भारती
5जी द्वारा होने वाली दूरसंचार क्रांति शुरू होने से पहले ही मृत, लाभ मिलेगा चीन को

यूरोप और चीन में जहाँ 5जी सेवाएँ सुरू हो रही हैं, वहीं भारत बैठकर शोक मना सकता है कि शुरू होने से पहले ही इसकी दूरसंचार क्रांति समाप्ति की ओर है।

पहले से तनावग्रस्त दूरसंचार उद्योग के ताबूत में आखिरी कील राहत सुझावों के लिए गठित की गई सचिवों की कमेटी का बरखास्त किया जाना बनी। एजीआर के अतिरिक्त भार के अलावा ऋण राहत का कोई विकल्प न होने ने स्पेक्ट्रम के अभाव की समस्या को और बढ़ा दिया है।

रिपोर्ट किया जा रहा है कि भारत के दूरसंचार सेवा प्रदाता प्रारंभिक बड़े मूल्य, स्पेक्ट्रम के अभाव और नीलामी के लिए नए बैंड की कमी के कारण 5जी सेवाओं को शुरू करना 2025 तक टालने पर विचार कर रहे हैं।

रिपोर्ट में भारत के सेल्युलर ऑपरेटर संघ के निदेशक की बात कही गई। इस संघ में एयरटेल, रिलायंस और वोडाफोन-आइडिया के साथ हुआवे, एरिकसन और सिस्को जैसी हार्डवेयर कंपनियाँ भी हैं।

5जी शुरुआत में देरी के दो प्रमुख कारण हैं। पहला  यह कि मूल्य को 1 मेगाहर्ट्ज़ के लिए 492 करोड़ रुपये रखा गया। प्रयोगों की कमी, अंतर्राष्ट्रीय मूल्य और बढ़ते ऋण को देखते हुए इस मूल्य को अधिकांश कंपनियाँ नहीं चुका सकती हैं।

दूसरा  कारण है कि पहले 300 मेगाहर्ट्ज़ का स्पेक्ट्रम उपलब्ध था लेकिन अब 175 मेगाहर्ट्ज़ ही उपलब्ध है क्योंकि 25 मेगाहर्ट्ज़ इसरो को दे दिया गया व 125 मेगाहर्ट्ज़ रक्षा के लिए रखा गया है। वहीं बड़ी तीनों कंपनियाँ अपने लिए 100-100 मेगाहर्ट्ज़ की अपेक्षा कर रही थीं।

वहीं 5जी हार्डवेयर बनाने वाली एक प्रमुख कंपनी एरिकसन ने 5जी सेवा का अनुमानित समय 2022से घटाकर 2020 कर दिया था। लेकिन हाल में हुई घटनाओं को देखकर यह परिवर्तन अति आशावादी लगता है।

लेकिन इसका नुकसान न सिर्फ दूरसंचार कंपनियों को होगा बल्कि कई अन्य प्रमुख उद्योगों को भी होगा।

5जी उपयोग से बढ़ने वाले सामर्थ्य को चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। पहला, मोबाइल का ब्रॉडबैंड बढ़ेगा जो अंदर और बाहर दोनों जगह 100एमबीपीएस से अधिक की गति देने में सक्षम होगा।

दूसरा, फिक्स्ड वायरलेस ऐक्सेस (एफडब्ल्यूए) के माध्यम से उन क्षेत्रों में तीव्र गति इंटरनेट सेवा दी जा सकेगी जहाँ फाइबर केबल लगाना या रख-रखाव करना मुश्किल होगा जैसे हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में।

तीसरा, 5जी इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) में सहायक होगा क्योंकि यह लाखों-कोरड़ों यंत्रों को इंटरनेट से जोड़ सकेगा। इससे कई निजी और सरकारी कार्यक्रमों के लिए डाटा विश्लेषण भी आसान बनेगा।

आईओटी का प्रतीकात्मक चित्र

अंततः, बिना विलंब के संचार सेवा देने में यह विश्वसनीय बनेगा। कम्प्यूटिंग परिभाषा में विलंब को निर्देश और डाटा स्थानांतरण के बीच के समय के रूप में गिना जाता है। यह स्वास्थ्य सेवा, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, स्वचालित कारों और वर्चुअल वास्तविकता जैसे ऐप के लिए आवशयक है।

तो 5जी क्रांति में देरी के साथ-साथ किन-किन उद्योगों का घाटा होगा?

