भारती
खेती के नए प्रकार- नीतिगत परिवर्तनों से पूर्व पर्यावरण अनुकूल बन रहे लातूर के किसान

भूमि, जल और फसल- खेती के तीन मुख्य आधार। रसायनों के अत्यधिक उपयोग से भूमि अनुपजाऊ हो रही है, वर्षा आधारित सिंचाई निश्चितता नहीं दे पाती और फसल पर पर्याप्त मूल्य न मिलने के कारण पिछले कुछ वर्षों में खेती को घाटे का व्यवसाय माना जाने लगा है। किसान की खेती से होने वाली कमाई मात्र लागत की ही पूर्ति कर पाती है और इस प्रकार अलाभकारी है। खेती पर मूल्य और बाज़ार इस चर्चा का विषय नहीं है, हम चर्चा करेंगे वर्तमान प्रणाली में कैसे किसान अपनी लागत बचाकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं।

एकीकृत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (आईएनआरएम) एक ऐसी पद्धति है जिसमें हम उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को विकसित कर और नैसर्गिक सीमाओं को ध्यान में रखकर समग्र विकास की ओर अग्रसर होते हैं। इसके कई क्षेत्रों में विभिन्न संस्थानों के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद शोध कर रहा है।

महाराष्ट्र का लातूर जिला सूखा प्रभावित रहा है लेकिन फिर भी इसके अधिकांश किसान गन्ना उगाते थे जो कि ऐसी फसल है जिसमें जल की अधिक लागत है। इस कारण 2016 में प्रशासन ने किसानों को दूसरी फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जिसके फलस्वरूप एक वर्ष में गन्ना क्षेत्रफल 45,000 हेक्टेयर से कम होकर 29,000 हेक्टेयर पर आ गया।

इसी प्रकार 2017 में आर्ट ऑफ लिविंग में प्रशिक्षण पाकर लातुर के जेवड़ी गाँव के एक किसान बालासाहेब यादव ने गन्ने की जगह अपनी भूमि पर केला उगाया और इसे ड्रिप तकनीक से सींचा ताकि बूंद-बूंद की उपयोगिता हो। बिना रसायन के उपयोग के उगने वाले केलों का स्वाद लोकप्रिय हुआ और वे सामान्य से अधिक दाम पर भी बिके। इस तरह अपनी 4 एकड़ भूमि से बालासाहेब ने 4 लाख रुपये कमाए।

प्राकृतिक रूप से अपने द्वारा उगाए गए केलों के साथ बालासाहेब

पिछले सात वर्षों से अपनी 10 एकड़ भूमि पर प्राकृतिक खेती करने वाले महादेव गोमरे अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रशिक्षित करते हैं। वे महाराष्ट्र और कर्नाटक के लगभग 30,000 किसानों को प्रशिक्षण दे चुके हैं। वे मल्टी क्रॉपिंग (विविध फसलों की बुआई) और इंटर क्रॉपिंग (सहरोपण) को प्रोत्साहित करते हैं जिसमें दालों व फलदार वृक्षों को उगाने से कमाई अधिक होती है। उनका दावा है कि 1 एकड़ भूमि पर 50,000 रुपये की लागत में 5 लाख रुपये की कमाई की जा सकती है।

किसी भी खेती में मुख्य भूमिका फसल की होती है। इसमें दो भाग हैं- फसल का चुनाव और उत्पाद। विविध फसलों को बोने का लाभ यह है कि उन्हें विविध पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिससे भूमि में किसी एक पोषक तत्व का अभाव नहीं होता और इसी कारण रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस क्षेत्र में सोयाबीन, चना और सब्जियों की बुआई उपयुक्त रहती है। साथ ही फलदार वृक्षों में अनार, आम और सीताफल सुझावित हैं।

ये किसान भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए रासायनिक खाद की जगह खेत के ही अतिरिक्त उत्पादों से कम्पोस्ट (प्राकृतिक खाद) बनाते हैं। महादेव का मानना है कि खेती के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों की व्यवस्था प्रकृति स्वयं करती है। वे बताते हैं कि मल्टी फार्मिंग से मिल रहे लाभ ने अन्य किसानों को भी इसकी ओर रुख करने के लिए प्रोत्साहित किया।

