भारती
दिल्ली बनी अय्याशी का अड्डा- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल भाग 6

20 साल सुलतान रहने के बाद एक दिन बलबन मर गया। उसके दो बेटे थे-बुगरा खां और खाने शहीद। खाने शहीद मुलतान के इलाके में राज करता था और बुगरा खां बंगाल में लखनौती से। बलबन ने अपने पोते कैखुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, जो खाने शहीद का बेटा था। लेकिन बलबन की मौत के बाद दिल्ली के ताकतवर तुर्कों ने खाने शहीद के साथ अपनी किसी रंजिश के चलते कैखुसरो को रातों-रात मुलतान रवाना कर दिया और बुगरा खां के बेेटे कैकुबाद को सुलतान बना दिया। उसने कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था कि वह बलबन की जगह बैठेगा।

बलबन का पूरा शासनकाल क्रूरता का दूसरा नाम है तो उसके उत्तराधिकारी कैकुबाद ने मुफ्त में मिली दिल्ली की हुकूमत को अय्याशी का रौनकदार अड्डा बना दिया। उसे 17 साल की उम्र में मुइज्जुद्दीन कैकुबाद के नाम से सुलतान बनाया गया था। कैकुबाद ने दिल्ली में सुलतान के महल में रहने की बजाए यमुना के किनारे किलोखड़ी में अपना नया आशियाना बनाया, जो एक शानदार राजभवन था। उसने अपने मलिकों, अमीरों, भरोसेमंद दरबारियों और सरदारों को भी अपने आसपास बसाया।

लूटमार और कत्लेआम से हुकूमत हासिल करने वाले कातिल हमलावर लुटेरों को दिल्ली पर कब्जा किए 90 साल हो चुके थे। कम से कम देश की आजादी के बाद इनका इतिहास इसी रूप में लिखा जाना चाहिए था। लेकिन कब्जे करने के बाद हर जगह इन्होंने खुद को सुलतान और बादशाह कहा तो हमने भी अपनी इतिहास की किताबों में इनके शर्मनाक दावों को सचाई के रूप में स्वीकार कर लिया। सात सौ साल की इनकी अंधेरी हुकूमत एक ही अध्याय में खत्म होनी थी-देश में बेरहम कातिल, लुटेरे, हमलावरों के कब्जे। भारत को गर्व करने लायक अपने नायक इतिहास में कम नहीं थे। विस्तृत इतिहास उनका ही लिखा जाना चाहिए था।

तो मुइज्जुद्दीन कैकुबाद के साथ ही इस्लाम की हुकूमत का एक गौरतलब रंग हमें दिल्ली में दिखाई देना शुरू होता है। इनका हाल जियाउद्दीन बरनी ने इन शब्दों में बयान किया है

“देश के चारों तरफ से गाने-बजाने वाले, चारण, भांड, मसखरे और विदूषक दरबार की रौनक बनने लगे। इनकी इज्ज़त अफजाई होने लगी। मस्जिदें नमाजियों से खाली हो गईं। शराबखाने लोगों की चहल-पहल से भर गए। शराब के दाम 10 गुना तक बढ़ गए। शराब और नशे का दूसरा सामान बेचने वालों की थैलियाँ सोने-चांदी से भर गईं।”

बरनी हमें ऐसे दो लोगों से मिलवाता है, दिल्ली में जिनकी अहमियत अचानक बढ़ गई थी। इनके नाम हैं- जियाउद्दीन जहजी और हुशाम दरवेश। ये अपने समय के बड़े चुटकुले बाज भाट हुआ करते थे। दोनों मसखरे मुइज्जुद्दीन कैकुबाद की खास महफिलों के नदीम बन गए। भरे दरबार में वे चुटकुले सुनाते रहते और किसी बात पर खुश होने पर सुलतान इन्हें दौलत, खिलअत और घोड़े देता रहता। दरबार में दिन-रात हँसी-मज़ाक, नाच-गाना चलता रहता। सुलतान के शौक का पता चलते ही उसे खुश करने वाले भी लगातार दरबार में घेरा मजबूत बनाते गए।

