भारती
इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश आकर्षण 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिए आवश्यक

प्रसंग- 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था की लक्ष्य-प्राप्ति के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश आवश्यक।

जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषमा की है कि 2024-25 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लक्ष्य 5 ट्रिलियन डॉलर रखा गया है, तब से यह संदेह बना हुआ है कि वर्तमान में 3 ट्रिलियन डॉलर के आसपास वाली भारतीय अर्थव्यवस्था क्या इस गति से बढ़ रही है कि इस लक्ष्य को पूरा कर पाए।

इस दिशा में जो आशा कि किरण दिख रही थी, वह यूएस-चीन के व्यापार युद्ध और हाल में फैल रहे कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण धुंधली पड़ गई है व विश्व के सभी बाज़ार नीचे गिर रहे हैं।

5 ट्रिलियन डॉलर के जीडीपी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अगले पाँच वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था को 9 प्रतिशत की दर से लगातार बढ़ना होगा। अंतर्राष्ट्रीय मोनेटरी फंड (आईएमएफ) ने जनवरी 2020 में भारत की वृद्धि दर को 130 बेसिस पॉइंट से आँकते हुए 2019-20 के लिए 4.8 प्रतिशत बताया।

वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक के अद्यतन में कहा गया कि भारत की वृद्धि “गैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र में तनाव और ग्रामीण आय में मंद वृद्धि” के कारण काफी धीमी पड़ गई है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) ने अपनी भविष्यवाणी में 2019-20 के लिए भारत की वृद्धि में कोविड-19 के कारण 110 बेसिस पॉइंट की कटौती कर 5.1 प्रतिशत दर की बताई है।

क्या वृद्धि दर मायने रखती है?

क्या हम जीडीपी अंकों को अधिक महत्त्व देते हैं या हमें अन्य आर्थिक जाटा बिंदुओं को भी देखना चाहिए? पहला है सार्वजनिक और निजी निवेश की गति। दूसरा है नई आय और रोजगार के अवसरों की वृद्धि दर जैसे ई-कॉमर्स, टैक्सी जैसे क्षेत्रों से उत्पन्न हो रहे अवसर। तीसरा है प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि।

तरलता एक बड़ी चुनौती है जिसका सामना भारत कर रहा है। इसी कारण सीमित धन हाथ में रहता है। बैंकिंग क्षेत्र का तनाव चक्रीय होने की बजाय संरचनात्मक है। 2004-2014 के बीच बैंकिंग क्षेत्र को काफी क्षति पहुँची। गैर-बैंकिंग वित्त क्षेत्र भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के कारण तनाव में हैं।

भारत सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए राशि उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (एनआईआईएफ) गठित किया गया जिसमें अबू धाबी निवेश प्राधिकरण, तेमासेक ऑफ सिंगापुर और एचडीएफसी समूह जैसे निवेश हैं।

एनआईआईएफ की वेबसाइट का मुखपृष्ठ

सरकार ने 100 ट्रिलियन रुपये (1.4 ट्रिलियन डॉलर) इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए घोषित भी किए हैं जिसमें ऊर्जा, रेलवे, शहरी विकास, सिंचाई, परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्रो पर पैसे खर्च किए जाएँगे।

भारत के सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों को बेचने और सरकार के विनिवेश के प्रयासों को उत्साहजनक संकेत मिले हैं। इस वर्ष के लिए प्रस्तुत केंद्रीय बजट में सरकार ने 2021 तक 2.1 ट्रिलियन डॉलर के विनिवेश का लक्ष्य रखा है।

इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निवेश आकर्षित करना

पहले ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने में हमें 60 वर्ष लगे, अगले ट्रिलियन डॉलर के लिए 10 वर्ष और अब लगभग तीन वर्षों में हम 2 से 2.9 ट्रिलियन डॉलर पर पहुँच गए हैं। ऐसे पाँच वर्षों में 2 ट्रिलियन डॉलर और प्राप्त करना संभव है। अनिवार्य शर्त यह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में निवेश आकर्षित किया जाए। 2005 से 2015 के दशक में लगभग ट्रिलियन डॉलर का निवेश देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में हुआ।

दूसरे ट्रिलियन डॉलर का निवेश हो सकता है अगर हम कुछ चीज़ें सही करें। अगले कुछ वर्षों में विश्व के चार सबसे बड़े मेट्रो फूटप्रिंटों में से तीन चीन और भारत में होंगे, चौथा टोकियो में जो लंदन और न्यू यॉर्क को पीछे छोड़ देंगे। अगर भारत सही दिशा में निवेश आकर्षित कर पाया ता 5 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी का लक्ष्य पहुँच से बाहर नहीं है।

