भारती
आईबीजी यानी एकीकृत युद्ध समूह बदलेंगे भारतीय सेना की युद्ध अवधारणा

आशुचित्र- आधुनिकीकरण की दिशा में सेना में महत्वपूर्ण ऑपरेशनल बदलाव का माध्यम बनेंगे एकीकृत युद्ध समूह (आईबीजी)।

युद्ध क्षमता को बेहतर बनाने, सैनिकों की संख्या को कम करने और बदलते समय के साथ नई रणनीतियों को तैयार करने के सिलसिले में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले महीने भारतीय सेना में पहले चरण के सुधारों को मंजूरी दी थी। एक लंबे विचार-विमर्श के बाद सेना के पुनर्गठन का खाका तैयार किया गया है, जो 21वीं सदी की वास्तविकताओं से मेल खाता हो।

हमारी थलसेना में 13 लाख सैनिक हैं। संख्याबल के लिहाज से यह दुनिया की तीन सबसे बड़ी सेनाओं में एक है, पर इसका बड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है। हाल में चीनी सेना का पुनर्गठन हुआ है और उसके आकार में 50 फीसदी की कमी की गई है, बावजूद इसके उसकी गतिशीलता में तेजी आई है।

भारतीय सेना ने 12 स्वतंत्र अध्ययनों के आधार अपनी युद्ध क्षमता को बढ़ाने की दिशा में पिछले साल से यह काम शुरू किया है। इस साल मार्च में तत्कालीन रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने इन सुधारों की स्वीकृति दी थी। इसी प्रक्रिया के तहत सेना एक संरचनात्मक परिवर्तन के रूप में ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप’ (आईबीजी) यानी कि एकीकृत युद्ध समूहों का विकास कर रही है। सेना की रणनीति में पिछले 15 साल में यह सबसे बड़ा बदलाव है। 

परिवर्तन की आवश्यकता

आईबीजी में युद्ध के लिए आवश्यक सभी तत्वों को एक स्थान पर एकीकृत किया जाएगा। सामान्यतः यह एकीकरण युद्ध में होता ही है, पर शांतिकाल में सेना के अलग-अलग तत्व स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, जबकि ‘एकीकृत युद्ध समूह’ हमेशा एकीकृत इकाई के रूप में काम करेंगे।

यानी कि दूसरे विश्व युद्ध के समय विकसित हुई स्ट्राइक कोर की अवधारणा के स्थान पर अब तुरंत कार्रवाई करने वाली सेना बनाने पर ज़ोर है। यह बदलाव दो कारणों से ज़रूरी समझा गया। दोनों कारण एक-दूसरे से जुड़े हैं। हाल के वर्षों में देखा गया है कि सेना को युद्ध की स्थिति में लाने में कुछ समय लगता है। संरचनात्मक कारणों से उसके विविध अंगों को एकताबद्ध होने में समय लगता है। 

अक्टूबर 2001 में जम्मू कश्मीर विधानसभा और फिर दिसंबर में संसद पर हमले के बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन पराक्रम’ चलाया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सेना को सीमा की ओर कूच करने का आदेश दिया था।

करीब 10 महीने तक दोनों देशों की सेनाएँ एक-दूसरे के आमने-सामने रहीं। भारत ने यह शक्ति प्रदर्शन किया था यह बताने के लिए कि पाकिस्तान अपने तौर-तरीकों से बाज आए। 

इस शक्ति प्रदर्शन का पाकिस्तानी रणनीतिकारों पर क्या प्रभाव पड़ा, यह चर्चा का अलग विषय है, पर भारतीय सेना ने अपनी संचालन नीति और संरचना को लेकर कुछ महत्वपूर्ण अनुभव हासिल किए।