ऐसे माहौल में एक शख्स ने नीचे से ऊपर सबसे तेजरफ्तार तरक्की की। उसका नाम था मलिक निजामुद्दीन। वह दिल्ली के फखरुद्दीन कोतवाल का भतीजा और दामाद था। वह पहले किसी मामूली नौकरी में रखा गया था, लेकिन खुशामद करके कैकुबाद जैसे अय्याश सुलतान के करीब आता गया और एक दिन सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए। बलबन के समय के बचे-खुचे असरदार और तजुर्बेकार लोग उसके डर से दरबार से दूर होते गए। अब निजामुद्दीन खुद ही दिल्ली का सुलतान बनने का सपना देखने लगा था।

कैकुबाद दिन भर गाने-बजाने वाले और हंसी-ठिठोली करने वाले चापलूसों से घिरा नशे में पड़ा रहता। यही उसकी दिनचर्या थी। वह इसे ही सुलतानी समझता था। कैखुसरो को दिल्ली से पहले ही भगाया जा चुका था, जो निजामुद्दीन की नज़रों में अपने रास्ते का ही एक कांटा था।

निजामुद्दीन ने कैकुबाद की अक्ल में यह बैठाया कि किसी भी दिन कैखुसरो उसे मारकर खुद दिल्ली पर कब्जा कर सकता है। जब कैकुबाद नशे में था तो उससे कैखुसरो की हत्या का फरमान हासिल कर लिया। कुछ लोग इस काम के लिए तैनात किए गए कि जैसे भी हो जल्द से जल्द कैखुसरो को मार दिया जाए। एक दिन रोहतक में कैखुसरो को कत्ल कर दिया गया।

 इस घटना के बाद दिल्ली में निजामुद्दीन की धाक जम गई। उसने अगला निशाना सुलतान के मंत्री ख्वाजा खतीर को बनाया। किसी आरोप में उसे गधे पर बिठाकर शहर में घुमाने की सजा दी गई। अब ऊँचे पदों पर पहले से बैठे नव मुसलमान अमीरों की बारी आई। एक साजिश के तहत उन्हें एक साथ दरबार में बुलाया गया।

निजामुद्दीन ने एक ही बार में सबको ठिकाने लगाने की पूरी तैयारी कर रखी थी। सात बड़े ओहदेदारों को वहीं रस्सियों से बांध लिया गया। दो को दिल्ली छोड़ने के लिए कहा गया। बाकी सारे मार डाले गए। जब यह सब हो रहा था तब सुलतान पूरे समय अपनी नाच-गानों की महफिल में ही मस्त था। निजामुद्दीन का असर इस कदर कायम हो गया कि सुलतान उसकी बीवी काे अपनी मां कहने लगा। वह फखरुद्दीन कोतवाल की बेटी थी।

फखरुद्दीन कोतवाल अपनी आंखों से यह सब देख-सुन रहा था। निजामुद्दीन उसका भतीजा भी था और बेटी का शौहर भी। दरबार के रंग-ढंग देखकर वह उसे समझा रहा है

“तू मेरा बेटा है। मैं और मेरे पिता 80 साल से दिल्ली की कोतवाली कर रहे हैं। हमने कभी व्यवस्था में दखल नहीं किया इसलिए महफूज रहे हैं। तू बादशाही की ख्वाहिश छोड़ दे। हम इसके काबिल नहीं हैं। बादशाही के वस्त्र हमारे शरीर पर, जो घुड़सवारी नहीं जानते, शोभा नहीं देते। हम तीर और भाला चलाने की काबिलियत नहीं रखते और जंग का मैदान कभी देखा तक नहीं है। अगर तूने बादशाही का ख्याल अपने दिल से नहीं निकाला तो हम सबको तबाही में डाल देगा।”

मुइज्जुद्दीन कैकुबाद का बाप बुगरा खां लखनौती से बंगाल पर राज कर रहा था। दिल्ली में उसका बेटा सुलतान बना दिया गया था। उसकी नजर दिल्ली की हर हरकत पर भी बराबर बनी हुई थी। उसे बंगाल में अपने बिगड़ैल बेटे की खबरें तफसील से मिलीं। उसे पता चला कि निजामुद्दीन ने एक तरह से हुकूमत पर अपना कब्जा कर लिया है।

