भारती
सहायता करने का सुख सर्वोपरि है, इसे न भोगने वाले ही कृपण हो सकते हैं- कुरल भाग 8

निर्धनों की सहायता

जो ज़रूरतमंदों को दिया जाता है, वही वास्तविकता में उपहार होता है। अन्य सभी उपहार व्यापारिक लेन-देन के समान होते हैं जहाँ देने वाल कुछ पाने की अपेक्षा भी करता है।

विभिन्न अवसरों पर संबंधियों से प्राप्त उपहारों का हिसाब (तमिल में इसे कुरियेदिर्प्पै  कहते हैं) रखा जाता है और अगले उपयुक्त अवसर पर उसके समतुल्य उपहार उन्हें दिया जाता है। यही प्रथागत सामाजिक कर्तव्य है।

भिक्षा पर आश्रित होना और भिक्षा पाना सदैव पीड़ा पहुँचाता है, भले ही आपकी निर्धनता आपको इसकी अनुमति देती हो। लेकिन दूसरी ओर निर्धन को कुछ देना अच्छा होता है, भले ही भविष्य में आपको इसके बदले कुछ न मिले।

देने वाले को दान का भाव सुख देता है लेकिन पाने वाले को एहसान लेने का भाव पीड़ा देता है। यह मानवीय प्रवृत्ति है। यह तिरुवल्लुवर के दृष्टिकोण का विशेष उदाहरण है। वे कुछ ऐसी चीज़ों पर बल डालते हैं जो धार्मिक विश्वासों से बंधी हुई नहीं होती है।

आप दान को पाकर बुरा महसूस कर सकते हैं लेकिन तब तक ही जब तक आप देने वाले के मुख का वह तेज नहीं देख लेते जो दान करने के कारण आलोकित हुआ है।

जब आप उस मुख को देखेंगे तो समझेंगे कि किसी को सुख देने का अवसर और शक्ति मिलना वास्तविकता में सौभाग्य है।

किसी तपस्वी का मानसिक सामर्थ्य उसे भूख सहने की शक्ति देता है और इसीसे उसे शक्ति भी मिलती है। लेकिन दूसरे की भूख को मिटाना, खुद की भूख सहने से बड़ा कार्य है।

असुविधा की पीड़ा झेलना बहादुरी है लेकिन दूसरे की पीड़ा महसूस करना और उनकी सहायता के लिए तत्पर होना उससे भी बड़ी बहादुरी है।

भूख के अभिशाप से लोगों को बचाने वाला व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है क्योंकि ऐसा करके उसने अपने धन को सुरक्षित तिजोरी में रख लिया है।

क्या इन लोगों ने कभी देने का सुख नहीं भोगा है? अन्यथा वे इतने कठोर हृदयी होकर देने से मना कैसे करते। अंततः वह सब इस संसार से ओझल हो जाएगा जो उन्होंने ज़रूरतमंद को नहीं दिया।

वे इतने मूर्ख और कृपण नहीं होते अगर वे कल्पना कर सकते कि स्वयं को सुख देने की उनके पास कितनी शक्ति है जिसे वे निरर्थक प्रयासों पर व्यर्थ कर रहे हैं। यदि उन्होंने एक बार इसे परखा होता तो वे जानते।

वे अत्यंत दुखी होते हैं जिन्हें निर्धनता भिक्षा मांगने के लिए विवश करती है। लेकिन उनसे अधिक नीच वे होते हैं जिनका संकीर्ण हृदय उन्हें भूखों के मुँह पर द्वार बंद करने देता है, ताकि वे स्वयं खा सकें।

मृत्यु सबसे पीड़ादायक है लेकिन वह अच्छे मनुष्य के लिए सुखकारी होती है क्योंकि वह स्वयं को निर्धनों की सहायता करने की स्थिति में नहीं पाता है।

वर्तमान समय में भिक्षा देने का गुणगान मूर्खता लग सकता है और भविष्य में हो सकता है सराहा न जाए जब समाज की आर्थिक संरचना को पूर्णतः बदल दिया जाएगा। हमें इसे उस पृष्ठभूमि से सोचना होगा जब सामाजिक संगठन के विषय में शायद ही विचारा गया होगा। जो उस समय दान के विषय में कहा गया, उसे आज समाज सेवा के लिए लागू किया जा सकता है। मूल वही है, भले ही आकार परिवर्तित हो गया है।

सार्वजनिक आदर

निर्धनता ही आपका धन है यदि इसका कारण ऐसा है जो आपको समाज में सम्मान दिलाता है। कुछ परिस्थितियों में मृत्यु आपको अमर बनाती है। जो निर्धनता, निर्धनता नहीं है और जो मृत्यु, मृत्यु नहीं बल्कि जीवन है, वह सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो सच्चे मूल्यों का अर्थ समझते हैं।

जब व्यक्ति को वह आदर नहीं मिलता जो अच्छे मनुष्यों को मिलना चाहिए, तब वे अपनी त्रुटियों को देखकर शोक मनाने की बजाय संसार को दोष क्यों देते हैं जो उन्हें यह सम्मान देने से नकार देता है?

अगले अंक में जारी…