भारती
लालच एक ऐसा रोग है जो कुशाग्र बुद्धि और परम ज्ञान वालों को भी होता है- कुरल भाग 5

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें लालच, दूसरों के लिए अपशब्द और व्यर्थ बातों के विषय में।

लालच न करें

अळुक्कारु  ईर्ष्या और दूसरों की कुशलता देखकर खुश होने का असामर्थ्य होता है। वेक्किल्  लालच और अवैध साधनों से दूसरों के वस्तुओं की प्राप्ति की कामना होती है।

यदि व्यक्ति का मस्तिष्क सदाचार छोड़कर गलत साधनों से दूसरों की वस्तुओं को पाना चाहने लगे तो यह उसे एक भूल से दूसरी भूल पर ले जाता है और उसके व उसके परिवार के अपयश का कारण बनता है।

जो सच्चे अर्थों में सुख पाना चाहते हैं, वे अवैध साधनों की ओर कभी नहीं जाएँगे जो ज़्यादा से ज़्यादा क्षणिक सुख ही दे सकता है।

तो एक व्यक्ति को क्या करना चाहिए? तिरुवल्लुवर कहते हैं कि जब भी मस्तिष्क गलत दिशा में जाना चाहे तो इसपर लगाम लगाएँ।

अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करके जिन लोगों को जीवन का सही दृष्टिकोण प्राप्त हो गया है, वे अपनी चाहतों को पूरा करने के लिए दूसरों की वस्तुओं को पाने का नहीं सोचते हैं।

बुद्धि की इच्छाशक्ति और ज्ञान का विस्तार किसी काम के नहीं रह जाते यदि व्यक्ति पर लालच का वश हो जाता है और वह मूर्खता की ओर अग्रसर हो जाता है।

लालच एक ऐसा रोग है जो कुशाग्र बुद्धि और परम ज्ञान वाले व्यक्तियों को भी प्रभावित करता है, इसलिए यह चेतावनी है।

एक गृहस्थ का जीवन जीते हुए आप सभी प्राणियों को प्रेम और परोपकार की दृष्टि से देखना सीखते हैं। ऐसे में लालची विचारों को अपने मस्तिष्क में आने देना इस प्रयास का नाश करना होगा।

दूसरों के वस्तुओं के प्रति लालच न करें। जिन वस्तुओं को आपने अवैध साधनों से पाया है, वे आपकी कामनानुसार आपको सुख नहीं दे पाती हैं। सच्चा सुख तब ही मिलता है जब आपने नैतिक साधनों से उन्हें प्राप्त किया हो।

लालच मूर्खता है। यह मृत्यु के समान पीड़ा देती है। दूसरी ओर आपको गर्व की अनुभूति होनी चाहिए कि दूसरों की वस्तुएँ देखकर आपकी आँखों में लालच नहीं आता है। इस विरक्ति को विकसित करें। यह आपको विजय का सुख देगी।

लालच अपने प्रयोजन को ही नहीं पूरा कर पाती। संतुष्टि आत्मा को विजयी बनाती है।

दूसरों के बारे में बुरा न कहें

कुछ बार आप किसी व्यक्ति के सामने उसे कटु बातें कह दें लेकिन उसके पीठ पीछे उसकी बुराई करने की मूर्खता न करें।

यदि व्यक्ति अपनी कमियों को भी उतनी ही अच्छी तरह से देख पाता जैसे वह दूरे की त्रुटियों को देखता है तो विश्व में शीघ्र ही बुराई का नाश हो जाता।

तिरुवल्लुवर ने वही महसूस किया जो बर्न्स ने कई वर्षों बाद गाया।

व्यर्थ बातों से बचें

जो व्यक्ति अपनी व्यर्थ बातों से अपने समूह में ही घृणा का पात्र बनता है, उसकी हर जगह निंदा होती है।

यह दोहा अपने समूह में वाचन की गरिमा बनाए रखने के लिए कहता है और बताता है कि इसे नज़रअंदाज़ करना कितना बड़ा नुकसान कर सकता है।

मिश्रित संगति में अभद्र बातें करना किसी मित्र का बुरा करने से भी अधिक बुरा है।

जिन मित्रों के साथ आपने बुरा किया है, उनसे आप दया की अपेक्षा कर सकते हैं लेकिन आम बातचीत में संयम न बरतने पर आप समाज में निंदा के पात्र बन जाते हैं।

अगले अंक में जारी…