कैकुबाद को खूबसूरत नाचने वालियों के हाथ से शराब पीने से ही फुरसत नहीं है और दरबार में भाट-चारणोें की भरमार है तो वह फिक्र में पड़ गया। उसे बीते 90 साल में हुए कत्लेआम और खूनखराबे का बखूबी अंदाजा था। हर कहानी घूम-फिरकर एक खूनखराबे पर खत्म होती थी। इस वक्त उसका नशेड़ी और अय्याश बेटा शेर की सवारी कर रहा था।

लखनौती में बुगरा खां ने नासिरुद्दीन की पदवी धारण की। अपने नाम के सिक्के चलाए। वहीं से कैकुबाद और बुगरा खां के बीच कई दिनों तक लिखा-पढ़ी होती रही। आखिर में बाप-बेटे के बीच एक मुलाकात तय हुई। निजामुद्दीन के कहने पर बेटा शानदार सवारी के साथ रुतबे में दिल्ली से चला और बाप लखनौती से रवाना हुआ। अवध में कहीं सरयू नदी के किनारे दोनों के पड़ाव डले।

वह मुलाकात बड़ी दिलचस्प है, जब हम बुगरा खां को अपने बिगड़ैल बेटे को सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए हर तरह की अय्याशी और निजामुद्दीन जैसे नाकाबिल करीबियों से दूर रहने की नसीहत देते हुए देखते हैं। बुगरा खां को अपने बाप बलबन की सत्ता पर मजबूत पकड़ की याद आती है और वह अपने बेटे मुइज्जुद्दीन कैकुबाद को इन शब्दों में समझाइश देता है-

“मैं दो साल से तेरी अय्याशी की खबरें सुनता रहा हूं। दो साल भी राज्य तेरे पास सुरक्षित रह गया, यह मेरे पिता की बदौलत है, जिसने बादशाही की जड़ें इतनी गहरी कर दीं कि हवा का मामूली झोंका भी उसे हिला नहीं सकता। मैं देखता हूं कि तेरी हुकूमत बरबादी के रास्ते पर है। तूने ऐसे लोगों को मरवा डाला, जो मेरे पिता के भरोसेमंद या उसके गुलाम थे। मेरी तभी से नींद उड़ी हुई है। अब दूसरे लोगों का भरोसा भी तू खो देगा।”

“मेरा बड़ा भाई हुकूमत के काबिल था लेकिन उसकी मौत मेरे पिता के समय ही हो गई। तूने उसके बेटे को मरवा दिया। मैं लखनौती में फंसा हुआ हूँ। हम चारों के अलावा बलबन का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। अब अगर कोई तुझे हटा देगा तो यह हुकूमत दूसरे वंश में चली जाएगी। पता नहीं वे हमारी औरतों को किस तरह बेइज्ज़त और लज्जित करेंगे।

“मैंने जिन अय्याशों, विलासियों और बकबास करने वालों को तेरी महफिल में देखा है, वे तुझे यह मौका भी नहीं देंगे कि तू भोग-विलास छोड़कर बादशाही और खजाने को व्यवस्थित करने पर ध्यान दे। ऐसे नदीमों, गाने-बजाने वालों और औरतों को अपने पास से दूर कर दे। अपनी जान की खैर कर। तू आइने में अपना चेहरा देख, जो गुलाब के फूल से ज्यादा सुर्ख था, अब केसर सा पीला पड़ चुका है।

“मैंने सुना है कि तू नमाज नहीं पढ़ता। रमजान के रोजे नहीं रखता। ऐसे विद्वानों ने, जिन्हें मुसलमान नहीं कहना चाहिए, तुझे दौलत के लालच में रोजा नहीं रखने की सीख दी है कि रोजे की जगह किसी गुलाम को आजाद कर दो या साठ गरीबों को भोजन करा दो। बादशाहों को उल्माए आखिरत की बातों पर भरोसा करना चाहिए। अगर तू अपनी बेहतरी चाहता है तो हजरत मुस्तफा की शरा के हुक्म को मान।

