत्सव, भ्रमण के दिन भर और साल भर व्यस्त रखने वाले हरेक काम के लिए 36 श्रेणियों के पुरोहित निर्धारित हैं और किसी एक का निर्धारित काम कोई दूसरा नहीं कर सकता। जैसे रसोई का जिम्मा जिस श्रेणी को है, उसे सुपाकार कहते हैं। हर दिन भगवान के लिए भारी मात्रा में लजीज प्रसाद यही लोग बनाते आए हैं। फिर कदम-कदम पर उनके अपने नियम और संहिताएं हैं। वे क्या पहनेंगे, कौन सी सामग्री का इस्तेमाल करेंगे, कौन सी चीजें वर्जित हैं वगैरह-वगैरह।

यही वजह है कि देश के किसी भी तीर्थ की तुलना में यहाँ पुरोहित वर्ग की उपस्थिति कहीं ज्यादा जटिल, गहरी, प्रभावशाली और यदाकदा आक्रामक भी है। यह पुरोहितों के बीच बंटी जिम्मेदारियों का जटिल और काफी हद तक दिलचस्प जाल है। लेकिन इनके तौर-तरीके कई बार दूर-दूर से गहरी आस्था अपने हृदय में लेकर आने वाले हजारों श्रद्धालुओं का मन खट्‌टा भी कर देती है और पुरी के पंडों की एक खास छवि बन जाती है। इस विशाल मंदिर परिसर के पिछले भाग में विमला, भुवनेश्वरी और लक्ष्मी के मंदिर हैं। हरेक के आसपास पुरोहितों की बैठकें हैं और वे हर आने वाले को यहाँ की समृद्ध पौराणिक कथाओं से अवगत कराते हैं। वे आपको बताएँगे कि अमुक स्थान के दर्शन किए बिना गए तो जगन्नाथ पुरी के दर्शन पूर्ण नहीं माने जाएँगे।

लेकिन भुवनेश्वर में लिंगराज मंदिर से लेकर पुरी के जगन्नाथ मंदिर का हर कोना ओडिशा के शानदार स्थापत्य का प्रमाण है। यह भारत की महान मंदिर और मूर्तिकला की धरोहर है, जो हजारों साल में विकसित हुई है। कोणार्क में यह कला अपना चरम वैभव दिखाती है। सदियों तक यह निर्माण होते रहे। 11वीं सदी में दिल्ली में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद भारत एक अलग दौर में दाखिल हो गया, जब उसे कई आघात सहने पड़े। ओडिशा भी इससे अछूता नहीं रहा और जगन्नाथ मंदिर भी। इस्लाम के कट्‌टर अनुयायी सुलतानों और बादशाहों ने सब कुछ मिट्‌टी में मिला डालने की कोशिशें पीढ़ियों तक कीं। लेकिन बहुसंख्यक शोषित समाज ने उस दुर्गम दौर में भी अपनी रचनात्मकता को धूल में नहीं मिलने दिया और जितने प्रयास मिटाने के हुए, उतनी ही ऊर्जा से नवनिर्माण भी होते रहे। यही सोमनाथ की कहानी है। यही जगन्नाथ की कहानी है। भारत की नाभि में स्थित किसी अमृत कलश ने ही हमारी महान सभ्यता के इन स्मारकों को बचाने में मदद की होगी। थोड़ी भौतिक परेशानियों और जटिल परंपराओं को पल भर के लिए एक तरफ रख दें तो जगन्नाथ पुरी का मंदिर भारत के दर्शन का एक आस्थापूर्ण आमंत्रण है।