भारती
संविधान हिंदू राष्ट्र की बाधा नहीं, समस्या जिस भाषा में इसकी कल्पना हुई वह है

आशुचित्र- भारतीय संविधान के साथ एक समस्या यह है कि इसका विचार और लेखन पूर्ण रूप से एक विदेशी भाषा, अंग्रेज़ी में हुआ।

हिंदू राष्ट्र का पक्ष तीन बातों पर आधारित है। पहला यह कि क्या हमें स्वीकार है कि भारत एक सभ्यतागत-राज्य हो जिसकी जड़ें इसकी प्राचीन आत्मा और मूल्यों में निहित हो।

दूसरा यह कि हिंदू राष्ट्र की परिभाषा क्या इस विचार से असहमत लोगों समेत सभी हितधारकों के लिए सकारात्मक लाभ बन सकेगी और तीसरा यह कि क्या वर्तमान संवैधानिक दस्तावेज मौलिक आदर्शों से समझौता किए बिना इस विचार को समर्थन कर पाएँगे।

विश्व में तीन प्रकार के राज्य अस्तित्व में हैं- वेस्टफैलियन राष्ट्र-राज्य जहाँ नस्ल, धर्म और संस्कृति को मिलाकर किसी रक्षा योग्य भूभाग में रह रहे निवासियों को परिभाषित किया जाता है। ये विचार यूरोप के इतिहास और भूगोल के संदर्भ के रूप में विकसित हुआ एवं इसका विस्तार वहाँ हुआ जाहँ यूरो-केंद्रित संस्कृति ने प्रभुत्व जमाया।

17वीं शताब्दी में राष्ट्र-राज्य के वेस्टफैलियन विचार का उद्भव हुआ जब छोटे-बड़े राज्य और साम्राज्य 30 वर्षों तक युद्ध करते रहे परंतु कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला। हिस्टरी टुडे में इसे ऐसे वर्णित किया गया है-

युद्ध या एक दूसरे से जुड़े युद्धों की शृंखला 1618 में शुरू हुई जब ऑस्ट्रेयिआई हैब्सबर्ग्स ने रोमन कैथोलिकवाद बोहेमिया के प्रोटेस्टेन्ट पर आरोपित करने का प्रयास किया था। इससे प्रोटेस्टेन्ट कैथोलिकों के विरुद्ध हो गए, होली रोमन साम्राज्य फ्रांस के विरुद्ध, जर्मन राजकुमार साम्राज्य और एक-दूसरे विरुद्ध, फ्रांस स्पेन के हैब्सबर्गों के विरुद्ध।

स्वीड्स, डेन्स, पोल्स, रूसी, डच और स्विस सभी इसमें खींच लिए गए थे या स्वयं कूद पड़े थे। व्यावसायिक स्वार्थों और प्रतिद्वंद्वों ने भी भूमिका निभाई, और धर्म एवं सत्ता आधारित राजनीति का भी इसमें योगदान रहा।

युद्ध तब ही समाप्त हुआआ जब बहुत से युद्धरत राज्य निरंतर युद्धों से थक गए थे और इसे जारी रखने को व्यर्थ माना। लेकिन अंतिम संधि तक पहुँचने में झगड़ालू वार्ताओं ने चार वर्षों (1644-48) का समय लिया- इन चर्चाओं में 194 राज्यों एवं 179 पूर्णाधिकारियों ने भाग लिया- उत्तर-पश्चिमी जर्मनी में स्थित छोटे से नगर वेस्टफैलिया में इसपर हस्ताक्षर हुए।

इस संधि में राष्ट्र-राज्यों के अधिकार व भूमिकाएँ परिभाषित की गईं थीं जिसके अनुसार हर राज्य का अपने भूभाग पर संप्रभुत्व था। यूरोप के बाहर राष्ट्र-राज्य नस्ल और जनजातीय एकल-संस्कृति (जैसे चीन, जापान, कोरिया, आदि) पर आधारित हैं। इन्हें सभ्यतागत राज्य भी कहा जा सकता है, विशेषकर यदि सैकड़ों वर्षों पीछे जाकर देखा जाए।

