भारती
कैसे गंगा में एशिया के सबसे बड़े नाले को बहने से रोका गया, सिसामाउ की सफल कहानी

गौमुख से लेकर गंगासागर तक अपनी यात्रा के दौरान गंगा में प्रदूषण सबसे अधिक कानपुर में होता है। यह बात आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि शहर में हर रोज़ 45 करोड़ लीटर का सार्वजनिक मल और औद्योगिक प्रवाह उत्पन्न होता है जिसका ज़्यादातर हिस्सा कुछ समय पहले तक सीधे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता था।

लगभग 14 करोड़ लीटर का अपशिष्ट जल जिसमें अधिकतर घरेलू मलजल होता है लेकिन साथ ही फज़लगंज के बूचड़खानों का अनुपचारित मल भी होता है, वह सीसामाउ नामक सिर्फ एक नाले के माध्यम से सीधा पवित्र नदी गंगा में बहाया जा रहा था।

‘एशिया के सबसे बड़े नाले’ के रूप में जाना जाने वाला सीसामाउ नाला 1890 के दशक से चल रहा है। कई सहायक नालियों समेत सीसामाउ नाले का नेटवर्क 13 किलोमीटर लंबा है जिसे 2018 में पूरी तरह से बंद कर मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) की ओर मोड़ दिया गया।

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कानपुर में राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक हुई। प्रधानमंत्री नाले को मोड़ने की व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने के लिए अटल घाट से नाव की सवारी कर सीसामाउ नाला पहुँचे थे।

नाले को मोड़ने का काम दो चरणों में किया गया।

पहले चरण में नाले को बकर मंडी में रोक दिया गया था। लगभग 8 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल को प्रतिदिन यहाँ रोककर इसे राखी मंडी पम्पिंग स्टेशन के माध्यम से 210 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की उपचार क्षमता वाले बिंगवान एसटीपी की ओर पंप कर दिया जाता है।

वहीं दूसरे चरण में नाले को गंगा के पास वीआईपी सड़क पर रोका गया। लगभग 6 करोड़ लीटर के अपशिष्ट जल को रोजाना यहाँ रोककर नवनिर्मित आरएसपीएच पम्पिंग स्टेशन के माध्यम से शहर के जाजमऊ क्षेत्र में स्थित एक एसटीपी में पंप कर दिया जाता है।

इसके परिणामस्वरूप गंगा में बहने वाले 14 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल को अनुपचारित ही बहा दिए जाने की बजाय अब उसका उपचार करने के बाद ही गंगा में छोड़ा जाता है। इससे ना केवल गंगा को अपशिष्ट जल से बचाया जा सका बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया कि कानपुर शहर में वर्तमान मलजल उपचार क्षमता का अच्छी तरह से उपयोग हो सके।

निर्माणाधीन एसटीपी, साभार ट्विटर @mstqalander

457 एमएलडी की उपचार क्षमता वाले कानपुर शहर में से अधिकांश का प्रयोग नहीं हो रहा था क्योंकि तीन स्थापित संयंत्रों- जाजमऊ एसटीपी ( 205 एमएलडी), बिंगवान एसटीपी (210 एमएलडी) और साज़ारी (42 एमएलडी) तक पर्याप्त मात्रा में मलजल नहीं पहुँच पा रहा था। ऐसा इसलिए है क्योंकि जल निगम के अनुसार शहर का मात्र 39 प्रतिशत हिस्सा मलजल प्रणाली से जुड़ा हुआ है।

2011 की जनगणना के अनुसार कानपुर में 5.5 लाख अचल संपत्तियाँ हैं जहाँ से सबसे अधिक मात्रा में अनुपचारित मलजल गंगा में बहाया जाता था। कानपुर नगर निगम के अनुसार केवल 1.76 लाख (30 प्रतिशत से थोड़ा अधिक) संपत्तियाँ ही 2013 में सीवर लाइनों से जुड़ी थीं जबकि बाकी घरों का मलजल सीधे गंगा में बहा दिया जाता था।

एसटीपी की क्षमता से कम क्षमता का प्रयोग केवल कानपुर में ही नहीं होता था। 2013 की एक रिपोर्ट में, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का कहना था कि गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में 64 में से 51 संयंत्रों की कुल क्षमता के 60 प्रतिशत से भी कम का उपयोग होता था।

वर्तमान एसटीपी क्षमता के बेहतर उपयोग के लिए करीब 420 किलोमीटर लंबी नई सीवर लाइनें डाली जा रही हैं और अक्टूबर 2019 तक करीब 190 किलोमीटर की लाइन डाली जा चुकी थी व इस परियोजना का कार्य अगस्त 2020 तक पूरा होने की संभावना है।

