भारती
हैदराबाद मेट्रो प्रमुख से वार्ता- “सब क्लब नहीं जा सकते, सार्वजनिक स्थल आनंददायक हों”

“आपको सोचना है कि कैसे आप अपने देश को कैसे अलग बना सकते हैं।”, इस प्रेरणास्पद विचार के साथ हैदराबाद मेट्रो रेल लिमिटेड (एचएमआरएल) का संचाललन कर रहे प्रबंधक निदेशक एनवीएस रेड्डी ने इस परियोजना को कुशलता का पर्याय बना दिया है। इस परियोजना के कई आयामों पर स्वराज्य  के साथ प्रस्तुत है उनकी चर्चा।

हम जानते हैं कि देश में दूसरा सबसे बड़ा परिचालन नेटवर्क हैदराबाद मेट्रो का है और यह अब तक एकमात्र मेट्रो है जो पीपीपी मॉडल के तहत बना है। इसकी और क्या विशिष्टताएँ हैं?

जी हाँ 3 बिलियन डॉलर, यानी कि 20,000 करोड़ रुपये- इस पैमाने का पीपीपी मेट्रो रेल मॉडल विकसित देशों में भी अनसुना है। यह पहला है।

जो इसे विशिष्ट बनाता है, वह इसके निर्माण में निहित तर्क है। जहाँ अधिकांश मेट्रो का निर्माण अभियांत्रिकी और परिवहन परियोजना के रूप में होता है, वहीं मैं इसे एक शहर को पुनर्नियोजित करने के अवसर के रूप में देखता हूँ। पश्चिमी देशों ने अब जाकर इसे समझा है, ऑटोमोबाइल क्रांति के कारण शहरों का विस्तार हुआ जिसका अर्थ यह है कि शहर कारों के लिए डिज़ाइन हुए, लोगों के लिए नहीं!

मेरा मानना है कि शहर महिलाओं, बच्चों, दिव्यांगजनों और वृद्धजनों के लिए सहज बनें। लोगों को अच्छे सार्वजनिक स्थलों का आनंद लेने का अवसर मिलना चाहिए, हर कोई क्लब जाने का खर्च वहन नहीं कर सकता। आपराधिक दरों और सार्वजनिक स्थलों के अभाव में सीधा संपर्क है।

लिंग समानता एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है। महिलाएँ स्वतंत्र रूप से तब विचरण कर सकती हैं जब अच्छा सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध हो। जैसे हम देख सकते हैं कि दुपहिया वाहनों ने किस तरह परिदृश्य को बदला है।

निर्भया घटना के बाद मैंने कई महिला समूहों के साथ कुछ सत्र आयोजित किए थे और मुझे सुरक्षा के विषय में कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हुईं जिन्हें मैंने अपने अभियंताओं से साझा किया। हम सार्वजनिक सुविधा का एक साधन बना रहे हैं, ताज महल नहीं और अभियंताओं का दायित्व है कि वे सामाजिक परेशानियों को समझते हुए तकनीकी समाधान दें। हमने हर स्टेशन पर 64 कैमरे लगाए, इससे स्वतः ही छेड़खानी की घटनाओं में गिरावट होती है।

एक और बात यह है कि ज़मीनी स्तर पर हैदराबाद मेट्रो स्टेशन अलग दिखते हैं। सामान्यतया ऊपर या भूमिगत स्तर पर महल समान ढाँचा होता है लेकिन भूमि तल को अनदेखा किया जाता है क्योंकि सड़के मेट्रो रेल संस्थाओं की नहीं, नगर निगम की होती हैं। विकसित देशों में भी भूमिगत मेट्रो के प्रवेश द्वारा चूहे के बिल जैसे दिखते हैं।

मैंने सड़क तल पर स्ट्रीट फर्नीचर के माध्यम से लैंड्स्केप परिवर्तन का कार्य शुरू किया, हरियाली, साइडवॉक्स (फुटपाथ) विकसित किए। यदि सड़कों पर बढ़ती भीड़ को रोकना है तो सार्वजनिक परिवहन के साथ पैदल यात्रियों के लिए अच्छी व्यवस्थाएँ होनी चाहिए।

हम प्रायः एचएमआरएल के अभियांत्रिकी नवाचारों के विषय में सुनते हैं। क्या आप कोई उदाहरण दे सकते हैं?

एक उदाहरण है हमारे द्वारा प्रयोग की गई प्री-फैब्रिकेटेड स्टेशन संरचना जो कि विश्व में पहली बार ही हुआ था। सामान्यतया ऊपरी स्तर पर बने हुए मेट्रो स्टेशनों की संरचना पोर्टल होती है। मैंने अपने अभियंताओं को चुनौती दी कि वे बैलेंस्ड कैंटीलिवर संरचना बनाएँ जो कि जटिल होती है। शुरू में वे घबराए लेकिन उन्होंने कर दिखाया।

इसलिए एक क्षण के लिए भी हमें ट्रैफिक को नहीं रोकना पड़ा। मेरे गुरु ई श्रीधरन ने इसे एक चमत्कार बताया। हमारी इस प्रकार की कई अभियांत्रिकी उपलब्धियाँ हैं।

एचएमआरएल के प्रबंधक निदेशक एनवीएस रेड्डी

आपको तीसरी बार एक्सटेंशन मिला है। आपका सफलता सूत्र क्या है?

कार्य के लिए उत्साह सबसे महत्त्वपूर्ण है और यही चीज़ है जिसने असंभव, मनहूस आदि कहकर नकार दी गई इस परियोजना को वास्तविकता के धरातल पर उतारा। सात वर्षों तक मैंने बिना एक भी दिन के अवकाश के लगातार काम किया, त्यौहारों पर भी नहीं।

दूसरी चीज़ है कि मैं नए विचारों और समाधानों के प्रति खुलापन रखता हूँ जिसके कारण विरोधात्मक विचारों को भी स्वीकार कर पाता हूँ। इसे परियोजना में 2,600 पियर (स्तंभ) हैं और मैं हर स्तंभ पर एक लेख लिख सकता हूँ कि कैसे इसकी समस्या का समाधान हुआ था।

कुछ चीज़ें ऐसी थीं जिनका पहले से अनुमान नहीं लगाया जा सकता था जैसे कहीं भी खुदाई करने से पहले हमें अपनी बुद्धिमता से सोचना था कि कहाँ पाइपलाइन, सीवेज पाइप, बिजली केबल, आदि नहीं होंगे। क्योंकि ज़्यादातर मामलों में ड्रॉइंग उपलब्ध नहीं होती।

एक ऐसी ही घटना हुई घटना हुई जब हमने उभरी हुई भूमि के काफी नीचे निज़ाम के काल का एक बड़ा-सा नाला पाया। ये चालू था और विधान सभा के सामने ही, वो भी सड़क के बीचोंबीच जिसे हटाया भी नहीं जा सकता। हमें ऐसे समाधान खोजने होते हैं जिसमें कुछ घंटों के लिए भी ट्रैफिक बंद नकरना हो। आम लोग इन चीज़ों से परिचित नहीं होते हैं।

कई बार मैंने स्वयं आवश्यक और व्यवहार्य समाधान खोज निकाला है और फिर अभियंता इसके लिए लाखों गणनाएँ करते थे जिससे संरचना की स्थिरता सुनिश्चित की जा सके। सिर्फ वज़न की बात नहीं है, कई प्रकार के तनाव होते हैं, जिसमें से कुछ भूकंप संबंधी भी होते हैं।

हालाँकि हैदराबाद भूकंप संभावित क्षेत्र नहीं है, फिर भी हमने इन सब चीज़ों को ध्यान में रखकर निर्माण किया है क्योंकि यह निर्माण अगले 100 वर्षों के लिए है। चरम लोडिंग परिस्थिति के हिसाब से डिज़ाइन किया गया है।

मैं मुख्य रूप से एक वित्त संबंधी व्यक्ति हूँ लेकिन रेलवे कर्मचारी महाविद्यालय में हमें अभियांत्रिकी के कई कोर्स पढ़ाए जाते हैं और साथ ही कई वर्षों से परियोजनाओं के काम में ही लगा रहा हूँ। हालाँकि, दो-तिहाई परेशानियाँ अभियांत्रिकी संबंधी नहीं होती हैं, बल्कि सामाजिक, विरासत-संबंधी अन्य समस्याएँ होती हैं। विशेषकर हैदराबाद जैसा संवेदनशील शहर। जब तक आप खुले दिमाग के साथ कार्य नहीं करेंगे, तब तक इनका समाधान नहीं खोज पाएँगे।

साथ ही जब हम पर निशाना साधा जा रहा था तो एक नेता के रूप में मैंने कभी अपने लोगों को इन परेशानियों का सामना नहीं करने दिया, नहीं तो वे हतोत्साहित हो जाते। मैं प्रबंधन और ओलंपिक कहानियाँ सुनाकर उनका मनोबल बढ़ाता रहता था।

जब विरोध हो रहा था तो मैंने एक आरटीसी चालक की सहायता से, जो कविताएँ लिखता था, मेट्रो समर्थक गाने लिखे। हमने 5,000 सीडी जारी कीं और उन्हें उत्सव पांडालों में बजाया जिससे वे लोकप्रिय हो गए। ये अधिक लोगों को प्रभावित करते हैं, बजाय वायु प्रदूषण जैसी बातों से। संनाद आवश्यक है।

यदि आप अपने कार्य के प्रति उत्साह रखते हैं व अपने कार्य में आनंद की अनुभूति करते हैं तो आपको समाधान मिलते जाते हैं और कई नवाचार भी होते हैं।

आपने पीपीपी मोड के बारे में ही क्यों सोचा?

मैंने श्रीधरन जी के साथ कोंकण रेलवे में काम किया था, बाद में मैं एससी रेलवे के माध्यम से संगठित आंध्र प्रदेश में आया।

मेरा एक सपना था- अगर दिल्ली में मेट्रो हो सकती है, तो हैदराबाद में क्यों नहीं? 2006 में, जब हमने मुख्यमंत्री वाईएसआर से अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उनका जवाब था- “ठीक है, लेकिन मुझसे पैसे मत मांगो!” उन्होंने मुझे एक मॉडल के बारे में सोचने के लिए कहा-“आपने कई परियोजनाओं पर कार्य किया है और आप अपने नवाचार के लिए जाने जाते हैं।”

मैंने नगर निगम में एकल-पुरुष संगठन के रूप में यह परियोजना शुरू की; बाद में मैं इससे स्वतंत्र होना चाहता था और 2007 में एचएमआरएल का गठन किया गया। मेरे पास सर्वश्रेष्ठ अभियंता, प्रतिभाशाली लोग थे, लेकिन निजी क्षेत्र के प्रति उनके मन में संदेह था।

मैंने रेलवे में काम किया था और जानता था कि रेल परिचालन जटिल है; लेकिन मेरा तर्क था, यदि आप हवाई सुरक्षा के लिए निजी क्षेत्र पर भरोसा कर सकते हैं, तो रेल सुरक्षा निश्चित रूप से कम जटिल है। आप देखें, रेलवे में अधिक सुधार नहीं हुए हैं, लेकिन धीरे-धीरे, मैंने उन सबका मत परिवर्तित किया।

हमें शून्य से तकनीकी दस्तावेज, रियायती समझौता-पत्र आदि तैयार करने थे। ये उपलब्ध नहीं थे क्योंकि दुनिया में चार-पाँच परियोजनाएँ ही पीपीपी मॉडल पर आधारित हैं, और वह भी आंशिक रूप से। अधिकतर, ये सरकारी परियोजनाएँ हैं, जिसमें दूसरी प्रणाली अपनाई गई है- यदि सरकार आपको पैसा देती है, तो आप निर्माण करेंगे और कोई आपकी बारीकियों पर ध्यान भी नहीं देगा।

लेकिन यदि यह एक निजी चीज़ हो तो आपको बेहद सावधान रहना होगा। मैं गजेंद्र हल्दिया जैसे विशेषज्ञों के साथ बैठा, और इसकेे प्रत्येक खंड पर विस्तार से चर्चा की।

ये तकनीकी दस्तावेज़ खजाने के समान मूल्यवान होंगे…

हाँ, योजना आयोग ने 2009 में उन्हें ‘मानक रियायत करार’ के रूप में प्रकाशित किया, जो किसी के भी मार्गदर्शन के लिए सभी जगह उपलब्ध है। मैंने इन्हें प्रौद्योगिकी-तटस्थ बना दिया है, जहाँ आप उन्हें यह नहीं बताते कि कैसे डिज़ाइन किया जाए, लेकिन उन्हें व्यापक मापदंडों, सुरक्षा आवश्यकताओं, प्रदर्शन सूचकांकों, आदि देते हैं। पुणे अब इसका अनुसरण कर रहा है।

जब मेटास के साथ प्रारंभिक समझौता विफल हो गया, तो क्या यह गति अवरोधक था?

हाँ, लेकिन आपको विफलता से निपटना चाहिए। संकट प्रबंधन यही है कि आप अलग तरीके से कैसे सोचते हैं? आपको यह सोचना होगा कि आप अपने देश को अलग कैसे बना सकते हैं।

कई शीर्ष लोग आत्महत्या करते हैं क्योंकि एक, आप शीर्ष पर अकेले होते हैं, और दो, दबाव अधिक होता है। भारत में, आप इस बात से भी चिंतित होते हैं कि समाज क्या सोचता है। आजकल मैं ने विफलता प्रबंधन, संकट के दौरान नेतृत्व और उच्चतम स्तरों पर दबाव के बारे में संस्थानों में व्याख्यान देता हूँ।

एल एंड टी के रियायतकर्ता के रूप में आने के बाद भी क्या यह सफर बाधाओं से भरी थी?

हाँ, ये सही है। हमें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा! भारी विरोध प्रदर्शन हुए, मेरे पुतले कई बार जलाए गए और मुझे पुलिस सुरक्षा दी गई।

इस देश में, हमारे पास अत्यधिक स्वतंत्रता है और हम महसूस नहीं करते हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल अधिकार नहीं है, बल्कि कर्तव्य और दायित्व भी हैं। कोई हार्वर्ड, एमआईटी या स्टैनफोर्ड आपको भारत के संवेदनशील नगरों में एक परियोजना करने का तरीका नहीं सिखा सकता है।

अत्यधिक धैर्य और दृढ़ता की आवश्यकता थी। किसी भी धार्मिक संरचना में एक से डेढ़ साल की बातचीत होती है, भले ही हमारे इंजीनियरिंग समाधानों ने सुनिश्चित किया हो कि मुख्य संरचना प्रभावित न हो, लेकिन परिसर की दीवारों के लिए भी आपत्तियाँ उठाई गई थीं। अन्य कारणों से, हमें राजनेताओं, गैर-सरकारी संगठनों, सभी प्रकार के निहित स्वार्थों द्वारा लक्षित किया गया था।

एनवीएस रेड्डी (बाएँ) का साक्षात्कार लेती हुईं स्वराज्य सहयोगी स्वाति कमल (दाएँ)

कुछ लोगों का मानना है कि मेट्रो के बजाय बस रैपिड ट्रांज़िट सिस्टम (बीआरटीएस) होना चाहिए ?

इस देश में हर कोई विशेषज्ञ है! लोगों ने यहाँ तक ​​कहा कि मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट सिस्टम (एमएमटीएस) मेट्रो से बेहतर है,उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि यह मैं ही था जिसने एमएमटीएस का निर्माण किया था- और संयोगवश, उन्होंने तब इसका विरोध किया था।

खैर, मैं बीआरटीएस के बारे में बात करने वाला पहले कुछ भारतीयों में से एक था, लेकिन तब मुझे इसकी सीमाओं का एहसास हुआ। तथ्य यह है कि हमारे शहर योजनाबद्ध नहीं हैं। हमारे पास ‘सड़कों का एक पदानुक्रम’ नहीं है, जहाँ एक मुख्य सड़क उप-मुख्य सड़क की ओर जाती है, जो आगे सड़कों के निचले चार स्तरों की ओर ले जाती है।

इसके बजाय, हमारे पास मुख्य सड़क से सीधे गलियों से जुड़ी हुई हैं और यह कि हर कुछ सौ मीटर पर आपको चौराहा (जंक्शन) मिल जाता है। परिवहन और यातायात अभियंता यह देखकर अचंभित हैं कि किसी भी भारतीय शहर में जंक्शन की क्षमता से तीन-चार गुना अधिक ट्रैफिक कैसे चलता है!

आपको याद होगा कि परिवहन क्षेत्र में मज़बूत लॉबियाँ हैं- एक मज़बूत मेट्रो लॉबी, एक मोनोरेल लॉबी, एक मज़बूत बीआरटीएस लॉबी, आदि। सभी विधाओं के गुण और अवगुण हैं।

आप हैदराबाद एयरपोर्ट मेट्रो लिमिटेड (एचएमआरएल) के साथ एलिवेटेड बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (ईबीआरटीएस) में भी शामिल हैं…

हाँ, मैं बीआरटीएस के साथ काम करने को काफी उत्सुक हूँ, यह दक्षिण अमेरिकी शहरों में सफलतापूर्वक लागू किया गया है। बड़े भारतीय शहरों में, आमतौर पर पस्थितियाँ अनुकूल नहीं होती है- रोड स्तर पर यह संभव नहीं है। विशेष रूप से जंक्शनों पर समस्याएँ होती हैं क्योंकि आपको इसे समर्पित मार्ग देने की आवश्यकता होती।

इस परिस्थिति में, समर्पित मार्ग के साथ हम इसे बना रहे हैं। यह मेट्रो की आधी लागत पर है; हर आधे किमी. पर आपके पास एक बस स्टेशन है, जो लगभग एक मेट्रो स्टेशन जैसा दिखता है, और कोई प्रदूषण नहीं है क्योंकि वे सभी इलेक्ट्रिक वाहन हैं।

ईबीआरटीएस के लिए एचएमआरएल की क्या सोच और समाधान है?

मेरे पास विशेषज्ञता है क्योंकि मैं पहले सड़क, फ्लाईओवर परियोजनाओं में शामिल रहा हूँ। बोली लगाने के बाद यह एक और पीपीपी होगा।

और फिर हम इसे मेट्रो के साथ जोड़ेंगे। यह कोरिडोर 1 के केपीएचबी स्टेशन से शुरू होकर कॉरिडोर 3 के माइंडस्पेस जंक्शन मिलेगा और बीच में कुछ अन्य संयोजन भी होंगे।

हम निश्चित रूप से उनका मार्गदर्शन कर सकते हैं, मेरे कुछ अभियंता अच्छी तरह से इसमें प्रशिक्षित हैं, और मेट्रो के साथ तालमेल हो सकता है।

क्या अगस्त के अंत में, रायदुर्ग स्ट्रेच पर काम निर्धारित समयानुसार पूरा हो जाएगा?

हाँ, कुछ और महीने, शायद सितंबर तक।

आप परियोजनाओं में “न्यूनतम” का सिद्धांत कैसे बरकरार रख पाते हैं क्योंकि प्रसिद्ध “अधिक समय और लागत” इस प्रकार की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में नैसर्गिक माना जाता है?

मैं इस पर अभी टिप्पणी नहीं करना चाहूँगा।

लेकिन कोई समाधान होगा ताकि ये लंघन बिल्कुल न हो?

समाधान हैं। यदि मैंने एक सामान्य नौकरशाह की तरह व्यवहार किया होता तो यह परियोजना नहीं हुई होती। भले ही रियायती समझौता इस बारे में बात करता है कि सरकार को क्या करना चाहिए और रियायतकर्ता को क्या करना चाहिए, यह उस अनुसार काम नहीं करता है। आपको सक्रिय रहना होगा।

इसके अलावा, मैंने अपने लोगों के लिए एक ढाल की तरह काम किया और निजी क्षेत्र के साझेदारों को सारी चीज़ों से सुरक्षित रखा- मैं मेट्रो का चेहरा था और सभी तरह के राजनीतिक दबावों को संभाला।

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बात करें तो मैंने मन बना लिया था कि किसी को 1 रुपया भी नहीं दिया जाएगा। सौभाग्य से, सभी मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों ने मेरा समर्थन किया। मैंने पाँच मुख्यमंत्रियों और 13 मुख्य सचिवों से निपटकर इस परियोजना को पूरा किया है।

पुराने शहर के खंड के निर्माण में देरी क्यों हो रही है? क्या इसके विरोध और अन्य मुद्दों को हल नहीं मिला है?

नहीं, पुराने शहर में अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है। कई मुद्दे हैं और मैं इसपर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता।

अब `वे’ तैयार हैं, लेकिन अब अन्य मुद्दे भी हैं। प्रारंभिक दौर में यह आसानी से किया जा सकता था, लेकिन…

क्या आपको विश्वास है कि 2022 तक यह परियोजना पूरी की जाएगी?

जैसा कि मूल मॉडल में उल्लेख किया गया है, यह पाँचवें वर्ष में ही समाप्त हो जाएगा, या शायद थोड़ा बाद में, लेकिन यह होगा अवश्य। मैंने इसे इसी तरह डिज़ाइन किया है।

आपने इसे कैसे डिज़ाइन किया है?

दुनिया में केवल चार मेट्रो प्रणालियाँ पैसा कमा रही हैं। उन्हें सरकारी परियोजनाओं के रूप में ही बनाया गया था, लेकिन उन्हें बाद में निजी क्षेत्र की दक्षता का एहसास हुआ। वहाँ, 50 प्रतिशत राजस्व यात्री किराए और 50 प्रतिशत संपत्ति विकास से आती है।

वित्तीय विकल्पों के लिए, आपको गहन चिंतन करना होता है और तब जाकर कोई विचार आता है। जैसे स्टेशन के लिए 2 एकड़ भूमि में से मैंने केवल 0.5 एकड़ पर मेट्रो भवन बनाया; बाकी भूमि रियायतकर्ता एल एंड टी को एक मॉल बनाने के लिए दिया गया।

अंतिम छोर तक संयोजकता की मानक समस्या के लिए आपने पार्किंग एग्रीगेटर के साथ करार किया था, लेकिन इसमें भी कुछ समस्याएँ थीं…

निहित स्वार्थ जहाँ हो, वहाँ शुरुआती समस्याएँ उत्पन्न होती ही हैं, लेकिन वैसे सनसनीखेज भी नहीं है जैसा कुछ लोग मानते हैं।

हम बहुत काम अलग तरह से कर रहे हैं। कई चीजें हो रही हैं, जिनका मैं इस स्तर पर उल्लेख नहीं करना चाहता। कुछ उदाहरण एक बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक चार्जिंग सुविधाएँ, शटल सेवाएँ हैं। और जनता के पैसे खर्च किए बिना।

आप जनता का धन खर्च नहीं करना चाहते और निजी क्षेत्र को शामिल करने की बात करते रहते हैं। निजी क्षेत्र निवेश क्यों करना चाहेगा?

मैं बाज़ार की ताकतों में विश्वास करता हूँँ, अन्यथा यह सब्सिडी की तरह हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि मैं निजी क्षेत्र पर आँख मूंदकर भरोसा करता हूँ। मैं एकाधिकार को प्रोत्साहित नहीं करता, और उन्हें बताता हूँँ कि प्रतिस्पर्धा का सामना करने की आवश्यकता है। लेकिन मैं निजी क्षेत्र की उद्यमिता और लचीलेपन में दृढ़ता से विश्वास करता हूँ, और मैं कई अभियंताओं को प्रोत्साहित और परामर्श देता हूँ। समाधान हमेशा खोजा जा सकता है।

लाभ के बावजूद, मेट्रो रेल का निर्माण महंगा पड़ता है। आपके अनुसार बेहतर संयोजकता हेतु अन्य विकल्प क्या हैं?

मेट्रो की हमेशा आवश्यकता नहीं होती और सस्ते विकल्पों के बारे में सोचा जा सकता है। सबसे व्यस्त घंटे में सबसे व्यस्त दिशा में जाने वाला ट्रैफिक (पीएचपीडीटी) नामक एक अवधारणा है। बिंदु अ से बिंदु ब तक, कितने लोगों को ले जाने की आवश्यकता है, उसी से निर्धारित किया जाना चाहिए कि परिवहन के लिए कौन-सी विधि और प्रणाली निर्मित होनी चाहिए है।

मेट्रो से आवागमन के लिए भारी संख्या में लोगों के होने के बावजूद, ट्रैफ़िक में फँसने की समस्या बनी हुई है। इसका समाधान कैसे किया जा सकता है?

ये हमेशा बनी रहेंगी। कोई भी शहर अपनी सभी यातायात समस्याओं को हल करने में सक्षम नहीं है।

आज हैदराबाद में 50 लाख वाहन हैं और शहरीकरण व कार स्वामित्व में वृद्धि के कारण हर साल 5 लाख नए वाहन जुड़ रहे हैं। भारतीय  सड़कों पर कारें जिस दर से आ रही हैं; सिर्फ शहर ही नहीं बल्कि गाँव भी इस तरह की संकरी गलियों और दोनों तरफ की कारों के कारण स्थगित हो जाएँगे या हिंसा की चपेट में आएँगे।

क्या अधिक फ्लाईओवर इसमें मदद कर सकते हैं?

फ्लाईओवर की आवश्यकता है, लेकिन यह केवल एक मध्यावधि समाधान हो सकता है। दीर्घकालिक समाधान अच्छा सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्री सुविधाएँ, और पहले छोर से अंतिम छोर संयोजकता है। ताकि निजी वाहनों की बिल्कुल भी ज़रूरत न पड़े।

पैदलयात्रियों की सुविधाओं के लिए जगह की आवश्यकता होती है, और हम भारतीयों की आरोपित आदतें भी होती हैं। तब आप इन सपनों को वास्तविकता में कैसे बदलेंगे?

हमने इसे जुबली हिल्स की सड़क संख्या 36 पर किया है। हमने पाया कि कई घरों ने घर-योजना का उल्लंघन किया था; हमने निर्दयतापूर्वक उन अतिक्रमणों का विध्वंस किया। कल्पना करें 370 अदालती मामलों में से हम 360 जीते और ज्यादातर भूमि-अधिग्रहण के मामले थे।

इस मामले में मैं केंद्र और राज्य की सरकारों को श्रेय देता हूँ, क्योंकि मुझे कोई धमकियाँ नहीं मिलीं। बेशक, मैं कुछ लोगों के बीच काफी अलोकप्रिय हो गया था, लेकिन यह किया जाना आवश्यक था।

तेलंगाना सरकार ने ऐसा कुछ काम किया है जो अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बने?

कई राज्य कार्य कर रहे हैं, लेकिन कभी-कभी सरकारें हमेशा सही प्राथमिकता नहीं रखती हैं। वहाँ पर द्रष्टा नौकरशाह महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

मेट्रो प्रमुख के रूप में जनता के लिए आपका क्या संदेश है?

कृपया जिम्मेदार और अनुशासित रहें। हम सामूहिक रूप से शहर और हमारे स्वास्थ्य को बहुत नुकसान पहुँचा रहे हैं- जहाँ भी संभव हो सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें!

क्या हैदराबाद में मेट्रो को नुकसान पहुँचाने की कोई घटना आपके सामने आई है?

नहीं, उल्लंघन शहर नियोजन में थे; मेट्रो संपत्ति के साथ, लोग बहुत अच्छा व्यवहार कर रहे हैं! मैं इसके लिए उन्हें धन्यवाद देता हूँ।