भारती
सीमा सड़कों को पहले से तीव्र गति से बना रहा भारत, इसी से क्रुद्ध हुआ होगा चीन

आशुचित्र- पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा सीमा सड़क के निर्माण ने गति पकड़ी है जो चीन की आक्रामकता का कारण हो सकता है। 

अप्रैल 2019 में 11-सदस्यीय मोटरसाइकल अभियान दल ने लेह के निकट कारु से काराकोरम पास तक और वहाँ से लौटने की 1,000 किलोमीटर लंबी यात्रा तय की जिसमें वे चांग ला पास, श्योक नदी के किनारे और 17,000 फीट की ऊँचाई वाले पूर्वोत्तर लद्दाख के दुर्गम भूगोल से भी गुज़रे।

हर गर्मी लद्दाख में होने वाली खोज-यात्रा से यह अभियान अलग था- पहली बार था कि कोई अभियान दल 255 किलोमीटर लंबी नव-निर्मित दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएस-डीबीओ) सड़क से गुज़रा।

पूर्वोत्तर लद्दाख (सेना के लिए उत्तरी सब-सेक्टर) की संयोजकता के लिए आवश्यक डीएस-डीबीओ, चीन अधिकृत 38,000 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्रफल के अकसाई चिन से सटे 2013 में भारत-चीन तनाव के साक्षी रहे देपसांग मैदान समेत कई दूरवर्ती क्षेत्रों तक पूरे वर्ष चलने वाली सड़क प्रदान करती है।

यह सड़क पिछले 19 वर्षों से निर्माणाधीन थी- इसका निर्माण कार्य 2000 में शुरू हुआ था जिसे 2012 तक पूरा किया जाना चाहिए था। इसकी प्रगति पर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की नज़र होती थी।

हालाँकि 2011 में, जब तक अधिकांश सड़क बन चुकी थी, एक पूछताछ में पाया गया कि सड़क निर्माण श्योक नदी के किनारे मैदान क्षेत्र में हुआ है, न कि पहाड़ी इलाके में। इसके परिणामस्वरूप हर वर्ष जून से अक्टूबर में जब बर्फ पिघलने से नदी का पानी तटों को पार कर देता था, तब इस सड़क के कुछ भाग क्षतिग्रस्त हो जाते थे।

कुछ के अनुसार गर्मियों श्योक नदी के जल स्तर बढ़ने के कारण सड़क 94 दिन तक भी बंद रही थी। इस प्रकार 12 वर्षों में जिस सड़क का निर्माण पूरा होने वाला था, वह सैन्य उपयोग के योग्य नहीं थी।

यह समस्या सिर्फ डीएस-डीबीओ सड़क के साथ ही नहीं थी बल्कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के निकट कई सामरिक सड़कों का निर्माण विलंब का शिकार हुआ। कई वर्षों की देरी के कारण परियोजनाओं की लागत चार गुनी तक हो जाया करती थी।

1997 में सरकार ने चीन अध्ययन समूह के साथ मिलकर 73 सामरिक सड़कों की पहचान की जिनकी कुल लंबाई 4,643 किलोमीटर थी। इनका नाम रखा गया भारत-चीन सीमा सड़क (आईसीबीआर) जिन्हें एलएसी के निकट बनाना था ताकि हम सैन्य संचालन को सक्षम करके अधिकृत क्षेत्रों और तिब्बत के चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर को टक्कर दे सकें।

73 में से 3,409 किलोमीटर लंबी 61 सड़कों को सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा बनाया जाना था, वहीं 1,230 किलोमीटर लंबी 12 सड़कों का दायित्व केंद्रीय लोक निर्माण विभाग को दिया गया।

1999 में कैबिनेट कमेटी से स्वीकृति मिलने के बाद बीआरओ को इन सड़कों का निर्माण 2012 तक पूरा करना था। हालाँकि 2017 में भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में पाया गया कि 2012 की समय-सीमा तक 61 में से 15 सड़कें ही बन सकी थीं।

हालाँकि पूरी हुई सड़कों की संख्या से आईसीबीआर परियोजना की प्रगति आँकना सर्वश्रेष्ठ तरीका नहीं है क्योंकि कई सड़कों पर काफी काम हुआ है लेकिन वे पूरी नहीं हो सकीं। हालाँकि कुछ वर्षों में संख्या की तुलना से निर्माण गति का अनुमान लगाया जा सकता है।

अब ये देखें- 520 किलोमीटर की कुल लंबाई वाली 12 आईसीबीआर का निर्माण 2009 के अंत तक पूरा हो गया था और 2015 की शुरुआत तक 625 किलोमीटर की कुल लंबाई वाली 19 सड़कें पूरी हुईं। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है निर्माण कार्य की गति धीमी थी।

