भारती
धर्मांतरितों के प्रति बलबन का व्यवहार व शुरुआती 33 धर्मांतरितों की शिनाख्त- भाग 5

प्रसंग- बलबन ने ही अपने दरबार में धर्मांतरित हिंदुओं के बारे में एक किस्सा सुनाया था, जानिए धर्मांतरित हिंदुस्तानियों के साथ कैसा व्यवहार होता था।

धर्मांतरण ने इस देश की शक्ल बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है, जो बीते 1,000 साल में किसी सदी में रुका नहीं है। मैंने इतिहास के ब्यौरों में वे चेहरे और नाम तलाशे, जिन्होंने सबसे पहले अपना धर्म छोड़ा। आमतौर पर दिल्ली में इस्लामी हुकूमत में थोक धर्मांतरण के ही जिक्र या फरमान मिलते हैं। जैसे किसी शहर या सूबे पर दिल्ली की फौजों के हमले, लूटमार, कत्लेआम और इस्लाम कुबूल करने की सज़ा के साथ कब्ज़े।

खुशकिस्मती से जियाउद्दीन बरनी के साथ गुलाम वंश की हुकूमत में ही मुझे कुछ ऐसे चेहरे मिल गए, जो इस्लाम कुबूल करने वाले शुरुआती हिंदुस्तानी थे। बरनी ने भरे दरबार का वह दृश्य दिखाया है, जब धर्मांतरित लोग सुलतान के सामने पेश किए जाते हैं। आइए आप भी देखिए-

गयासुद्दीन बलबन ने नायब और सुलतान के रूप में 40 साल दिल्ली पर राज किया। इस दौरान दरबार और फौज में ऊपर से नीचे तक के हर महत्वपूर्ण पद पर तुर्क मूल के लोगों को ही मौके दिए। गौर करें, तब के शुरुआती धर्मांतरित हिंदुस्तानी मुसलमानों को भी उस दौर में किसी किस्म की इज्ज़त अफज़ाई नहीं थी।

ऐसा बिल्कुल नहीं था कि आप उनकी ज़िद के आगे झुककर मुसलमान बन भी गए तो मामूली इज्ज़त के भी हकदार होंगे। बराबरी की बात तो दूर वे लोग हिंदुस्तानी मुसलमानों को खुलकर नीच, बाजारी, तुच्छ, कमीने और चरित्रहीन कहते थे। शायद वे मानते होंगे कि जो अपने मुल्क, अपनी रवायतों और अपने मजहब के ही न हुए, वे ऐसे ही तो होंगे। क्या उनका चरित्र होगा और वे कितने गिरे हुए होंगे! एक बार फिर इल्तुतमिश और बलबन के पास चलकर ऐसे लोगों की शिनाख्त करते हैं।

सुलतानों के समय ‘ख्वाजा’ हिसाब-किताब की निगरानी वाला एक पद था, जो वज़ीर की सिफारिश से नियुक्त होते थे। ‘ख्वाजा’ कोई मजहबी पदनाम नहीं है, जैसा कि कुछ दरगाहों में दफन इस्लामी अनुयायियों को बहुत इज्जत के साथ आज कहा जाता है- ख्वाजा साहब।

बलबन के समय ‘ख्वाजा’ ताजुद्दीन मरकानी नाम का एक शख्स था। वह बताता है कि सुलतान बनने के पहले ही साल बलबन ने दरबार के अपने करीबी ओहदेदारों को हुक्म दिया कि अमरोहा की अक्ता (प्रांत) की ख्वाजगी के लिए एक ठीकठाक मुत्सर्रिफ (हिसाब-किताब की देखभाल करने वाला, वित्त अधिकारी) चुनकर पेश करें।

मलिक अलाउद्दीन किशली खां और निजामुद्दीन बुजगाला समेत दरबार के पाँच प्रमुख लोग सुलतान के हुक्म से कमाल महियार नाम के एक काबिल आदमी काे दरबार में चुनकर लाए। कमाल ने दरबार की रवायत के मुताबिक बलबन के सामने जमीन का चुंबन यानी खाकबोस किया, जो कि बलबन का उसूल था कि इस्लामी हुकूमत में सुलतान के सामने ऐसे ही झुककर रहा जाए।

बलबन ने किसी मुसलमान के नाम के साथ यह उपनाम पहली बार सुना होगा- महियार। आप देखिए इस घटना से यह पता चलता है कि दिल्ली पर काबिज पहले बैच के गुलाम वंश के शासक भी नई नियुक्तियों को लेकर किस हद तक सतर्क थे। उसका ध्यान ‘महियार’ शब्द पर अटक गया। उसने अपने दोनों आला अफसरों से कहा कि उससे पूछें कि महियार का मतलब क्या होता है?

