भारती
प्रेमचंद- एक विचारक, एक सच्चाई के कहानीकार

प्रेमचंद के व्यक्तित्व और साहित्य का सामर्थ्य, शक्ति और सत्यता उसमें निहित विरोधाभास हैं। प्रत्येक बुद्धिजीवी के विचार सामयिक सत्य का हाथ थाम के चलते हैं। अपने विचारों को वर्तमान तथ्य की कसौटी पर कसने से दुराव और प्राकट्य सत्य को उपेक्षित करने वाले लेखक स्वयं को एक कट्टरपंथी विचारक में परिवर्तित कर देता है जो अपने ही आरंभिक विचारों का बंदी हो जाता।

दुराग्रह एक बुद्धिजीवी के लिए पूर्वाग्रह के सामान ही विष है। एक विवेकशील बुद्धिजीवी दोनों से दूरी रख के चलता है। बने हुए पिंजरों में एक उन्मुक्त आकाश में भ्रमण करने वाले पक्षी को नहीं बांधा जा सकता है। जिसे हम अल्पबुद्धि एक स्थिर स्थिति पकड़े रहने से बचने का भय समझते हैं, महामानवों में यही प्रवृत्ति उनके निरंतर विकास का सूचक होती है। 8 अक्टूबर 1936 को इहलोक त्यागने वाले धनपत राय श्रीवास्तव उर्फ़ मुंशी प्रेमचंद की यही प्रवृत्ति उन्हें भारत के आधुनिक साहित्य का बौद्धिक महामानव बनाती है। 

21 जुलाई 1880 में उत्तर प्रदेश के लमही में जन्मे प्रेमचंद ऐसे एक महामानव की परिभाषा में उचित बैठते हैं। अपने जीर्ण-शीर्ण कोट और फटे जूतों को धारण किये प्रेमचंद कबीलों में बँटे हुए साहित्यिक समाज के ऊपर कहीं विराजमान दिखते हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात दो चीज़ें साहित्य के क्षेत्र में हुईंजीवित साहित्यकारों को अनुशासित करके सत्ता के समर्थन में लाने की और मृत साहित्यकारों के लेखन को ढाँपकर, मरोड़कर वर्तमान सत्ता के समर्थन में उनकी जबरन नियुक्ति।

शरद जोशी जी अपने लेखप्रेमचंद के बासी आलोचकमें इसी ओर इंगित करते हैं जब वे कहते हैं कि, “पूंजीयुग की जिन थोथी नैतिकताओं में हम रहते हैं वहाँ व्यक्तित्व प्रदर्शन का विशेष महत्त्व है।वे आगे लिखते हैं– “प्रेमचंद के साहित्य के वास्तविक और नए मूल्यांकन के नया दौर प्रारंभ होना चाहिए जिसमे हम अधिक तटस्थ, अधिक गहन दृष्टि से उनकी समस्त रचनाओं पर सोचें विचारें। प्रेमचंद आदर्शवादी थे, यथार्थवादी थे, आदर्शोन्मुख यथार्थवादी थे, वे ग्रामचिंतन के चतुर चितेरे थे, गोर्की थे टॉलस्टॉय थे, ऐसे नारों से काम नहीं चलेगा।

प्रेमचंद के मूर्तिकरण के पीछे एक भाव लोभ का था जो प्रेमचंद को अपने राजनैतिक खेमे से बांधना चाहता था, जिस युग में कार्डधारी कामरेड होना वैचारिक पराधीनता के स्थान पर, एक शक्ति के दंभ का सूचक हो गया था, वैचारिक रूप से स्वतंत्र साहित्यकार अपवाद ही दिखता होगा।

प्रेमचंद को भी तुरंत वामपंथीकांग्रेसी कैंप में खींचा गया और उनका हर वह लेखन जनता की दृष्टि से बाहर कर दिया गया जो इस खाँचे में फिट नहीं होता था। यह सत्य है कि अपनी लेखनी को राजनैतिक दलीय प्रतिबद्धता से बचते रहे परंतु प्रेमचंद की सामाजिक प्रतिबद्धता पर कभी प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। राजनैतिक निष्ठा से इतर प्रेमचंद जीवन और लेखन में राष्ट्र और समाज के प्रति ऐसे कर्तव्यनिष्ठ रहे कि उनका वैचारिक विस्तार राजनीतिज्ञों को आशंकित करता रहा। 

