भारती
स्वदेशी रक्षा तकनीक को सेना से मिल रहा प्रोत्साहन, ‘मेक इन इंडिया’ आ सकता है काम

गत 19 सितंबर को बेंगलुरु के एचएएल विमान पत्तन से स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस पर उड़ान भरने के बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगले एक दशक में यानी 2029-30 तक भारतीय सुरक्षा बलों के पास उपलब्ध तकनीक का 75 प्रतिशत भाग स्वदेशी होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि वह दिन भी दूर नहीं जब हमारी 100 प्रतिशत रक्षा-तकनीक स्वदेशी होगी। स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार विश्व में रक्षा-उपकरणों का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश भारत है। इसके कुछ समय पहले तक हमारा देश सबसे बड़ा आयातक था। 

एक मोटा अनुमान है कि हम अपनी रक्षा-आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लगभग 60 प्रतिशत आयात पर निर्भर हैं। इस बात के अनेक अर्थ हैं। आयात पर निर्भर रहने से विदेशी मुद्रा जाती है, अक्सर दाम भी ज्यादा देने पड़ते हैं और रक्षा-तकनीक हासिल करने के लिए प्रायः राजनीतिक स्तर पर कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं।

दूसरी तरफ उच्चस्तरीय रक्षा-उपकरणों को हासिल करने की मजबूरी के कारण देश के औद्योगिक-तकनीकी विकास और वैज्ञानिक अनुसंधान पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसी कारण भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में रक्षा तकनीक के स्वदेशीकरण पर ध्यान देना शुरू किया है। सरकार ने इसके लिए 15वें वित्त आयोग के संदर्भों में बदलाव किया है। 

रक्षा-सामग्री का निर्यात

हाल में भारत सरकार ने करीब 50 दूतावासों में तैनात विदेशी सैनिक-सहचारियों (मिलिट्री अताशे) से संपर्क किया है, ताकि भारतीय रक्षा-उपकरणों निर्यात की संभावनाओं का पता लगाया जा सके। भारतीय रक्षा उपकरणों का निर्यात जो 2018-19 में 4,682 करोड़ रुपये (66 करोड़ डॉलर) का था, 2019-20 में बढ़कर 10,500 करोड़ रुपये (1.47 अरब डॉलर) का हो गया। अब सन 2018 में घोषित रक्षा-उत्पादन नीति में सरकार ने सन 2015 तक 5 अरब डॉलर की सामग्री के निर्यात का लक्ष्य रखा है।

 

स्वदेशी विमान तेजस और सुपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस को लेकर कुछ देशों ने हाल में दिलचस्पी दिखाई भी है। दक्षिण पूर्व एशिया में फिलीपींस के साथ बातचीत चल रही है। वियतनाम को हम पहले से रक्षा-उपकरण दे रहे हैं। म्यांमार, मॉरिशस और बांग्लादेश ने भी कुछ सामग्री प्राप्त की है। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुछ देशों के साथ भारत के ने रक्षा-उपकरणों के बाबत संपर्क किया है।

रक्षा-तकनीक के साथ कई प्रकार की संवेदनशीलताएँ जुड़ी होती हैं। विदेश-नीति भी उससे जुड़ती है। सबसे ऊपर बात यह है कि क्या हम उस स्तर की तकनीक विकसित करने में सफल हैं, जिसे हमारी सेनाएँ स्वीकार करें?  

दुनिया के देश उच्चस्तरीय रक्षा तकनीक हासिल करने के कई तरीके अपनाते हैं। विकसित देशों ने रक्षा अनुसंधान-विकास पर भारी रकम खर्च करके वर्षों में तकनीक विकसित की है। रक्षा-तकनीक आसानी से खरीदी-बेची नहीं जा सकती। उसपर सरकारी नियंत्रण होते हैं।

फिर भी विदेशी तकनीक खरीदने का एक रास्ता है। यों कोई भी देश अपनी विशिष्ट तकनीक आसानी से नहीं देता। खरीदे गए विदेशी उपकरणों की रिवर्स इंजीनियरी यानी उनकी नकल से भी उपकरण तैयार होते हैं और तकनीक की चोरी भी होती है। यह रास्ता चीन, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया जैसे देशों ने अपनाया है। भारत में यह संभव नहीं हैं।

