भारती
रचना और प्रेरणा को जाता है कोलकाता मेट्रो की पानी के नीचे बनी सुरंग का श्रेय

हुगली नदी के पश्चिमी तट से 18 अप्रैल 2017 को रचना ने अपना काम शुरू किया। पूर्वी तट से कुछ सप्ताह बाद प्रेरणा ने काम शुरू किया। लगातार 36 दिनों तक नदी के नीचे खुदाई करने के बाद रचना 23 मई 2017 को पूर्वी तट तक पहुँच गई।

ऐसा करके रचना ने इतिहास लिखा और विश्व के इस भाग में यह किसी अभियांत्रिकी अचरज से कम नहीं है। प्रेरणा ने भी 21 जून 2017 तक उलटी दिशा में पूर्वी से पश्चिमी तट का सफर पूरा किया।

रचना और प्रेरणा दो जर्मन-टनल बोरिंग मशीनें (टीबीएम) हैं जिनके भागों को भारत लाकर दो भूमिगत बड़े शाफ्टों में जोड़ा गया जो नदी के दोनों ओर के तट पर स्थित हैं।

रचना और प्रेरणा ने जो दो सुरंगें खोदी हैं, वे 16.6 किलोमीटर लंबे कोलकाता मेट्रो के पश्चिमी-पूर्वी गलियारे का महत्त्वपूर्ण भाग हैं। यह सॉल्ट लेक में स्थित सेक्टर वी के आईटी हब को नदी के पार स्थित हवाड़ा से जोड़ेगा।

सेक्टर वी से शुरू होती मेट्रो लाइन पाँच स्टेशनों से गुज़रते हुए 5.8 किलोमीटर की दूरी ज़मीन से ऊपरी स्तर (एलिवेटेड) पर तय करती है और फिर हावड़ा तक कि 10.8 किलोमीटर लंबी दूरी भूमिगत स्तर से पूरी करती है। नदी के नीचे आने वाला भाग 520 मीटर लंबा है और नदी के तल से 13 मीटर गहराई पर स्थित है।

ये टबीबीएम जर्मन अभियांत्रिकी कंपनी हेरेंकनेट ने बनाए हैं। रूसी अभियांत्रिकी कंपनी ट्रांसटॉनल्सट्रॉय और एफकॉन्स (शापूर्जी पलोंजी समूह का भाग) ने साझा रूप से 938 करोड़ रुपये का भूमिगत भाग के निर्माण का अनुबंध 2010 में जीता था।

लेकिन घरों के मालिकों और दुकानदारों विरोध के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया। इसे बाद 80 परिवारों और 100 दुकानदारों का विस्थापन करने से बचने के लिए मार्ग रेखा बदली गई। नई मार्ग रेखा को भारतीय रेलवे और परियोजना की 48.5 प्रतिशत लागत उठाने वाली जापान अंतर्राष्ट्रीय समन्वय एजेंसी (जिका) ने स्वीकृति दे दी।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग की भी स्वीकृति लेनी पड़ी क्योंकि निर्माण स्थलों के निकट काफी विरासत संरचनाएँ हैं। यह स्वीकृति लेने में भी काफी समय लगा।

अक्टूबर 2011 से हावड़ा मैदान में खाली पड़ीं दोनों टीबीएम को ज़मीन के नीचे उतारने के लिए शाफ्ट खोदने का काम पाँच वर्षों बाद और पूर्वी तट पर मार्च 2017 में शुरू हुआ।

“ब्राबोर्न रोड (पूर्वी तट) पर सुरंग खोदने का काम मुश्किल था क्योंकि सुरंग विरासत संरचनाओं के 100 मीटर करीब से गुज़रती है। इसके अलावा और भी पुरानी इमारतें थीं। इन भवनों में रहने वाले लोगों को अस्थाई रूप से दूसरी जगह ले जाया गया और कमज़ोर इमारतों को गिरने से बचाने के लिए आईआईटी खड़गपुर से विशेषज्ञ बुलाए गए।”, कोलकाता मेट्रोरेल कॉर्पोरेशन (केएमआरसी) के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया।

कोलकाता मेट्रो की सुरंग, चित्र साभार- @harishbabu0406

नदी के नीचे सुरंग बनाना और भी कठिन था क्योंकि टीबीएम को नर्म मिट्टी की खुदाई करनी थी। “टीबीएम जैसे-जैसे खुदाई करती जा रही थीं, वैसे-वैसे अंदरुनी दीवारों पर कॉन्क्रीट की मोटी परत चढ़ाई जा रही थी ताकि कहीं से पानी का रिसाव न हो।”, केएमआरसी अझिकारी ने बताया।

