भारती
आईटी कार्यबल की घर वापसी से कैसे मिले स्थाई लाभ, कोविड-19 का रोजगार पर प्रभाव

कोरोनावायरस वैश्विक महामारी ने दीर्घ अवधि से स्थापित कई मिथकों को तितर-बितर कर दिया है। आईटी सेवाओं के संबंध में ऐसे ही दो मिथकों का सफाया हुआ है- पहला तो यह कि कार्यबल दूर से काम नहीं कर सकता और दूसरा यह कि कार्यस्थल कार्यालय के शहर से बाहर नहीं हो सकता।

इससे क्षेत्र के लिए एक अद्वितीय परिवर्तन अवसर का अनावरण हुआ है। आइए इसे समझें।

संक्रमण के फैलाव के कारण और परिणामस्वरूप लागू हुए लॉकडाउन के चलते आईटी सेवाओं के कार्यबल का एक बड़ा अंश कार्यस्थल वाले शहरों को छोड़कर अपने गृह नगर वापस लौट गया है।

अचानक से बरेली, बेलगाम, बीकानेर, बिलासपुर और बोकारो जैसे शहरों में आईटी सेवाओं का वातावरण बन गया है जहाँ लोग अपने घरों की सुरक्षित सीमा के भीतर रहकर काम कर रहे हैं।

आईटी सेवाएँ अपने वादे के अनुसार निर्बाधित सेवा के वैश्विक डिलीवरी मॉडल के अनुसार लगातार काम कर रही हैं और इसके कार्यबल के स्वास्थ्य व सुरक्षा से भी कोई समझौता नहीं हो रहा है।

सर्वप्रथम  आवश्यक है कि हम इंटरनेट बैंडविड्थ और 4जी नेटवर्क की उपलब्धता की भूमिका को पहचानें जिसके कारण दूर से कार्य करने का विकल्प सुगम बना हुआ है। कुछ वर्ष पहले ही देश के आंतरिक भागों में एक वीडियो कॉल के लिए इंटरनेट की गति वर विश्वास नहीं किया जा सकता था।

लेकिन अब दूरसंचार नेटवर्क की तीव्र वृद्धि के प्रति हमें धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए। वॉट्सैप पर अनेक वीडियो क्लिपों के प्रसार और इस प्रकार निरंतर इंटरनेट के उपयोग ने क्रियाशील बैंडविड्थ का पूर्ण परीक्षण कर लिया है जो इसे ऐसे संभाव्य अवसरों के लिए तैयार करते हैं।

वॉट्सैप की उपयोगिता

दूसरा, इस महामारी ने आईटी सेवाओं को प्रथम श्रेणी शहरों में निर्धारित अचल संपत्ति लागत और निरंतर बढ़ रहे वेतनों पर पुनर्विचार व पुनः अवलोकन करने का अवसर दिया है। रियल टाइम, मिशन क्रिटिकल या उच्च-स्तरीय डाटा संवेजनशील डिलीवरी को छोड़कर अधिकांश कार्य देश के किसी भी कोने से हो सकता है।

देखें इसका क्रियान्वयन कैसे हो सकता है-

1. नासकॉम जैसे उद्योग संघ देशभर के 50 द्वितीय और तृतीय स्तर के नगरों में 200 की क्षमता वाले सह-कार्यस्थल (को-वर्किंग स्पेस) स्थापित कर सकते हैं जो अभी तक आईटी क्रांति से अछूते रहे हैं।

2. आईटी सेवा कंपनियाँ कर्मचारियों को एक विकल्प दे सकती हैं जिसमें वे कम वेतन स्तर (जीवनयापन मूल्य के अनुसार) के साथ अपने पसंद के नगर से काम करने के लिए स्वतंत्र हों। वेतन कटौती कार्यबल के लिए अधिक असुविधाजनक नहीं होगी क्योंकि जीवनयापन मूल्य के कम होने के साथ-साथ कार्यालय से आने जाने की परिवहन लागत में भी बचत होगी।

इससे व्यक्ति की ऋण उठाने की क्षमता कम अवश्य होगी लेकिन द्वितीय या तृतीय स्तर के नगरों में रहते हुए उनकी ऋण की आवश्यकता भी कम ही रहेगी। कुल मिलाकर, कार्यबल की संपन्नता अधिक ही रहेगी।

3. आईटी कंपनियाँ जो इस पहल के भागीदार बनेंगे, वे एक स्पष्ट समझौता कर सकते हैं कि वे एक ही स्थान पर काम कर रही प्रतिभाओं में दूसरी कंपनी के कर्मचारी को स्वयं में मिलाने का प्रयास नहीं करेंगे।

उदाहरण स्वरूप, वारंगल के लिए टीसीएस वारंगल के ही इंफोसिस कर्मचारी को नहीं ले सकती है। ऐसे उपाय करने आवश्यक हैं ताकी सुनिश्चित हो सके कि हर शहर में छोटी कार्यबल संख्या को स्थापित करके कंपनियाँ जिस निवेश के लिए प्रतिबद्ध हो रही हैं, वह फल भी दे।

