भारती
नवाचार के लिए शोध पत्रों से नहीं, प्रवेश परीक्षा पद्धति में परिवर्तन से बनेगी बात

जब संसाधन सीमित हों तो रचनात्मकता और इसकी सहेली, नवाचार (इनोवेशन) हमें कम चीज़ों से अधिक प्राप्त करने में सहायता करते हैं। व्यवहारिक रूप से इसे कॉर्पोरेट क्षेत्र में शोध एवं विकास (आर एंड डी) और शिक्षा के क्षेत्र में शोध कार्य के महत्त्व से देखा जा सकता है।

इसीलिए यूएस के शैक्षिक संस्थानों में जो कार्य करना चाहते हैं या स्थाई कर्मचारी बनना चाहते हैं उनके लिए ‘पब्लिश या पेरिश’ यानी प्रकाशित करें या अस्त हो जाएँ का मूलमंत्र चलता है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी, गणित और इनसे जुड़े क्षेत्रों में अग्रणी रहा यूएस दर्शाता है कि अवश्य ही नवाचार और प्रकाशन में सकारात्मक संबंध होगा।

यही तर्क चीन में लागू किया जाता है जहाँ सभी शिक्षाविदों के लिए पत्रों का प्रकाशन करना अनिवार्य है। इस नीति से कुछ रोचक बातें सामने आईं। पहली, यूएस शिक्षा क्षेत्र में विद्यमान चीन और चीनी शोधकर्ता पत्रों के प्रकाशन में सबसे आगे हैं। दूसरी, इनमें से अधिकांश पत्र या तो जाली या नीच गुणवत्ता के पाए गए हैं।

तीसरी और सबसे रुचिकर बात- चीन को अभी भी सहस्रों हैकरों के माध्यम से यूएस की कंपनियों और संस्थानों से औद्योगिक और वैज्ञानिक जानकारी चुरानी पड़ती है। इससे प्रकाशित शोध और वास्तविक नवाचार के बीच की कड़ी कमज़ोर पड़ती दिखाई देती है। अवश्य ही चीन मौलिक शोध में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है लेकिन जब तक पूर्ण पारदर्शिता नहीं होती, तब तक हम संदेहशील ही रहेंगे।

प्रकाशन और नवाचार के परस्पर संबंध में यह कमी गुडहार्ट का नियम दर्शाती है- “कोई भी अवलोकित सांख्यिकीय नियमितता तब नष्ट हो जाएगी जब इसे नियंत्रित करने के लिए दबाव डाला जाएगा।” मरीलीन स्ट्रैथर्न इसे और संक्षिप्त रूप से बताते हैं- “जब कोई मानदंड लक्ष्य बन जाता है, तब यह मानदंड नहीं रह जाता।”

इसका अर्थ यह हुआ कि भले ही प्रकाशन नवाचार का आँकलन करने के लिए एक अच्छा साधन हैं लेकिन जब लोगों को रोजगार के लिए प्रकाशन करने के लिए कहा जाएगा तो इससे किसी भी चीज़ का आँकलन नहीं किया जा सकता है।

जिसने भी शैक्षिक प्रकाशन की दिशा में काम किया है, वह जानता है कि पत्र का प्रकाशन के लिए स्वीकृत होना- 1. एक स्वीकार्य विषय, 2. शोध की कार्यविधि और प्रस्तुति के तरीके, 3. लिटरेचर रिव्यू और रेफरेंस से एक स्व-पर्याप्त साइटेशन इंडेक्स- पर निर्भर करता है।

विचार (आइडिया) की मौलिकता या इसे लागू करने के सौंदर्य का किसी जर्नल द्वारा इसकी स्वीकार्यता से अदिक लेना-देना नहीं है। जब तक यह किसी शैक्षिक पत्र की तरह दिखता है, तब तक इसे एक शैक्षिक पत्र की तरह स्वीकार कर लिया जाता है। (पाठकों को बता दें कि लेखक के गैर-भारतीय शैक्षिक जर्नलों में केवल दो पत्र प्रकाशित हुए हैं, जिस कारण से यहाँ खट्टे हैं अंगूर वाली बात हो सकती है।)

