भारती
गेहूँ के रिकॉर्ड उत्पादन की संभावना एक चुनौती, अथाह भंडार का कैसे हो उपभोग

प्रसंग- गेहूँ के रिकॉर्ड उत्पादन की अपेक्षा उतनी अच्छी खबर क्यों नहीं?

पिछले 10-15 दिनों में उत्तर भारत के कई भागों में वर्षा हुई और कहा जा रहा है कि खेतों में खड़ी गेहूँ की फसल इससे प्रभावित होगी।

हालाँकि, जैसा भय है कि गेहूँ का उत्पादन प्रभावित होगा तो ऐसा नहीं है। यह अवश्य हो सकता है कि वर्षा प्रभावित क्षेत्रों में गेहूँ की गुणवत्ता खराब हो। लेकिन बढ़ते भंडार के कारण एक औरचिंता का विषय है।

द इकोनॉमिक टाइम्स  ने गेहूँ एवं बाजरा भारतीय शोध संस्थान के निदेशक डॉ ज्ञानेंद्र पी सिंह का उद्धरण दिया है जिसमें वे कह रहे हैं कि 5 प्रतिशत फसल का नुकसान हो सकता है।

भारत में गेहूँ रबी फसल है जिसे सर्दियों में उगाई जाती है। इसे नवंबर-दिसंबर में बोया जाता है और अप्रैल में इसकी कटाई होती है। गुजरात और मध्य प्रदेश में यह फसल थोड़ी जल्दी बोई जाती है और कटाई होने वाली है या शुरू हो चुकी है।

कृषि मंत्रालय के डाटा के अनुसार इस वर्ष रबी मौसम में 33.61 मिलियन हेक्टेयर (एमएच) क्षेत्र में गेहूँ बोई गई है जो पिछले वर्ष से 4 एमएच अधिक है। औसत से भी यह 3.1 एमएच अधिक है।

पिछले पक्ष में वर्षा के बावजूद इस वर्ष गेहूँ के लिए मौसम अनुकूल रहा है। जहाँ फसल उग रही है, वहाँ तापमान अभी भी ठंडा ही है जो अच्छी फसल देगा। इसके फलस्वरूप इसवर्ष रिर्ड उत्पादन भी हो सकता है।

पिछले वर्ष गेहूँ उत्पादन 102.19 मिलियन टन (एमटी) के रिकॉर्ड स्तर पर था। उद्योग सूत्रों की मानें तो इस वर्ष उत्पादन 110 एमटी को भी पार कर सकता है। यह रिकॉर्ड उत्पादन सरकार का काम कठिन करेगा जिसके दो कारण हैं।

पहला  यह कि पिछले वर्ष के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण भंडार में पहले से ही काफी अनाज है। अप्रैल से नया अनाज भी आना शुरू हो जाएगा।

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के डाटा के अनुसार 1 मार्च को गेहूँ भंडार 27.52 एमटी था। 1 अप्रैल तक देश के पास 7.46 एमटी भंडार होना चाहिए और यह उससे कई अधिक है।

सरकारी नियमों के अनुसार एफसीआई के पास 4.46 एमटी का गेहूँ भंडार होना चाहिए और 3 एमटी का नीतिगत भंडार होना चाहिए जो अकाल या खाद्य आपातकाल के समय काम आ सके।

इसके ऊपर अब इस वर्ष का अनुमानित गेहूँ उत्पादन 110 एमटी से अधिक है जो देश में गेहूँ के पहाड़ खड़ा कर देगा। हमारे पास 136 एमटी गेहूँ होगा। चिंता का कारक है कि पारंपरिक गोदामों में इन्हें रखा जाएगा जहाँ पानी, मौसम, कीड़ों और कृंतकों का खतरा इनपर बना रहेगा।

दूसरा  यह कि राशन दुकानों के माध्यम से वितरित करने के लिए राज्य जो अनाज लेते हैं वह तंत्र ढीला है। एफसीआई डाटा के अनुसार पिछले वर्ष के अक्टूबर तक विभिन्न योजनाओं के तहत 14.41 एमटी गेहूँ लिया गया था जिसमें से 13.01 एमटी राष्ट्रीय फूड आर्ट योजना के लिए गया।

इस योजना के अंतर्गत गेहूँ गरीब और गरीबी रेखा से नीचे आने वाले लोगों को कम दरों पर गेहूँ दिया जाता है। हालाँकि उद्योग सूत्रों का कहना है कि गरीबों वितरित किए जाने वाला अधिकांश अनाज खुले बाज़ार तक अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है।

एफसीआई के पास जो रिकॉर्ड भंडार है वह इसके बावजूद है कि प्रतिवर्ष विभिन्न योजनाों के लिए लगभग 26 एमटी गेहूँ लिया जाता है। विडंबना यह है कि एफसीआई के पास इतने भंडार के बावजूद आटा मिल वाले माँग आपूर्ति के लिए कच्चे माल की खोज में लगे रहते हैं।

