भारती
हरियाणा सरकार के आरक्षण का निर्णय राष्ट्र-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी, व्यापार-विरोधी क्यों

आशुचित्र- अंततः इस नीति का सर्वाधिक नुकसान हरियाणा के लोगों को ही होगा।

भारत में ऐसी सरकारी नीतियों को खोजना कठिन नहीं है जो हिंदुत्व-विरोधी हो अर्थात हिंदुओं के हितों के विरोध में हो, राष्ट्र-विरोधी हो अर्थात राष्ट्र के हितों के विरोध में या व्यापार-विरोधी हो। लेकिन यह बहुत कम बार ही होता है कि कोई नीति विरोध के तीनों पैमानों को पूरा करे।

तुरंत मेरे दिमाग में केंद्रीय स्तर की एक ऐसी नीति आ रही है, कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार द्वारा पारित शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 जिसे सोनिया गांधी का संरक्षण प्राप्त था। पूर्ण विश्लेषण करने पर केंद्र और राज्य के स्तर पर कांग्रेस द्वारा लागू की गईं और भी ऐसी नीतियाँ मिल जाएँगी।

भजापा भी इस मामले में शुद्ध नहीं है। यह अभी तक त्रुटिपूर्ण सच्चर कमिटी के सुझावों पर आधारित यूपीए की “अल्पसंख्यक नीति” को चला रही है। व्यापार के लिए यह कांग्रेस से बेहतर हो सकती है लेकिन पिछले छह वर्षों में इसने कई व्यापार-विरोधी नीतियाँ भी लागू की हैं।

साथ ही हिंदुत्व के उद्देश्य को नुकसान पहुँचाने के आरोप से भी यह मुक्त नहीं है, कभी कुछ न करके (जैसे मार्क्सवादियों द्वारा 15 वर्ष पहले तैयार किए गए विद्यालयी इतिहास के पाठ्यक्रम  में कोई परिवर्तन न करेक) या कभी अपने आदेशों से (जैसे मंदिरों पर अधिकार जमाकर मंदिर संपत्ति का उपयोग धर्मनिरपेक्ष कामों के लिए करना)।

लेकिन यह बहुत ही कम होता है कि किसी भाजपा नीति को राष्ट्र-विरोधी, हिंदुत्व-विरोधी और व्यापार-विरोधी तीनों एक साथ कहा जा सके। सह पल सोमवार (6 जुलाई) को आया जब हरियाणा कैबिनेट ने 50,000 रुपये से कम मासिक वेतन वाली निजी क्षेत्र की 75 प्रतिशत नौकरियों को राज्य के निवासियों के लिए आरक्षित करने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी।

आपको स्पष्ट हो कि यह भाजपा सरकार की सहयोगी जननायक जनता पार्टी (जजपा) का चुनावी वादा था लेकिन अब इस निर्णय के लिए मुख्यमंत्री खट्टर भी उतने ही उत्तरदायी हैं जितने जजपा नेता दुष्यंत चौटाला।

इस बुरे विचार को सबसे पहले पिछले वर्ष जुलाई में आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी की नवनिर्मित सरकार ने लागू किया था। लेकिन इसपर कोई आश्चर्यचकित नहीं हुआ था क्योंकि यह किसी क्षेत्रीय पार्टी की सरकार द्वारा किया जा रहा था और वे राष्ट्र को किनारे रखकर प्रायः इस प्रकार के निर्णय ले लेती हैं।

लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी, नहीं, राष्ट्रवादी पार्टी संकीर्ण मानसिकता पर आधारित ऐसा नीतिगत निर्णय ले तो यह आश्चर्यजनक होने के साथ-साथ निराशाजनक भी है क्योंकि इसके समर्थक भाजपा से अपेक्षा करते हैं कि वह राष्ट्र को प्राथमिकता देगी।

पहला,  इस प्रकार के कानून मूल रूप से राष्ट्र-विरोधी हैं। स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण, वह भी निजी क्षेत्र में पतन की ओर जाने वाली राह है। जब दूसरे राज्यों के लोगों को हरियाणा या आंध्र प्रदेश में नौकरी नहीं मिल पाएगी तो वे राज्य, विशेषकर जहाँ निजी क्षेत्र तुलनात्मक रूप से बेहतर है और अवसर पर्याप्त हैं, वे भी दूसरे क्षेत्रों के लिए अपनी सीमाएँ बंद करने के लिए विवश होंगे।

अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है और सरकारी नौकरियों की संख्या घट रही है तो इस वास्तविकता की ओर हम और तेज़ी से बढ़ेंगे। यह राष्ट्र निर्माण परियोजना के लिए खतरा है क्योंकि यदि राज्य अंतर्मुखी बनते जाएँगे तो राष्ट्रीय एकता कभी नहीं आएगी। राष्ट्रीय एकता का सबसे पहला कदम है कि किसी भी राज्य के लोग कहीं भी आ-जा सकें और रोजगार से बेहतर दूसरे स्थान पर जाकर बसने का, दूसरे लोगों से घुलने-मिलने का और क्या कारण होगा।