तकनीक की उपयोगिता 

रक्षा-तकनीक केवल युद्ध-तकनीक नहीं होती, बल्कि उसकी नागरिक जीवन में भी उपयोगिता होती है। हमारे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने ऐसी औषधियों तथा मेडिकल उपकरणों का विकास भी किया है, जो नागरिक जीवन में उपयोगी है।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हमें जिस पूंजी का इस्तेमाल स्वदेशी उद्योगों के विकास पर लगाना चाहिए, वह विदेशी उपकरणों की खरीद पर खर्च हो जाती है। स्वदेशी औद्योगिक आधार बनेगा, तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। इसके बाद हम अपनी आवश्यकताओं के साथ-साथ विदेशी बाजारों में अपने उत्पादों को भी बेच सकेंगे।  

सन 1958 में पहले से काम कर रही कुछ तकनीकी संस्थाओं के विलय के बाद डीआरडीओ का गठन हुआ था। इसका ध्येय वाक्य है ‘बलस्य मूलं विज्ञानम्।’ यानी ज्ञान और विज्ञान की सहायता से ही हम बलशाली बने रह सकते हैं। देश में रक्षा-अनुसंधान की यह शिखर संस्था है, जो नई तकनीक विकसित कर रही है।

देशभर में इस संगठन की 50 से ज्यादा प्रयोगशालाएँ हैं, जो शस्त्र प्रणालियों, टैंकों और उनसे जुड़े अन्य प्रकार के वाहनों तथा अन्य उपकरणों, माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर उच्चस्तरीय रेडारों, लड़ाकू विमानों, हेलिकॉप्टरों से लेकर युद्धपोतों और उनके उपकरणों, संचार प्रणालियों से लेकर जीवन विज्ञान तक के क्षेत्र में काम कर रही हैं। अग्नि, पृथ्वी, आकाश, नाग, पिनाक, ब्रह्मोस जैसी प्रहार प्रणालियों, तेजस लड़ाकू विमान रुद्र और ध्रुव जैसे हेलीकॉप्टरों, आकाश में शत्रु की गतिविधियों पर निगाह रखने वाली अवॉक्स प्रणाली और अर्जुन युद्धक टैंक तक इसमें शामिल हैं। 

स्वदेशीकरण का प्रस्थान-बिंदु

बुनियादी तौर पर देश में रक्षा उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में ही था। एक तो निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन के साथ जोड़ने की झिझक थी, दूसरे देश का निजी क्षेत्र संसाधनों और तकनीकी गुणवत्ता की दृष्टि से पर्याप्त विकसित भी नहीं था। इस वजह से रक्षा उत्पादन का ज्यादातर काम एचएएल, बीईएल, एमडीएल, जीएसएल, बीईएमएल, जीआरएसई, एचएसएल, बीडीएल और आयुध निर्माणी बोर्ड जैसी विशाल संस्थाएँ विकसित होती गईं।

डीआरडीओ के बन जाने मात्र से रक्षा तकनीक विकसित नहीं हो गई। डीआरडीओ ने 1960 के दशक में ज़मीन से आकाश तक मार करने वाला प्रक्षेपास्त्र (सैम) विकसित करने की परियोजना ‘इंडिगो’ का काम हाथ में लिया। इसमें विशेष सफलता नहीं मिली, फिर इसके बाद 1970 के दशक में छोटी दूरी की सैम और अंतरमहाद्वीपीय प्रक्षेपास्त्र की परियोजनाओं ‘डेविल’ और ‘वैलिएंट’ के काम हाथ में लिए गए। 

अंततः 1982-83 में डॉ अब्दुल कलाम के नेतृत्व में ‘इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल प्रोग्राम (आईजीएमडीपी)’ शुरू हुआ, जिसमें अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग मिसाइलों की परिकल्पना शामिल थी। इस कार्यक्रम में मिली सफलताओं के बावजूद भारतीय सेनाओं और डीआरडीओ के बीच पटरी ठीक से बैठ नहीं रही थी।

