भारती
अहमदाबाद-मुंबई तीव्र गति रेल (बुलेट ट्रेन) का तेज़ी पकड़ता कार्य कहाँ तक पहुँचा

अहमदाबाद से मुंबई के बीच बनने वाली हाई स्पीड रेल (एचएसआर) की घोषणा फरवरी 2017 में हुई थी लेकिन अब जाकर इसका कार्य तेज़ी पकड़ रहा है। नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एन एच एस आर एल सी) ने निर्माण पूर्व कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर दिया है।

इसके लिए भूमि अधिग्रहण का जो कार्य रुका हुआ था, उसे भी गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय ने बल दे दिया है। 19 सितंबर को सुनाए गए निर्णय में न्यायालय ने 120 याचिकाओं को खारिज कर दिया है जो किसानों द्वारा दायर की गई थीं। हालाँकि किसानों को उच्च मुआवज़ा राशि की मांग करने की छूट दी गई है।

इन याचिकाओं ने राज्य संशोधन को चुनौती दी थी जिसकी प्रतिक्रिया में न्यायालय ने कहा कि यह मामला गुजरात राज्य सरकार का नहीं है व महाराष्ट्र और गुजरात दोनों सरकारों के अधीन आता है। मुआवज़ा राशि के मूल्यांकन और पर्यावरण व सामाजिक प्रभाव के लिए किए गए अध्ययन को भी न्यायालय ने वैध माना।

भूमि अधिग्रहण

508 किलोमीटर लंबे इस तीव्र गति के ट्रैक के लिए अधिकांश रूप से सरकार और रेलवे के स्वामित्व वाली भूमि का ही उपयोग किया जाएगा। इसके अतिरिक्त 1,400 हेक्टेयर निजी भूमि की आवश्यकता है, जिसमें से 620 हेक्टेयर भूमि अब तक अधिग्रहित की जा चुकी है, फाइनेंशियल एक्सप्रेस  ने रिपोर्ट किया।

कुल भूमि में से कुछ वन भूमि भी है। परियोजना दायरे में महाराष्ट्र की 131.3 हेक्टेयर वन भूमि और गुजरात की 5.8 हेक्टेयर वन भूमि आती है जिसमें 24.1 हेक्टेयर क्षेत्र में मैंग्रोव जंगल भी हैं। इससे लगभग 53,500 मैंग्रोव पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका है। इसके बदले में दोगुने क्षेत्र में वृक्ष लगाए जाएँगे।

उपयोगिताओं का स्थानांतरण

मार्ग में आने वाली विभिन्न उपयोगिताओं को स्थानांतरित किया जा रहा है लेकिन वर्तमान में वृक्षों से छेड़छाड़ नहीं की जा रही है। एन एच एस आर एल सी के अधिकारी ओएनजीसी, गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड, गुजरात एनर्जी ट्रांस्मिशन कंपनी लिमिटेड, अहमदाबाद, सूरत व वडोदरा के नगर निगमों और महाराष्ट्र के प्राधिकरणों से इस कार्य के लिए संपर्क स्थापित कर रहे हैं।

रेलवे के भवनों को स्थानांतरित करने का कार्य शुरू हो चुका है और ओएनजीसी ने भी अपने पाँच तेल केंद्रों को स्थानांतरित कर दिया है। दोनों राज्यों की 1,600 बिजली उपयोगिताओं को भी स्थानांतरित किया जाना है। इसके लिए टाटा पावर और एस्सार जैसी निजी कंपनियों से भी समन्वय किया जा रहा है।

परियोजना विवरण

इस ट्रैक पर कुल 12 स्टेशन होंगे जिनमें से आठ- साबरमती, कालुपुर (अहमदाबाद), आनंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोरा और वापी- गुजरात में और चार- बोइसार, विरार, ठाणे और बांद्र-कुरला कॉमप्लैक्स (बीकेसी)- महाराष्ट्र में होंगे।

परियोजना को कुल 27 भागों में पूरा किया जाएगा जिसमें से दो भाग निरीक्षण के व 25 निर्माण कार्य के हैं। इनमें से एक भाग को अप्रैल 2019 में वडोदरा में पूरा कर दिया गया। यहाँ स्लैब ट्रैक के साथ एचएसआर ट्रेनिंग लाइन का निर्माण किया गया है।

निर्माण पूरा होने से पहले दो-तीन वर्षों में 3,100 लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रशिक्षण कार्य में जापान हमारी सहायता कर रहा है। 13 लोगों के एक दल को दिसंबर में तीन महीनों के लिए जापान भेजा जाएगा। साथ ही प्रशिक्षण के लिए दस्तावेज भी विकसित किए जाएँगे।

