भारती
हिंदू राष्ट्र की परिभाषा गोलवलकर से भागवत तक, उपनिषद के नेति-नेति से समझें

हिंदू राष्ट्र को परिभाषित करना सरल नहीं है क्योंकि स्वयं हिंदू धर्म को परिभाषित करना कठिन है। हिंदू धर्म के विरोधाभासों और विसंगतियों के कटु आलोचक बाबा साहेब अंबेडकर रिडल्स ऑफ हिंदुइज़्म में कहते हैं कि हिंदू धर्म “पंथों और सिद्धांतों का ढेर” है जो “एकेश्वरवादियों, बहुदेववादियों और सर्वेश्वरवादियों को आश्रय देता है।”

अंबेडकर के अनुसार कोई पारसी, ईसाई या मुस्लिम जानता है कि उसका धर्म क्या है और वह किसमें विश्वास रखता है लेकिन यदि किसी हिंदू से पूछा जाए कि क्या बातें उसे हिंदू बनाती हैं तो वह घबरा जाएगा। इसी विचार को महात्मा गांधी ने सकारात्मक तरीके से आगे रखते हुए कहा था कि हिंदू धर्म अलगाववादी विचार नहीं है।

यहाँ विश्व के सभी पैगंबरों को पूजने का स्थान है… हिंदू धर्म सभी को उस ईश्वर की पूजा करने को कहता है जिसमें उसका विश्वास हो या जिसे वह धर्म मानता हो और इस प्रकार यह सभी मतों के साथ शांति भाव से रहता है।

1893 में विश्व धर्म सभा में प्रस्तुत हिंदू धर्म पर लिखे पत्र (यह उनके भाषणों से पृथक है) में स्वामी विवेकानंद का भी कुछ इसी प्रकार कहा कहना था-

वेदांत दर्शन की उच्च आध्यात्मिकता, जिसकी गूंज हाल की विज्ञान की खोजों में सुनाई पड़ती है, से लेकर विविध पौराणिक कथाओं से जुड़ी मूर्ति-पूजा, बौद्धों के अनीश्वरवाद, जैनों के निरीश्वरवाद तक सभी का हिंदू धर्म में स्थान है।

कुल मिलाकर अपने अनिवार्य बहुवाद के लिए हिंदू धर्म कई विरोधाभासों के साथ जीता है। कुछ लोगों ने हिंदू धर्म में सांस्कृतिक, भौगोलिक और नस्लीय विशेषताएँ ढूंढ ली हैं ताकि यह एक राष्ट्रीय पहचान के अनुकूल बन सके और इसे हिंदू राष्ट्र से जोड़ा जा सके।

सर्वपल्ली राधाकृष्णन के लिए हिंदू धर्म एक “जीवनशैली” है। द हिंदू व्यू ऑफ लाइफ  में वे कहते हैं, “हिंदुओं के विभिन्न पंथों में अंतर सतही है और हिंदू एक सामान्य इतिहास, सामान्य साहित्य और सामान्य सभ्यता के साथ एक विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई हैं।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर हिंदुओं को भारत की एक “राष्ट्रीय नस्ल” मानते थे, वहीं वीर सावरकर का मानना था कि “जो भी महासागर से सिंधु तक फैले भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पवित्र भूमि मानता है, वह हिंदू है।” सैद्धांतिक रूप से वो मुस्लिम या ईसाई जो इस भूभाग के बाहर अपनी धार्मिक निष्ठा नहीं रखते हैं, वे भी इस परिभाषा के अंतर्गत आएँगे।

कुछ लोगों ने माना कि पवित्र भूभाग के हिंदू विचार में निहित राष्ट्रवाद का उल्लेख ऋग्वेद से अथर्ववेद तक में मिलता है जिसका विस्तार तीर्थ जाने की प्रचलित प्रथा में आज तक दिखता है। अब्राह्मिक धर्मों में भले ही कई तीर्थस्थल होते हैं लेकिन धर्म को वे भूभाग से तटस्थ मानते हैं।