कई बार एफसीआई खुला बाज़ार विक्रय योजना (ओएमएसएस) के साथ प्रस्तुत होती है लेकिन क्योंकि खरीदने वालों को निगम के लिए अतिरिक्त शुल्क देने होते हैं तो कम ही खरीददार बचते हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर तक एफसीआई ओएमएसएस के तहत केवल 6 लाख टन गेहूँ ही हेच पाया था जबकि कई अधिक बेचा जा सकता था।

गेहूँ उपभक्ताओं का मानना है कि गेहूँ उत्पादन के प्रति सरकार के उद्देश्य में बड़े परिवर्तन की आवश्यकता है। अभी तक नीति थी आत्म-निर्भर बनना लेकिन इस लक्ष्य को काफी पहले प्राप्त किया जा चुका है। अब सरकार को देखना होगा कि गेहूँ उत्पादन के क्या अन्य उपयोग किए जा सकते हैं और उपभोग को कैसे बढ़ाया जाए।

उदाहरण स्वरूप नीति निर्माताओं को इस बात की समीक्षा करनी होगी कि ओएमएसएस योजना के अंतर्गत एफसीआई का अपनी लागत को जोड़ना कितना सही है। निगम प्रति टन गेहूँ पर 3,500 रुपये प्रति टन का अतिरिक्त शुल्क लगाता है जिस उसने अप्रैल में 18,400 रुपये प्रति टन की दर पर खरीदा था।

इस वर्ष गेहूँ के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाकर 19,250 रुपये प्रति टन कर दिया गया है और अब सरकार को भंडार के लिए गेहूँ की खरीद पर और अधिक खर्च करना होगा।

रबी फसल का एमएसपी

अगर सरकार किसानों से गेहूँ नहीं खरीदेगी तो मूल्य गिरने की संभावना है जो किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक आत्महत्या होगी।

ब्याज और भंडारण लागत के अतिरिक्त शुल्क के अलावा सरकार किसानों से गेहूँ खरीदने पर राज्य सरकारों को कई उप-कर भी देती है। ये सब जुड़कर खरीद शुल्क में 15 प्रतिशत के अतिरिक्त शुल्क के रूप में जुड़ जाता है।

ओएमएसएस के अधिक मूल्य के कारण ही उपभोक्ताओं को खुदरा दुकानों पर आटा के लिए अधिक दाम देना होता है। अंततः सरकार, उद्योग और उपभोक्ता, सब ही आवश्यकता से अधिक व्यय करते हैं।

पिछले वर्ष सितंबर में खाद्य मंत्री, जो एफसीआई की क्रियाशीलता का निरीक्षण करते हैं, को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमएओ) की ओर से सुझाव दिया गया था कि ओएमएसएस के मूल्य में कटौती की जाए लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया था।

यदि खाद्य मंत्रालय के अधिकारियों ने पीएमएओ की सुनी होती तो भंडारण को काफी मात्रा में कम किया जा सकता था। एक  यह हो सकता था कि आटा मिलें निजी कंपनियों से अधिक गेहूँ एफसीआई से लेती।

दूसरा  यह कि मक्के के दाम बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग संघर्षरत था। अगर गेहूँ का मूल्यकम होता तो इस उद्योग के पास गेहूँ के उपयोग का विकल्प होता और भंडार को कम किया जा सकता था।

ऊँची कीमतों के कारण उपभोक्ताओं ने सरकार को बिना आयात शुल्क के मक्का मंगाने के लिए कहा। इसके बाद सरकार ने 15 प्रतिशत के रियायती शुल्क पर मक्का आयात की अनुमति दी।

खरीफ मौसम में अच्छे उत्पादन के कारण जनवरी से मक्की का मूल्य 15 प्रतिशत तक गिरा है। लेकिन जब मक्की की कीमत 27 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई थी तो ऐसे में 25 रुपये प्रति किलोग्राम की गेहूँ इसमें सहायता कर सकती थी।

वर्तमान एमएसपी के कारण गेहूँ का निर्यात संभव नहीं है। भारतीय गेहूँ को चारा योग्य माना जाता है और जब गेहूँ कम से कम 100 डॉलर प्रति टन सस्ती अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बिक रही है तो भारतीय गेहूँ के लिए आसार नहीं हैं।

इन सबके कारण सरकार के पास गेहूँ के भंडार को संभालने की एक बड़ी चुनौती है। अभी या कुछ समय बाद सरकार को इसमें कटौती के तरीके देखने होंगे। अतिरिक्त लागत में कटौती की जा सकती है जो 13,000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष रहती है।

गेहूँ के अलावा सरसों और आलू पर भी वर्षा का प्रभाव पड़ेगा लेकिन इसका आँकलन अभी हुआ नहीं है।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।