कमाल ने जवाब दिया– “महियार मेरा पिता और एक हिंदू गुलाम था।”

कमाल ने बिल्कुल सहज भाव से जवाब दिया। जो सच था, वही बताया। शायद उसे यह भरोसा भी रहा होगा कि अब तो मेरा मजहब भी वही है, जो दिल्ली पर कब्ज़ा करने वाले और खुद को सुलतान कहने वाले इन स्वयंभू हुक्मरानों का है। इसमें आपत्ति जैसा कुछ क्या होगा?

वह जवाब देकर खामोश हो गया, लेकिन बलबन यह सुनते ही सन्नाटे में आ गया। वह गुस्से में आकर फौरन सिंहासन से उठा और चला गया। उसके गुस्से और उसके बुरे नतीजों से भलीभांति वाकिफ दरबार के अधिकारी मारे डर के बेसुध हो गए। जाने अब क्या हो? वे भी तब तक यह नहीं समझ पाए कि कमाल महियार काे लाकर उनसे क्या गुस्ताखी हो गई है।

कमाल महियार को चुनकर लाने वाले पाँचों अधिकारियों को बलबन ने तलब किया। वह बहुत गुस्से में बोला

“तुम सब याद रखना कि इसके बाद किसी अधिकारी ने कोई ऊँचा पद किसी नीच, कमीने या चरित्रहीन, चाहे वह कितना ही काबिल क्यों न हो, देने के लिए मेरे सामने पेश किया तो ऐसा सबक सिखाऊँगा कि संसार वाले भी तालीम हासिल करेंगे।”

ये सुलतान गयासुद्दीन बलबन के अल्फाज़ हैं, जो जियाउद्दीन बरनी ने दर्ज किए हैं। अब सोचिए, कमाल महियार का कुसूर क्या था? अगर उसका कोई कुसूर था तो सिर्फ इतना था कि वह एक ऐसे हिंदू गुलाम का बेटा था, जो हाल ही में मुसलमान बना होगा। हालात जो भी रहे हों।

यह दिल्ली में धर्मांतरण का एकदम शुरुआती नामजद प्रसंग है, जो सिर्फ इस वजह से दस्तावेजों में दर्ज हो गया, क्योंकि उसे सीधे सुलतान के सामने एक अहम ओहदे के लिए प्रस्तावित किया गया था। लेकिन बलबन की नज़र में मजहब बदल लेना भर काफी नहीं था। वह तो ऐसी सज़ा थी, जो जीते-जी भुगतनी ही थी।

फिर इन मजहब बदल लोगों की औलादों की पहचान पैदाइशी तौर पर ही बदली हुई होनी थी। यानी पीढ़ियों को यह सजा अंधों की तरह ढोनी थी। मगर मामला इतना साफ भी नहीं था कि सिर्फ नाम बदलने भर से आप उनकी हुकूमत में दरबार में बराबरी से बैठने के हकदार हो जाएँ। बलबन को हिंदुस्तानी मूल के लोगों (भले उन्होंने मजबूरी में या खुशी-खुशी इस्लाम कुबूल कर लिया हो) से यह नफरत विरासत में मिली थी। वह इल्तुतमिश का गुलाम था, जो इल्तुतमिश के बेटे नासिरुद्दीन की हत्या कर खुद सुलतान बन बैठा था।

मैंने शुरू में कहा कि भारत में हर कहीं इस नई धारा की शुरुआत हमलों, लूटपाट, खूनखराबे और मारकाट से ही होती है। इस्लाम का नाम लेकर कोई दयावान संत, भिक्षु या साधु अपने धर्म का प्रचार करने यहाँ नहीं आया, न ही वे व्हेनसांग की तरह भारतीय मूल की किसी धार्मिक धारा की शिक्षा प्राप्त करने के मकसद से आए हुए जिज्ञासु थे। उनके हाथों में तलवार, आंखों में उतरा हुआ खून, भारत जैसे मालामाल मुल्क की दौलत को हथियाने की हवस और सत्ता पर किसी भी तरह काबिज होने का जानलेवा जुनून हर सदी में छाया हुआ था।