इसके बाद आते हैं ऐसे राष्ट्र जो मुख्य रूप से धार्मिक पहचान के आधार पर परिभाषित होते हैं जैसे सऊदी अरब, पाकिस्तान और अधिकांश मुस्लिम विश्व जहाँ भूगोल की भूमिका नहीं रहती।

इज़रायल को मिश्रित धर्म और सभ्यतागत पहचान पर आधारित राज्य माना जा सकता है। इसके बाद आते हैं आधुनिक “धर्मनिरपेक्ष” राज्य जो एक कृत्रिम संविधान के आधार पर पहचाने जाते हैं (यूएस और अधिकांश आधुनिक यूरोप)।

वामपंथी-उदारवादियों और अधिकांश औपनिवेशिक इतिहासकारों के अनुसार “धर्मनिरपेक्ष” राज्य वह है जहाँ राष्ट्रीयता पूर्ण रूप से एक कृत्रिम संविधान से परिभाषित होती है। कई नस्लों, धार्मिक प्रथाओं और भाषाई विविधताओं का यह मेल होता है जिनकी कोई एक सभ्यतागत पहचान नहीं है।

कुछ वामपंथी भारत को भी राज्य-राष्ट्र मानते हैं जहाँ विभिन्न राज्य अतार्किक रूप से एक “राष्ट्र” में समूहबद्ध हैं। लेकिन हमने ऊपर देखा कि कैसे राधामुकुंद मुकर्जी ने एक शताब्दी पूर्व ही लिख दिया था कि हिंदू राष्ट्रीय पहचान एक सामान्य साझा पवित्र भूगोल और तीर्थस्थलों से अभिव्यक्त होती है।

दिल्ली उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करने वाले जे साईं दीपक ने हाल ही में सभ्यतागत-राज्य के विचार पर लेखों की शृंखला लिखी थी। इसमें उन्होंने बताया कि पश्चिमी विद्वानों ने वेस्टफैलिया की संधि से बाहर राष्ट्र के विचार को नकारा है जिसे उपनिवेश-पश्चात (पोस्ट-कॉलोनियल) के भारतीय विद्वानों ने मान लिया, तब ही वे भारत को विभिन्न राष्ट्रीयताओं के राज्य-राष्ट्र के समूह के रूप में देखते हैं।

द संडे गार्जियन में प्रकाशित लेख शृंखला में साईं दीपक लिखते हैं, “सबसे अधिक दिखाई देने वाली लेकिन फिर भी सबसे कम समझी जाने वाली बात है ‘राष्ट्र-राज्य’ के पश्चिमी ज्ञानमीमांसीय साम्राज्यवाद अर्थात उपनिवेश के विचार के परिणाम।

यह आश्चर्यजनक नहीं है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण अवश्य है कि यह लगभग सर्व-स्वीकार्य है और राष्ट्र के राज्यत्व प्राप्ति की अभिलाषा को वैध ठहराने के लिए इसी को मानदंड के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि पश्चिम द्वारा परिभाषित ‘राष्ट्र’ की परिभाषा में लोग नहीं आते हैं तो वे राजनीतिक संगठन के रूप में पश्चिम द्वारा स्वीकृत राष्ट्र-राज्य नहीं बन सकते हैं।

कोई भी एक, स्थाई और अकादमिक परिभाषा परिवर्तनशील ऐतिहासिक घटनाओं के साथ न्याय नहीं कर सकती है लेकिन फिर भी राष्ट्र-राज्य के संदर्भ में राष्ट्र की अनुमानित परिभाषा- ऐसा समूह जो सचेत सांस्कृतिक समरूपता से जुड़ा है और राज्यत्व की आकांक्षी साझा करता है, उसे राष्ट्र कहा जा सकता है।”