कीटनाशकों के रूप में गौमूत्र व नीम उत्पादों के अलावा लहसुन-अदरक का भी उपयोग किया जाता है। इस प्रकार किसी प्रकार के रसायन का उपयोग न करके ये किसान घर में बने इन उत्पादों से लागत पर भी बड़ी बचत कर पाते हैं। अन्नदाता नामक एक किसान समूह के तहत ये अपने खेतों का स्वस्थ और रसायन मुक्त उत्पादन बेचते हैं। बालासाहेब की माँ कहती हैं कि जबसे उन्होंने प्राकृतिक उत्पादों का उपभोग शुरू किया है, तबसे उनके घर में कोई बीमार नहीं पड़ा है।

महाराष्ट्र में इस वर्ष काफी वर्षा हुई है लेकिन इसके बावजूद मराठवाड़ा में अभी भी पानी का अभाव है। खेती के लिए पानी उपलब्ध कराने के लिए कुछ तरीके अपनाए गए। पहला तो यह था कि वर्षा का पानी खेतों में ही संग्रहित किया जाए। इस तरह पानी को बह जाने से रोका गया। दूसरा बह रहे पानी के मार्ग में डी-सिल्टेशन मशीनें लगाई गईं और उससे इकट्ठा हुई मिट्टी को पुनः खेतों में डाला गया जिससे मिट्टी के कटाव के कारण खेतों की उर्वरक क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।

इस क्षेत्र में बहने वाली मांजरा नदी को पुनर्जीवित किया गया जिसका कार्य 2013 में शुरू हुआ था। नदी का पानी भूमिगत जल से मिले इसके लिए नालों के संयोजन स्थान पर मेढ़ बनाई जाती हैं। इन मेढ़ों की विशेषता यह है कि वे सीमेंट के प्रयोग के बिना स्थानीय पत्थर से बनाए जाते हैं जो भूमिगत जल की भराई के लिए सहायक होते हैं। बालासाहेब अपना अनुभव बताते हैं कि उनकी बोरवेल सूखी रहती थी लेकिन इस कार्य के बाद जल का स्तर बढ़ा है और वे इससे सिंचाई कर पाते हैं।

पुनर्जीवन के बाद बहती हुई मांजरा नदी

एग्रोफॉरेस्ट्री भी एक प्रकार की खेती पद्धति है जिसे इस क्षेत्र के किसान अपना रहे हैं। इसमें पर्यावरण के लिए लाभकारी दृष्टि से कुछ बिना फल वाले पेड़ लगाए जाते हैं और कुछ फलदार पेड़ लगाए जाते हैं जो किसानों की आय का माध्यम बनें। पेड़ों का चुनाव स्थान पर निर्भर करता है जैसे चोटी क्षेत्र में कम पानी की लागत वाले सीताफल और आँवला के पेड़ लगाए जाते हैं, वहीं घाटी क्षेत्र में अधिक पानी की लागत वाले आम और जामुन बोए जाते हैं।

आर्ट ऑफ लिविंग की सहायता से ये किसान कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) द्वारा विभिन्न कंपनियों से जुड़ गए हैं जो इनके उत्पाद बेचने में सहायता करती है। बालासाहेब अब सोयाबीन उगाने पर विचार कर रहे हैं और उनका एक तेल मिल से अनुबंध भी हो गया है जो अगले तीन वर्षों तक उनका उत्पाद खरीदेगी। इस संस्था ने किसान में उत्साह और विश्वास पैदा करने का भी कार्य किया है जिससे वे नई खेती पद्धतियों को अपनाने हेतु तत्पर हैं।

दूसरी ओर सरकार भले ही किसी केंद्रीय नीति से इन किसानों की सहायता न कर पा रही हो लेकिन उनके सुझावों पर छोटे-मोटे निर्माण कार्य और सहयोग सरकार के विभिन्न विभाग करते रहते हैं। किसानों की याचिका पर कई स्थानों पर सरकारी विभागों ने रीचार्ज संरचना का निर्माण और डी-सिल्टेशन तकनीक की स्थापना की है।

सच्चे अर्थों में समग्र विकास मनुष्य और प्रकृति के साथ रहने से ही होता है। इस हेतु कई किसान आगे आए हैं जो नई पद्धति अपनाकर प्रकृति के अनुकूल खेती कर रहे हैं। अब आवश्यकता है केंद्रीय सहायता की जो इनके प्रयासों को एक दिशा देकर सुदृढ़ कर सके। आशा है कि आईएनआरएम पर सरकारी शोध क्रियान्वित भी हों जो हमें स्वास्थ्यवर्धक खाद्यान्न और किसानों को समृद्धि दें।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।