भारती
रियल एस्टेट पर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का प्रभाव, नवी मुंबई और नोएडा के उदाहरण

रियल एस्टेट (अचल संपत्ति) के बाज़ार में पिछले कुछ समय से मंदी देखी गई थी लेकिन आर्थिक मंदी के अलावा इसका एक बड़ा कारण स्वयं बिल्डर थे। उसके बाद जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) और रेरा (रियल एस्टेट विनियमन और विकास अधिनियम) बिल्डरों पर शिकंजा कसने के लिए लाए गए।

लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और शुरुआती रूप से तो इन सुधारों ने मंदी को बढ़ाया ही। मगर अब हम पिछले कुछ समय के अचल संपत्ति ट्रेंड को भारत के मेट्रोपॉलिटन शहरों में देखेंगे तो कोलकाता को छोड़कर सभी जगह उछाल पर हैं।

एक और बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कि किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना का रियल एस्टेट पर क्या असर होता है। अर्थव्यवस्था का चालक होने के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र-विशेष की अचल संपत्ति के मूल्य को भी बढ़ाता है।

इस लेख में हम दो महानगरों के ऐसे क्षेत्र के उदाहरण देखेंगे जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के कारण रियल एस्टेट पर प्रभाव पड़ रहा है। एक ओर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में बना रहा जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, वहीं दूसरी ओर मुंबई में कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ निर्माणाधीन हैं।

जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा का प्रभाव

दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय (आईजीआई) हवाई अड्डे और गाज़ियाबाद के हिंडौन हवाई अड्डे के बाद एनसीआर में जेवर तीसरा हवाई अड्डा होगा। इसके लिए वित्तीय वर्ष 2020 में योगी सरकार ने 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।

2023 तक अपेक्षाकृत पूरा होने वाला यह हवाई अड्डा मंदी में चल रहे रियल एस्टेट को नोएडा में उबारेगा। संपत्ति बाज़ार में नई ऊर्जा के आने के साथ-साथ अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास भी देखने को मिलेंगे।

आईजीआई हवाई अड्डे की तरह जेवर में भी एयरोसिटी बनाई जाएगी। 2025 तक इसे दिल्ली मेट्रो की एक्वालाइन से जोड़ने की योजना पर विचार चल रहा है। हवाई अड्डे को राष्ट्रीय राजधानी में स्थित एक बड़े बस ट्रांज़िट स्टेशन, सराय काले से भी रैपिड रेल ट्रांज़िट सिस्टम के माध्यम से जोड़ा जाएगा। भविष्य में जेवर हवाई अड्डे को पूर्वी पेरिफेरल एक्सप्रेसवे से भी जोड़ा जा सकता है जो दिल्ली को बाइपास करता हुआ हरियाणा के पलवल को कुंडली से जोड़ता है ।

उत्तर प्रदेश रेरा के अनुसार इस क्षेत्र में लगभग 100 परियोजनाएँ अटकी हुई हैं। इस परियोजना का प्रभाव ज़मीनी स्तर पर दिखने भी लगा है। विकास कार्यों को देखते हुए इस क्षेत्र में संपत्तियों के दाम काफी बढ़ गए हैं।

भूमि स्वामी इस अंतर को महसूस कर पा रहे हैं। पहले जहाँ 1 बीघा ज़मीन 4-5 लाख रुपये में बिकती थी, अब उसका मूल्य 20-25 लाख रुपये को छू रहा है। एक बीघा में 843 स्क्वायर मीटर (स्क्व. मी.) होते हैं।

इस परियोजना के लिए जिन किसानों की भूमि अधिग्रहित की गई है उन्हें क्षेत्र की कीमत का तीन गुना दिया जा रहा है। वर्तमान में भूमि का मूल्य 900 रुपये प्रति स्क्व. मी. है लेकिन किसानों को 2,300 रुपये प्रति स्क्व. मी. दिए जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने ज़मीन के बदले कुल 3,000 करोड़ रुपये दिए हैं। ये ज़मीनें छह गाँवों से ली गई है- दयनातपुर, रणहेरा, बनवारीबास, किशोरपुर, रोही और परोही। एक बीघा के लिए 21 लाख रुपये दिए गए हैं।

नोएडा के क्षेत्र में इस प्रकार का बड़ा परिवर्तन 2001 से देखने को मिला था जब दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाईवे बना। उस समय एक औद्योगिक क्षेत्र रहा नोएडा आज व्यवसायिक और आवासीय क्षेत्र में परिवर्तित हो चुका है।