आईसीबीआर निर्माण की गति धीमी होना कोई नई बात नहीं है जो हमें पता चली है परंतु संभावना है कि अब ऐसा न हो। रक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018 की समीक्षा में कहा गया कि “2,316.62 किलोमीटर लंबी सड़कों का निर्माण पूरा हो चुका है।” यह बीआरओ द्वारा बनाई जाने वाली कुल सड़कों को 68 प्रतिशत है और 2019 की समीक्षा कहती है कि “75 प्रतिशत सड़कें पूरी की जा चुकी हैं।”

इस प्रकार एक वर्ष में हमने 7 प्रतिशत की प्रगति देखी। यदि बीआरओ इसी गति से पहले से आईसीबीआर पर काम करता तो एलएसी के निकट सभी सीमा सड़कें कई वर्षों पहले बनकर तैयार हो गई होतीं।

2018 के पहले से ही निर्माण की गति बढ़ना शुरू हो गई थी।टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया था कि 2014-15 में पहाड़ कटाई की गति 107 किलोमीटर थी जो  2016-17 में बढ़कर 147 किलोमीटर हो गई। इसी प्रकार सड़क निर्माण 2014-15 में 174 किलोमीटर हुआ था जो 2016-17 में बढ़कर 233 किलोमीटर हो गया।

स्पष्ट रूप से पिछले कुछ वर्षों में आईसीबीआर कार्य की प्रगति बढ़ी है। चीन के बढ़ते उल्लंघनों और 2017 में डोकलाम पर भारत-चीन के आमने-सामने के अलावा भी कई कारण हैं जिनसे इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के कार्य ने गति पकड़ी- 2014-15 से बीआरओ में कई परिवर्तन हुए हैं।

पहला, 2015-16 में संगठन को पूर्ण रूप से रक्षा मंत्रालय के अधीन लाया गया था। पहले बीआरओ को वित्त सड़क यातायात मंत्रालय से मिलता था जबकि इसे कार्य रक्षा मंत्रालय सौंपता था। दोहरे नियंत्रण के कारण बीआरओ का कार्य कुशल नहीं था।

दूसरा, 2017 में डोकलाम पर जब भारत-चीन का आमना-सामना समाप्त हुआ था तो मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि एलएसी के 100 किलोमीटर के दायरे में सेना की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को वन अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।

2014 में सत्ता में आने के बाद भी मोदी सरकार ने इसी प्रकार की एक और सामान्य अनुमति दी थी। वन और पर्यावरण अनुमतियों में देरी के कारण कई सड़क परियोजनाओं में विलंब हुआ है।

तीसरा, जब डोकलाम पर आमना-सामना चल रहा था तब मोदी सरकार नेबीआरओ अधिकारियों को अधिक प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियाँ दी थीं। कुछ मामलों में तो वित्तीय शक्ति को 10-15 गुना भी बढ़ाया गया।

पिछले दशक की तुलना में तकनीक और सर्वेक्षण की उन्नति से भी इन्हें सहयोग मिला जिसने एलएसी के निकट नई सड़कों और पुलों के निर्माण की गति बढ़ाई। बीआरओ के 32,000 लोगों के कार्यबल का 67 प्रतिशत चीन सीमा के निकट तैनात है।

बीआरओ ने लद्दाख और पूर्वोत्तर में कई महत्त्वपूर्ण संयोजकता परियोजनाओं को पूरा किया जिनमें से डीएस-डीबीओ सड़क एक है। 2011 में जब इस सड़क को सैन्य उपयोग के लिए अनुपयोगी पाया गया था तो कुछ लोगों का दावा है कि तीन-चौथाई सड़क के लिए बीआरओ ने नई मार्गरेखा तैयार की। पूर्वी लद्दाख में भारत के सबसे ऊँचाई पर बने पुल के साथ यह सड़क 2019 की शुरुआत में बनकर तैयार हो गई थी।

भारत का सबसे ऊँचाई पर स्थित श्योक नदी पर बना पुल जिसका नाम ‘लद्दाख के शेर’ कर्नल चेवांग रिनचेन पर रखा गया है

डीएस-डीबीओ सड़क जिस क्षेत्र से गुज़रती है- गलवान नदी घाटी को पार करते हुए, वहीं भारत और चीन का हाल में आमना-सामना हुआ था। इसका कारण माना गया कि भारत यहाँ एक नई सड़क बना रहा है।

अभी भी भारत को बहुत कुछ करना है लेकिन एक बड़ा परिवर्तन आया है। दशकों तक भारत ने सीमा क्षेत्रों को अनदेखा किया और फिर धीमी गति से इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण शुरू किया लेकिन चीन ने अपने उन्नत इंफ्रास्ट्रक्चर का धौंस दिखाकर एलएसी पर यथास्थिति को बदलना चाहा।

इंंफ्रास्ट्रक्चर में अंतर को जब भारत भरने लगा तो इसे चीन से चुनौती मिलने लगी।

प्रखर स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakharkgupta के माध्यम से ट्वीट करते हैं।