भारती
मुस्लिमों द्वारा “पूर्व-नियोजित”, दिल्ली दंगों के आरोप-पत्र में काफिरों के प्रति घृणा के संकेत

24 और 25 फरवरी को पूर्वी दिल्ली के करावल नगर के शिव विहार तिराहे के निकट हुई घटनाएँ, जो दिल्ली दंगों का केंद्र बिंदू रहा था, वे स्थानीय मुस्लिमों द्वारा पूर्व-नियोजित थीं, दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में दावा किया गया।

“मुस्लिम समुदाय के कई दंगाई राजधानी स्कूल की छत पर थे और वहाँ से पेट्रोल बम व पत्थर दूसरे पक्ष के लोगों व संपत्तियों फेंक रहे थे, एक लोहे की गुलेल की सहायता से।”, आरोप-पत्र में कहा गया।

इस स्कूल के सामने स्थित अनिल स्वीट्स कॉर्नर में पहली मृत्यु हुई जब 24 फरवरी की दोपहर को दंगे शुरू हुए थे। दुकान में काम करने वाले दिलबर नेगी का पूर्णतः जला हुआ शव जलाए गए परिसर में रात को मिला था।

दिन में 3 बजे डीआरपी कॉन्वेन्ट स्कूल और दो पार्किंग स्थल समेत तिराहा पर स्थित दूसरे हिंदू अधिष्ठानों को भी मुस्लिम दंगाइयों ने निशाना बनाया। इससे पहले दिन के 1 बजे एक हिंदू व्यक्ति को गोली लगी थी लेकिन वह बच गया।

10 मार्च को पुलिस ने स्कूल के मालिक फैसल फारूक को गिरफ्तार किया था और वह अभी न्यायिक हिरासत में है। फारूक पर आरोप है कि उसने दंगों को बढ़ाने के लिए अपने स्कूल के पास स्थित हिंदू संपत्तियों को जलाने का षड्यंत्र रचा।

इसी तिराहे पर शाम 5 बजे सलमान नामक व्यक्ति की गोली लगने से मौत हुई। विभिन्न आरोप-पत्रों को पढ़ने से पता लगा कि घटनाक्रम कुछ ऐसा था कि दोपहर से सक्रिय मुस्लिम दंगाइयों के प्रतिरोध में 3 बजे से हिंदू भीड़ सक्रिय हुई।

दिल्ली पुलिस ने अलग-अलग घटनाओं में शिव विहार तिराहे पर 24 और 25 फरवरी के संबंध में 10 एफआईआर दर्ज की है। 24 फरवरी को शुरुआती तीन घटनाओं में पीड़ित हिंदू हैं और एक में एक मुस्लिम व्यक्ति पीड़ित है।

25 फरवरी की छह घटनाओं में दो में मुस्लिम पीड़ित हैं, तीन में हिंदुओं के साथ मारपीट हुई और एक घटना में सशस्त्र सीमा बल के जवानों पर तेजाब से हमला हुआ।

स्वराज्य ने दिल्ली-पुलिस के जिन आरोप-पत्रों को पढ़ा है उनमें से एक 25 फरवरी की शाम को हुई वीरभान की हत्या का उल्लेख करती है। यह न सिर्फ तिराहा पर घटनाओं के क्रम को स्पष्ट करती है कि मुस्लिम समुदाय ने हिंसा की शुरुआत की बल्कि दंगाइयों की सांप्रदायिक प्रेरण और “काफिर” हिंदुओं के प्रति घृणा भी दर्शाती है।

शाम 4.30 बजे एक मुस्लिम भीड़ के बीच से चली गोली के कारण वीरभान की मौत हो गई थी। वह बाइक टला रहा था और उसका पुत्र उसके पीछे बैठा था। गोली उसके सिर में लगी और संभवतः उसी समय उसकी मौत हो गई थी, ऐसा ऑटोप्सी करने वाले डॉक्टर का विश्लेषण है।

जब पुलिस ने मामले की जाँच के लिए सीसीटीवी कैमरे खंगाले तो तिराहे के निकट के सभी कैमरे क्षतिग्रस्त पाए गए। जब एक प्रत्यक्ष साक्षी (उसी क्षेत्र का निवासी) सामने आया तब पुलिस जाँच को आगे बढ़ा सकी। उसने न सिर्फ घटनाएँ बताईं बल्कि वीरभान को मारने वाली भीड़ का जो लोग हिस्सा थे, उनके नाम भी बताए।

वे उसके आस-पड़ोस में रहने वाले लोग थे- मोहम्मद सलमान (स्थानीय कपड़ा विक्रेता का दामाद), मोहम्मद आरिफ (ताले-चाबी बनाने वाला), जावेद अली (महिलाओं के पर्स बेचने वाला), अशरफ अली (कपड़े बेचने वाला), सोनू सैफी (वेल्डर) और परवेज़ (पंक्टर वाला)।