1908 में सोज़वतन’ जैसे राष्ट्रवादी कथा संग्रह के रचयिता जिस प्रकार एक राजनैतिक व्यक्तित्व के रूप में परिभाषित होने से बचते रहे यह प्रेमचंद की वैचारिक निष्पक्षता और परिपक्वता का ही परिचायक है। 

मोटे तौर पर कांग्रेस के समर्थक प्रेमचंद, असहयोग में नौकरी छोड़ने वाले निर्धन लेखक प्रेमचंद, अपनी कथा आदर्श विरोध में  जब कांग्रेसी नेताओं की राय बहादुरी परंपरा और कांग्रेस के अभिजात्यबाहुल्य नेतृत्व पर एक बहुत ही भावुक कटाक्ष लिखते हैं, तो यही निरपेक्ष भाव उनके लेखन को अप्रतिम सत्य का आलोक प्रदान करता है।

विदेशी सामान के बहिष्कार को लेकर कांग्रेसी बैरिकेडिंग पर भी प्रेमचंद एक भावुक कथा में प्रश्न उठाते हैं, और उस नीति पर बिना लाग-लपेट के तंज लेते हैं जो ग़रीबों को ब्रिटिश विरोध में सड़क पर ला रही थी, वहीं शीर्ष नेतृत्व का विलासिता पूर्ण जीवन ब्रिटिश आशीर्वाद के नीचे बनाए हुए थी।

एक क़िस्सागो के नाते प्रेमचंद निर्विवाद रूप से कथा सम्राट हैं और उन्हें ग्रामीण अंचल के लेखक के खाँचे में धँसा दिया गया है किंतु एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी एवं विचारक के नाते प्रेमचंद की विश्लेषणात्मक सामर्थ्य से अधिकांशतः हम अपरिचित ही हैं।

प्रेमचंद की जो सामाजिक विषयों में एक निरपेक्ष भूमिका है जहाँ प्रेमचंद को अलग स्थान देती है, वर्ग विशेष को कुछ हद थक परेशान भी करती है। इन विरोधाभासों के नीचे तैरती तथ्यात्मकता को समझने के लिए एक विलक्षण समझ की आवश्यकता है।

मसलन कैसे प्रेमचंद उर्दू-हिंदी के साथ साथ, हिंदी एवं आंचलिक भाषाओं के निकट संबंधों के पक्षधर थे, वहीं भारत में हिंदी को एक पूर्ण राष्ट्रभाषा का स्वरूप देने के लिए कटिबद्ध थे। भाषा के संदर्भ में अपने कांग्रेस से मतभेदों को लेकर प्रेमचंद सदा मुखर रहे, और नेताओं की राष्ट्रभाषा के प्रति प्रतिबद्धता की कमी को लेकर बोलते रहे। 

27 अक्टूबर 1934 को प्रेमचंद मुंबई में राष्ट्रभाषा समिति की बैठक में कहते हैं- “जो हमारा अंगरेज़ साहब करता है, वही हमारा हिंदुस्तानी साहब करता है। अंग्रेज़ियत ने उसे हिप्नोटाइज कर दिया है। …जब कभी अंगरेज़ साहबों से उसे कोई ठोकर मिलती है, तो वह दौड़ा हुआ जनता के पास फ़रियाद करने जाता है- उसी जनता के पास, जिसे वह काला आदमी और अपना भोग्य समझता है।

…ठोकरों पर ठोकरें मिलती हैं, तब यह क्लास देशभक्त बन जाता है और जनता का वक़ील और नेता बन कर, उसका ज़ोर लेकर अंगरेज़ साहब से मुक़ाबला करना चाहता। तब उसे ऐसी भाषा की कमी महसूस होती है, जिसके द्वारा वह जनता तक पहुँच सके। कांग्रेस को जो थोड़ा बहुत यश मिला, वह जनता को उसी भाषा में अपील करने से मिला। क्या यह दुःख की बात नहीं कि वे, जो भारतीय जनता की वक़ालत के दावेदार हैं, वह भाषा न बोल सकें और न समझ सकें, जो पचीस करोड़ की भाषा है?” यह स्वतः प्रमाणित है कि प्रेमचंद यहाँ स्वयं को राष्ट्रीय राजनीति के हाशिये में धकेल रहें है।