मैं जब देखता हूँ कि पाकिस्तान ने अपनी मिसाइलों के नाम गौरी और गज़नवी के नाम पर रखे हैं तो पाकिस्तान के ‘माइंड सेट’ के बारे में सोचता हूँ। खुद को सुलतान-बादशाह कहने वाले बेरहम हमलावर-लुटेरों से अपनी बल्दियतें जोड़कर फख्र महसूस करने वाले आज के इस उपमहाद्वीप के सारे मुसलमानों को ये ब्यौरे ज़रूर पढ़ने चाहिए। शायद वे अपनी याददाश्त पर जमी धूल के पार अपने असली अपमानित पुरखों की शक्ल अपने जेहन में ताजा कर सकें।

बलबन ने ही अपने दरबार में धर्मांतरित हिंदुओं के बारे में एक किस्सा सुनाया था। गौर फरमाइए कि वह क्या कह रहा है। वह शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के समय का एक गज़ब का तजुर्बा सुना रहा है। उसका हर शब्द बहुत गौर करने लायक है-

“मेरे मालिक सुलतान शमसुद्दीन ने अपने बड़े बेटे शहजादा नासिरुद्दीन को कन्नौज की अक्ता प्रदान की तो ख्वाजा अजीज़ को नियाबत, निज़ामुलमुल्क जुनैदी को ख्वाजगी और जमालुद्दीन मरजूक को टकसाल का अधिकारी बनाया। इन नियुक्तियों के बाद जब नायब और ख्वाजा के लिए खिलअत प्रदान की गई और पाबोस (चरण चूमना) की इजाज़त मिली।

तब मंत्री अजीज बहरोज ने जमाल मरजूक की तरफ इशारा करके एक शेर पढ़ा-किसी कमीने के हाथ में कलम मत दो, क्योंकि इससे आकाश को इस बात का साहस हो जाता है, कि काबे में जो काला पत्थर है, उसे इस्तिंजे का पत्थर बना दे…

सुलतान शमसुद्दीन समझ गया कि यह शेर नीच जमाल मरजूक के बारे में पढ़ा गया है। उसने नायब निजामुलमुल्क जुनैदी को बुलाकर जमाल मरजूक के बारे में पूछताछ कराई। पता चला कि वह कुलीन मुसलमान नहीं है। जुनैदी ने अपनी सिफारिश में कहा कि जमाल का लेखन बहुत अच्छा है। वह पढ़ा-लिखा है। सुलेख में दक्ष है।

इस दलील पर सुलतान बहुत गुस्सा हुआ। उसने कहा, नीच लोगों को उनकी काबिलियत के कारण पद देकर मेरे राज्य के ऊँचे ओहदे इनके द्वारा बरबाद करते हो। नाराज़ सुलतान ने हुक्म दिया कि अब तक शाही महकमों में ऐसे कितने नीच लोग नियुक्त हो चुके हैं। बड़ी पूछताछ के बाद ऐसे 33 लोगों का पता चला। उनके नाम सुलतान के सामने पेश किए गए। सबको फौरन पद से हटा दिया गया।

जिस समय यह जाँच-पड़ताल चल रही थी। दो बड़े अफसरों ने कहा कि जो नीच तबके से थे, उन्हें तो हटा दिया अब ज़रा नायब के मूल वंश की पूछताछ का हुक्म भी दे दिया जाए। अगर उसकी अपनी नसों में नीचता का लहू न होता तो वह हर्गिज़ ऐसे नीच वंश के लोगों को ऊँचे पद न देता।

जब नायब निज़ामुलमुल्क जुनैदी के खानदान की पड़ताल की गई तो पता चला कि उसके पुरखे हकीकत में हिंदुस्तानी जुलाहे थे। नीच और नाकाबिल लोगा को ऊँचे पद देने से इतना बड़ा पदाधिकारी भी दरबार में बेइज्ज़त हो गया और वह जुलाहे के रूप में ही मशहूर रहा।”

अब आप इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी की कलम से उसी दौर में लिखे गए इस किस्से को फिर से पढ़िए। बरनी के जरिए सुलतान इल्तुतमिश के दरबार में हम 33 ऐसे लोगों से रूबरू होते हैं, जो हिंदुस्तानी मूल के थे लेकिन वे अपना मजहब बदल चुके थे।

