भारती
परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम खोल रहा नए आयाम, जानें क्या है यह रक्षा परियोजना

एक गंभीर दुर्घटना समेत कई समस्याओं का सामना करने के बावजूद भारत के समुद्री परमाणु कार्यक्रम ने पिछले कुछ वर्षों में बड़ी छलाँगें लगाई हैं। यह देश की सबसे मूल्यवान रक्षा परियोजना है और इसकी सीधी निगरानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कर रहे हैं।

अक्टूबर 2018 मे पहली बार इस परियोजना का खुलासा किया गया था जब भारत ने अपने पहले एसएसबीएन आईएनएस अरिहंत के पहले अवरोध पहरे के पूरे होने की घोषणा की थी। यह एक परमाणु सशक्त पंडूब्बी है जो न्यूक्लियर-टिप्ड बैलिस्टिक मिसाइलों से भी लैस है।

इससे पहले 2017 में अरिहंत श्रेणी का दूसरा जहाज़ आईएनएस अरीघात तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने चुपके से लॉन्च किया था। दूसरी श्रेणी का यह जहाज़ पहले से बड़ा, बेहतर और अधिक शस्त्र क्षमता वाला था।

अरिहंत श्रेणी की परियोजना, जो समनुक्रम गति पर काम कर रही है, को एसएसएन यानी परमाणु सशक्त पंडुब्बियों का नया आयाम मिल गया है। एसएसबीएन में जहाँ न्यूक्लियर-टिप्ड बैलिस्टिक मिसाइलें होती हैं, वहीं एसएसएन में पारंपरिक अस्त्र वाली मिसाइल में होती हैं।

एसएसबीएन पनडुब्बी

2019 में सरकार ने इन पनडुब्बियों के विकास के शुरुआती चरण के लिए 100 करोड़ रुपये दिए थे। शुरुआती डिज़ाइन के चरण में सफलता मिलने के बाद अब इस कार्यक्रम को विस्तृत डिज़ाइन चरण के लिए स्वीकृति मिल गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब सरकार इस परियोजना में अधिक संसाधन लगाएगी।

भारत कुल छह एसएसएन बनाकर 6,000 टन की विस्थापन क्षमता विकसित करना चाहता है।

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सरकार में आने के एक वर्ष बाद 2015 में इस परियोजना को हरी झंडी दिखा दी गई थी। शुरुआती डिज़ाइन का काम 2017 में गुरुग्राम आधारित पनडुब्बी डिज़ाइन केंद्र में शुरू हुआ था और तब से इस परियोजना ने काफी प्रगति कर ली है।

हैदराबाद आधारित राज्य शासित मिश्रा धातु निगम से भारत में ही पोत के लिए एक विशेष धातु मिश्रण विकसित करने को कहा गया है जो पनडुब्बी को अरिहंत श्रेणी के जहाज़ों से समुद्र में और गहरा उतरने में सक्षम बनाए। इन एसएसएन पर जो परमाणु रिएक्टर विकसित किया जा रहा है, वह भी अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बियों से अदिक बलशाली होगा।

एसएसबीएन की तरह ही एसएसएन को परमाणु रिएक्टर से ऊर्जा मिलती है और ये पानी के नीचे लंबे समय तक के लिए रह सकते हैं।  डीज़ल-इलेक्ट्रिक पनुब्बियों यानी एसएसके से काफी लंबे समय तक इनकी पानी के नीचे रहने की क्षमता है। एसएसके को नियमित अंतराल पर अपनी बैट्री चार्ज करने के लिए सतह पर आना होता है जो पानी के अंदर रहते समय उन्हें ऊर्जा देती है।

साथ ही एसएसएन का संचालन एसएसबीएन जितना कठिन नहीं है क्योंकि इनमें न्यूक्लियर टिप्ड मिसाइलें नहीं होतीं।

न्यूज़ रिपोर्टों के अनुसार एसएसएन का एक स्केल मॉडल जल्द ही निर्मित किया जाएगा और डिज़ाइन की त्रुटियों के लिए इसका परीक्षण होगा। इस वर्ष की शुरुआत में रूस से अकुला-2 एसएसएन के 10 वर्ष के पट्टे का 3 अरब डॉलर का समझौता हुआ था। इससे नए विकास में सहायता मिलेगी और साथ ही क्रू को प्रशिक्षित किया जा सकेगा।

अकुला श्रेणी की पनडुब्बी

इन परियोजनाएँ के लिए जो प्रयास किए जा रहे हैं वे अधिकांश रूप से स्वदेशी ही हैं क्योंकि अरिहंत श्रेणी के लिए 60 प्रतिशत उपकरण स्थानीय निर्माताओं से ही लिए जा रहे हैं। लेकिन साथ ही भारतीय नौसेना को रूस के डिज़ाइन व तकनीकी सहयोग का भी लाभ मिला है।

एसएसबीएन को नौसेना में लाने के साथ-साथ एसएसएन पर भी काम जारी रहेगा। आईएनएस अरीघात जो ट्रायल पूरा करने वाला है, 2020 से ही नौसेना को सेवा देना शुरू कर देगा।

