भारती
“हिंदुओं का दमन कर अलाउद्दीन खिलजी ने बढ़ाई इस्लाम की इज़्ज़त”- जानकार (भाग 20)

हिंदुओं का दमन पूरी ताकत से करने के लिए इल्तुतमिश के 75 साल बाद अलाउद्दीन खिलजी ने कमर कसी। ऐसी कठाेर नीतियाँ बनाई गईं और उनपर बहुत सख्ती से अमल किया, जिनके बारे में जानकर रूह कांप जाए। ऐसे फैसले लिए गए, जिनसे काफिरों को जहाँ तक मुमकिन हो खत्म किया जा सके।

अब तक हमने उन्हें दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद के इन 100 सालों में हिंदू राज्यों में जमकर लूटपाट और कत्लेआम मचाते हुए लगातार देखा, लेकिन अब हिंदुओं को हर हाल में मटियामेट करना ही इस्लामी हुकूमत की पहली प्राथमिकता थी।

इसके लिए इस्लाम के मजहबी जानकारों की भी राय ली गई और आलिमों ने जो तरीके खिलजी को बताए, उनके ब्यौरे इस्लाम का एक अलग गौरतलब चेहरा उजागर करते हैं। खिलजी और उसके समय के मजहबी लोग इस्लाम की कैसी व्याख्या कर रहे थे, दिल थामकर इतिहास से गायब भारत की बदकिस्मती की वजह बने इन नृशंस तौर-तरीकों को जरा आप भी देखिए।

दिल्ली में अपने खिलाफ लगातार सिर उठा रहे विरोधियों से परेशान अलाउद्दीन खिलजी ने सबसे पहले अपने ताकतवर अमीरों, मलिकों और दरबार के अहम ओहदों पर बैठे अपने ही जैसे शातिर और बेरहम तुर्कों की सारी संपत्तियाँ जब्त करा लीं।

उनके आपस में मेलजोल, एक-दूसरे के घरों में आने-जाने, महफिलों, दावतों और रिश्तेदारी करने पर रोक लगा दी। शराबबंदी की गई। लोगों को सार्वजनिक रूप से पिटवाया गया। दबदबा यहाँ तक कायम हुआ कि डरे हुए दरबारी एक-दूसरे से इशारों में बात करने लगे।

कैदियों को मारने के लिए कुएँ खुदवाए गए। इन कुओं में लोगों को ज़िंदा गिरा दिया जाता था। एक कुएँ में कई लोग फेंक दिए जाते थे, जो एक दूसरे पर दबकर मर जाते थे। कैद के कुओं ने एक अलग खौफ पैदा कर दिया था। यह दिल्ली में हो रहा था।

कट्‌टर सुन्नी मुसलमानों को हुकूमत में सब तरह के हक हासिल करने का प्रबल पक्षधर और हमें उस दौर की पल-पल की खबर दे रहा जियाउद्दीन बरनी हिंदुओं की बारी आने पर सबसे ज्यादा जोश में दिखाई देता है। उसने ऐसे हर मौके की तफसीलें हमारे लिए दर्ज की हैं। हिंदुओं के खिलाफ दिल्ली में लिए जा रहे इस उच्च स्तरीय मजहबी और सियासी फैसले पर सबसे पहले यह ब्रेकिंग न्यूज़ जियाउद्दीन बरनी ही दे रहा है

साज़िशों को दबाने के हुक्म जारी करने के बाद सुलतान ने बुद्धिमानों से वह कानून बनाने को कहा, जिनके जरिए हिंदुओं को दबाया जा सके। हिंदुओं के पास इतना धन भी न बचे कि वे घोड़े पर सवार हो सकें, हथियार रख सकें, अच्छे कपड़े पहन सकें और आराम से जिंदगी गुज़ार सकें।

दिल्ली और दिल्ली के चारों तरफ फैले प्राचीन हिंदू राज्यों में तब भी बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की थी। खिलजी ने तय किया कि उसके इलाके में किसान अपनी पैदावार का आधा हिस्सा उसे देंगे। दिल्ली के आसपास के देहातों, कस्बों के अलावा बयाना, झायन, पालम, देपालपुर, लाहौर, सामाना, रेवाड़ी, नागौर, कड़ा, अमरोहा, बंदायू और कटिहर पर कब्ज़ा जमा चुके मुस्लिम तुर्कों के मातहत कठोरता से कमाई का आधा टैक्स के रूप में वसूली का नेटवर्क तैयार किया गया।

