भारती
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में निजी कंपनियों के लाभ पर अंकुश लगाना आवश्यक

किसानों की वित्तीय सुरक्षा के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना इसके प्रारंभ से तीन वर्ष बाद किसानों से अधिक बीमा कंपनियों को लाभ पहुँचाती नज़र आ रही है। ऐच्छिक बीमा के विकल्प का अभाव, बीमा कंपनियों द्वारा भुगतान में देरी व कई बार नियमों की आड़ में किसानों के नुकसान की भरपाई न हो पाने जैसी समस्याएँ सामने आई हैं।

ऋण लेने पर बीमा प्रीमियम को स्वतः ही काट लिया जाता लेकिन नुकसान होने पर बीमा कंपनियाँ पैसा देने में देरी करती हैं। सरकार ने इसे रोकने के लिए नियम भी बनाए कि दो महीने में पैसा नहीं देने पर कंपनी को 12 प्रतिशत ब्याज के साथ रकम देनी पड़ेगी, लेकिन इसके बावजूद भी किसानों को पैसा समय पर नहीं मिलने की खबरें प्रायः सामने आती रहती हैं।

भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण  की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, निजी क्षेत्र की 11 कंपनियों ने 11,905.88 करोड़ रुपए प्रीमियम के रूप में इकट्ठा किया लेकिन उन्होंने केवल 8,831.79 करोड़ रुपए के दावों का ही भुगतान किया। वहीं पाँच सरकारी कंपनियों ने 13,411.10 करोड़ रुपए का प्रीमियम सरकार और किसानों से इकट्ठा किया, जबकि फसल बर्बादी की वजह से किसानों को 17,496.64 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया।

इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि बीमा कंपनियाँ इस योजना से भारी लाभ कमा रही हैं। वहीं दूसरी ओर केंद्र द्वारा दिया गया सरकारी अनुदान लगातार बढ़ता जा रहा है। 2017 में जहाँ केंद्र ने लगभग 5,600 करोड़ रुपए दिए थे, वहीं 2019 आते-आते इतनी रकम सिर्फ एक मौसम के लिए दी गई है। 2018 में केंद्र ने लगभग 9,100 करोड़ रुपए का अनुदान बीमा कंपनी को दिया था।

प्राकृतिक आपदा, कीड़े और रोग की वजह से सरकार द्वारा अधिसूचित फसल में से किसी नुकसान की स्थिति में किसानों को बीमा कवर और वित्तीय सहायता देना, किसानों की खेती में रुचि बनाए रखने के प्रयास एवं उन्हें स्थायी आमदनी उपलब्ध कराना है, कृषि में खोज एवं आधुनिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई फसल बीमा योजना कारगर सिद्ध नहीं हुई।

बीमा योजना पर से किसानों की घटती रुचि को 2016 और 2017 में पंजीयन संख्या की तुलना करके समझा जा सकता है। 2016-17 में 5.8 करोड़ किसानों ने पंजीकरण करवाया था, जबकि यह आँकड़ा 2017-18 में 4.70 घटकर करोड़ हो गया। वहीं दूसरी तरफ हम देख सकते हैं कि सरकार का व्यय बढ़ने के साथ-साथ लाभार्थियों की संख्या भी बढ़ी है। खरीफ 2016 में जहाँ 1.07 करोड़ किसानों को लाभ मिला था, वहीं यह आँकड़ा 2017 में बढ़कर 1.37 करोड़ हो गया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में संसद की प्राक्कलन समिति ने फसल बीमा योजना में पारदर्शिता की कमी को एक बड़ी समस्या माना था। इस योजना में सुधार हेतु समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद में वर्ष के आरंभ में सौंपी थी। योजना की संरचना भी दोषपूर्ण मानी गई जिससे यह किसानों को पूरा लाभ पहुँचाने में असमर्थ थी।

भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी

राष्ट्रीय किसान संगठन (रजि.) के महासचिव परमजीत सिंह ने स्वराज्य  को बताया, “इस योजना की दो कमियों को सुधार लिया जाए तो यह योजना ऐतिहासिक हो सकती है।” पहला, सरकार ने हर जिले में कुछ तय फसल पर बीमा कराने की सुविधा दी है। कंपनी प्रीमियम काटते वक्त यह बात किसानों को नहीं बताती है, लेकिन जब किसान फसल बर्बाद होने के बाद क्लेम करने जाते हैं तो इस नियम की आड़ में क्लेम खारिज कर देती है। अगर इसमें सुधार हो जाए तो किसानों का भरोसा बढ़ सकता है।