साईं दीपक तर्क देते हैं कि भारत के संविधान निर्माताओं ने जब माना था कि इंडिया ही भारत (इस भूभाग का प्राचीन नाम) है तो उन्हें साथ ही उपरोक्त परिकल्पना को नकार भी देना चाहिए था। भले ही भारत के विभिन्न भाग अलग-अलग धार्मिक व अन्य आकांक्षाओं वाले विभिन्न राजाओं द्वारा शासित थे, दीपक एक वास्तविकता का उल्लेख करते हैं-

इतिहास को कोई भी मोड़, कितना ही विनाशकारी क्यों न रहा हो, हमारी अविरल सभ्यतागत पहचान को मिटाने योग्य नहीं था। भारतीय चेतना में यह निरंतरता और भारतीय सभ्यता के “जीवित” होने का प्रमाण संवैधानिक सभा के 22 जनवरी 1947 को स्वीकृत उद्देश्य संकल्पों के आठवें बिंदु में मिलता है जहाँ कहा गया इंडिया (जो कि भारत है), एक “प्राचीन भूमि” है। संविधान के अनुच्छेद 1 के साथ इसे जोड़कर देखने पर यह कहा जा सकता है कि संवैधानिक रूप से भी भारत एक भारतीय सभ्यता-राज्य है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्य सभा सांसद सुब्रम्ण्यम स्वामी भी अपनी पुस्तक दि आइडियोलॉजी ऑफ इंडियाज़ मॉडर्न राइट में लिखते हैं कि संविधान की मूल प्रति में भारत के 5,000 वर्ष पुराने सांस्कृतिक इतिहास के 22 उदाहरण थे- भगवान राम, कृष्ण, हनुमान से लेकर बुद्ध, महावीर के बाद अकबर, शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह और रानी लक्ष्मीबाई तक।

इसमें एक ही उदाहरण कटु लगता है, वह है टीपू सुल्तान का जिसकी धार्मिक कट्टरता को आभास आधुनिक हिंदुओं को भी है लेकिन “सेक्युलर” बौद्धिकों को नहीं। लेकिन संभवतः इस दस्तावेज में वह अपनी जगह अंग्रेज़ों के विरोध के कारण बना पाया होगा- इसे हमें अनदेखा नहीं करना चाहिए।

आप इसे भारत या हिंदू राष्ट्र कह सकते हैं लेकिन हम बात उसी सभ्यतागत-राज्य की कर रहे हैं जिसका उल्लेख संविधान निर्माताओं ने भी किया है। इसलिए भारत को हिंदू राष्ट्र बोला जा सकता है और बोलना भी चाहिए। यहाँ हिंदू का अर्थ हिंदू धर्म से नहीं है बल्कि भारतीय सभ्यता से है।

एक हिंदू राष्ट्र जो इससे असहमत लोगों के प्रित भेदभाव नहीं करता हो, न कर सकता हो। हिंदू राष्ट्र को परिभाषित करने की आवश्यकता संविधान की कुछ बातों से आती है जिनके विस्तार और पुनर्व्याख्या की आवश्यकता है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर ध्यान दें-

हम भारत के लोगभारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्नसमाजवादीपंथनिरपेक्षलोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को-
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचारअभिव्यक्तिविश्वासधर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा,
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए,
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर 1949 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृतअधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

प्रस्तावना में कुछ गलत नहीं है, यहाँ तक कि इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल के दौरान 1970 के दशक के मध्य में डाले गए “समाजवादी” और “पंथनिरपेक्ष” शब्दों को भी स्वीकारा जा सकता है। आपातकाल लागू करने को वैधानिक सिद्ध करने के लिए ये शब्द डाले गए थे। अन्यथा सामाजिक न्याया, समानता, भाईचारे, आदि के विचार को विरोध कौन कर सकता है?