साक्षी अजय कुमार (नाम परिवर्तित) एक दूरसंचार अभियंता है जो अपनी मौसी के घर से लौटकर तिराहे के निकट स्थित अपने घर जा रहा था। जब वह हनुमान मंदिर पहुँचा तो उसने मुस्तफाद से राजधानी स्कूल की ओर जाती हुई एक मुस्लिम भीड़ को तिराहे पर एकत्रित देखा।

“वे (उपरोक्त छह)मुस्लिमों को भड़का रहे थे और हिंदुओं को अपशब्द कह रहे थे। तब मैंने भीड़ में से एक व्यक्ति को गोली चलाते हुए देखा जो जोहरीपुर से आते हुए एक बाइकसवार को लग गई। उसके पीछे एक लड़का बैठा था। गोली लगने के बाद बाइक गिरी और वे दोनों भी गिर गए।”, कुमार ने कहा।

“मैं गोली चलाने वाले व्यक्ति को नहीं देख पाया लेकिन मैंने सलमान, आरिफ, जावेद, अशरफ, सैफी और परवेज़ को भीड़ से आगे आते हुए देखा और वे गिरे हुए इन दोनों लोगों को मारने लगे। वे हर गुज़रते व्यक्ति को डंडे, ईंट, पत्थर और काँच की बोतल से मार। बाद में मुझे पता चला कि जिसे गोली लगी थी वह वीरभान था।”, कुमार ने पुलिस को बताया।

घटना के बाद कुमार घर गया और रात तक बाहर नहीं आया, फिर उसने अपनी मौसी के घर पुनः जाने का निर्णय लिया। उसने इन्हीं लोगों को भीड़ के साथ क्षेत्र में तोड़फोड़ करते हुए देखा और वे सांप्रदायिक नारे भी लगा रहे थे।

“सलमान, आरिफ, जावेद, सैफी, अशरफ और परवेज़ अपने सहधर्मियों के साथ चिल्ला रहे थे कि ‘हिंदू काफिरों को मारो, हमें जन्नत मिलेगी।’ वे घृणित बातें करके भीड़ को भड़का रहे थे। तब ही मैंने अशरफ और अन्य लोगों को हनुमान मंदिर के सामने एक व्यक्ति को पकड़ते हुए देखा।”, प्रत्यक्ष साक्षी ने बताया।

“सलमान, जावे और आरिफ ने उसे डंडों से पीटा, अशरफ और अन्य लोगों ने पत्थर और काँच की बोतल से जिससे उसका सर फूट गया। बुरी तरह जख्मी हालत में वह व्यक्ति महावीर एन्क्लेव की तरफ भागा जहाँ बहुत लोग थे और चोटिलों को पट्टी लगा रहे थे। मुझे बाद में पता चला कि उसकी मृत्यु हो गई और उसका नाम आलोक तिवारी था। मैं किसी तरह से भागकर अपने पड़ोसी के घर पहुँचा।”, कुमार ने आगे कहा।

कुमार के बयान पर पुलिस ने मार्च, अप्रैल और मई में चार लोगों को पकड़ लिया जबकि मोहम्मद आरिफ और जावेद अली आरोप-पत्र दायर होने तक फरार थे। सभी आरोपियों ने 24 और 25 फरवरी के अपराधों में अपनी संलिप्तता को स्वीकारा है।

“मुझे वॉट्सैप पर ऐसे वीडियो और संदेश आते थे जो मुस्लिमों को एकजुट होकर लड़ने के लिए कहते थे। सब कह रहे थे कि वे लोग मुस्लिमों को इस देश से बाहर निकाल देंगे और काफिरों को मुस्लिमों की शक्ति दिखानी है। हम साथ मिलकर जो भी काम करेंगे वह पूरा विश्व देखेगा क्योंकि यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत में हैं।”, आरोपी सलमान ने पुलिस को बताया।

“हम लोगों से उनका नाम पूछने के बाद उन्हें पीट रहे थे।”, आरोपी परवेज़ ने स्वीकारते हुए कहा कि वे पहले से मृत वीरभान और उसके पुत्र व आलोक तिवारी को रात में पीटकर मार देना चाहते थे। अशरफ अली और सोनू सैफी ने भी 24 और 25 फरवरी को हिंसात्मक भीड़ का भाग होने की बात स्वीकार की जिसने आलोक तिवारी और वीरभान को मारा।

पुलिस को पता चला है कि अशरफ अली शिव विहार तिराहे पर नौ से ज्यादा दंगों के मामलों में लिप्त था। सभी आरोपियों के कॉल रिकोर्ड (आरोप-पत्र में संलग्न) के अनुसार भी वे वीरभान और आलोक तिवारी को मारने के समय में घटनास्थल पर उपस्थित थे।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।