पहला, मीडिया और मनोरंजन उद्योग। 4जी के आगमन से ही मीडिया के हमारे उपभोग में बड़ा परिवर्तन हुआ था। माँग अनुसार स्ट्रीमिंग सेवाओं का लोग आनंद ले रहे हैं। समाचार उद्योग ने भी अपने वीडियो उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया है। इस प्रकार तीव्र गति की मोबाइल ब्रॉडबैंड सेवाओं में देरी के कारण वे अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों से पीछे रह जाएँगे।

ईटीटेलीकॉम व ऐनालिसिस मेसन सर्वेक्षण के अनुसार 83 प्रतिशत लोगों का मानना था कि 5जी का सर्वाधिक लाभ मीडिया और मनोरंजन उद्योग को मिलेगा। इस क्षेत्र से जुड़े संगठित और असंगठित रोजगारों को देखें तो पाएँगे किविदेशी निवेश के साथ दीर्घ अवधि में यह भी एक नुकसान है।

दूसरा, स्वास्थ्य क्षेत्र। स्मार्ट वियरेबल और स्वास्थ डाटा उपयोग के लिए बढ़ते निवेश के बीच आयुष्मान भारत जैसी योजना 5जी का लाभ उठा सकती थी। देरी के साथ स्वदेशी रूप से रोबोटिक सर्जरी और रीमोट स्वास्थ्य सेवा का विकास पीछे रह जाएगा।

समस्या केवल सेवा की ही नहीं है बल्कि हार्डवेयर की भी है। जब तक सामूहिक रूप से 5जी का प्रचलन 2020 के दशक के अंत या 2030 की शुरुआत तक बढ़ेगा, तब तक बाज़ार में सस्ते चीनी स्मार्ट यंत्रों की बाढ़ आ चुकी होगी, जैसी आज मोबाइल फोन की स्थिति है।

कुछ चीनी स्मार्टफोन

इससे मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों से मिलने वाला लाभ नहीं मिल पाएगा। मेसन सर्वेक्षण के अनुसार 64 प्रतिशत ने स्वास्थ्य सेवाओं को 5जी का दूसरा सबसे बड़ा लाभार्थी माना।

यही सर्वेक्षण ऑटोमोटिव क्षेत्र को 60 प्रतिशत पर रखता है। भारत में इसका अनुभव हम कर चुके हैं जब एमजी हेक्टर ने भारत की पहली इंटरनेट कार बनकर स्थानीय मॉडलों को पीछे छोड़ दिया था। इंटरनेट और आईओटी सक्षम कारें व सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर ही भविष्य है।

तीसरा, स्थानीय हार्डवेयर उद्योग। भारतीय मोबाइल कांग्रेस ने भले ही हुआवे को डेमो की अनुमति दे दी थी लेकिन चीनी सरकार से इसके संबंध चिंता का विषय हैं। 5जी में देरी से स्थानीय रूप से सक्षम होना और बड़ी चुनौती होगी।

बढ़ते ऋण के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश भी एक बड़ी चुनौती है। 5जी लागू करने के लिए बहु-इनपुट बहु-आउटपुट (मीमो) तकनीक की आवश्यकता है। इसका सिद्धांत है कि वायरलेस नेटवर्क एक साथ एक ही रेडियो चैनल पर अनेक डाटा लेने और भेजने में सक्षम हो।

5जी को सहायक संरचनाओं की आवश्यकता होती है जो इसे लागू करने की कीमत को बढ़ाता है। यह दूरसंचार सेवा प्रदाता पर अत्यधिक भार देता है। स्मॉल सेल के माध्यम से नेटवर्क का घनत्व बढ़ाना भी चुनौती है।

वर्तमान ऋण स्थिति जहाँ शुल्क समस्या है और सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिल रही है, एयरटेल व वोडाफोन-आइडिया के लिए हार्डवेयर में स्थानीय सामर्थ्य  और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश में संतुलन बनाना मुश्किल होगा। ऐसे में हम चीन पर आश्रित होंगे जो दीर्घ अवधि में हमें नुकसान पहुँचाएगा।

चौथा, सेवा क्षेत्र। भारत के बाज़ार आकार को देखते हुए कहा जा सकता है कि आईओटी के शुरू हो जााने से स्थानीय डाटा विश्लेषण और इंटेलीजेंस कंपनियाँ विकसित होतीं।

हालाँकि पिछले दशक के अधिकतम समय में जैसा रहा वैसे ही भारत के द्वितीय स्तर की आईटी कंपनियाँ पश्चिम या चीन के ऐपों के भारतीय संस्करण बनाने में लिप्त नज़र आएँगी।

अगर 5जी लागू करने को एक मैराथन के रूप में देखा जाए तो चीन और यूनाइटेड स्टेट्स हमसे कम से कम पाँच वर्ष आगे होंगे।

अभी के लिए 5जी क्रांति मर चुकी है और उपभोक्ताओं के भावनात्मक नुकसान की मात्रा पता लगाने का कोई तरीका नहीं है। कंपनियों और सरकार के लिए नुकसान बड़ा है ही। अगर 2जी असफलता की जड़ भ्रष्टाचार थी तो इसकी जड़ मूर्खता होगी।