नमामि गंगे अभियान के तहत कानपुर के पनखा में एक नई एसटीपी का भी निर्माण किया जा रहा है। इस एसटीपी की कुल क्षमता 30 एमएलडी होगी जिसका निर्माण वार्षिकी मिश्रण आधारित सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत किया जा रहा है।

कांग्रेस के गंगा एक्शन प्लान (जीएपी) समेत पहले शुरू कुिए गए जलमल उपचार इंफ्रास्ट्रक्चर खराब रखरखाव और शासन की कमी के कारण पूरी तरह से क्रियान्वित नहीं हो पाए थे।

वर्ष 2013 में सीपीसीबी ने उत्तर प्रदेश के आठ में से चार एसटीपी में जैविक ऑक्सीजन आवश्यकता (बीओडी) अर्थात जीवों के लिए आवश्यक घुलित ऑक्सीजन की मात्रा के स्तर को बढ़ा हुआ पाया था। बीओडी का स्तर अनुमत सीमा से ऊपर होने का अर्थ है कि जल प्रदूषित है।

सीपीसीबी मुख्यालय

इसी तरह बिहार और पश्चिम बंगाल में क्रमशः पहले और तीसरे एसटीपी में बीओडी का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया था। इसके अलावा, 64 में से 14 एसटीपी निष्क्रिय पाए गए थे। कई मामलों में संसाधनों की कमी के कारण महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर को असहाय रह गए थे।

उदाहरण के तौर पर कानपुर के पास जाजमऊ उपनगर में बड़ी संख्या में स्थित चमड़े के कारखानों को बार-बार होने वाली बिजली कटौती के कारण नदी में अनुपचारित पानी छोड़ना पड़ता था।

वार्षिकी मिश्रण मॉडल एक समाधान प्रदान करता है। इस मॉडल के अंतर्गत सरकार द्वारा 40 प्रतिशत तक पूंजी का निवेश निर्माण से जुड़ी समय-सीमा के आधार पर होगा जो सुनिश्चित करेगा कि परियोजनाएँ समय पर पूरी हों।

शेष पूंजी को परियोजना की निर्माण अवधि के दौरान वार्षिक भुगतान समेत संचालन और रखरखाव लागत खर्च के रूप में दिया जाएगा। इसके साथ ही राशि का भुगतान एसटीपी के प्रदर्शन से जुड़ा होगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि नमामि गंगे से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर निरंतर अच्छा प्रदर्शन करें।

लगभग 319 एमएलडी की संयुक्त उपचार क्षमता वाले पाँच संयंत्रों को पहले से ही इस मॉडल के तहत प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित शहरों- वाराणसी, मथुरा, कानपुर, उन्नाव, फर्रुखाबाद और प्रयागराज में निर्मित किया जा रहा है।

मथुरा में इस मॉडल के तहत बनने वाला एसटीपी इंडियन ऑयल रिफाइनरी को प्रतिदिन दो करोड़ लीटर उपचारित सीवर जल की आपूर्ति करेगा जिससे जल मांग का तनाव झेल रही यमुना नदी पर निर्भरता कम होगी। रिफाइनरी इस उद्देश्य के लिए बनाए जाने वाले तृतीय स्तर के उपचार संयंत्र के संचालन और रखरखाव की पूरी लागत खुद उठाएगी।

हाल ही में उत्तराखंड के हरिद्वार में वार्षिकी मिश्रण मॉडल के तहत निर्मित 14 एमएलडी की क्षमता वाली भारत की पहली जलमल उपचार इकाई- सराय एसटीपी का उद्घाटन हुआ था।

सरकार ने भी एक शहर एक संचालक अवधारणा को अपनाया है, जिसके तहत एकल संचालक को शहर के संपूर्ण मलजल इंफ्रास्ट्रक्चर का दायित्व दिया जा सके ताकि एकल बिंदु की जवाबदेही सुनिश्चित हो और असमन्वय की संभावना को सीमित किया जा सके।

जीएपी को लागू करने वाले विभिन्न निकायों के बीच समन्वय के अभाव के कारण कार्यक्रम के बहुत कम लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका। उदाहरण के लिए, शहरी स्थानीय निकायों की कार्यक्रम को लागू करने और इसके तहत निर्मित इंफ्रास्ट्रक्चर के संचालन में बहुत कम भूमिका थी लेकिन इन संपत्तियों का स्वामित्व उन्हीं के पास था। 2011 में सात आईआईटियों के संघ द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट कहती है कि इससे इन संपत्तियों का उचित संचालन और रख-रखाव मुश्किल हुआ।

प्रखर स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakharkgupta के माध्यम से ट्वीट करते हैं।