उस समय यह विचार भी किया गया कि क्या कश्मीर में एक छोटा-सा युद्ध छेड़ा जाना चाहिए। उसमें वायुसेना की भूमिका पर भी विचार हुआ। साथ ही साथ यह बात भी सामने आई कि इन सबकी तैयारियों में कितना समय लगेगा। यह विमर्श संभवतः सन 1986-87 के युद्धाभ्यास ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के से शुरू हो चुका था, जिसे लेकर पाकिस्तानी सेना भयभीत रहती है। 

कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन

इस विमर्श की देन है भारतीय सेना का ‘कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन।’ हालाँकि भारतीय सेना ने अपनी इस अवधारणा को औपचारिक रूप कभी घोषित नहीं किया, पर इसका उल्लेख हमेशा होता है और पाकिस्तानी सेना इसे लेकर काफी परेशान रहती है।

आईबीजी की योजना के पीछे यह युद्ध सिद्धांत भी एक बड़ा कारण है। मोटे तौर पर ‘कोल्ड स्टार्ट’ का मतलब है सेना का अचानक आक्रामक ऑपरेशन की मुद्रा में आना। भारतीय सेना प्रारंभिक रूप से पाकिस्तानी सीमा के ‘शकरगढ़ बल्ज’ नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र में तैनात करने के लिए एक आईबीजी का गठन कर रही है। इस क्षेत्र में सन 1965 और 1971 के जाने-माने युद्ध हुए हैं।

1971 शकरगढ़ युद्ध

भारतीय सेना का पुनर्गठन केवल पाकिस्तानी सेना और उसकी रणनीति को सामने रखते हुए नहीं किया जा रहा है। हमारी दूरगामी प्रतिस्पर्धा चीन से है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में मात्र भारत ही ऐसा देश है, जो चीनी शक्ति को संतुलित कर सकता है। हमें चीनी रणनीति पर भी नज़र रखनी चाहिए।

पिछले तीन-चार वर्ष में चीन ने एक तरफ अपने ‘वन बेल्ट, वन रोड’ कार्यक्रम का विस्तार किया है, जिसके अंतर्गत पाक अधिकृत कश्मीर के होकर ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपेक)’ का निर्माण किया जा रहा है। पर मामला इतना भर ही नहीं है। 

चीनी सेना के पैर पाक-अधिकृत क्षेत्र में पड़ चुके हैं। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के नेतृत्व में सन 2015 से चीनी सेना के पुनर्गठन का काम चल रहा है। उसकी सेना का आकार आधा कर दिया गया है। चीनी रणनीति है कम से कम युद्ध लड़कर सफलता अर्जित करना। एक जमाने की भारी भरकम चीनी सेना अब हल्की और चुस्त सेना बन गई है। उसके पास तकनीक भी नई है। 

आईबीजी की आवश्यकता

अमेरिकी सेना अपनी संरचना के सहारे सारी दुनिया में सक्रिय रहती है। भारतीय सेना अब भी सैनिक-बल के सहारे है। इस दृष्टि से बदलाव महत्वपूर्ण हैं। इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की नियुक्ति की घोषणा की है। वस्तुतः यह नई वास्तविकताओं की स्वीकृति है। आईबीजी इसी दिशा में एक कदम है। यह योजना भी एकांगी नहीं है। केवल युद्ध समूह ही नहीं बनाने होंगे, बल्कि सेना की युद्धक संरचना में दूसरे परिवर्तन भी करने होंगे। 

आईबीजी कोई नई सेना नहीं होगी, बल्कि वर्तमान सेना के विविध तत्वों को जोड़कर बनाई जाएगी। इन्हें इस प्रकार बनाया जाएगा कि भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए 12 से 48 घंटे के भीतर कार्रवाई कर सकें। आशा है कि इस वर्ष के अंत तक पहला एकीकृत युद्ध समूह पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा। इस प्रकार के 11 से 13 समूह बनेंगे।