भारत के मामले में सभी तीर्थस्थल भारत में हैं, या बेहतर होगा यह कहना कि अविभाजित भारत में। इतिहासकार और विद्वान राधाकुमुद मुखर्जी ने एक सदी से पहले लिखी गई पुस्तक नेशनलिज़्म इन हिंदू कल्चर  में कहा है-

तीर्थस्थलों के संस्थान प्राचीन हिंदू सभ्यता को अलग बनाने वाली एक विशेषता हैं। विश्व के किसी भी देश में हम तीर्थों और पवित्र स्थलों का ऐसा विस्तृत नेटवर्क नहीं देखते हैं जो देश को पूजनीय मानने वाले धर्म-उत्साहियों ने हमारी मातृभूमि के अलग-अलग स्थानों पर स्थापित किए हैं।

वास्तव में यदि हम देश के सभी भागों और इतिहास के हर काल में प्रभाव छोड़ने वाले इस अद्भुत संस्थान को ध्यान से देखेंगे तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि यह एक माध्यम हे जिसके द्वारा हिंदुओं ने अपनी देशभक्ति अभिव्यक्त की है।

कुल मिलाकर हिंदू राष्ट्र एक धर्म शासन से अधिक हमारे पवित्र भूभाग के बारे में है। इसी विचार का प्रतिध्वनि डायना एक्क की पुस्तक इंडिया- अ सेक्रेड ज्योग्राफी में सुनाई देती है जहाँ वे लिखती हैं कि भारत “ऐसी भूमि है जो राजाओं की सत्ता और सरकारों से नहीं बल्कि तीर्थों के पदचिह्नों से जुड़ी है।” वे आगे कहती हैं-

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय काल्पनिक परिदृश्य को हिंदू मिथकों और पारंपरिक संदर्भों में जोड़ा गया है, सबसे अधिक तीर्थ की प्रथा से। हिंदू मिथकों और महाकाव्य साहित्य में न सिर्फ हिंदू के भक्ति भाव से संबंधिक साहित्य है बल्कि इसमें विद्वानों के लिए रुचिकर संरचनात्मक, तुलनात्मक और मनो-विश्लेषणात्मक साहित्य भी है।

हिंदू पौराणिक कथाएँ भारत के भूभाग- पहाड़ों, नदियों, जंगलों, तटों, गाँवों और शहरों से बहुतायत में जुड़ी हैं। सहस्रों तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक रूप से रचित भारत के मानसिक मानचित्र में इसका स्थान है।

अपने ही भूभाग में निहित हिंदू राष्ट्र का यह विचार हमें भारत को भारतमाता के रूप में देखने की ओर ले जाता है। बंकिम चंद्र चटोपाध्याय के वंदे मातरम में इसका सर्वश्रेष्ठ प्रतीकात्मक चित्रण है जिसमें भारत माता को शेर पर विराजमान दर्शाया गया है।

आरएसएस की शाखाओं की प्रार्थना में यही विचार दिखता है जिसमें वे कहते हैं, “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि (इस मातृभूमि को मैं सदा नमन करता हूँ)।” संघ को हिंदू/हिंदुत्व संगठन के रूप में जाना जाता है परंतु वास्तविक व्यवहार में यह संगठन हिंदू अनुष्ठानों, संस्कारों और त्यौहारों में अधिक विश्वास नहीं रखता है।

इसके प्रमुख पर्व हैं- वर्ष प्रतिपदा (सर्वाधिक स्वीकार्य हिंदू नव वर्ष), हिंदू साम्राज्य दिवस (शिवाजी के राज्याभिषेक की वर्षगाँठ), गुरु पूजन, रक्षा बंधन, विजयादशमी और मकर संक्रांति। यह सबसे लोकप्रिया हिंदू त्यौहारों- होली और दीपावली को नहीं मनाता है। 15 अगस्त आरएसएस के लिए अखंड भारत दिवस है, स्वतंत्रता दिवस नहीं।