प्रेमचंद जहाँ बहुत प्रेम से सांप्रदायिकता की निरर्थकता पर लिखते हैं, वहीं अपनी कथा ‘मंदिर और मस्जिद’ में एक वर्ग विशेष की आक्रामकता चित्रित करने में मर्यादा के संकोच में नहीं फँसते। प्रेमचंद अपनी कथा ‘मंदिर’ में जातिवाद पर प्रश्न उठाते हैं, वहीं अपनी कथा ‘जिहाद’ में हिंसापूर्ण धर्मांतरण पर बात करने में लाग-लपेट नहीं रखते।

ईसाई धर्मांतरण के प्रयासों को उस युग में पहचान के प्रेमचंद अपने लेख ‘हिंदू सभ्यता और लोक हित’ में लिखते हैं- “हम भी यूरोपियन दावों को अपने अज्ञान के कारण आँखें बंद करके स्वीकार कर लेते हैं और इस तरह अपनी क़ौम के पुराने कारनामों और मौजूदा पर ठीक से कोई राय कायम नहीं करते बल्कि खुद अपने आप को धिक्कारने लगते हैं।“

मार्च  में उनका लेख “हिंदू तहजीब और रफ़ाहे आम” शीर्षक से उर्दू पत्रिका ‘ज़माना’ में प्रकाशित उनका लेख भारतीय दर्शन एवं संस्कृति में प्रेमचंद के अटूट विश्वास को बताता है जब वे ईसा से हज़ारों वर्ष पूर्व सिंचाई, हस्पताल जैसे लोक कल्याणकारी विषयों की हिंदू भारतीय समाज में मिलने वाली प्रत्यक्ष प्राथमिकता पर पूर्ण विश्वास के साथ लिखते हैं।

रामायण और महाभारत पर मुंशी जी कितने प्रेम से लिखते हैं कि अगर संस्कृत साहित्य में सिर्फ़ दो किताबें होती (रामायण और महाभारत) तो भी किसी भाषा का लिटरेचर संस्कृत से आँखें न मिला सकता। प्रेमचंद में भाषा, संस्कृति एवं राजनीति, तीनों के लिए अद्भुत विश्वास एवं गौरव था किंतु वैचारिक स्वतंत्रता के स्वामी प्रेमचंद तीनों में से किसीके भी ठेकेदार होने के हामी न थे।

उनके विचारों में दिशा की धारा तो है पर कट्टरता का बंधन नहीं है। प्रेमचंद जुबानी जमाखर्च करने वाले लेखक नहीं थे, उनके लिए हर सिद्धांत कसौटी पर जाँचना अनिवार्य था। यही कारण था कि वे 8 फरवरी को असहयोग पर भाषण सुनकर सप्ताह भर में सरकारी नौकरी छोड़ देते हैं, परंतु सिद्धांतों से भटकने पर कांग्रेस को खरी खरी सुनाने में संकोच नहीं रखते हैं।

प्रेमचंद की लेखनी कभी शून्य में नहीं रही, वरन सदा एक जीवित और जीवंत आत्मा की सूचक रही। ‘समर यात्रा’ जैसी कहानियाँ असहयोग और दांडी यात्रा को परिप्रेक्ष्य में लेकर चलीं किंतु प्रेमचंद कभी कांग्रेसी चाटुकारिता के चक्कर में नहीं पड़े, यही कारण रहा कि भारतीय साहित्य का यह लाडला फटे जूते पहन कर जीवन के इस सफर से पार हो गया।

जनता का अपार स्नेह पाने वाला यह लेखक न सत्ता के निकट रहा न शक्ति के। ऐसे नेता ही राष्ट्रीय आत्मा और नैतिकता के संरक्षक और अभिभावक होते हैं और यह हर युग और समाज का सौभाग्य होता है यदि उसे ऐसा एक स्वतंत्र विचारक प्राप्त हो जाए।

प्रेमचंद के निर्वाण दिवस पर इस आशा के साथ कि भारत प्रेमचंद के समान स्वतंत्र स्वर के हर युग में उनके आशीर्वाद के रूप में प्राप्त करे। प्रेमचंद के स्वयं के विचार इस संदर्भ में विचारधाराओं की खींचतान में उलझे वर्तमान लेखकों के लिए ध्रुव तारे के सामान मार्गदर्शक होगी। 1925 में प्रकाशित अपने लेख में प्रेमचंद लिखते हैं-

“साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसखरों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है। कम से कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिए।”