 वह यह कहते हुए लखनौती लौटता है- “निजामुद्दीन को अपने बीच से हटा दे, क्योंकि इसके बाद उसे मौका मिला तो वह तुझे एक दिन भी सिंहासन पर बैठने नहीं देगा।”

बाप से इस मुलाकात के बाद लौटते हुए सुलतान कैकुबाद कुछ दिनों तक तो ठीक रहा। न शराब पी, न गाने-बजाने वालों को बुलाया और न औरतों से घिरा रहा। लेकिन उसकी कमजोरियां और औरतबाजी के किस्से इतने मशहूर हो चुके थे कि लोगों ने अपनी खूबसूरत बेटियों को उसके सामने पेश करने के लिए खासतौर से तालीम देना शुरू कर दिया था। नामालूम कब सुलतान या उसके चाटुकारों की नजर उन पर पड़ जाए और एक ही बार में वे मालामाल हो जाएँ। घरों में जवान, चंचल, शोख, खूबसूरत लड़कियों को गाना-बजाना, गजलें सुनाना, चुटकुलेबाजी, शतरंज, चौसर सिखाया जाता था। जियाउद्दीन बरनी लिखता है-“ऐसी कलाएं सिखाई गईं कि वे जाहिदों (संतों) को भी जुन्नार (जनेऊ) बंधवा दें, आबिदों (उपासकों) को भी शराबखानों में पहुंचा दें और परहेजगारों से भी मूर्ति पुजवा दें।’

 सुलतान की अय्याशियों ने दिल्ली और दिल्ली के आसपास क्या माहौल बना दिया था, बरनी इसकी गजब की झाँकी दिखाता है-

“अपनी ओर आकर्षित करने वाले हिंदुस्तानी गुलामों और खूबसूरत लड़कियों केा फारसी और गाना सिखाया गया। उन्हें सुनहरे जेवर और सुनहरे काम के लिबास पहनाए जाते थे। दिल जीत लेने वाली उन हसीनाओं को दरबार के कायदे और उठने-बैठने का तरीका सिखाया जाता था। तरुण दासों के कानों में कुंडल पहनाए जाते थे। बेजोड़ दासियों की बेटियों काे दुल्हन की तरह सजाया जाता था।

सुलतान की तारीफ में गजलें, कौल लिखे और पढ़े जाते थे। विदूषक भांड अपने मसखरेपन से शोकाकुल लोगों को भी हँसा देते थे। हंसी के मारे विलासियों के पेट में बल पड़ जाते थे। कोल (अलीगढ़) और मेरठ के कलार दो-दो और तीन-तीन साल की खिंची हुई पुरानी सुगंंधित शराबें सुराहियों में भरवाकर तोहफे में भेजते थे। अवध से दिल्ली लौटते हुए हर दिन सुडौल आकार की नौजवान लड़कियां रास्ते में खड़ी होती थीं। जब सुलतान की सवारी निकलती तो वे उसे लुभाने के लिए अपने रूप-रंग का प्रदर्शन करतीं और गाने सुनातीं।”

बाप से मुलाकात के बाद कैकुबाद के दिल्ली लौटते हुए एक दिन का वाकया दस्तावेजों में दर्ज हुआ है। एक खूबसूरत लड़का सजे-धजे घोड़े पर सवार होकर सुलतान की सवारी के पास से गुजरा। उसकी अदाएँ देखकर सब हैरत में पड़ गए। वह सुलतानी छत्र के पास पहुंचा। घोड़े से उतरा और सुलतान के घोड़े के सामने जमीन पर गिर पड़ा और किसी खूबसूरत लड़की की मानिंद बड़ी अदा से एक कविता पढ़ी-“यदि तू मेरी आंखों पर अपने कदम रख दे, तेरे रास्ते में मैं आंख बिछाता हूँ कि तू उन पर चले।’ उस दृश्य के सामने आते ही कैकुबाद बाप की सारी नसीहतों को भूल गया। दोनों के बीच शायरी में ही बात शुरू हो जाती है।