पीपीपी के दुरुपयोग की विरासत

पिछले दशक में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल का दुरुपयोग हुआ जिसके कारण वैश्विक निवेश प्रोत्साहित नहीं हो पाया। भारत में पीपीपी टीटीटी बन गया यानी कि टैक्सपेयर टू टाइकून ट्रांसफर (करदाता से उद्योगपति)। इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की लागत को बढ़ाकर दिखाया जाता था और बैंक से ऋण लेकर निजी क्षेत्र परियोजना के क्रियान्वित होने से पहले ही कमाई कर लेता था।

निजी साझेदार तब ही परियोजना में बना रहता है जब सकारात्मक नकद का प्रवाह बना रहे। घाटे में जाने पर ये साझेदार पल्ला झाड़कर चले जाते थे और बैंकों को अशोधित ऋण की समस्या से गुज़रना पड़ता था। ऐसे अधिकांश पीपीपी मॉडल 2006 से 2012 के बीच हुए जिससे बैंकों के एनपीए बढ़े और ये अभी भी समस्या बने हुए हैं। इन बैंकों का पूंजी पोषण फिर करदाताओं के पैसे से होता है।

पीपीपी 2.0 की आवश्यकता

आवश्यक है कि नए स्वरूप के साथ पीपीपी मॉडल फिर से उभरे। एक विकल्प यह हो सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियजोनाओं को सरकारी खर्चे पर बनाया जाए जो दीर्घकालिक समाधान बन सकता है और तैयार हो जाने के बाद निजी क्षेत्र का संचालन का दायित्व दे दिया जाए जो इसके नकद प्रवाह से कमा सकें। मुंबई और नई दिल्ली हवाई अड्डे इसका बड़ा उदाहरण हैं जिन्हें सार्वजनिक पैसों से बनाया गया और संचालन के लिए निजी कंपनियों को दे दिया गया।

मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

नकद प्रवाह बनाम निर्माणाधीन संरचनाओं की दुविधा

विदेशी निवेशक नकद प्रवाह वाली परियोजनाओं जैसे बने हुए हवाई अड्डे, आदि में रुचि रखते हैं। हाल ही में सरकार ने परियाजनाओं का निरीक्षण बढ़ा दिया है जिसमें राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपालाइन पर नज़र रखी जा रही है, परियोजनाओं के क्रियान्वयन, बोलियों और सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता बढ़ाई गई है। शीर्ष निजी कंपनियों को जोड़ना और अन्य बाज़ारी तंत्रों को विकसित करना जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश कंपनियों का गठन, उदाहरण- एनआईआईएफ भी महत्त्वपूर्ण कदम हैं।

निर्माणाधीन परियोजनाएँ निवेशकों को आकर्षित नहीं करती क्योंकि इसमें खतरा होता है। पहले से नकद का प्रवाह कर रही परियोजनाएँ आकर्षक होती हैं क्योंकि उनमें अगले 30 वर्षों तक कमाई की प्रबल संभावना रहती है।

उदाहरण स्वरूप मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के दूसरे टर्मिनल को देखें जिसका निर्माण एक निजी साझेदार जीवीके पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर ने किया है और इसी कंपनी ने नवी मुंबई में ग्रीनफिल्ड हवाई अड्डे के निर्माण की बोली जीती लेकिन विदेशी निवेश को आकर्षित करने में इस समस्या होगी क्योंकि निर्माणाधीन होने के कारण इसका दायित्व बड़ा है।

हाल के सौदों को देखें तो संपत्ति उत्सर्जन करने वाली परियोजनाएँ माँग में हैं। पिछले अक्टूबर एनआईआईएफ और इसके साझेदारों ने जीवीके समूह में 26.3-26.3 प्रतिशत की इक्विटी का सौदा किया जिसका कुल मूल्य 1 अरब डॉलर है।

सरकार को निवेशकों के लिए नकद प्रवाह का विकल्प खोलना होगा जैसे रेलवे स्टेशन जहाँ पहले से नकद प्रवाह है। 3 लाख से अधिक लोगों को सेवा देने वाले रेलवे स्टेशन किसी भी निजी निवेशक के लिए दुधारू गाय सिद्ध हो सकते हैं।

नगरीय परिवहन में भी ऐसा देखने को मिल रहा है जहाँ कई शहर अपना मेट्रो स्वयं बना रहे हैं और अगले 10 वर्षों में कम से कम 25 शहरों में मेट्रो होगी।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य प्राप्य है यदि इंफ्रास्ट्रक्चर को नीति के केंद्र में रखा जाए तो। इसके साथ विदेशी निवेश भी भारत आएगा जो नकद प्रवाह और प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा।