भारती
संदिग्ध चीनी कंपनी हुआवे को भारतीय 5जी जगत में प्रवेश मिलना चाहिए या नहीं

भारत के 5जी बाज़ार में चीनी कंपनी हुआवे को अवसर मिलेगा या नहीं, इसपर अभी भी असमंजस बना हुआ है। अगस्त से संभवतः शुरू होने वाले 5जी के ट्रायल के लिए दूरसंचार मंत्रालय के पैनल ने सुझाव दिया था कि भारत की प्रमुख दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों- भारती एयरटेल, रिलायंस जियो व वोडाफोन-आइडिया को अवसर दिया जाए। वहीं दूसरी ओर हुआवे भारत में अपना कारोबार चलाकर वैश्विक स्तर पर अपनी छवि सुधारना चाहता है।

क्या हुआ हुआवे की छवि को?

2009 से सफलता की उड़ान भरने वाली निजी कंपनी हुआवे की चीनी सरकार ने भी बड़ी सहायता की है। कंपनी पर आरोप है कि चीनी सरकार दूसरे देशों पर नज़र रखने और डाटा चोरी के लिए इसका उपयोग कर रही है। पीपल्स लिबरेशन पार्टी व चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंधों की बात और हुआवे के संस्थापक रेन ज़ेंगफाई का पूर्व सेनाधिकारी होना संदेह को और गहरा करता है।

यूएस ने अपने 5जी नेटवर्क से चीनी कंपनी को तो दूर रखा ही है, साथ ही यूरोपीय देशों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। जासूसी के डर से यूएस के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, कनाडा, जापान और ताइवान ने भी हुआवे पर प्रतिबंध लगा दिया है।

15 मई 2019 को यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आपातकालीन कार्यकारी आदेश जारी कर कंपनी पर पूर्ण प्रतिबंध की बात कही। हालाँकि ओसाका की जी20 समिट के बाद उन्होंने अमेरिकी कंपनियों को हुआवे के साथ व्यापार करने की ढील दी है लेकिन इसके प्रभाव का कुछ दिनों बाद ही पता चल पाएगा।

क्या हुआवे के विरुद्ध मिला कोई साक्ष्य?

2012 में हुआवे की जाँच की गई थी जिसपर यूएस कांग्रेस ने निष्कर्ष निकाला था कि चीनी सरकार के साथ अपने संबंधों को कंपनी ने उजागर नहीं किया। साथ ही माना गया था कि कंपनी यूएस नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं कर रही थी। सीआईए ने दावा किया है कि इसकी जाँच में पाया गया कि हुआवे को पीपल्स लिबरेशन आर्मी, चीनी राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग और चीनी खुफिया एजेंसी द्वारा वित्तीय रूप से पोषित किया जाता है। हालाँकि, किसी भी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

अंग्रेज़ी भाषी राष्ट्रों के समूह फ़ाइव आईज़ के देशों को भी अमेरिका ने आगाह किया था। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड ने किसी जाँच की जानकारी दिए बगैर ही कंपनी को 5जी नेटवर्क से दूर रखा है। वहीं दूसरी ओर यूके ने राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा केंद्र से हुआवे की जाँच करवाई जिसमें अधिकारियों ने माना कि कुछ तकनीकी कमियाँ हैं जो साइबर सुरक्षा के लिए सुधारी जानी चाहिए लेकिन उन्होंने चीन का कोई अनैतिक हस्तक्षेप इसमें नहीं पाया।

तकनीकी सुधारों के लिए अधिकारियों ने हुआवे को सूचित कर दिया है व कंपनी इसपर कार्य करने के लिए तैयार है। साथ ही कोर उपकरणों का अधिकार ईई को ही देने की बात कही गई है। जर्मनी ने भी कुछ इसी प्रकार का निर्णय लिया है जिसमें मुख्य उपकरण भरोसेमंद कंपनियाँ बनाएँगी लेकिन हुआवे का 5जी जगत में स्थान रहेगा क्योंकि जर्मनी के फेडरल नेटवर्क एजेंसी के अध्यक्ष जोशन होमैन का मानना है कि हुआवे के माध्यम से वे 5जी को जल्द बहाल कर पाएँगे।

5जी जगत में हुआवे का स्थान

जब जर्मनी जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश को 5जी की त्वरित बहाली के लिए हुआवे की आवश्यकता है तो यह देखना आवश्यक है कि ऐसी कौनसी तकनीकी निधि हुआवे के पास है। हुआवे के पास दुनिया की किसी भी कंपनी से अधिक 5जी पेटेंट हैं। जहाँ हुआवे के पास 1529 पेटेंट हैं, वहीं दूसरे स्थान पर नोकिआ के पास 1397 और तीसरे स्थान पर सैमसंग के पास 1296 पेटेंट हैं। आईपीलिटिक्स के डाटा के अनुसार 5जी मानक में तकनीकी सहयोग करने वाली कंपनियों में भी हुआवे सबसे आगे है। जहाँ हुआवे ने 11,423 सुझावों से सहयोग किया है, वहीं दूसरे स्थान पर एरिकसन है जिसने 10,351 सुझाव दिए हैं।

5जी तकनीक का उपयोग करने वाला हर उपकरण बनाने में यह सक्षम है। सैमसंग के बाद सबसे बड़ी स्मार्टफोन निर्माता हुआवे है और इसका दावा है कि 2020 तक यह सैमसंग को भी पीछे छोड़ देगी। अधिकांश पेटेंट होने के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि हुआवे सबसे उन्नत हैंडसेट और चिपसेट बनाएगी। साथ ही यह अन्य कंपनियों को भी हुआवे की तकनीक का प्रयोग करना होगा। शायद इसी कारण स्वीडन के इंटरनेशनल अफेयर्स संस्थान के रुहलिग का कहना है कि हुआवे उपकरणों के बिना भी चीन 5जी नेटवर्क को हैक करने में सक्षम है।

अमेरिका की बात को ब्रिटेन और जर्मनी दोनों ने अनसुना किया है जिसका प्रमुख कारण है कि इन देशों के 4जी इंफ्रास्ट्रक्चर में हुआवे का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कंपनी ने दावा किया है कि उसे 30 देशों में 46 व्यवसायिक 5जी कॉन्ट्रैक्ट मिले हैं और विश्व भर में इसके 1 लाख से ज़्यादा 5जी स्टेशन हैं। हुआवे को अनुबंध देने वाले प्रमुख देशों में दक्षिण कोरिया, स्विट्ज़रलैंड, यूके और फिनलैंड हैं।

भारत में 5जी

भारत की तीन प्रमुख दूरसंचार कंपनियाँ 5जी तकनीक विकसित करने के लिए तैयार हैं। जहाँ एयरटेल, जियो और वोडाफोन-आइडिया नेटवर्क प्रदाता होंगे, वहीं हार्डवेयर के लिए भी तीन कंपनियों का नाम सामने आया है। जियो और सैमसंग, नोकिआ और एयरटेल व एरिकसन और वोडाफोन-आइडिया साझेदार बन सकते हैं। वैश्विक स्तर पर भले ही यह कंपनियाँ हुआवे से पीछे हैं लेकिन इनके पास भी पर्याप्त तकनीक व पेटेंट हैं।

सरकार के विज्ञान-संबंधी सलाहकार के. विजय राघवन का मानना है कि हुआवे को भारत के 5जी से दूर ही रखा जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार समिति के अध्यक्ष पीएस राघवन का मानना है कि 5जी देशों के बीच शीत युद्ध का माध्यम बन रहा है, ऐसे में भारत को इन सबमें नहीं पड़ना चाहिए, अर्थात चीनी कंपनी को 5जी से दूर रखने का निर्णय समयपूर्व होगा।

संभवतः इन कंपनियों को ट्रायल के लिए तीन माहों का समय दिया जाएगा और इसके बाद स्पेक्ट्रम की नीलामी होगी। हालाँकि नीलामी के लिए प्रस्तावित स्पेक्ट्रम शुल्क अभी आवश्यकता से अधिक है और यह भारत के दूरसंचार विकास को और पीछे धकेल देगा। स्वराज्य  का सुझाव है कि कुशलतापूर्वक लागू करने के लिए स्पेक्टर्म शुल्क को प्रस्तावित शुल्क के आधे से दो-तिहाई तक किया जाना चाहिए।

चीन और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

यूएस के विरोधी रूस ने हुआवे के साथ अनुबंध कर लिया है और साथ ही यह कहा है कि तकनीक में दूसरे देश को आगे बढ़ता देख यूएस हुआवे पर प्रतिबंध की यह कूटनीतिक चाल चल रहा है। यह बात अतार्किक तो नहीं है, चीनी कंपनी के उत्थान के साथ विश्व का तकनीकी केंद्र वॉशिंगटन से बीजिंग स्थानांतरित हो जाएगा। हमेशा बौद्धिक संपदा पर पकड़ बनाए रखने के बाद यूएस के लिए इस वास्तविकता को स्वीकार करना कठिन होगा।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि विकसित देश हुआवे को बाहर रखने का निर्णय ले सकते हैं लेकिन विकासशील देशों को सभी दिशाओं से आ रही तकनीक का स्वागत करना चाहिए। हुआवे के अलावा भी भारत जिन 5जी हार्डवेयर का उपयोग करेगा, वे विदेशी कंपनियाँ ही हैं। लेकिन चीन से अधिक सजग होने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि चीन का नियम है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक डाटा सरकार निजी कंपनियों से भी ले सकती है। कई देशों को मनाने के जतन में हुआवे संस्थापक यह कह तो रहे हैं कि वे कंपनी को सरकारी हस्तक्षेप से दूर रखेंगे लेकिन लिखित में कोई प्रावधान उपलब्ध नहीं है।

भारत और चीन के संबंध की बात की जाए तो बीआरआई के अंतर्गत सीपेक का निर्माण कर चीन भारत की संप्रभुता को हानि पहुँचा रहा है, ऐसे में चीन का 5जी भारत के लिए खतरा उत्पन्न नहीं करेगा, इसपर विश्वास करना कठिन हो जाता है। हुआवे को बाहर रखने से चीन भारत की आलोचना अवश्य करेगा लेकिन भारत को इससे चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि चीन से हमारे संबंध पहले से ही कुछ विशेष नहीं हैं।

हो सकता है हुआवे के प्रवेश से भारत में 5जी का विस्तार तेज़ी से हो लेकिन अंततः 5जी इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स से जुड़ेगा और हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर का अभिन्न अंग होगा। ऐसे में चीन के लिए कब्ज़ा करना कठिन नहीं होगा और साइबर युद्ध में यकीन करने वाला चीन इससे पीछे भी नहीं हटेगा। इस स्थिति के लिए कई लोकोक्तियाँ और लोकगाथाएँ बनी हैं जैसे ‘दुर्घटना से देर भली’ और ‘कछुए-खरगोश की होड़’ वाली कहानी।

भारत में 5जी का विकास भले ही धीरे हो लेकिन सुरक्षित हो। फिर भी यदि भारतीय प्राधिकरणों को चीनी कंपनी की आवश्यकता महसूस होती है तो वे साइबर सुरक्षा की जाँच कर व अनुबंध के कुछ विशेष नियम तय कर चीनी सरकार के हस्तक्षेप पर लगाम लगा सकते हैं, जैसा कई देश कर रहे हैं। निश्चित रूप से भारत को यूएस की चेतावनी पर आँख मूंद कर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें उसका अपना स्वार्थ छिपा है, साथ ही केवल विकासशील देश के सद्भाव से भी चीन के लिए द्वार नहीं खोलने चाहिए। लेकिन हाँ यदि निरीक्षण के बाद यदि थोड़ा भी संदेह हो तो चीन ऐसा देश नहीं है जिसपर भरोसा किया जाए।