सुलतान बेकरारी में अपने शिविर में लौटता है। फौरन उस बांकी चितवन वाले लड़के को बुलवाया जाता है।

सुलतान कहता है- “मैं चाहता हूँ आज तेरे हाथ से शराब पीऊं। तू आज की महफिल का साकी बन।

वह लड़का उसे प्याला थमाता है। कहता है-” शाहेजहां नोश…शाहेजहां नोश। मतलब हे संसार के बादशाह पी, हे संसार के बादशाह पी।

सुलतान जवाब देता है- “अगर तू मेरा साकी बना रहे, तो कौन कह सकता है शराबनोशी हराम है…।

इस वक्त जबकि साकियों का बादशाह “और पीओ और पीओ’ के नारे लगा रहा था, सुलतान ने जियाउद्दीन जहजी की तरफ देखकर मुस्कराकर कहा-“साकियों का राज बुरा नहीं है। जहजी ने धरती पर अपना माथा टेककर कहा- “साकियों का संसार में राज्य नहीं, संसार यहीं है, यह लोग संसार में नहीं हैं।

सुलतान लहर में आ चुका था। उसने हुक्म दिया कि चांदी के एक हजार तनके लाए जाएं और उस खूबसूरत लड़के पर न्यौछावर किए जाएं। वह लड़का कहता है कि उस न्यौछावर पर उन लोगों का हक है, जिन्होंने मुझे जैसे चांद की तुझ जैसे सुलतान के लिए परवरिश की है। वे लोग दरबार में दाखिल होने का इंतजार कर रहे हैं। सुलतान पूछता है कि तुझ जैसा उन लोगों में कौन है। वह जवाब देता है-

“हे शाहजहां, मुझ जैसा तो कोई मां जन्म नहीं दे सकती, लेकिन मेरे साथ कई सुंदरियां सितारों की तरह इकट्‌ठा हैं। वे नाचने में निपुण हैं। उनका गाना मधुर है। उनके संगीत से चिड़ियां हवा से उतर आएंगी। दीवार-दरवाजे नाचने लग जाएंगे।

सुलतान ने उन्हें सामने पेश करने का हुक्म दिया। जब सुलतान ने जोशीले जत्थे की तरफ नजर की तो पाया कि सब एक से बढ़कर एक खूबसूरत हैं। हूरों जैसी उन हसीनाओं ने जब नाचना शुरू किया तो आसपास मौजूद सभी हैरान रह गए।

वे हसीनाएँ सुलतान के आसपास बैठने लगीं। उन्हें बीस-बीस, तीस-तीस हजार तनके दिए गए। उनमें से कुछ चुनी हुई लड़कियों को सोने, जवाहरात और मोतियों से लाद दिया गया। जिस मंजिल पर भी सुलतान का शिविर लगता, चारों तरफ मधुर तानें गूंजने लगतीं। मधुर गायकों के गायन, छेड़छाड़ करने वाली नृत्यांगनाओं के नाच और रमणियों के हावभाव से सेना के लोग और लश्कर के बहादुर जवान भी दीवाने हो गए।

आशिक मिजाज अपना सिर फोड़ डालते, कपड़े फाड़ डालते, सिर के बाल नोचने लगते। उन आशिक मिजाजों के पास जो भी दौलत थी, सब उन दिल जीतने वाली रमणियों को दे डाली। अपने घोड़े, अस्त्र-शस्त्र, खेमे और बोझ ढोने वाले जानवर भी बेच डाले। जब कुछ न बचा तो सिर की टोपी और कमर में बांधने वाली पेटी भी उन रमणियों के सामने डालने लगे। खाना, पीना, सोना छोड़ दिया। दिन भर बेहोश रहते, रात-रात भर होश न आता। सुलतानी शिविर के चारों तरफ तमाशा दिखाने वालों की निर्लज्जता और भांडपन चरम सीमा पर जा पहुँचा। चारों तरफ हंसी-ठट्‌ठा सुनाई देता।