हिंदू धर्म और भावी हिंदू राष्ट्र के प्रमुख तत्वों पर कई लेखकों और बौद्धिकों के विचार की व्याख्या करने पर तीन बातें स्पष्ट हो जाती हैं- पहला यह कि हिंदू राष्ट्र धर्म का सासन लागू करने में पाकिस्तान की प्रतिमूर्ति नहीं होगा, दूसरा यह कि इसकी प्रमुख परिभाषाओं में सहस्रों वर्षों में विकसित हुए भूभाग के प्रति निष्ठा आवश्यक है और तीसरा यह कि हिंदू राज्य को इससे परिभाषित किया जा सकता है कि इसमें किसकी अनुमति नहीं होगी न कि नागरिकों के लिए अनिवार्य धार्मिक व्यवहारों से।

सावरकर के एकत्रित हिंदू राष्ट्र में भी मुस्लिमों और अलप्संख्यकों के लिए स्थान है लेकिन बिना विशेष लाभों के। हिंदू महासभा का अध्यक्ष रहते हुए सावरकर ने अपने एक वक्तव्य में कहा था-

हिंदू महासभा न सिर्फ प्रति व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार करती है बल्कि मानती है कि इसके साथ मौलिक अधिकार और कर्तव्य भी सभी नागरिकों के लिए उनकी नस्ल और धर्म से परे समान होने चाहिए… अल्पसंख्यक अधिकारों की कोई भी बात सैद्धांतिक रूप से न केवल अनावश्यक बल्कि विरोधाभासी भी है।

क्योंकि यह सामुदायिक आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने का बोध कराता है। लेकिन व्यावहारिक राजनीति जैसी माँग करती है और हिंदू संगठनी गैर-हिंदू देशवासियों को भयमुक्त करना चाहते हैं, उसके लिए हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अल्पसंख्यकों के धर्म, संस्कृति और भाषा के लिए वैधानिक अधिकार दिए जाएँगे– जिसकी एक शर्त होगी-

बहुसंख्यकों के समान अधिकारों पर इससे अतिक्रमण न हो, न वे इससे निरस्त हों। अल्पसंख्यकों के अलग विद्यालय हो सकते हैं जिसमें वे अपने बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा दें, अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थान हो सकते हैं जिसे सरकार सहायता भी मिले लेकिन वे जितना कर देते हैं, उसके अनुपात में। ये सिद्धांत बहुसंख्यकों पर भी लागू हों।

इन सबसे आगे और ऊपर, यदि संविधान संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों और प्रति व्यक्ति एक वोट पर आधारित नहीं होता है तो जो अल्पसंख्यक अलग निर्वाचन क्षेत्र या आरक्षित सीटें चाहते हैं, उन्हें उसकी अनुमति होगी- लेकिन उनकी जनसंख्या के अनुपात में जिससे बहुसंख्यकों के समान अधिकारों का हनन न हो। (बोल्ड लेखक द्वारा किया गया है।)

ध्यान दें कि यह चब लिखा गया था जब पाकिस्तान का बनना तय नहीं था, ये प्रस्ताव अविभाजित भारत के लिए हैं जहाँ “हिंदू” बहुसंख्या में है और मुस्लिम एक बड़े अल्पसंख्यक हैं। सावरकर अनुपात के अनुसार उनके प्रतिनिधित्व की बात करते थे जिसका अर्थ हुआ कि उनका विधायी बल काफी होगा, इस अवधारणा के साथ कि हिंदू सांसद जो चाहते हैं उसमें एकजुट नहीं हैं।

यहाँ सिर्फ एक ही विरोध है कि संविधान अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार नहीं देगा (जैसा अनुच्छेद 25 से 30 में कहा गया है), न ही कोई ऐसे अधिकार हिंदुओं के होंगे और ऐसा ही वर्तमान में है। इस प्रकार सावरकर के विचार संकेत करते हैं कि हिंदू राष्ट्र केवल राजनीतिक प्रभुत्व के मामले में हिंदू होगा, न कि धर्म शासन के रूप में। न ही मुस्लिम इसके तले दबेंगे।

लेकिन न हिंदुओं को बढ़ती मुस्लिम जनसांख्यिकी या अन्य प्रकार की जनसांख्यिकी वृद्धि के तले दबने दिया जाएगा। सावरकर कहते हैं-