आईबीजी से जुड़े ऑपरेशनल कार्यों का 2019 की गर्मियों में पंजाब में हुए अभ्यास के दौरान परीक्षण भी किया गया है। अगले महीने सेना की पर्वतीय स्ट्राइक कोर के तीन आईबीजी युद्ध अभ्यास करने वाले हैं। यह अभ्यास अरुणाचल और असम के निकटवर्ती क्षेत्र में होगा। इसमें तोपखाने, हेलिकॉप्टरों, टैंकों और इनफेंट्री वाहनों की भूमिका भी होगी।

इस अभ्यास का उद्देश्य यह देखना है कि इस पर्वतीय क्षेत्र में सैन्य अभियान किस प्रकार संचालित किए जा सकते हैं। सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत के अनुसार ये युद्ध समूह सेक्टर-आधारित होंगे, इसलिए सभी अलग-अलग किस्म के होंगे। कुछ सेक्टरों में उन्हें वायुसेना की सहायता की आवश्यकता भी हो सकती है।

जनरल बिपिन रावत (मध्य में)

दूरगामी पुनर्गठन

ब्रिगेड के आकार के इन दस्तों में युद्ध के लिए आवश्यक सभी तत्व शामिल होंगे। उदाहरण स्वरूप पैदल सैनिक (इनफेंट्री), टैंक रेजिमेंट, तोपखाने, यूएवी, अभियंता और सिग्नल्स सब इसमें सम्मिलित होंगे।

रेगिस्तान में काम करने वाले आईबीजी की संरचना और ट्रेनिंग पहाड़ी इलाकों पर काम करने वाले आईबीजी से अलग होगी। आकार में भी पर्वतीय (चीनी सीमा से लगे हुए) क्षेत्रों के लिए छोटे आईबीजी और (पाकिस्तानी सीमा से लगे) मैदानी इलाकों के लिए बड़े आईबीजी बनेंगे। बड़े आईबीजी में इनफेंट्री की 4-5 बटालियनें और बख्तरबंद, तोपखाने की 2-3 रेजिमेंट, एक अभियांत्रिकी इकाई, एकीकृत सिग्नल्स इकाई और डेडिकेटेड इंटीग्रल लॉजिस्टिक्स यानी अपनी परिवहन व्यवस्था।  

इसका अर्थ हुआ कि बड़े आईबीजी में 8,000 से 10,000 सैनिक होंगे। हिमालय क्षेत्र के छोटे आईबीजी में करीब 5000। इन्हें चिनूक और एमआई-17 जैसे हैवी लिफ्ट हेलिकॉप्टरों की सुविधा भी प्राप्त होगी।

चीनी सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र के आईबीजी की संरचना पाकिस्तानी सीमा से लगे आईबीजी से भिन्न होगी। पश्चिमी सीमा पर तैनात आईबीजी के हथियार और दूसरे उपकरण, ट्रेनिंग और आक्रामक रणनीति चीनी सीमा से लगे हिमालयी आईबीजी से अलग होगी। पहाड़ी क्षेत्र के लिए बने आईबीजी के पास ऐसे सैनिक होंगे, जिनकी ट्रेनिंग ऊँचे इलाकों पर हुई होगी और जो पहाड़ी युद्ध के लिए तैयार होंगे।  

कुल मिलाकर सेना के पास अगले कुछ वर्षों में पश्चिमी मोर्चे पर 8-10 और चीन से लगे उत्तरी मोर्चे पर तीन-चार आईबीजी होंगे। आईबीजी की कमान ब्रिगेडियर स्तर के या कमान मेजर जनरल स्तर के अधिकारी को दी जाएगी।

सेना में अधिकारियों के स्तर पर भी परिवर्तन हो रहे हैं और कोशिश की जा रही है कि अधिकाधिक युवा अधिकारी आगे बढ़ें। आईबीजी के कारण सेना में महत्वपूर्ण ऑपरेशनल बदलाव होंगे। इन सुधारों के पीछे संसाधनों के उचित उपयोग और विशेषकर आधुनिकीकरण के लिए संसाधनों को जुटाने की कामना है। यह पुनर्गठन चार प्रमुख अध्ययनों का परिणाम है।