हम भारत के विचार को स्वीकार करते हैं लेकिन यह कैसे स्वीकार करें कि हमारी सभ्यतागत पहचान के विशेष शब्दों और अभिव्यक्तियों को संविधान में स्थान नहीं मिला, जबकि फ्रांस की क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के शब्दों को मिला है? क्यों इसमें धर्म, अहिंसा, अर्थ, न्याय, सत्य, मोक्ष, अंत्योदय, वर्ण और जाति जैसे शब्द नहीं हैं?

अंतिम दो शब्द महत्त्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि हमें वर्ण-जाति प्रणाली में आई हुई रूढ़ियों को दूर करना है लेकिन इन दोनों विचारों को पुर्तगाली शब्द ‘कास्ट’ से संबोधित कर हम इसे केवल श्रेणीबद्ध अत्याचार के विचार से जुड़ा पाते हैं जो गलत है।

जब हम वर्ण और जाति के अर्थों को नहीं समझ पाते, तब संबंध और सामाजिक पूंजी के विचार से भी दूर हो जाते हैं। इन दोनों को एक मानकर हम इसका अर्थ केवल कास्ट-आधारित भेदभाव और अत्याचार से जोड़ पाते हैं।

इस प्रक्रिया में हमने जाति को अत्याचार जारी रखने का मार्ग बना दिया है क्योंकि राज्य-प्रायोजित लाभ इसी आधार पर मिलते हैं। क्या आप सामाजिक अत्याचार और असमानताओं को इन संस्थानों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किए बिना समाप्त कर सकते हैं?

तर्क दिया जा सकता है कि धर्म, आदि शब्दों के अनेक अर्थ होते हैं लेकिन यह बात समानता या न्याय जैसे शब्दों पर भी लागू होती है। समानता के कई अर्थ हो सकते हैं, हर व्यक्ति का इसके प्रति भिन्न विचार हो सकता है।

असमान संसार में हम क्या समानता सुनिश्चित करेंगे? अवसर की समानता होगी या परिणामों की? हम पहला विकल्प चुन सकते हैं क्योंकि प्रस्तावना में यह स्पष्ट है लेकिन क्या मनुष्यों की परिभाषा सच में अवसर की समानता को स्पष्ट कर सकती है?

हम गोल्फ जैसे शौक के लिए अवसर की समानता को परिभाषित कर सकते हैं कि यदि आप बेहतर खिलाड़ी हैं तो आपको कम समय में गेंद को छेद में डालना पड़ेगा लेकिन क्या जीवन में हम ऐसा तंत्र बना सकते हैं जो कम क्षमता वालों को अधिक क्षमता वालों पर थोपे जिससे सच में सबके लिए समान अवसर हों?

समानता की इस होड़ में प्रतिभा का क्या स्थान होना चाहिए? कम क्षमता वालों को हर प्रकार की सहायता देने के बाद भी यदि परिणाम प्रतिभाशीलों के पक्ष में ही रहे तो? समानता को किसी भी तरह परिभाषित करें लेकिन यह सैद्धांतिक रूप से ही एक अच्छा लक्ष्य है, वास्तव में इसे प्राप्त करना असंभव है।

और न्याय क्या है? इसका क्या अर्थ है? क्या प्रायः ऐसा नहीं होता है कि न्याय को हम किसी मामले विशेष के अनुसार स्वीकार करते हैं, लेकिन इसे आवश्यक रूप से हर संदर्भ के लिए सटीक रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता है?

भारत के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सुधीर कक्कड़ जुलाई 2019 में टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे लेख में कुछ प्रश्न उठाते हुए संकेत करते हैं कि पारंपरिक भारतीय मूल्य जैसे समग्रता और सहानुभूति आजकल की राजनीतिक चर्चा से ओझल हो गए हैं-

मुझे लगता है कि सहानुभूति, उच्चतम रूप के प्रेम, सामाजिक समरसता और एकता जैसे मूल्यों पर पारंपरिक भारतीय सभ्यता के ज़ोर पर न्याय, गलत को सही करने जैसे अन्य मूल्य हावी हो रहे हैं।