मुस्लिम अल्पसंख्यकों से समान नागरिकों की तरह व्यवहार होगा, वे समान सुरक्षा के अधिकारी होंगे और उनकी जनसंख्या के अनुपात में उन्हें जनपद अधिकार मिलेंगे। हिंदू बहुसंख्यक किसी भी गैर-हिंदू अल्पसंख्यक के वैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं करेंगे।

लेकिन किसी भी सूरत में हिंदू बहुसंख्यकों को अपने उन अधिकारों को नहीं त्यागना चाहिए जो किसी लोकतांत्रिक और वैधानिक संविधान के तहत बहुसंख्यकों को मिलते हैं। विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने अल्पसंख्यक रहकर हिंदुओं के प्रति आभार व्यक्त नहीं किया है और इसलिए उन्हें प्राप्त पद और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों में अनुपात के अनुसार मिली वैधानिक साझेदारी से संतुष्ट होना चाहिए।

मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के वैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों पर निषेधाधिकार देना और उसे “स्वराज्य” कहना निरर्थक होगा। हिंदू शासकों को बदलना नहीं चाहते, वे इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे, इसलिए मरने के लिए तैयार नहीं हैं कि किसी एडवार्ड का स्थान कोई औकंगज़ेब ले ले, मात्र इस आधार पर कि उसका जन्म भारतीय सीमाओं के अंदर हुआ है, वे अपने घर में, अपनी भूमि में अपना स्वामित्व चाहते हैं।
(बोल्ड लेखक द्वारा)

हिंदू राष्ट्र में भूभाग के प्रति निष्ठा रखने का अर्थ होगा कि ऐसे कानून होंगे जो धर्मांतरण के लिए विदेशों से आ रहे पैसे को रोकेंगे या अवैध प्रवासन रोकने के लिए सीमा पर नियंत्रण होंगे। वहीं दूसरी ओर भारत से बाहर रह रहे हिंदुओं को भारत वापस आने का अधिकार होगा, यदि वे ऐसा चाहें तो- ऐसी ही इज़रायल के यहूदी राज्य में है जहाँ कहीं के भी यहूदी जाकर रह सकते हैं।

हिंदू राष्ट्र का अंतिम तत्व उपनिषद के ‘नेति-नेति’ का सिद्धांत होगा, अर्थात न यह, न वह। बृहदरण्यक उनिषद में ऋषि याज्ञवल्क्य ने नेति-नेति की व्याख्या करते हुए कहा है कि सर्वोपरि सत्य को समझा या उसका आभास नहीं किया जा सकता है, न ही उसे शब्दों में वर्णित किया जा सकता है। इसलिए, न यह, न वह। इसलिए आत्मन के विचार की तरह हिंदू राष्ट्र के विचार को इससे परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए कि इसे क्या होना चाहिए बल्कि इससे कि इसे क्या नहीं होना चाहिए।

हिंदू धर्म के अनिवार्य बहुवाद को देखते हुए कोई एक पुस्तक, कोई एक पैगंबर या कोई मौलिक सिद्धांत नहीं हैं जो सर्व-स्वीकार्य हैं इसलिए हिंदू राष्ट्र का संविधान यह नहीं बता सकता कि नागरिकों को क्या करना चाहिए बल्कि यह कि क्या नहीं करना चाहिए।

उदाहरण स्वरूप, यह कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधित कर सकता है जैसे सक्रिय धर्मांतरण, साथ ही व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने और अपनाने की स्वतंत्रता रहे। वास्तविक धर्मांतरण वह है जिसमें व्यक्ति बेहतर प्रथा को अपनाए न कि अपने सत्यों को ही त्याग दे।

ईश्वर और सत्य के लिए दूसरे पंथों के मार्ग को मना नहीं किया जाएगा लेकिन अब्राह्मिक मतों के उन विचारों को हतोत्साहित किया जाएगा जहाँ “मिथ्या-ईश्वरों” को नकारा या उनके मत को न मानने वालों को काफिर कहा जाता है, आदि। ऋग्वेद में जहाँ कई जनजातीयों ने लड़ाई की थी, वहाँ हारे हुए लोगों के ईश्वरों का अपमान नहीं किया जाता था, बल्कि स्वीकार किया जाता था।