यह इस्लाम की हुकूमत के शुरुआती गौरवशाली अध्याय हैं, जिनके बारे में 70 साल तक पढ़ाए गए इतिहास में कोई चर्चा नहीं है। जरा गौर कीजिए बरनी क्या बता रहा है-

हिंदुस्तान की रियासतों से लूटी हुई सारी दौलत और राजे-महाराजाओं के उपहार समेत कई सालों की दरबार को मिली न्यौछावर से इकट्‌ठा हुआ खजाना, सुलतान ने उन विलासियों की महफिल में लुटा दिया। अवध से इस तरह वह ऐश करता हुआ दिल्ली में किलोखड़ी के महल में दाखिल हुआ।

महीनों तक दिल्ली के लोग भी  इस तमाशे का हिस्सा बने रहे। सुलतान के स्वागत में सजाए गए पांडालों में उसके साथ आईं नर्तकियाँ और गायक जा पहुंचे। मलिकजादे उन हसीनाओं के दीवाने हो गए। ख्वाजाजादे आसक्त हो गए। आलिम व्यभिचार में पड़ गए। लाज-शर्म बाकी न रही। मान-मर्यादा खत्म हो गई। खुलेआम शराब बांटी जाने लगी। शराब के मटके लुटा दिए गए। शहर के लोग दीवाने हो गए। जैसा भोग विलास सुलतान मुइज्जुद्दीन कैकुबाद की हुकूमत में दिखा, वैसा उसके बाद कोई भी नहीं देख सका।

कैकुबाद तीन साल तक सुलतान रहा। वह इस कदर शराबनोशी और अय्याशी की गिरफ्त में था कि अवध से दिल्ली लौटने के बाद ही बीमार पड़ गया। महज 20 साल की उम्र मंे उसे लकवा मार गया। दिल्ली इन लुटेरों के हाथ में झूल रही थी। कैकुबाद का खेल खत्म होने को था तो बलबन के समय के बचे-खुचे सरदार कैकुबाद के तीन साल के बेटे को गोदी में उठा लाए और उसे ही सुलतान बनाकर तख्त पर बिठा दिया।

वह 1290 का साल था। अब जलालुद्दीन नाम का एक ताकतवर खिलजी दिल्ली में दिखाई देता है। सारे बचे-खुचे तुर्क उसके आसपास इकट्‌ठा होने लगते हैं। एक नई ताकत दिल्ली पर कब्जे के लिए तैयार नजर आने लगती है। दिल्ली ने देखा कि यह गुलाम वंश के खात्मे का समय है।

जलालुद्दीन खिलजी के नमूदार होते ही एक मलिक को सुलतान कैकुबाद के पास किलोखड़ी भेजा जाता है। इस मलिक के बाप को कभी कैकुबाद ने मरवा डाला था। अब बदला लेने की बारी उसकी थी। अपनी अय्याशियों के लिए कुख्यात कैकुबाद लाचारी की हालत में एक ऐसे कमरे में पड़ा था, जिसकी दीवारों पर शानदार शीशे जड़े थे। उस मलिक ने बलबन के इस पोते को एक कंबल में लपेटा। लातें मारीं और यमुना नदी में धकेल दिया।

लूट के माल की तरह हिंदुस्तान की सल्तनत अब एक झपट्टामार गिरोह से बेरहम बहेलियों के दूसरे जत्थे के हाथों में सरकने लगी। हम नहीं जानते कि कैकुबाद के दरबार में तीन साल और कुछ महीनों तक रौनक रहे उन नाचने, गाने और चुटकुले सुनाने वाले खूबसूरत हिंदुस्तानी लड़के, लड़कियों और उनके परिवार वालों का क्या हुआ? वे कौन लोग थे, जो सुलतान की आशिक मिजाजी को तुष्ट करने के लिए अपने बेटे-बेटियों को इस पेशे के लिए तैयार करने लग गए थे?

गुलामवंश अपने हिस्से का अंधेरा फैलाकर हिंदुस्तान की याददाश्त में दर्ज हजारों किस्से-कहानियों में समा गया…

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com