फ्रांसीसी क्रांति का प्रसिद्ध नारा- स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा- जो अब एक सार्वभौमिक आकांक्षा बन गया है, से हम सब परिचित हैं। लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस छोटे से नारे में भी बंधुत्व और भाईचारे को अंतिम स्थान मिला है और समकालीन चर्चा में यदि यह दरकिनार नहीं भी किया गया है तो मूक तो हो ही गया है।

बाबासाहेब अंबेडकर कहते हैं कि धार्मिक विचारधाराएँ जो न्याय और भाईचारे की बात करती हैं जैसे इस्लाम, वे भी वास्तविकता में इसे लागू नहीं कर पातीं। स्वतंत्रता पूर्व पाकिस्तान पर अंबेडकर ने लिखा था-

कहा जाता है कि हिंदू धर्म लोगों को बाँटता है व इसके विपरीत इस्लाम लोगों को जोड़ता है। यह अर्थ-सत्य है। क्योंकि जैसे इस्लाम लोगों को बांधता है, उतनी ही निर्दयता से उन्हें विभाजित भी करता है। इस्लाम एक बंद निगम है और मुस्लिमों व गैर-मुस्लिमों में जो यह भेद करता है, वह काफी वास्तविक है।

इस्लाम का भाईचारा मानवों का आपस में भाईचारा नहीं है। यह मुस्लिमों का मुस्लिमों से भाईचारा है। बधुत्व है लेकिन इसके लाभ उन्हीं तक सीमित हैं जो इस निगम के अंतर्गत आते हैं। जो इस निगम के बाहर हैं, उनके लिए तिरस्कार एवं शत्रुता के अलावा और कुछ नहीं।

लेकिन इस बंद निगम के अंदर भी अंबेडकर ने जाति भेदों को उजागर किया था और कहा था कि इस्लामी भाईचारे में भी प्रचंड सामाजिक दोष हैं। अंबेडकर को स्पष्ट था कि “मुस्लिम समाज में हिंदू समाज से भी अधिक दोष हैं।”

कुल मिलाकर बात यह है कि न्याय उनके हाथ की शक्ति है जो न्याय करने की बात करते हैं, वास्तविकता में यह समान लोगों में बंधुत्व सुनिश्चित नहीं करता।सुधीर कक्कड़ कहते हैं कि सामाजिक न्याय सत्ता समीकरणों से जुड़ा हुआ है-

निर्बलों और उत्पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए सामाजिक आंदोलन हमारे देश में गति पकड़ रहे हैं, पारंपरिक पदानुक्रमों और सत्ता संरचनाओं को झकझोर रहे हैं। यह स्वीकर करने योग्य प्रगति है। हालाँकि इनमें से कुछ आंदोलन अनुचित सत्ता संबंधों को सही करने के लिए सत्ता संबंधित एक ही नीति, न्याय पर आधारित हैं।

न्याय की धार्मिक नीति के अनुसार परिणाम का महत्त्व होता है, न कि मार्ग का और कई सुव्यक्त आवाज़ें हैं जो न्याय के लिए हिंसा का बचाव करती हैं। ऐसे मामलों में क्या सहानुभूति और दया की नीति न्याय की खोज में बाधा नहीं बनेगी?

अल्प में कहें तो बात यह है कि आप किसी भी सभ्यतागत आदर्श- फ्रांसीसी आंदोलन के आदर्शों या धर्म और न्याय जैसे भारतीय मूल्यों- की स्तुति क्यों ही न करें, वास्तविकता मे वे पूर्ण रूप से लागू नहीं हो सकते हैं।

लेकिन यदि ये आदर्श आपके समाज में निहित हैं तो अवश्य ही आदर्शों और वास्तविकता के बीच के अंतर को कम किया जा सकता है। स्पष्ट रूप से कहूँ तो आदर्शों की गूंज ऐसी भाषा में होनी चाहिए जिसे लोगों को अंतर्मन समझे।