इस नेटवर्क में ऊपर से नीचे तक तैनात आमिल, मुंशी, मुत्सर्रिफ और पटवारियों पर हिसाब-किताब की सख्ती बैठा दी गई ताकि वसूली बेरहमी से हो और पूरा माल खिलजी के खजाने में आए। एक जीतल की हेरफेर भी इनमें से किसी को भी कैदखाने में डलवा सकती थी।

यह ध्यान रखें कि निचले पदों पर वसूली करने वाले हों या दूर गाँव-कस्बों में मनमाना खिराज देने वाले, दोनों ही ज्यादातर हिंदू ही थे और इनमें से किसी को बचने का कोई उपाय नहीं रहा। यह आर्थिक रूप से हिंदुओं को मजबूर बनाने का पहला योजनाबद्ध प्रहार था। बरनी बता रहा है-

यह काम इस ढंग से किया गया कि चौधरियों, खूतों और मुकद्दमों में विरोध और बगावत बंद हो गई। उनका घोड़े पर सवार होना, हथियार रखना, अच्छे कपड़े और बेहतर खानपान सब बंद हो गया। खिराज अदा करने के बारे में उन्हें इतना आज्ञाकारी बना दिया गया कि दीवान का एक चपरासी भी कस्बों के बीसियों चौधरियों और मुकद्दमों को एक रस्सी में बांधकर खिराज चुकाने के लिए मारता-पीटता था।

हिंदुओं के लिए अब सिर उठाना मुमकिन नहीं था। हिंदुओं के घरों में सोने, चांदी, तनके, जीतल और धन-संपदा का नामोनिशान भी नहीं रहने दिया गया, क्योंकि इसी के बूते लोग साजिश और बगावत करते हैं। वे इस हद तक गरीब बना दिए गए कि खूतों और मुकद्दमों के घरों की औरतें मुसलमानों के घराें में जाकर काम करने लगीं, मजदूरी पाने लगीं।”

दस्तावेजों में दर्ज यह जानकारी भी जानने योग्य है कि अलाउद्दीन खिलजी को किसी विद्या का कोई ज्ञान नहीं था। वह कभी आलिमों के साथ भी उठता-बैठता नहीं था। हद दरजे का जाहिल और पत्थर दिल तो वह था ही, जिसने अपने चाचा, अपने भांजों और भतीजों की गर्दनें उड़वाईं थीं।

इस्लाम कुबूल करने वाले मुगलों और उनके औरतों-बच्चों तक के कत्लेआम किए थे। दानिशमंद उसके पास कम ही फटकते थे। केवल काजी जियाउद्दीन बयाना, मौलाना जहीर लंग और मौलाना मशीद कुहरानी दरबार के अमीरों के साथ दस्तरख्वान पर बैठने के लिए नियुक्त थे। अलाउद्दीन के सामने सिर्फ काजी मुगीसुद्दीन बयाना आया-जाया करता था।

हिंदुओं के दमन के लिए बनाए जा रहे सख्त कानूनों के समय अलाउद्दीन और काजी मुगीस के बीच सीधी निर्णायक बातचीत होती है। यह हमें इल्तुतमिश के समय दरबार में हिंदुओं को कुचलने का प्रस्ताव लेकर आए इस्लामी विद्वानों की उस बहस की याद दिलाती है, जब इल्तुतमिश के वज़ीर ने बड़ी चतुराई से उस मुद्दे को टाल दिया था।

अब एक बार फिर हिंदुओं को बाकायदा नीतिगत तरीके से निपटाने पर बहस हुई। आजाद भारत के सेक्युलर इतिहास से विलुप्त कर दिए गए ये ब्यौरे अमनपसंद और सहनशील भारतीयों की नींद उड़ाने वाले हैं। आइए सीधे चलते हैं दिल्ली, जहाँ अलाउद्दीन खिलजी और काज़ी मुगीस हिंदुओं की तकदीर का फैसला करने के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक कर रहे हैं…

दिल्ली से लाइव-

1. हिंदुओं को हर कहीं बेइज्जत करने का फैसला
हम उनके मुँह में थूकें और वे उफ भी न करें…

अलाउद्दीन ने काज़ी साहब के सामने पहला मसला यही रखा- “हिंदुओं से खिराज वसूलने पर शरिया की राय क्या है?’