इनमें से जमाल मरजूक का नाम बाकायदा दर्ज किया गया है। बाकी सिर्फ एक संख्या हैं। हमें नहीं पता कि उनके नाम क्या हैं और वे कहा के थे, किन जाति समूहों से थे और कैसे हालात में उन्होंने इस्लाम कुबूल किया था। इस जगह जमाल मरजूक की शैक्षणिक योग्यता सुलतान को बताई जा रही है कि वह लेखन में हुनरमंद है। तालीमयाफ्ता है। जिम्मेदारी निभाने के काबिल है।

धर्मांतरण को एक तरफ छोड़ दें तो बाकी 33 भी किसी न किसी काबिलियत से ही उनके पदों पर रखे गए होंगे। इससे यह भी पता चलता है कि तलवार के जोर पर सत्ता भले ही हथिया ली गई हो लेकिन हुकूमत चलाने के लिए इन जाहिल जत्थों को भी स्थानीय जानकारों की ज़रूरत थी। लेकिन उनके ठोस और जड़ दिमागों पर एक ऐसा विचार हावी था, जिसे वे इस्लाम कहते थे। एक ऐसा विचार, जिसमें किसी दूसरे को कोई जगह नहीं है, कोई रहम नहीं है।

अब आप ज़रा समय पर नज़र रखिए कि यह कबकी बात है। जमाल मरजूक की शिनाख्त का किस्सा तब का है जब पृथ्वीराज चौहान का शासन महज 17 साल पहले ही खत्म हुआ था। कुतबुद्दीन ऐबक के लाहौर में मरने के बाद 1210 में शम्सुद्दीन इल्तुतमिश सुलतान बना।

ये जो 33 हिंदुस्तानी धर्मांतरित मुसलमान उसके दरबार में थे, ये या इनके पिता उस संक्रमण काल के साक्षी रहे होंगे। वे पृथ्वीराज चौहान के समय भी किसी न किसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी या राजधानी में किसी न किसी काबिल हैसियत के ही रहे होंगे, जो सत्ता के बदलते समीकरणों में अपनी हैसियत को बरकरार रखने के लिए या तलवार के जोर पर मुसलमान बन गए होंगे। वजह जो भी हो, उनका मुसलमान बनना ही काफी नहीं था।

हमने देखा कि यह पता चलते ही कि ये तो हिंदू थे, इल्तुतमिश और बलबन दोनों का रुख कैसे बदल जाता है। उन्हें यह भी चिंता नहीं थी कि इन अनुभवी और योग्य लोगों के बिना शासन की जरूरतें पूरी कैसे होगी? उन्हें तुरंत हटा दिया गया। इसके बाद ये किरदार इतिहास से गायब हैं। हमें पता नहीं चलता कि ये 33 लोग कहां गए? क्या वे मुसलमान ही बने रहे या हिंदू धर्म में लौट आए? भारत में इस्लामी इतिहास के विवरण उन्हंे इल्तुतमिश और बलबन के दरबार में ही बेइज्जत छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं।

ये दोनों क्रूर सुलतान पहली पीढ़ी के तुर्क हमलावर थे, जिन्होंने दिल्ली को रौंदा। वे हिंदुस्तान में पैदा नहीं हुए थे और उनकी नज़र में हिंदुस्तानी लोगों की हैसियत नीच और कमीने की थी, भले ही सज़ा के तौर पर उन्होंने इस्लाम कुबूल ही क्यों न कर लिया हो। बलबन ने बिल्क्ुल यही शब्द प्रयोग किए हैं- “नीच और कमीने”।

यह तो हुआ एकदम स्पष्ट जहरीला नस्ली भेदभाव, जो एक ऐसी विचारधारा के अनुयायियों के दिमागों में भरा था, जिसका दावा इंसानी बराबरी का है, जो यह मानती है कि एक अल्लाह के सामने आकर सब बंदे बराबर हैं। कोई छोटा-बड़ा नहीं है। उसकी इबादत में सब बराबर हैं। आजाद भारत के जो बुद्धिजीवी इतिहासकार यह मानते हैं कि इंसानी बराबरी के सिद्धांत ने ही ऊँच-नीच में बँटी भारत की उपेक्षित जातियों को इस्लाम की तरफ खींचा, उन्होंने भी इस असलियत से आंख फेरकर रखी। असलियत यही थी।