भारतीय संविधान के साथ एक समस्या यह है कि इसका विचार और लेखन पूर्ण रूप से एक विदेशी भाषा, अंग्रेज़ी में हुआ जिसका तात्पर्य है कि इसकी समझ भी हमारी संस्कृति के लिए बाहरी ही रहेगी, भले ही न्यायालय भारतीय हों।

जब कानून अभिव्यक्ति की भाषा से अलग भाषा में लिखा जाता है तो इसे मूल्यों के रूप में लोगों में स्थापित करना कठिन हो जाता है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता और सेक्युलरिज़्म (धर्म निरपेक्षता) जैसे विचार, जो पश्चिमी संदर्भ के ऐतिहासिक अनुभवों से आए हैं जब राज्य और चर्च में सत्ता का विभाजन तय हुआ था, ऐसे देश में अर्थहीन हो जाते हैं जिसे इस बनावटी विभाजन की आवश्यकता नहीं है।

भारतीय वास्तविकता की समग्रता को बताने के लिए सबसे उपयुक्त अंग्रेज़ी शब्द है प्लुरलिज़्म (बहुवाद), न कि सेक्युलरिज़्म। जो सभ्यता एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति, अर्थात सत्य एक है लेकिन विद्वान उसे अलग-अलग तरीकों से समझाते हैं, का पाठ पढ़ाती है, वह प्राकृतिक रूप से बहुवादी है। इसे संविधान द्वारा इसे अनिवार्य करने की आवश्यकता नहीं है।

वैसे भी मुस्लिम बहुल देश में राज्य और चर्च के मध्य सत्ता के विभाजन का क्या महत्त्व है जब उनका इतिहास धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचानों का विलय करता आया है? पैगंबर मोहम्मद एक धर्मगुरु, राजनीतिक प्रमुख और सैन्य कमांडर थे। उसी प्रकार जब हिंदू विविध पहचानों के साथ सहज हैं तो राज्य एवं धर्म के बीच एक औपचारिक विभाजन का थोड़ा ही अर्थ बचता है।

एक और बात ध्यान देने योग्य है कि स्वतंत्रता पश्चात के प्रारंभिक दशकों में सत्यमेव जयते (राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य), धर्मो रक्षति रक्षितः (रॉ का आदर्श-वाक्य), यतो धर्मस्ततो जयः (सर्वोच्च न्यायालय), बहुजनहिताय बहुजनसुखाय (ऑल इंडिया रेडियो), सत्यम् शिवम् सुन्दरम् (दूरदर्शन), सेवा अस्माकम् धर्मः (भारतीय सेना), योगक्षेमम् वहम्यहम् (एलआईसी) जैसे वैदिक, उपनिषदिक और पौराणिक वाक्यांशोंको जनता पर हिंदू आरोपण के रूप में नहीं देखा गया।

उपनिषद, पंचतंत्र और महाभारत के श्लोक संसद की दीवारों पर लिखे हुए हैं, ऐसा सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी पुस्तक में लिखा है। लेकिन आज हमारे सभ्यतागत विकृति और पतन को दर्शाता है लोकप्रिय रामायण और महाभारत धारावाहिकों के दूरदर्शन पर पुनः प्रसारण व योग को सेक्युलरिज़्म विरोधी और हिंदुत्व विचारों का आरोपण बताना।

भारतीय शब्दों को अंग्रेज़ी में कहकर हम उनके प्रति भेदभाव करते हैं जो इसे सभ्यतागत और धार्मिक विरासत मानते हैं। इस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 26 में “संप्रदाय” शब्द का प्रयाग सुनिश्चित करता है कि हिंदू उप-पहचानों को अपने मंदिर स्वयं चलाकर प्राचीन रीति-परंपराओं को बनाए रखने के लिए आवश्यक संरक्षण न मिले।

