भारती
एसटीपी की उपस्थिति और कार्यकुशलता की चुनौतियों पर गुजरात की एक पड़ताल

गुजरात के वडोदरा में स्थित पर्यावरण सुरक्षा समिति ने मुद्दा उठाया है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद गुजरात के मलजल उपचार संयंत्रों (एसटीपी) को क्रियाशील करने का काम नहीं हुआ। दरअसल 22 फरवरी 2017 को सुनाए अपने आदेश में न्यायालय ने सभी एसटीपी को क्रियाशील करने की समय-सीमा 22 फरवरी 2020 रखी थी।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा 4 फरवरी को जारी रिपोर्ट से हम देख सकते हैं कि दिसंबर 2020 तक गुजरात में 65 एसटीपी तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है जो 31 मार्च तक 100 प्रतिशत मलजल उपचार के प्रस्ताव को पूरा करता हुआ नहीं दिख रहा।

वडोदरा शहर का ही उदाहरण लें तो यहाँ छानी क्षेत्र में 21 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की क्षमता वाले एसटीपी की स्थापना का प्रस्ताव 2013 में रखा गया था। बाद में यहाँ 50 एमएलडी की क्षमता वाले एसटीपी का निर्माण तय हुआ लेकिन यह अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में उद्योग वाले शहरों में उपचार संयंत्र स्थापित करने को प्राथमिकता देने की बात कही थी।

मई 2018 में गुजरात सरकार ने पानी की कमी और उद्योगों द्वारा पानी की आवश्यकता को देखते हुए नीति बनाई कि प्रतिदिन 1 लाख लीटर से अधिक का उपयोग करने वाले उद्योगों को उपचारित मलजल का उपयोग करना होगा। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए छानी में बन रहे एसटीपी में बेहतर निस्पंदन सुविधा और उपचारित जल को उद्योग तक पहुँचाने के लिए प्रेशर लाइन आवश्यक है।

124.68 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को राज्य स्तरीय तकनीकी समिति और राज्य स्तरीय ऊर्जा समिति द्वारा स्वीकृति मिल गई है और टेंडरिंग प्रक्रिया शुरू हो रही है। जीएसएफसी, जीएसीएल और गुजरात ऊर्जा निगम (जीआईपीसीएल) जैसे उद्योग इस परियोजना में भागीदार बनने के लिए आगे आए हैं।

वडोदरा स्थित जीआईपीसीएल स्टेशन-2

उद्योगों के जुड़ने से परियोजना की वित्त व्यवस्था भी आसान हुई। दिसंबर 2019 में हुई बैठक में तय हुआ कि जीआईपीसीएल परियोजना की लागत का 60 प्रतिशत देगी, वहीं जीएसएफसी और जीएसीएल 15-15 प्रतिशत। वडोदरा नगर निगम परियोजना का 10 प्रतिशत खर्च उठाएगा।

उद्योगों के लिए करनी होगी अलग व्यवस्था

हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) ने 21 जनवरी के अपने आदेश में गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सूरत स्थित जेटेक्स रेशम मिल द्वारा भेड़वाड़ खाड़ी में प्रवाहित किए जा रहे अनुपचारित रसायनिक जल को नियंत्रित करने के लिए कहा था।

सीपीसीबी के डाटा के अनुसार महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद गुजरात तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जिसमें सबसे ज़्यादा उद्योगों को एफ्लुएंट उपचार संयंत्र (ईटीपी) की आवश्यकता है। 8,240 ईटीपी आवश्यक उद्योगों में से 119 उद्योगों के पास ईटीपी नहीं है। ईटीपी वाले उद्योगों में से भी 170 उद्योग एफ्लुएंट मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं।

इसके अलावा जो छोटे उद्योग होते हैं, उनका निजी ईटीपी नहीं होता, वे सीईटीपी नामक एक सामूहिक व्यवस्था स्वयं करते हैं या सरकार उन्हें यह व्यवस्था उपलब्ध कराती है। सीपीसीबी के अनुसार गुजरात में कुल 33 सीईटीपी हैं जिनमें से केवल 13 ही मानकों के अनुसार हैं। साथ ही 18 सीईटीपी निर्माणाधीन हैं जिन्हें फरवरी तक पूरा हो जाना चाहिए।

