भारती
परिवारवाद और व्यक्तिवाद से अलग हैं भारतीय पारिवारिक मूल्य- कुरल भाग 22

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए गए तिरुवल्लुवर के कुछ चयनित कुरल परिवारवाद और व्यक्तिवाद के विषय में बताते हैं। 

तमिल शास्त्रों में संबंधियों और आप पर निर्भर करने वालों से प्रेम बनाए रखने के कर्तव्य पर ज़ोर डाला गया है। अपनी संपत्ति से उन्हें खिलाने-पिलाने और पहनाने-ओढ़ाने पर खर्च करना नैतिकता मानी जाती थी। लेकिन 19वीं सदी के समाज सुधारकों ने माना कि यह व्यक्ति और राष्ट्र की प्रगति में बाधक है।

जीवन के आर्थिक-सामाजिक आधार और व्यक्तिवाद में संघर्ष को भारतीय संस्कृति में न नकारा गया, न ही पूरी तरह स्वीकार किया गया। व्यक्ति और उसके संबंधी एक इकाई हैं और इन इकाइयों से बनकर समाज बनता है।

इस इकाई के सदस्य आपस में सबकुछ बराबर बाँटते थे। हर व्यक्ति से अपेक्षा की जाती थी कि वह नैतिकता के दायरे में और परिवार प्रमुख के निर्देशानुसार, अपनी क्षमता के अनुरूप काम करे। दूसरों से कम संपत्ति में योगदान देने के बावजूद उसे सबसके साथ बराबरी से रहने का अधिकार होता था। इस प्रकार इस छोटी इकाई में समाजवाद स्थित था।

ये इकाइयाँ आपस में प्रतिस्पर्धा करती थीं। इस प्रकार संबंधों के आधार पर बने समूहों के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी। विधिवत रूप से किसी के लिए इस इकाई में रहना अनिवार्य नहीं होता था। लेकिन जब तक वह उनके साथ रहता था, तब तक उसकी देखभाल बाकी लोगों की तरह ही की जाती थी।

अधिक कमाने वाला जो व्यक्ति अपने स्वार्थों के लिए परिवार को छोड़ देता था ताकि उसे अपनी कमाई साझा न करनी पड़े, उसे दोष की दृष्टि से देखा जाता था और परंपरा के विरुद्ध माना जाता था। इस प्रकार इस तंत्र में कुछ हद तक अप्रत्यक्ष अनिवार्यता थी।

आज राज्य के तंत्र में समाजवाद के सिद्धांत को व्यक्तिवादियों द्वारा चुनौती दी जाती थी। यह समस्या और इसके समाधान भी सहस्रों वर्ष पुराने हैं। यदि परिवार पर निर्भरता के सिद्धांत में कमियाँ हैं तो समाजवाद में भी हैं। इसके समर्थक भी इसकी कमियों को मानते हैं और कहते हैं कि दो बुरी चीज़ों में से एक बेहतर चुनना है व उसमें सुधार करना है।

लेकिन परिवार में सिद्धांत में सुधार करना अधिक आसान है। विश्व पुराने सिंद्धांतों के प्रति उत्सुकता से देख रहा है। यह परिवारवाद नहीं है क्योंकि इसमें राज्य की संपत्ति संबंधियों पर व्यय नहीं की जा रही है, बल्कि अपनी ही वैध संपत्ति से उनकी देखभाल की जा रही है।

परिवारवाद उन देशों में देखा जा सकता है जहाँ लोगों को अपनी संस्कृति से अचानक से अलग किया गया है। ऐसे में उनमें मूल्य बचें हैं कि सगे-संबंधियों की सहायता करनी है लेकिन ऐसा करने के लिए वे गलत मार्ग चुनते हैं जो परिवारवाद का रूप ले लेता है।

संपत्ति को संबंधियों और आप पर निर्भर करने वालों में बाँटना न सिर्फ एक नैतिक मूल्य है, बल्कि जीवन का उद्देश्य भी है। परस्पर समर्थन और दूसरों की सहायता से मिलने वाले सुख से समाज की खुशी सुनिश्चित होती है। कवि इसे एक कौवे से सीखने के लिए कहते हैं।

जब कौवे को कुछ खाने के लिए मिलता है तो वह उसे छुपाता नहीं है, बल्कि अपने साथियों को बुलाता है और फिर काना शुरू करता है। वही व्यक्ति संपन्न होते हैं जो इसे अपनाते हैं।

जो संबंधी आपको छोड़कर चले गए हैं, वे तब लौटकर आ जाएँगे जब आप खुद में वे बातें खोज लें जो वे चाहते हैं और अपनी कमियों को दूर कर लें।

इसलिए जब संबंधी आपको छोड़ें तो आप उन्हें न दोष दें, न उनसे घृणा करें, बल्कि खुद को परखें और कमियों को दूर करें। यदि कोई चला जाता है और प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि स्वार्थ के लिए लौट आता है तो इस कारण से उसे अस्वीकार नहीं करना चाहिए।

उन्हें जो करना है करने दीजिए लेकिन उनपर पुनः विश्वास करने से पहले उन्हें परख लीजिए।

अगले अंक में जारी…

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