इसका उदाहरण हम सबरीमाला मामले पर सितंबर 2018 में सुनाए गए निर्णय में देख चुके हैं जहाँ पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 4-1 के मत से इस बात को स्वीकृति दी थी कि प्रजनन आयुवर्ग की महिलाएँ भी मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। यह इसलिए हो पाया क्योंकि इस विकृतिकरण में संविधान की भाषा ने सहयोग किया।

हो सकता है कि नौ न्यायाधीशों की पीछ इस निर्णय को पलट दे लेकिन संविधान के शब्दों को गलत समझे जाने की संभावना हमेशा बनी रहेगी। जब भारतीय न्यायशास्त्र उस भाषा में लिखा गया है जिसके अर्थ यूरोकेंद्रीय और ईसाई संदर्भों से निकलते हैं तो अवश्य ही अनुवाद में हम बहुत कुछ खो बैठे हैं।

अनुच्छेद 26 इस प्रकार है-
लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्नय के अधीन रहते हुए, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को —
(क) धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण का,
(ख) अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का,
(ग) जंगम और स्थावर संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का, और
(घ) ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का, अधिकार होगा।

अनुच्छेद 26 के अनुसार हर धार्मिक संप्रदाय और उसके अनुभाग को संरक्षण मिलना चाहिए था लेकिन फिर भी अधिकांश न्यायाधीशों ने माना कि स्वामी अयप्पा के भक्त हिंदू हैं, न कि किसी और संप्रदाय या अनुभाग के हैं इसलिए उन्हें अनुच्छेद 26 द्वारा बताए गए संरक्षण नहीं मिलने चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा (अब सेवानिवृत्त) न्यायाधीश एम खानविलकर (सेवानिवृत्त), डीवाई चंद्रचूड़ एवं रोहिन्टन नरीमन प्रवेश अनुमति के पत्र में थे और सबरीमाला भक्तों को संप्रदाय का दर्जा नहीं दिया। केवल न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा ने माना कि सबरीमाला भक्त एक अलग संप्रदाय हैं।

यूरोकेंद्रीय संदर्भ के अनुसार संप्रदाय का अर्थ हुआ एक धार्मिक समूह जिसके उसी धर्म के अन्य समूहों से थोड़े अलग विश्वास हों। किसी संप्रदाय विशेष में विश्वास रखने वाले श्रद्धालु दूसरे संप्रदाय के चर्चों में नहीं जाते हैं, न ही दूसरे संप्रदाय के लोगों को दूसरे संप्रदाय के स्थान पर दफनाया जाता है।

यह कठोरता हिंदुओं में नहीं है। सभी मृतकों के लिए हमारे एक ही मरघट हैं, भले ही वे क्रिया-कर्म के लिए अपने संप्रदाय की परंपराओं का पालन करें। एक शैव्य वैष्णव मंदिर में जा सकता है और इसका विपरीक क्रम भी स्वीकार्य है, कोई भी किसी भी संप्रदाय के मठ में उसी आस्था के साथ जा सकता है जो आस्था वह अपने संगठन और गुरुओं के प्रति रखता है।

अनुच्छेद 25 से 30 का मूल्य उद्देश्य अल्पसंख्यकों के धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करना था लेकिन इसका अर्थ अब यह निकाला जा रहा है कि ये अधिकार हिंदू संस्थानों को न मिलें, कई बार “दुष्प्रबंधन” के नाम पर उनसे ये अधिकार छीने जाते हैं। लेकिन यदि इसी कारण से मस्जिद या चर्च को राज्य अपने अधीन ले ले तो “सेक्युलरिस्ट” छाती पीटेंगे।

“सेक्युलर” शब्द यूरोपीय संदर्भ में तब प्रयुक्त किया जाता था जब राज्य और चर्च में सत्ता का विभाजन करना था लेकिन भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह अर्थहीन है क्योंकि हमारी सभ्यता बहुवादी है। जाति आधारित भेदभाव को रोकने के लिए संवैधानिक प्रावधानों का उपयोग केवल हिंदू संस्थानों में हस्तक्षेप के लिए हुआ है।