जून 2019 में हुई गुजरात वॉटर समिट में निर्णय लिया गया कि राज्य सरकार पेयजल की तरह मलजल के लिए भी क्षेत्रीय ग्रिड बनाएगी जिससे उपचारित मलजल का उपयोग उद्योग कर सकें। इसके लिए 20253 तक 70 प्रतिशत पुनः उपयोग और 2030 तक 100 प्रतिशत का लक्ष्य रखा गया है।

गुजरात वॉटर समिट

उद्योगों को उपचारित मलजल पहुँचाने वाला गुजरात का पहला शहर बना सूरत, बामोली संयंत्र से पंडेसरा स्थित उद्योगों को 80 एमएलडी पानी पहुँचा रहा है। इसके अलावा फरवरी के अंत तक डिंडोली संयंत्र भी 35 एमएलडी जल पहुँचाने में सक्षम हो जाएगा। इससे सूरत नगर निगम की राजस्व कमाई भी हो रही है व उद्योगों की जल आवश्यकता को अन्य माध्यम से पूरा करने से नागरिकों के लिए अधिक जल उपलब्ध रहेगा।

सूरत का लक्ष्य है कि अगले डेढ़ साल में उद्योगों को संपूर्ण रूप से उपचारित मलजल की ही आपूर्ति की जाए। वर्तमान में सूरत नगर निगम इससे 30 करोड़ रुपये की वार्षिक आय कर रहा है और जब यह 550 एमएलडी उपचारित मलजल की आपूर्ति करने लगेगा तब अनुमानित वार्षिक आय 500 करोड़ रुपये होगी।

एसटीपी के बावजूद समस्या

ऊपर हमने एसटीपी के अभाव का एक उदाहरण देखा लेकिन कई स्थानों पर एसटीपी होने के बावजूद उपचारित जल मानकों पर खरा नहीं उतरता और जल निकायों को प्रदूषित करता है। सीपीसीबी के अनुसार गुजरात के 217 एसटीपी में से 37 मानकों पर खरी नहीं उतरतीं।

पर्यावरण सुरक्षा समिति की ओर से रोहित प्रजापति ने स्वराज्य  से बातचीत में बताया कि एयरेशन (ऊर्जा की सहायता से पानी को हवा से हिलाना) एक समस्या है। पानी की बचत के लिए उन्होंने एक मॉडल आज़माया था जिसमें मल और मलजल को अलग-अलग टैंकों में भेजा जाता है। इससे मलजल का पुनः उपयोग आसानी से हो जाता है और 40 प्रतिशत पानी की बचत होती है।

गाँवों में उन्होंने प्रयोग किया जिससे मल रहित मलजल का उपयोग सीधे खेत में किया जा सकता है। स्कूलों में भी उन्होंने यह प्रयोग किया और मलजल के खेतों में प्रयोग से अतिरिक्त यूरिया की आवश्यकता नहीं रही।

प्रजापति दावा करते हैं कि सीपीसीबी के अनुसार 60 प्रतिशत एसटीपी मानकों पर खरे नहीं उतरते। इसका कारण वे गलत तकनीक बताते हैं। ठीक रूप से मलजल के उपचारित न होने पर नदियों में इसके बहाए जाने से नदी प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।

दूसरी समस्या एसटीपी चलाने के लिए बिजली का होने वाला उपयोग है। एक रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न नगर निगमों पर बिजली विभागों का 300 करोड़ रुपये बकाया है। इस समस्या के लिए एक नई पहल की गई जिसके तहत आठ नगर निगमों और 15 कस्बों की एसटीपी को सौर ऊर्जा से चलाया जाएगा।

सीपीसीबी के अनुसार देश भरके संयंत्रों में कुल मलजल का केवल 37 प्रतिशत उपचार करने की ही क्षमता है। प्राधिकरणों की फूर्ति बढ़ाने के लिए जुर्माना एक अच्छा उपाय है। नवंबर 2019 में एनजीटी ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 करोड़ रुपये और 22 टैनरियों पर 280 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। इसके अलावा प्रति माह एक नाले को प्रवाहित करने के लिए 5 लाख रुपये का जुर्माना लगता है।

वडोदरा की विश्वामित्री नदी में मगरमच्छों की संख्या की गणना हो रही है। जीवों की अच्छी संख्या नदी के अच्छे स्वास्थ्य का परिचायक है। नमामि गंगे परियोजना के बाद गंगा में भी कई जीव-जंतु फिर से दिखने लगे हैं। इस गणना के परिणामों से नदी के स्वास्थ्य का अनुमान तो लगेगा लेकिन असली लाभ तब है जब हितधारक सीवेज मुक्त नदियों के प्रति प्रतिबद्ध हों।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।