उन्होंने आगे समझाया, “हर कॉन्क्रीट परत में आयात की हुई नियोप्रीन और हाइड्रोफिलिक ऑक्सिलरी गास्केट लगाए गए। यह गास्केट पानी के संपर्क में आते ही फैल जाती है और सीलन को बंद कर देती है। यह अतिरिक्त सुरक्षा के लिए किया गया था।”

नदी के नीचे खुदाई करने में 250 से अधिक कर्मचारी दो शिफ्टों में काम कर रहे थे। एक और चुनौती यह थी कि मिट्टी के नर्म होने के कारण दोनों टीबीएम को एक साथ नहीं चलाया जा सकता था।

“नदीं के नीचे जो दबाव होता है वह सामान्य से तीन गुना अधिक होता है। सुरंग में दबाव कम करने के लिए उपकरणों का उपयोग किया गया। रेतीली गाद (सैंडी सिल्ट) में से सुरंग खोदनी थी जो काफी खतरनाक था।”, एफकॉन के प्रवक्ता ने बताया। नदी के तल की ऊपरी परत नर्म मिट्टी की व निचली परत रेतीली गाद की है।

नदी के तल और सुरंगों की छत में औसत दूरी 19.5 मीटर की है और भूमि के स्तर से सुरंग की छत 33.24 मीटर गहराई पर स्थित है। दोनों सुरंगों के बीच 16.1 मीटर की दूरी है व इनका व्यास 5.5 मीटर है। सुरंग में मेट्रो 80 किलोमीटर प्रति घंटा की गति पर चलकर इसे 1 मिनट से भी कम में पार कर जाएगी।

काम पूरा होने के दो साल बाद तक दोनों टीबीएम कर्ज़न पार्क के नीचे ही पड़ी रहीं। 160 टन की क्षमता वाली क्रेन से दोनों टीबीएम को टुकड़ों में विभाजित करके 3 जुलाई 2019 तक पूरी तरह से निकाल लिया गया। 22 जुलाई को विदाई समारोह के बाद इन विघटित टीबीएम को नागपुर स्थित एफकॉन के उपकरण यार्ड भेज दिया गया।

3 जुलाई 2019 का चित्र

हुगली के नीचे की दूसरी सुरंग

नदी के नीचे बनने वाली यह पहली सुरंग नहीं है। नौ दशक पूर्व एक दूसरी सुरंग, इससे थोड़ी छोटी, कोलकाता से हावड़ा तक बिजली के केबल पहुँचाने के लिए बनाई गई थी।

20वीं शताब्दी के आरंभ में हावड़ा औद्योगिक विकास गति पकड़ रहा था। कई जूट मिलें और और अभियांत्रिकी इकाइयाँ वहाँ स्थापित हो रही थीं। अंग्रेज़ों ने सोचा कि कोलकाता के स्टेशनों में बन रही बिजली को नदी के पार हावड़ा तक पहुँचाना होगा।

पंजाब से लाए गए मजदूरों ने मार्च 1930 में बोटैनिकल गार्डन के निकट हुगली के पश्चिमी तट पर खड़े शाफ्ट खोदने का काम शुरू किया और पूर्वी ओर यह कम मेटियाब्रूज़ में शुरू हुआ।

ज़मीन से 33.5 मीटर की गहराई तक की खुदाई के बाद ब्रिटिश अभियंताओं की निगरानी में आड़ी खुदाई शुरू हुई जो जुलाई 1931 में पूरी हुई।

यह सुरंग मेट्रो सुरंगों से नदी की धारा में आगे की ओर स्थित है और अभी भी अस्तित्व में है। कलकत्ता बिजली आपूर्ति निगम (सीईएससी) के अभियंता और मजदूर रोज़ यहाँ का निरीक्षण करते हैं और केबलों की दुरुस्तता सुनिश्चित करते हैं।

 

पानी के नीचे इस सुरंग की सफल खुदाई के बाद अंग्रेज़ों ने कोलकाता और हावड़ा के बीच ट्रेन चलाने के लिए एक और सुरंग की खुदाई का सोचा। तब तक अंग्रेज़ सुरंग खुदाई की तकनीक पर महारत हासिल कर चुके थे। लंदन ट्यूब का निर्माण सीईएससी सुरंग से 67 वर्ष पूर्व हो गया था।

एक ओर जहाँ सीईसी सुरंग को बनने में 17 माहों का समय लगा, वरहीं हावड़ा पुल को छह वर्षों से अधिक का समय लग गया था। हाल के समय में बने विद्यासागर सेतु को देखें तो उसे 13 वर्षों से अदिक समय लगा।