अन्य दो एसएसबीएन जिन्हें वर्तमान में एस4 और एस4-स्टार कहा जा रहा है, वे भी विशाखापट्टनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में निर्माणाधीन हैं और 2024 के पहले नौसेना को सेवा देने लगेंगे।

मनु पब्बी की रिपोर्ट के अनुसार अरिहंत श्रेणी के चौथे पोत का संरचनात्मक कार्य पूरा होने वाला है। ये दोनों जहाज़ आईएनएस अरिहंत के 6,000 टन से तो कम से कम 1,000 टन विस्थापन क्षमता अधिक रखते हैं।

ये जहाज़ 3,500 किलोमीटर की दूरी तक आठ के-4 सबमरीन लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) की मारक क्षमता रखती हैं जबकि आईएनएस अरिहंत की क्षमता चार ही है।

पहली श्रेणी के अरिहंत जहाज़ में 750 किलोमीटर दूरी की क्षमता वाले एक दर्जन के-15 सागरिका एलबीएम हैं। के-15 ने सेवा जदेना शुरू कर दिया है, वहीं के-4 का अभी भी परीक्षण चल रहा है।

भारत एसएसबीएन की नई श्रृंखला पर भी कार्य कर रहा है जो अरिहंत श्रेणी से उन्नत है। इसका डिज़ाइन कार्य भी चल रहा है। एस-5 के नाम से जानी जाने वाली इस नई पनडुब्बी की विस्थापन क्षमता 13,500 टन है जो अरिहंत श्रेणी से दोगुनी है। साथ ही यह 12 न्यूक्लियर टिप्ड मिसाइलों को भी ढो सकती है।

इस प्रकार भारत तीन समुद्री परमाणु कार्यक्रमों पर कार्य कर रहा है- अरिहंत श्रेणी के एसएसबीएन, एसएसएन और एस-5 श्रेणी के एसएसबीएन।

एक विश्वसनीय समुद्री अवरोध के लिए देश के एसएसबीएन अन्य बातों के साथ शत्रु की जनसंख्या और औद्योगिक केंद्रों को निशाना बनाने में भी सक्षम होने चाहिए। भारत को पाकिस्तान व चीन के शहरों को निशाना बनाने में सक्षम होना चाहिए।

के-15 की 750 किलोमीटर दूरी की क्षमता के अनुसार अरब सागर से ही पाकिस्तानी शहरों को निशाना बनाया जा सकता है। इससे पाकिस्तानी नौसेना का काम कम होगा क्योंकि उन्हें कम समुद्री क्षेत्र की निगरानी करनी होगी और वे भारतीय एसएसबीएन को पकड़ भी सकते हैं। यह समस्या और बड़ी है क्योंकि वर्तमान में भारत के पास केवल एसएसबीएन है।

चीन के शहर मिसाइल की रेंज के बाहर होंगे, भले ही पोत को बंगाल की खाड़ी के पूर्वोत्तर छोर पर रखा जाए। इस प्रकार बीजिंग से अनबन कीस्थिति में नईदिल्ली के पास चीन को परमाणु हमले से डराने का विकल्प नहीं होगा।

सैद्धांतिक रूप से एसएसबीएन चीन के और निकट जा सकता है जिससे वह मिसाइल के रेंज में आ जाए लेकिन इससे उसके पहचाने जाने या हमले का खतरा बढ़ा जाएगा।

इसलिए भले ही भारत ने अपनी तीनों सेनाएँ विकसित की हों लेकिन इसका नौसैनिक पाया या समुद्री अवरोध क्षमता अभी भी विश्वसनीय नहीं है क्योंकि मिसाइलों की रेंज कम है।

के-श्रृंखला की मिसाइलों में दूसरी, मध्यम रेंज वाली के-4 समाधान है। 3,500 किलोमीटर की रेंज के साथ यह बंगाल की खाड़ी के पूर्वोत्तर भाग से चीन को बीजिंग समेत और पूरे पाकिस्तान को निशाना बना पाएगी। इस मिसाइल का जनवरी में कई बार परीक्षण हुआ।

के-4 के बाद 5,000 किलोमीटर की रेंज वाली के-5 एसएलबीएम है। इस श्रृंखला में चौथी मिसाइल के-6 पर काम 2017 में हैदराबाद के डीआरडीओ आधारित एडवान्स्ड नेवल सिस्टम्स में फरवरी 2017 में शुरू हुआ।

कहा जाता है कि के-6 मिसाइल की रेंज 6,000 किलोमीटर से अधिक है। रिपोर्ट का कहना है कि के-6 उन्नत एस-5 श्रेणी के एसएसबीएन में लैस होगी। इन दोनों मिसाइलों के आ जाने से भारत के पास चीन के भीतरी इलाकों तक निशाना साधने की क्षमता होगी।

प्रखर स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakharkgupta के माध्यम से ट्वीट करते हैं।