हिंदू राष्ट्र मुस्लिम के हज जाने या अपना धर्म मानने के मार्ग की बाधा नहीं बनेगा लेकिन यह उनपर रोक लगाएगा जो उम्मा को हिंदू या भारतीय हितों के विरुद्ध जाने के लिए उकसाते हैं, जैसा हाल ही में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष ज़फरउल इस्लाम ने किया था।

इस्लाम ने कुवैत के प्रति भारतीय मुसलमानों के साथ खड़े रहने के लिए आभार व्यक्त किया था। उनका दावा था कि भारतीय मुसलमानों ने अभी तक उनपर हो रहे कथित अत्याचार की शिकायत अरब विश्व से नहीं की है लेकिन जिस दिन वे ऐसा करने के लिए “विवश होंगे, तो कट्टरपंथियों को भूस्खलन का सामना करना होगा।”

इस प्रकार भूभाग से बाहर स्थित निष्ठा पर ज़ोर देकर ज़फरउल इस्लाम ने अप्रतिबद्ध हिंदुओं के मस्तिष्क में हिंदू राष्ट्र के समर्थन का एक कारण डाल दिया है क्योंकि हिंदुओं को अल्पसंख्यकों की बाहरी निष्ठा से ही भय है।

हमें संदेह हो सकता है कि हिंदू राष्ट्र के विचार का विरोध इसलिए नहीं होता कि इससे कोई खतरा है, बल्कि गुरु गोलवलकर के कथन के कारण होता है जहाँ उन्होंने वी, आर नेशनहुड डिफाइन्ड में परोक्ष रूप से मुस्लिमों को द्वितीय दर्जे का नागरिक बनाने की बात कही थी। गोलवलकर ने ज़ोर दिया था-

हिंदुस्तान के गैर-हिंदू लोगों को हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी एवं हिंदू धर्म के प्रति आदर और श्रद्धा का भाव रखना सीखना होगा, उनके मन में हिंदू नस्ल और संस्कृति को गौरवान्वित करने के अलावा और कोई विचार नहीं होना चाहिए… एक शब्द में कहें तो उन्हें विदेशी बनकर नहीं रहना है या फिर वे हिंदू राष्ट्र के अधीन बिना किसी दावे, बिना किसी विशेषाधिकार, बिना विशेष व्यवहार, यहाँ तक कि नागरिक अधिकारों के बिना रहें।

यह कथन ऐसा है जिसपर स्वयं आरएसएस भी लज्जित महसूस करता है और सरसंघचालक मोहन भागवत ने सितंबर 2018 में राष्ट्र भर में रिपोर्ट किए गए वक्तव्य में कहा था कि संघ गोलवलकर के इस विचार से सहमत नहीं है। भागवत ने कहा था,

हमने एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है ‘विज़न एंड मिशन- गुरुजी’। इसमें उनके सार्वकालिक विचार हैं। हमने उन सभी विचारों को हटा दिया है जो किसी परिस्थिति में उत्पन्न हुए होंगे और उन विचारों को रखा है जो सार्वकालिक हैं।

जो आलोचक गोलवलकर पर निशाना साधते हैं, वे एक सरल बात भूल जाते हैं- नेशनहुड में उन्होंने जो प्रतिपादित किया है, वह वही है जो इस्लाम हराए हुए लोगों के लिए सुझाता है, धिम्मियों का दर्जा जिनके सीमित अधिकार होते हैं और मुस्लिम-बहुल समाजों में वे द्वितीय दर्जे के नागरिकों की तरह रहते हैं।

गोलवलकर की निंदा करने वाले एक भी व्यक्ति ने इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि इस्लाम में धिम्मियों के साथ व्यवहार का क्या विचार है। आरएसएस भले ही गोलवलकर के इस कट्टर विचार को त्याग दिया है लेकिन इस्लामवादियों ने ऐसा नहीं किया है।

वह चाहे जो कुछ भी हो लेकिन हिंदू राष्ट्र का अर्थ भारत में इस्लामी शासन की प्रतिमूर्ति बनना नहीं है।

(यह लेख हिंदू राष्ट्र शृंखला का द्वितीय भाग है। पहला भाग आप यहाँ पढ़ सकते हैं।)

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।