मैं पूछता हूँ कि आज के उत्तरप्रदेश में गाज़ीपुर, मऊ और बलिया के इलाके के जुलाहे अपने पुरखों में क्या निज़ामुलमुल्क जुनैदी को याद करना नहीं चाहेंगे, जो पहले-पहल धर्मांतरित जुलाहों की बदकिस्मत पीढ़ी में से था और जिसे मंत्री पद तक मिला लेकिन एक मेहनतकश और हुनरमंद जुलाहे की पहचान ज़ाहिर होते ही वह अचानक एक नीच और कमीना हिंदुस्तानी हो गया।

बेइज्ज़ती के तौर पर बदले हुए मजहब की सजा में यह जलालत और उसके हिस्से में बदी थी? क्या वह आज के अंसारियों का असली पुरखा नहीं है? इस सच्चाई को जानकर हमलावरों से अपनी पुश्तों को जोड़कर फख्र महसूस करने वालों में शर्म का बचा हुआ आखिरी कतरा आँखों से बहना चाहिए।

कमाल महियार का बाप हिंदू था। उसके और भाई-बहन, नाते-रिश्तेदार भी रहे ही होंगे। हाे सकता है वे हिंदू ही बने रहे होंगे और अफरातफरी से भरी दिल्ली से अपना धर्म बचाने के लिए कहीं और पलायन कर गए होंगे, जो कि उस दौर में आबादी के उथल-पुथल का एक आम कारण था या हो सकता है वे दिल्ली में ही बने रहे होंगे। हो सकता है उन्होंने निजामुलमुल्क जुनैदी जैसों को सत्ता के निकट ताकतवर होता देख बाद में खुद भी धर्म बदल लिया हो।

दो-चार पीढ़ी के बाद जब खिलजी या तुगलकों ने दिल्ली पर कब्जा किया होगा और गुलाम वंश के शासकों का खात्मा हुआ होगा तब तक जुनैदी और महियार के वंशज भी न सिर्फ एक पीढ़ी पुराने मुसलमान हो चुके होंगे बल्कि उनकी अगली पीढ़ियों में अपनी पुश्तैनी असलियत घिसी-पिटी याददाश्त में दर्ज एक किस्सा भर रह गई होगी! हो सकता है आगे की पीढ़ियों ने जुनैदी को सुलतानों के नायब के रूप में फख्र से याद रखा हो और खुद को ‘शाही’ वंश से होने का वहम पाले रही हो।

आज जब हम 800 साल पहले के इन दृश्यों में घूमते हैं तो ऐसे कई किंतु-परंतु जेहन में उठ खड़े होते हैं। मैं अक्सर सोचता हूँ कि आज के मुसलमानों में कितने जुनैदी के ही वंशज होंगे, कितनों की रगों में महियार-मरजूक और उन 33 अज्ञात लोगों का खून बह रहा होगा, जो इल्तुतमिश के दरबार से बेइज्ज्ज़त करके निकाले गए थे अौर बलबन ने जिन्हें नीच और कमीना कहकर दुत्कारा था! अपने उन बदकिस्मत पुरखों के हम नाम तक नहीं जानते।

मजहब का वह बदलाव एक सजा के तौर पर थोपा गया था। भूली हुई याददाश्त ने उसे एक ठोस व्यवस्था बना दिया, जो मिश्रित परंपराओं के साथ एक संगठित जातीय समूह में बदलती गई। मेरा मानना है कि 15 अगस्त 1947 को गुलामी के 1,000 साल लंबे दौर की हर सजा अपने-आप ही माफ हो चुकी थी। वे जबरन बदले हुए नाम और मजहब की कैद में बने हुए हैं।

भारत में 70 साल के सेकुलर सिस्टम ने इन समूहों को अपनी असल जड़ों से जोड़ने की बजाए उनकी भूली हुई याददाश्त को और भटकाए रखा। अब ये समूह बचे-खुचे भारत में वोट बैंक की शर्मनाक पहचान बनकर रह गए। पाकिस्तान तो इस्लाम के नाम पर ही बना और वह अब तक इस भुलावे में है कि वे गजनवी-गौरी के वारिस हैं, जिन्हांेने सात सौ साल तक हिंदुस्तान पर हुकूमत की।

वे कब समझेंगे कि 700-800 सालों का उनका  इतिहास एक वहम है, वह कहीं से गौरवशाली तो बिल्कुल ही नहीं है। वे इतिहास की जीती-जागती एक ऐसी सच्चाई हैं, जो भरे मन, रुंधे गले और डबडबाती आंखों से कुबूल होना चाहिए। पीठ फेरने से सचाई थोड़े ही बदलती है। इतिहास तो सबका गवाह है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com