काज़ी ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए फरमाया- “शरिया कहती है कि जब कर वसूल करने वाला उससे चांदी मांगे तो वह बिना सोचे-विचारे और बड़ी इज्ज़त से सोना अदा कर दे। अगर मुहसिल (कर वसूल करने वाला) उसके मुँह में थूकना चाहे तो वह बिना किसी आपत्ति के मुँह खोल दे, जिससे वह उसके मुंह में थूक सके। उस हालत में भी वह मुहसिल के हुक्म का पालन करता रहे।

इस तरह थूकने, बेइज्ज़ती और सख्ती करने का मकसद यह है कि जिम्मी का अत्यधिक आज्ञाकारी होना साबित होता रहे। इस्लाम की इज्ज़त बढ़ाना बेहद ज़रूरी है। दीन को बेइज्ज़त करना बहुत बुरा है। खुदा उनको बेइज्ज़त करने के बारे में यही कहता है।

खासकर हिंदुओं को बेइज्जत करना दीन के लिए बेहद ज़रूरी है। इसकी वजह यह है कि वे मुस्तफा के दुश्मनों में सबसे बड़े दुश्मन हैं। मुस्तफा अलैहिस्सलाम ने हिंदुओं के बारे में यह हुक्म दिया है कि उनको कत्ल कराया जाए, उनकी धन-दौलत लूट ली जाए, उन्हें कैद किया जाए। या तो उनसे इस्लाम कुबूल कराया जाए या उनको मार डाला जाए और उनकी धन-संपत्ति छीन ली जाए।

काज़ी ने थोड़ा रुककर अपनी बात जारी रखी- “हम इमामे-आजम को मानने वाले हैं और उनके अलावा किसी ने भी हिंदुओं से जजिया वसूलने का हुक्म नहीं दिया है। दूसरे मजहब वालों ने इस तरह की कोई रवायत नहीं लिखी है। उनके आलिम हिंदुओं के बारे में सिर्फ यह आदेश देते हैं कि या तो उनको कत्ल कर दिया जाए या उनसे इस्लाम कुबूल कराया जाए।

काज़ी की राय सुनकर अलाउद्दीन के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। वह काज़ी से कहता है- “तूने जो कुछ कहा, उसके बारे में मुझे कुछ मालूम नहीं है। लेकिन मुझे यह पता है कि खूत और मुकद्दम शानदार घोड़ों पर सवार होते हैं। अच्छे कपड़े पहनते हैं। ईरानी धनुष से तीर चलाते हैं। शिकार करते हैं।

खिराज, जजिया और चराई का एक जीतल भी खुद नहीं देते। खूती का पारिश्रमिक अलग से देहातों से वसूलते हैं। महफिलें करते हैं, शराब पीते हैं और कई तो बुलाने पर भी दीवान में हाजिर नहीं होते। मुहसिलों की परवाह नहीं करते।

मुझे इस बात पर बड़ा गुस्सा आया। मैंने सोचा कि मैं दूसरे इलाकों पर कब्ज़ा जमाने की सोचता रहता हूँ और मेरी इकलीम में 100 कोस के भीतर मेरे हुक्म नहीं माने जाते। तब मैंने ऐसा किया कि मेरे हुक्म से सभी चूहे बिलों में घुस गए। इस समय तू भी कहता है कि शरिया के आदेश भी इस बारे में यही कहते हैं कि हिंदुओं को ज्यादा से ज्यादा आज्ञाकारी बनाया जाए।

अलाउद्दीन इतना कहकर रुका। उसने एक गहरी साँस ली और फिर तनकर बोला- “ऐ मौलाए-मुगीस तू बड़ा दानिशमंद है लेकिन तुझे कोई तजुर्बा नहीं है। मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ लेकिन मुझे तजुर्बा बड़ा है।