कुछ भारतीय आईटी कंपनियाँ

इस विचार के कुछ प्रत्यक्ष लाभ हैं-

अ. शहरी प्रवासन का उलटाव- इससे बड़े शहरों पर पड़ने वाला भारी इंफ्रास्ट्रक्चर भार घटेगा (जैसे मुंबई और बेंगलुरु), साथ ही यह भारत भर में अगले 50 शहरों (जैसे हुबली, धारवाड़, नाशिक) में गुणवत्ता विकास करने का अवसर प्रदान करता है।

ब. तय लागत में कटौती- भारत के प्रथम श्रेणी नगरों में अचल संपत्ति का मूल्य कई व्यापारों के लिए वित्तीय तनाव उत्पन्न कर रहा है और उनके उत्पाद का कोई विशेष मूल्यवर्धन भी नहीं करता है। सिर्फ संकट के समय में ही नहीं, जब अन्य परिस्थितियों में भी कंपनियाँ अपने मूल्य का निरीक्षण करेंगी तब भी व्यापार एक कम लागत वाले मॉडल की ओर ही बढ़ना चाहेंगे।

स. व्यापार निरंतरता योजनाएँ- प्राकृतिक आपदा या राजनीतिक अस्थिरता के कारण किसी भी बड़े शहर में आधारित व्यापार के लिए डिलीवरी में चुनौती खड़ी हो सकती है। अगर कार्यबल पूरे देश में फैला होगा तो दूरस्थ स्थानों से ऐसे संकट के समय को झेलने का सामर्थ्य बढ़ेगा जो एक प्रभावी व्यापार निरंतरता योजना है। इसकी सराहना वैश्विक ग्राहकों द्वारा की जाएगी।

इसके कुछ मार्मिक लाभ भी हैं। आईटी सेवाओं में कार्यरत लोग अपने माता-पिता के निकट रह पाएँगे और उनकी बीमारी अथवा वृद्धावस्था में उनकी सहायता कर सकेंगे। अगर सफल हुआ तो यह मॉडल अन्य उद्योगों के लिए भी भावी प्रगति का प्रारूप बनेगा। मेट्रो शहरों की भीड़-भाड़ से दूर रहकर लोगो जीवन की उच्चतर गुणवत्ता का भी आनंद ले सकते हैं।

कायापलट करने वाले इस विचार को लागू करने के लिए सरकार के पास इससे उत्तम और कोई समय नहीं हो सकता है। यह त्वरित विकास और अवसर उत्पन्न करेगा जो हमें हमारे सपनों के भारत के निकट ले जाएगा। एक ओर जहाँ सरकार इस विचार को आगे बढ़ा सकती है, वहीं दूसरी छोर को थामते हुए कंपनियाँ या नासकॉम जैसे उद्योग संघ इसके क्रियान्वयन का नेतृत्व कर सकते हैं।

आईटी उद्योग के पास तो फिर भी एक विकल्प है लेकिन कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जो तनाव में आने वाले हैं। ऑफलाइन सेवाएँ अब ऑनलाइन हो जाएँगी जिनके लिए नए व्यापार मॉडल की आवश्यकता होगी। साझा अर्थव्यवस्था नौकरियाँ जो पिछले कुछ समय से उछाल पर थीं अब तनाव में आएँगी।

मानवीय आवश्यकता की पूर्ति के लिए नई तकनीकों की स्वीकार्यता बढ़ेगी। विनिर्माण, औद्योगिक गतिविधियाँ तथा कृषि और मशीनीकृत हो जाएँगी। ऐसे में सरकार निम्न कौशल वाली नौकरियाँ उत्पन्न करने में चुनौतियों का सामना करेगी।

कई नौकरियाँ अनुबंध आधारित हो जाएँगी क्योंकि अनिश्चितताओं के बीच कोई भी दीर्घ अवधि के लिए प्रतिबद्ध नहीं होना चाहेगा। इन सबसे बढ़ने वाली चिंताओं के बीच सरकार द्वारा यदि न्यूनतम आय योजना लाई जाती है तो वह अधिक स्वीकार्य होगी।

नई डिजिटल कंपनियों को निचले स्तर से प्रोत्साहित करना आर्थिक स्थिरता को सुनिश्चित करेगा। साथ ही आईटी सेवाओं और कैप्टिव्स (वैश्विक इन-हाउस केंद्र) में कार्यरत लोगों की कम संख्या के कारण उपरोक्त विचार के क्रियान्वयन में कोई अत्यधिक परिश्रम नहीं लगेगा। यह वास्तव में एक कायापलट परिवर्तन हो सकता है, न सिर्फ सेवा उद्योग के लिए अपितु भारत के लिए भी।

गौरव चतुर, आशीष चंदोरकर और माणिक सेठ के लेखों पर आधारित।