दिल्ली-नोएडा डायरेक्ट फ्लाईवे

इसके बाद दिल्ली मेट्रो और आगरा से जोड़ने वाले यमुना एक्सप्रेसवे के बन जाने के बाद नोएडा के दक्षिणी क्षेत्र में भी विकास देखने को मिला और यह क्षेत्र ग्रेटर नोएडा बना। गाज़ियाबाद के राज नगर एक्सटेंशन में भी हिंडोन एलिवेटेड रोड के बनने के बाद अचल संपत्ति के मूल्य में बढ़त देखी गई।

नवी मुंबई में रियल एस्टेट की स्थिति

नवी मुंबई को 1970 से स्थापित किया जा रहा है लेकिन यह प्रयास कभी भी पूर्ण रूप से सफल संयोजकता के अभाव के कारण नहीं हुआ। मुंबई लोकल की ट्रांस हार्बर लाइन से तो नवी मुंबई को जोड़ा गया लेकिन इसकी क्षमती सीमित थी और सड़क संयोजकता भी ट्रैफिक जामों से ग्रसित होती रही।

इस कारण एक सहयोगी शहर की तरह विकसित होने की बजाय जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) के स्थापित होने के कारण केवल बंदरगाही गतिविधियाँ ही नवी मुंबई हो पाईं।

वाशी पुल, सायन-पनवेल राजमार्ग, मुलुंद-एरोली पुल और ठाणे-बेलापुर रोड पर कालवा पुल जैसी परियोजनाएँ संयोजकता बढ़ाने के लिए पूरी हुईं और उसके बाद नवी मुंबई में व्यावसायिक क्षेत्र विकसित होने लगे। लेकिन यह भी अपेक्षा से कम रहा क्योंकि मुंबई के उप-नगरीय क्षेत्रों के विकल्प उपलब्ध थे।

मुलुंद-एरोली पुल

लेकिन अब तीन परियोजनाएँ हैं जो नवी मुंबई के विकास को बल दे सकती हैं- नवी मुंबई मेट्रो की लाइन 1, मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (एमटीएचएल) और नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा।

बेलापुर से खांडेश्वर के बीच 23.4 किलोमीटर लंबी मेट्रो लाइन बनाई जा रही है। इस मार्ग पर 20 स्टेशन होंगे व परियोजना की अनुमानित लागत 4,163 करोड़ रुपये है। इसका टेस्ट ट्रायल हो चुका है और अप्रैल 2020 तक सेवाएँ शुरू होने की अपेक्षा है।

दूसरी परियोजना है मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ने वाले 21.8 किलोमीटर लंबा समुद्री पुल एमटीएचएल की। 18,000 करोड़ रुपये की अनुमानि लागत से बनने वाली यह परियोजना निर्माणाधीन है जिसकी 2022 तक पूरा होने की अपेक्षा है।

यह पुल नवी मुंबई में चिरले पर जाकर मिलेगा। यहाँ से उसकी तीन शाखाएँ बँटेंगी- एक जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) की ओर जाएगी, एक नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर और तीसरा मुंबई-गोवा राजमार्ग की ओर।

तीसरी परियोजना है नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा। इसके लिए 1,160 हेक्टेयर की भूमि का अधिग्रहण करने के बाद एल एंड टी को ईपीसी (अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण) अनुबंध सौंप दिया गया है। इस परियोजना का संचालन जीवीके समूह कर रहा है।

मुंबई अर्बन ट्रांस्पोर्ट प्रोजेक्ट-3 के अंतर्गत जो नए रेलवे स्टेशन बने हैं उनका प्रभाव भी रियल एस्टेट पर देखने को मिला है। 2018 में ही 12 किलोमीटर लंबा पहला भाग खोल दिया गया था। उरण तक कुल 27 किलोमीटर लंबी एमयूटीपी-3 का दूसरा चरण 2020 के अंत तक पूरा कर लिया जाएगा। मेट्रो लाइन 2बी को भी बढ़ाकर नवी मुंबई तक ले जाने का प्रस्ताव है लेकिन अभी इसे स्वीकृति नहीं मिली है।

इस प्रकार चिरले और उलवे दोनों ही क्षेत्रों के रियल एस्टेट में एमटीएचएल व एमयूटीपी-3 के कारण उछाल देखने को मिलेगी। वहीं एमयूटीपी-3 का प्रभाव चिरले को पनवेल से जोड़ने वाली रोड के आसपास के रियल एस्टेट पर भी पड़ेगा।