तू समझ ले कि हिंदू उस समय तक मुसलमान का आज्ञाकारी नहीं होता जब तक वह पूरी तरह गरीब और दरिद्र नहीं हो जाता। मैंने यह हुक्म दिया है कि अवाम के पास सिर्फ इतना ही धन रहने दिया जाए जिससे वह हर साल खेती, दूध और मट्‌ठे के लिए ही काफी हो और अधिक धन-संपत्ति इकट्‌ठी न कर पाएँ।

यह बातचीत दो दिन चली। इसमें अलाउद्दीन ने देवगिरि में लूट से हासिल बेहिसाब संपत्ति की माल्कियत के बारे में सवाल किए। अपने हरम की औरतों और अपने बेटों पर होने वाले खर्चे का मसला भी रखा। दूसरे दिन जब काजी बैठक में आया तब वह कहता है-

“काज़ी मुगीस, मैंने कोई किताब नहीं पढ़ी और न ही पढ़ा-लिखा हूँ। मैं जाहिल हूँ। अलहमदो, कुलहो अल्लाह और दुआए-कुनूत के सिवा कुछ नहीं पढ़ सकता। लेकिन कई पीढ़ियों से मुसलमान हूँ और मुसलमान का बेटा हूँ।

2. हिंदुओं की दुर्गति पर हदीस के जानकार ने कहा कि खिलजी को नबियों के बीच जगह मिलेगी…

अलाउद्दीन खिलजी ने जिस साल काज़ी मुगीस से हिंदुओं के भविष्य के बारे में यह खुली बात की, उसी समय इस्लाम में हदीस का एक नामी जानकार मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क हदीस की 400 किताबों के साथ मुलतान पहुँचा। जब उसने सुना कि अलाउद्दीन नमाज़ नहीं पढ़ता और जुमे की नमाज़ में भी ज्यादातर गैरहाज़िर रहता है तो वह मुल्तान से आगे नहीं बढ़ा और शेखुल इस्लाम सद्रुद्दीन के साहबजादे शेख शम्सुद्दीन फजलुल्लाह का चेला बन जाता है।

वहीं से उसने हदीस की एक किताब में अलाउद्दीन की तारीफ लिखकर दिल्ली भेजी। उसने अलाउद्दीन की शान में क्या लिखा है, वह देखिए-

मैं देहली के निवासियों की सेवा के इरादे से आया था। मेरा ख्याल था कि मैं खुदा और मुस्तफा के लिए हदीस के ज्ञान का देहली में प्रचार करूँ। लेकिन जब मैंने यह सुना कि बादशाह नमाज़ नहीं पढ़ता, जुमे में हाज़िर नहीं होता तो मैं मुल्तान से ही लौट जाता हूँ।

लेकिन मैंने बादशाह की दो-तीन काबिलियत के बारे में सुना है जो किसी भी मजहबी बादशाह में होनी चाहिए। उन काबिलियत में से एक यह है कि हिंदुओं को बेइज्ज़त, पतित, शर्मसार और गरीब बना दिया गया है। मैंने सुना कि हिंदुओं की औरतें और बच्चे मुसलमानों के दरवाजों पर आकर भीख मांगा करते हैं।

ऐ इस्लाम के बादशाह, तेरी यह धर्मनिष्ठता तारीफ के काबिल है। तू मुहम्मद के मजहब की खूब हिफाज़त कर रहा है। अगर इसी आचरण के कारण तेरे सभी पापों में से जो आकाश से पाताल तक के पापों से भी ज्यादा हों, चिड़िया के एक पंख के बराबर भी बख्शे जाने से रह जाएँ तो कल कयामत में तू मेरा दामन थाम लेना।’

हदीसों का यह जानकार अलाउद्दीन की तारीफ में इस हद तक गया है कि वह आगे लिखता है- “ऐ बादशाह तू बधाई का पात्र है। तुझे नबियों के बीच जगह मिलेगी।

यह इस्लामी दुनिया का सर्वोच्च सम्मान देने जैसा है कि किसी को नबियों के बीच और उनके बराबर मान लिया जाए और ऐसा इस्लाम की शान में चार चांद लगाने वाला इंसानियत का कोई बड़ा कारनामा कर दिखाने के बदले में नहीं किया जा रहा है।