इस संगठन की संरचना को लेकर भी सवाल थे। फरवरी 2007 में भारत सरकार ने विज्ञान और तकनीकी विभाग के पूर्व सचिव डॉ पी रामाराव के नेतृत्व में एक समिति को इसके अध्ययन का काम सौंपा, जिसकी रिपोर्ट के बाद इसकी संरचना में बदलाव किए गए। स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास के लिए देश की औद्योगिक संरचना और रक्षा-उद्योगों से जुड़ी नीतियों में बदलावों का क्रम अभी चल ही रहा है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ कार्यक्रमों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। 

सुस्त व्यवस्था

तकनीक के स्वदेशी विकास का संकल्प उतना सरल नहीं है, जितना बाहर से नज़र आता है। हाल में प्रकाशित एक विश्लेषण में बताया गया है कि देश में पिछले छह साल में ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के तहत कम से कम सात परियोजनाएँ अटकी पड़ी हैं।

इसके पीछे कई कारण हैं। इनमें प्रशासनिक प्रक्रियाओं की सुस्ती, तकनीकी और व्यावसायिक पेंच और पर्याप्त राजनीतिक इच्छा-शक्ति की कमी तथा ऐसे ही तमाम कारण हैं। पर इसमें दो राय नहीं कि इन परियोजनाओं की सफलता के साथ तकनीकी स्वदेशीकरण का एक और सूत्र जुड़ा है। वह है उच्चस्तरीय विदेशी तकनीक और देश के निजी क्षेत्र की भूमिका।

महत्वपूर्ण बात यह है कि टाटा, लार्सन एंड टूब्रो, अशोक लेलैंड, महिंद्रा, अडानी, रिलायंस, भारत फोर्ज और निजी क्षेत्र के तमाम दूसरे समूहों को विश्वास है कि आने वाले वर्षों में रक्षा के क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम युगांतरकारी साबित होगा। 

कुछ साल पहले तक की स्थिति थी कि हम युद्धपोत का डिज़ाइन बना सकते थे, पर उन्हें बनाने के लिए विशेष स्टील नहीं बना पाते थे। वह रूस से खरीदा जाता था। पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने वह स्टील बनाकर दिखाया

हाल में खबर थी कि सेल के स्टील को पोत निर्माण में इस्तेमाल की अनुमति मिल गई है। हमारा तेजस विमान पाकिस्तान के जेफ-17 विमान की तुलना में एक पीढ़ी आगे का इसलिए है, क्योंकि उसके ढाँचे में कम्पोज़िट फाइबर का इस्तेमाल हुआ है।

इसके लिए स्वदेशी तकनीक विज्ञान और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की प्रयोगशाला नेशनल एयरोस्पेस लैबोरेटरी ने विकसित करके दी है। कम्पोज़िट फाइबर के कारण तेजस का वजन कम है और वह रडार की पकड़ से अपेक्षाकृत बचा भी रहता है।  

सेनाओं की पहलकदमी

हाल में खबर थी कि वायुसेना ने एचएएल में निर्मित एचटीटी-40 ट्रेनर विमान को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। कुछ साल पहले तक एचटीटी श्रृंखला के विमानों को वायुसेना को समर्थन नहीं मिल पाता था। हमने पिलेटस विमान खरीदा, जो बाद में विवादास्पद साबित हुआ। संभव है कि स्वदेशी तकनीक से निर्मित उपकरण गुणवत्ता में कुछ पीछे हों, पर यदि हम उन्हें स्वीकार ही नहीं करेंगे, तो कौन उन्हें लेगा? उनमें सुधार तभी संभव होगा, जब हम उनका इस्तेमाल करेंगे। 

गत 15 अक्टूबर को डीआरडीओ के एक कार्यक्रम में थलसेना अध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने कहा, “भविष्य के युद्धों में भारतीय सेना स्वदेशी तकनीक से विकसित हुए उपकरणों की मदद से विजय हासिल करेगी।”

इस कार्यक्रम के चार दिन बाद वायुसेना के सह-प्रमुख एमएम नरवाने ने एक कार्यक्रम मे कहा कि वायुसेना स्वदेशी तकनीक का वरण करेगी, भले ही वह सर्वश्रेष्ठ मानकों पर खरी नहीं उतरती हो। उनमें सुधार बाद में भी हो सकता है। वस्तुतः यह एक मनोदशा है, जिससे बाहर निकलना चाहिए। सेनाओं की यह पहलकदमी स्वागत योग्य है।