तकनीकी विशेषताएँ

परियोजना का 92 प्रतिशत मार्ग भूमि के स्तर पर नहीं होगा। इसमें 460.3 किलोमीटर लंबी वायाडक्ट, 9.22 किलोमीटर लंबे पुल और 25.87 किलोमीटर की कुल लंबाई वाली सुरंगें होंगी। ट्रैक को भूमि से ऊपर बनाने का निर्णय जल निकायों, सड़क-रेल मार्गों से क्रॉसिंग आदि से बचने के लिए लिया गया है।

इस परियोजना के अंतर्गत भारत की पहली समुद्री सुरंग बनाई जाएगी जो कि 7 किलोमीटर लंबी होगी। यह ट्रैक ठाणे क्रीक से गुज़रेगा इसलिए मैंग्रोव व फ्लैमिंगो के संरक्षण के लिए यह निर्णय लिया गया है। इसके निर्माण हेतु न्यू ऑस्ट्रेलियन टनलिंग व टनल बोरिंग मशीन तकनीकों का सहारा लिया जाएगा।

भारतीय रेलवे के कार्यों में सर्वेक्षण के लिए पहली बार लिडार का प्रयोग हो रहा है। लेज़र डाटा, जीपीएस डाटा और वास्तविक चित्रों की सहायता से यह 10 सेंटीमीटर की सटीकता के साथ मार्गरेखा व निर्माण कार्य के लिए ली गई अतिरिक्त भूमि को चिह्नित करेगी।

वडोदरा, अहमदाबाद और सूरत में मार्गरेखा वर्तमान रेलवे स्टेशनों से गुज़रती है इसलिए इन्हें पार करने के लिए स्टील पुलों की योजना है।वडोदरा स्थित पुल एकल विस्तार लंबाई की दृष्टि से सबसे लंबा होगा जो कि 240 मीटर है। अहमदाबाद का पुल 120 मीटर लंबा होगा। स्टील का होने के कारण इसका विमार्ग-गमन (डिफ्लेक्शन) कम होगा।

सिग्नल और दूरसंचार प्रणाली वैसी ही होगी जैसी जापानी शिंकनसेन ट्रेनों में होती है। तीव्र गति पर हवा के दबाव को कम करने के लिए एयरोडायनामिक डिज़ाइन होगी जिसके लिए डब्बों के बीच में, बगल में और निचली तरफ विशेष उपकरण लगाए जाएँगे। साथ ही आगे की ओर लंबी निकली हुई नाक सुरंग से गुज़रने में सहायता करेगी।

वर्तमान और भविष्य

हाल ही में साबरमती टर्मिनल के निर्माण के लिए बीएल कश्यप एंड सन्स लिमिटेड को 332 करोड़ रुपये का अनुबंध मिला है। 16 कंपनियों में से सबसे कम बोली होने के कारण कश्पय को यह कार्य सौंपा गया है। इस टर्मिनल की थीम महात्मा गांधी के दांडी मार्च पर आधारित होगी जो साबरमती से ही शुरू हुआ था।

अब तक लगभग 370 किलोमीटर लंबे भाग के लिए टेंडर आमंत्रण भेज दिए गए हैं जिसमें बांद्रा-कुरला कॉमप्लैक्स से शिलफाटा तक 20 किलोमीटर लंबी भूमिगत सुरंग, ज़ारोली और वडोदरा के बीच 237 किलोमीटर लंबे भाग पर निर्माण, सूरत, वापी, बिलिमोरा और भरूच का स्टेशन निर्माण, नवसारी जिले में पुल निर्माण, आदि शामिल हैं।

अहमदाबाद और वडोदरा के बीच 90 किलोमीटर लंबे भाग के लिए टेंडर निकाले गए हैं जिन्हें भरने की अंतिम तिथि 28 नवंबर है। टेंडर प्राप्त करने वाली कंपनी को 1,370 दिनों में निर्माण कार्य पूरा करना होगा।

लगभग 1.1 लाख करोड़ की लागत से बनने वाली इस परियोजना का 80 प्रतिशत यानी कि 88,087 करोड़ रुपये जापान इंटरनेशनल कोपरेशन एजेंसी (जीका) 50 वर्षों के लिए 0.1 प्रतिशत के ब्याज पर ऋण देगी। 17,000 करोड़ रुपये केंद्र सरकार व 5,000 करोड़ रुपये गुजरात व महाराष्ट्र की राज्य सरकारें देंगी।

वैसे तो इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य दिसंबर 2023 रखा गया है लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र को कोई भेंट दी जाए इसलिए 50-60 किलोमीटर के खंड पर कार्य पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। हालाँकि एन एच एस आर सी एल के प्रबंधक महानिदेशक अचल खरे ने इसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य बताया है। यह खंड सूरत से बिलिमोरा के बीच होगा।