ये सब एक राष्ट्र की भावना को बढ़ाते हैं। लेकिन निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण जैसी खतरनाक नीतियों से हम पहले भारतीय होने की बजाय, पहले बंगाली, तमिल, मराठी, हरियाणवी आदि बनते जाएँगे। पिछले सात दशकों में हमने संघर्ष करके सामाजिक मोर्चे पर जो कुछ प्राप्त किया, यह नीति उन सबके लिए खतरा है।

दूसरा, इस प्रकार की नीतियाँ हिंदुत्व परियोजना के विरोध में है। यह कोई संयोग नहीं है कि आर्थिक उदारीकरण और निजी क्षेत्र में वृद्धि के साथ ही हिंदुत्व भी मजबूत हुआ है। करोड़ों लोग निर्धनता से उबरकर मध्यम-वर्गीय बन पाए हैं।

कहीं भी आने जाने की स्वतंत्रता ने लोगों को गाँव से शहरों की ओर आने का अनुमति दी है जहाँ उन्हें जाति के नाम से जानने की बजाय पहले हिंदू के रूप में पहचाना जाता है। ये करोड़ों मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय लोग हिंदुत्व की प्राणवायु हैं।

यदि हम पुनः क्षेत्रवाद की ओर लौट जाएँगे तो हिंदुत्व के मार्ग में हमारे किए गए प्रयास धूमिल हो जाएँगे और कांग्रेस शैली की जाति आधारित राजनीति प्रतिशोध की भावना के साथ वापस आ जाएगी।

तीसरा, ऐसे निर्णय व्यापार विरोधी तो निस्संदेह हैं। हरियाणा में निजी क्षेत्र अभी प्राथमिक स्तर पर ही। फरीदाबाद और गुड़गाँव को छोड़कर वहाँ केवल नाम-मात्र के उद्योग हैं। और इन दोनों को लाभ भी इसलिए मिला है क्योंकि वे नई दिल्ली से सीमा साझा करते हैं।

झज्जर और सोनीपत जैसे अन्य जिले भी जो दिल्ली सीमा के निकट हैं, वे निजी क्षेत्र की इकाइयों के वहाँ बसने का आर्थिक लाभ उठा रहे हैं। लेकिन खट्टर सरकार की यह नीति इस प्रगति को शुरुआती स्तर में ही आघात पहुँचा देगी।

हरियाणा सरकार को मिलने वाले कर का एक बड़ा भाग गुड़गाँव और फरीदाबाद जैसे शहरों से आता है जहाँ प्रमुख विनिर्माण और सेवा कंपनियाँ स्थित हैं और वे बड़ी संख्या में दूसरे राज्य के लोगों को रोजगार देती हैं। इस पैसे से ही सरकार कल्याणकारी योजनाओं को वित्तपोषिच कर पाती है। लेकिन अब यह हाथ में भी लड्डू रखना चाहती है और उसे खाना भी चाहती है।

जब बात बेरोजगारी की हो तो हरियाणा अग्रणी राज्यों में से एक है और इसका कारण है कि यह विकसित राज्यों से शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। राज्य में उच्च शिक्षा के लिए कोई प्रतिष्ठित संस्थान नहीं है। प्राथमिक शिक्षा की भी अवस्था कुछ विशेष नहीं है।

शिक्षा में निवेश करने और कौशल विकास योजनाओं को वित्तपोषित करने की बजाय सरकार छोटा मार्ग अपनाना चाहती है तथा निजी क्षेत्र पर अपने रोजगार के लिए अयोग्य युवाओं का भार डालना चाहती है।

लेकिन सरकार को समझना चाहिए कि निजी कंपनियाँ उसके इन आदेशों को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे आराम से दूसरे राज्यों (या देशों) में जाकर बस सकती हैं जहाँ उनका मूल्य पहचाना जाए।

चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियों को आकर्षित करना तो दूर की हात, ऐसी नीतियाँ उस सीमित निजी क्षेत्र को भी हरियाणा से दूर कर देंगी जो वर्तमान में वहाँ स्थापित है। फलस्वरूप हरियाणवियों को वे निजी क्षेत्र की नौकरियाँ नहीं मिलेंगी जिनके लिए यह कानून लाया जा रहा है।

सरकार कर द्वारा अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खो देगी और लोगों को दूसरे राज्य जाने के लिए विवश होना पड़ेगा लेकिन वहाँ भी उन्हें अस्वीकार किया जाएगा। सरकार को समझना चाहिए कि जिनके लिए वह दावा कर रही है कि यह नीति लाई जा रही है, उन ही हरियाणवियों को सर्वाधिक नुकसान होगा।

अगर भाजपा राष्ट्रीय हित, हिंदुत्व परियोजना और व्यापार के लिए चिंतित है तो ऐसी नीति लाने के लिए उसे हरियाणा सरकार को आड़े हाथ लेना चाहिए।