शोध का मुखौटा चढ़े प्रकाशनों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था में भी घुसपैठ करनी शुरू कर दी है। इतनी कि एक भारतीय प्रबंधन संस्थान के निदेशक ने निर्णय लिया है कि पाठन अनुबंधित शिक्षकों द्वारा कराया जाए और स्थाई शिक्षकों को इन व्यर्थ चीज़ों से दूर रखा जाए ताकि वे सिर्फ पत्रों के प्रकाशन पर ध्यान केंद्रित करें।

यह एक हास्यास्पद बात है क्योंकि कम से कम प्रबंधन के क्षेत्र में तो ऐसा है कि एक जटिल समाधान खोजने और वित्तीय रूप से सटीक परियोजना को लागू करने में संशयात्मक डाटा संग्रहण व सांख्यिकी महत्त्व वाली परिकल्पना का पी-वैल्यू टेस्ट करने से कई अधिक नवाचार है।

लेकिन दुर्भाग्यवश विश्वविद्यालयों की रैंकिंग पद्धति और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) तथा अखिला भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) जैसे नियामकों ने प्रकाशन को उत्कृष्टता का एक आयाम बना दिया है।

वास्तविकता में शैक्षिक पराक्रम के लिए ऐसे साधनों को अपनाने की जड़ें- कम से कम भारत में- अर्थशास्त्र में नवाचार की कमी है। कौन निर्णय लेता है कि भारत में अच्छा छात्र होने का क्या अर्थ है?

सबसे पहले शिक्षाविद और फिर उनसे भी महत्त्वपूर्ण कॉर्पोरेट एक्ज़ेक्यूटिव, जो अधिकांश रूप से अभियांत्रिकी या प्रबंधन में स्नातक होते हैं। वे निर्णय लेते हैं कि किस महाविद्यालय से किसे नियुक्त करना है।

ऐसे निर्णयकर्ताओं में जो समान होता है वह नवाचार या वास्तविक विचार नहीं, बल्कि अपने छात्र जीवन में किसी प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने का इतिहास होता है। इसलिए उन्हें परीक्षा में सफल होने योग्य और उनके जैसे लोग पसंद आते हैं। भारत का शैक्षिक और कॉर्पोरेट क्षेत्र उन लोगों से भरा पड़ा है जिन्होंने सफलतापूर्वक कोई प्रवेश परीक्षा पार की है, न कि उन लोगों से जिनहोंने नवाचार किया है।

एक समय में जॉइंट एन्ट्रेन्स एक्ज़ामिनेशन (जेईई) और कॉमन एन्ट्रेन्स टेस्ट (कैट) ऐसा कल्पित किए गए थे जो व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता परख सकें। लेकिन फिर, गुडहार्ट का नियम यहाँ लागू हुआ और ये परीक्षाएँ ही छात्रों का अंतिम लक्ष्य बनकर रह गईं।

जेईई की रैंक एक समय में एक अच्छा पैमाना थी लेकिन एक लक्ष्य बनने के बाद इसके द्वारा किया गया आँकलन अर्थहीन रह गया है। वास्तविक विचारों वाले छात्र कभी भी कोचिंग प्रणाली से चलने वाली इस परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाएँगे और परीक्षा पार करके महाविद्यालय और वहाँ से कॉर्पोरेट पहुँचने वाले लोग नए विचार नहीं ला पाएँगे।

यही कारण है कि फ्लिपकार्ट हमेशा अमेज़ॉन की प्रति (कॉपी) रहेगा और ओला व ओयो क्रमशः उबर व एयरबीएनबी की प्रतियाँ। भले ही ये काफी सफल हैं लेकिन इनके उत्पादों और सेवाओं में कुछ मौलिक नहीं है। ये लोग कभी स्काईप या वॉट्सैप जैसी मौलिक वस्तुएँ नहीं बना सकते हैं।

तो विकल्प क्या है? क्या कोई ऐसा साधन हो सकता है जो लोगों को अपक्व और स्वाभाविक मेधा तक पहुँचाए? क्या जेईई जैसी बनावटी रूप से कठिन परीक्षाओं का विकल्प हो सकता है जिसे सिर्फ कोचिंग और अच्छी तैयारी से ही पार किया जा सकता है?

काफी समय पहले कक्षा 10वीं व 12वीं के अंकों से भी कौशल को आँका जा सकता था लेकिन राज्य बोर्डों में सभी को 90 प्रतिशत देने की होड़ ने इसे भी बर्बाद कर दिया है। क्या हो यदि 12वीं कक्षा की परीक्षाओं में पर्सेंटाइल (आप कितने लोगों से आगे हैं) अंक से महाविद्यालयों में प्रवेश मिले?