समान व्यवहार और भेदभाव रोकने की दिशा में आगे बढ़ते हुए राज्य भेदभाव करके अल्पसंख्यकों के पक्ष में भेदभाव करने लगा है। केंद्र और राज्य के स्तर पर अल्पसंख्यक मंत्रालय और आयोग हैं जो अल्पसंख्कों को विशेष लाभ पहुँचाते हैं।

शिक्षा के अधिकार में 93वें संवैधानिक संशोधन से अल्पसंख्यक संस्थानों को पिछड़े वर्गों को शिक्षा देने जैसे अधिनियम के कर्तव्यों से मुक्त रखा गया है, वहीं बहुसंख्यक संस्थानों के पास इसे मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए आवश्यकता है कि बहुसंख्यकों के विरुद्ध हो रहे इस भेदभाव को रोकने व हमारी प्राचीन विरासत की रक्षा के लिए संविधान में कुछ संशोधन किए जाएँ। साथ ही आक्रामक धर्मांतरण गतिविधियों को रोकने के लिए भी कानून बनने चाहिए।

इसके अलावा भारतीय सभ्यतागत-राज्य का उन लोगों के प्रति भी कर्तव्य है जो हमारे साथ सामान्य विरासत साझा करते हैं और दूसरे स्थानों पर उनपर अत्याचार किया जा रहा है। नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 जो हिंदुओं एवं पड़ोसी तीन मुस्लिम देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की प्रक्रिया को गति देता है, इस दिशा में पहला कदम है।

लेकिन इसपर भी कानूनी प्रश्न उठाए गए। विरोधियों ने कहा कि धर्म के आधार पर भेदभाव न करने के संवैधानिक मूल्य के यह अधिनियम विरुद्ध है। इससे तीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं-

पहला यह कि अंग्रेज़ी आधारित भारतीय संविधान में कुछ परिवर्तनों की आवश्यकता है ताकि यह भारतीय समाज के प्राकृतिक लय से मेल खा सके। अंग्रेज़ी में सोचकर संस्कृत अथवा हिंदी में अनुवाद करना एक बात है और भारतीय शब्दों में धारणा बनाकर उसके लिए अंग्रेज़ी शब्द ढूंढना दूसरी।

जैसे रिलीजन का अनुवाद करके उसे धर्म कहा जा सकता है लेकिन धर्म का कोई अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध नहीं है क्योंकि संदर्भ ही नहीं है। धर्म के कई अर्थ हैं और संदर्भ के अनुसारधर्म परिवर्तनशील भी है। लेकिन इसे मात्र अंग्रेज़ी शब्द के अनुवाद के रूप में प्रयुक्त करके हमने इसके अर्थ को संकुचित कर दिया है।

प्राकृतिक रूप से हम बहुवादी समाज हैं और हमारे लिए सेक्युलरिज़्म का कोई अर्थ नहीं है। यदि भारतीय भाषा जैसे हिंदी में संविधान लिखा जाता और फिर अंग्रेज़ी में इसका अनुवाद होता तो अवश्य ही हमारे अनुभव भिन्न होते। इसलिए अब आवश्यकता है कि संविधान के कुछ प्रावधानों में परिवर्तन करके इसे हमारी सभ्यता के अनुकूल बनाया जाए।

दूसरा, इस बात को समझें कि संविधान में परिवर्तन होने से खुद को हिंदू न मानने वाले लोगों के अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि “हिंदू राष्ट्र” में भी अनुच्छेद 25 से 30 अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करेंगे। तीसरा, संविधान में इन परिवर्तनों से हम इसे हिंदूफोबिक कानून-निर्माण का साधन बनने से रोक पाएँगे।

शृंखला के आगे आने वाले भागों में हम संविधान के विशेष प्रवाधानों को देखेंगे जिन्हें परिवर्तन की आवश्यकता है। हिंदू राष्ट्र शृंखला का पहला भाग यहाँ और दूसरा भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।