खिलजी की इज्ज़तअफज़ाई हिंदुओं के क्रूर दमन के लिए हो रही है। दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद अब चारों तरफ हिंदुस्तान को मटियामेट कर रहे खिलजी को इस्लाम की इज्जत बढ़ाने वाले एक महान सुलतान के रूप में मान्यता मिल रही है। जबकि वह न कुरान पढ़ता, न नमाज़ को जाता।

यह भी देखिए कि उसने अपने खूंखार और शैतानी तौर-तरीकों से किसी को नहीं बख्शा। उसने मुसलमानों को भी थोक में मारा। उनके घर के औरतों-बच्चों को पहली बार दिल्ली में सरेआम कत्ल किया।

आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और बचे-खुचे हिंदुस्तान में क्रूर इस्लामी हमलावरों के साथ अपनी बल्दियतें जोड़ने वाले और असल इतिहास से पूरी तरह बेखबर आज के सारे मुसलमानों के लिए ये दिल दुखाने वाले ब्यौरे इस बात का अवसर देते हैं कि वे इस्लाम की सही व्याख्या कुरान और हदीस में मौजूद तथ्यों के साथ समाज के सामने प्रस्तुत करें।

क्या सिंहासन पर बैठा कोई अपराधी ऐसे घृणित और आपराधिक कारनामों के बूते पर नबियों के बीच जगह पा सकता है? ये क्या चल रहा है? और इससे किसको फिक्र होनी चाहिए? यह सिर्फ मुसलमानों की चिंता के विषय हैं। एक नया मजहब किस तरह के लोगों के हाथों में चला गया? वे किस रास्ते पर इसे ले गए हैं? क्या वे ही सही हैं और अमन की अपीलें ढकोसला हैं?

जियाउद्दीन बरनी ने मलिक करीबेग के जरिए दरबार के ये गोपनीय ब्यौरे दर्ज किए और यह रिपोर्टें हम तक आई। यह 14वीं सदी की शुरुआत थी। नए-नए इलाकों को रौंद रही दिल्ली के लुटेरों की फौजें खुद को ‘इस्लाम की सेना’ कहती थीं।

हिंदुस्तान के नए-नए इलाकों में पहली पीढ़ी मुसलमानों और उनके तौर-तरीकों से रूबरू हो रही थी। 100 साल से लाहौर, दिल्ली, अवध, कन्नौज, बिहार और बंगाल में कोहराम मचा हुआ था। उसके पहले महमूद गज़नवी सिर्फ लगातार लूटपाट के लिए आया करता था। इस्लाम से यह दो सौ साल का संपर्क और परिचय था। यानी आठ पीढ़ियों से यह नई धारा बह रही थी।

आज से 700 साल पहले गंगा तो अपनी जगह वैसी ही थी, लेकिन उसमें जो मिल रहा था वह इस्लाम के नाम पर जहरीला और जानलेवा नस्ली भेदभाव, हिंदुओं के खूनखराबे का भयावह गटर था।

अगर उस दौर से सीधे 700 साल बाद के समय में छलांग लगाकर देखें तो हिंदुस्तान का एक अलग चित्र सामने देखते हैं। मजहब के नाम पर 1947 में पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश बनने के बाद बचे-खुचे भारत में हम 1990 में कश्मीर से पंडितों का वैसा ही दमन देखते हैं और मुल्क के बाकी हिस्से में गंगा-जमुनी राग का शोर सुनते हैं। हिंदुओं के लगातार दमन और सदियों तक चले धर्मांतरण के बावजूद अगर टुकड़ा-टुकड़ा होकर भी कुछ बचा रह गया है तो यह कुदरत का करिश्मा ही है। अल्लाह की मेहरबानी है। शुक्र है।

अगले हफ्ते चलेंगे चित्तौड़, जहाँ 30,000 हिंदुओं का कत्ल कर दिया गया है। पहाड़ों की ऊँचाइयों पर चील-गिद्ध मंडरा रहे हैं। खिलजी को इस किले पर फतह हासिल करने में आठ महीने लगे हैं और चित्तौड़ का नाम बदल दिया गया है।