इसका तुरंत विरोध होगा कि अलग-अलग छात्रों की संख्या वाले विभिन्न बोर्डों की तुलना नहीं की जा सकती है। त्रिपुरा जैसे छोटे बोर्ड में शीर्ष 5 प्रसेंटाइल वाले छात्रों को महाराष्ट्र जैसे बड़े बोर्ड में शीर्ष 5 पर्सेंटाइल प्राप्त करने वालों के समतुल्य नहीं समझा जा सकता है।

क्या हो यदि हम हर व्यक्ति का एक ही केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के अधीन 12वीं की राष्ट्रीय परीक्षा देना अनिवार्य कर दें? या तो राज्य बोर्ड के अतिरिक्त या विकल्प में? यह सुनने में अच्छा लग सकता है लेकिन इसमें केंद्रीयकरण और एक बिंदु से जुड़े होने के कारण विफलता का खतरा रहेगा।

हम क्या कर सकते हैं कि देश को शिक्षा ज़ोनों में विभाजित करें और हर ज़ोन के लिए एक ज़ोनल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (ज़ेडबीएसई) गठित करें। यह भारतीय रेल के 16 मंडलों की तरह होगा जैसे पश्चिमी, केंद्रीय पूर्वी, दक्षिण पूर्वी, आदि।

हर ज़ोन एक से अधिक राज्य में होगा और इसका दायरा राज्य के अलावा भाषाई तथा सांस्कृतिक आधार पर भी हो सकता है। हर  ज़ेडबीएसई अपने स्तर पर कक्षा 10वीं व 12वीं की बोर्ड परीक्षाएँ करवाएगा। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य एवं क्षेत्रीय विविधता पर आधारित पाठ्यक्रम और स्थानीय सुलभता के अनुसार इसकी समयावली बनाई जा सकती है।

हालाँकि उस समय राज्य बोर्डों की आवश्यकता नहीं रह जाएगी लेकिन यदि वे यथास्थिति रहे तब भी छात्र को अपने क्षेत्र की ज़ेडबीएसई परीक्षा देने दी जाए और वह किस विद्यालय में पढ़ा है, उससे अंतर न किया जाए। जब ज़ेडबीएसई क्रियाशील हो जाएँगे तब कक्षा 10वीं व 12वीं में विद्यार्थी के पर्सेंटाइल अंकों के आधार पर सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और यूजीसी द्वारा वित्तपोषित संस्थानों में प्रवेश मिले।

कुल पर्सेंटाइल के अलावा अभियांत्रिकी या कला जैसे विभिन्न संकायों में प्रवेश के लिए आवश्यक विषय-विशेष के पर्सेंटाइल को भी देखा जा सकता है। इससे छात्रों को महाविद्यालय में प्रवेश के लिए बनावटी बौधिक परीक्षाओं में नहीं बैठना होगा और वे ज़ेडबीएसई के विभिन्न विषयों और अधिक व्यापक पारंपरिक विद्यालयी पाठ्यक्रम पर ध्यान दे पाएँगे।

लेखक की पीढ़ी के समय नियुक्तिकर्ता 10वीं और 12वीं के अंकों को महत्त्व देते थे और ज़ेडबीएसई से जो देशभर में बेहतर समानता लेकर आएगा, यह तरीका अधिक कुशल हो जाएगा। जो महाविद्यालय अच्छे प्लेसमेंट चाहते हैं, उन्हें अच्छे ज़ेडबीएसई पर्सेंटाइल वाले छात्रों को बुलाना होगा, न कि यह विपरीत प्रवाह में होगा।

इससे सच में अच्छे छात्रों को अच्छे महाविद्यालयों में प्रवेश मिलेगा और उन्हें अच्छी नौकरियाँ या शोध के लिए अच्छे अवसर मिलेंगे। ऊपर से नीचे चलने वाले पब्लिश या पेरिश दर्शन की जगह यह पद्धति नीचे से ऊपर जाएगी जहाँ ज़ेडबीएसई के कक्षा 10वीं व 12वीं के पर्सेंटाइल अंकों के आधार पर प्रवेश मिलेगा। नवाचारी देश में असली मेधा को पहचानकर उसे पुरस्कृत करने में यह तंत्र समर्थ होगा।