दूसरी सबसे बड़ी कमी यह है कि सरकार ने फसल बीमा योजना के वक्त कहा था कि वह हर जिले के उत्पादन क्षमता के आँकड़े जारी करेगी, इससे किसानों को यह लाभ होगा कि अगर फसल की उत्पादन क्षमता कम है तो बिना किसी सर्वे के कंपनी उसकी बीमा राशि खाते में डाल देगी, लेकिन पिछले तीन सालों में सरकार ने एक भी जिले की उत्पादन क्षमता के आँकड़े जारी नहीं किए हैं। सरकार इसपर अगर ध्यान दे तो योजना में कंपनियों की मनमानी रुकेगी।

इन परिस्थितियों को देखने के बाद अब सरकार भी इस योजना में आमूलचूल परिवर्तन करने की सोच रही है व इसके लिए कृषि मंत्रालय ने सभी सांसदों और राज्य-सरकारों से सलाह मांगी है‌। गांव कनेक्शन  की रिपोर्ट के अनुसार बीमा योजना को स्वैच्छिक बनाया जा सकता है व ऊँचे प्रीमियम वाली फसलों को हटाकर राज्य विशिष्ट ग्राहक के अनुरूप उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए लचीलापन देने जैसे प्रयासों पर विचार किया जा रहा है।

साथ ही कृषि मंत्रालय ने इसके प्रीमियम कटौती के भी संकेत दिए हैं, लेकिन क्या सिर्फ प्रीमियम कटौती हो जाने से इसका समाधान हो जाएगा? योजना की शुरुआत में ही सरकार ने स्पष्ट कर दिया था कि इसकी प्रीमियम दर काफी कम होगी। खरीफ फसल पर जहाँ निचली प्रीमियम दर 2 प्रतिशत रखी गई, वहीं रबी फसल पर 1.5 प्रतिशत की प्रीमियम दर रखी गई थी।

प्रीमियम कम रखने के पीछे की मंशा को बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “यह योजना देश के सभी किसानों तक पहुँचे, जिससे अधिक संख्या में किसान लाभांवित हो, यही हमारी सरकार की लक्ष्य है।” लेकिन फिर भी अनिवार्य नामांकन ने किसानों को असंतुष्ट किया है।

इस योजना में कई तरह के सुधारों की आवश्यकता है।

पहला, सरकार हर जिले में बीमा फसल की उत्पादन क्षमता जारी करे। इसके जारी होने से किसानों के बीच क्लेम का झंझट नहीं रह जाएगा और बीमा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगेगा।

दूसरा सबसे बड़ा सुधार ऐच्छिक बीमा का है। परमजीत बताते हैं, “किसानों के लिए ऐच्छिक बीमा का विकल्प होना चाहिए, अगर किसानों को लगता है कि उसे इस बार बीमा नहीं करानी है या इस फसल पर नहीं करवानी है तो नहीं कराने की भी सुविधा हो।” साथ ही पारदर्शिता लाई जानी चाहिए जिससे किसानों को पता चले किस फसल पर बीमा मिलेगा और किसपर नहीं, इस तरह उनकी प्रीमियम राशि व्यर्थ नहीं होगी।

इसके अलावा क्लेम के वक्त द्वि-स्तरीय सर्वे पर भी विचार किया जा रहा है क्योंकि बीमा कंपनियों द्वारा किए गए सर्वे में अनियमितताएँ रहती हैं और किसानों को कम भुगतान दिया जाता है। भुगतान के समय कंपनियाँ मनमानी करने लगती हैं, जैसे कई बार अपने पोर्टल बंद कर देती है, तो कई बार किसानों की याचिका पर ध्यान नहीं दिया जाता है‌। ऐसे में कंपनियों पर कार्रवाई की जानी चाहिए।

निजी बीमा कंपनियाँ मुनाफा कमाएँगी लेकिन इस मुनाफे को सीमित करके कैसे अतिरिक्त बचत को राष्ट्रीय स्तर के बीमा जोखिम कोष में स्थानांतरित किया जाए, यह इन सुधारों की सबसे बड़ी चुनौती होगी। लेकिन पारदर्शिता बढ़ाने और बीमा कंपनियों पर निगरानी रखने से निश्चित ही कुछ हद तक योजना की प्रभावशीलता को बढ़ाया जा सकेगा।