भारती
दुर्भाग्य बाढ़ की तरह आ सकता है लेकिन मस्तिष्क के विचार से नष्ट भी हो सकता है- कुरल

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा तमिल से भावार्थ किए गए कुरल की श्रृंखला में पढ़ें दुर्भाग्य से निपटने और शिक्षा के महत्त्व के विषय में। 

धैर्य

दुर्भाग्य, पीड़ा या पराजय से धैर्य नहीं टूटना चाहिए। इस अध्याय में किसी तपस्वी की मन की शांति के विषय में चर्चा नहीं की गई है, बल्कि सांसारिक जीवन में व्यस्त व्यक्ति के अचल मन की बात की गई है।

1. जब दुर्भाग्य आपके सामने आता है तो उसपर हँसे क्योंकि यही आपको इससे उबरकर जय की ओर जाने में सहायता करेगा।

2. दुर्भाग्य बाढ़ की तरह आ सकता है लेकिन बुद्धिमान मनुष्य अपने मस्तिष्क के एक विचार से ही उसे नष्ट कर देता है।

दुर्भाग्य मस्तिष्क पर काम करता है लेकिन संकल्पित विचार इससे उबरकर आगे बढ़ सकता है।

3. जन्म से ही मनुष्य के दुर्भाग्य की चपेट में आने की संभावना होती है। बुद्धिमान व्यक्ति इस समझते हैं और इसके समक्ष अचल रहते हैं।

दुर्भाग्य शरीर को हानि पहुँचा सकता है लेकिन मस्तिष्क इससे उबर सकता है।

4. जो अपने भीतर सुख की अभिलाषा को बढ़ने नहीं देता और जानता है कि मनुष्य को दुर्भाग्य का सामना करना होता है, उसे इससे निपटने में समस्या नहीं होगी।

5. यदि सौभाग्य के समय आप अपने मस्तिष्क को उत्तेजना से दूर रख पाते हैं तो यह संकेत है कि आप दुर्भाग्य की पीड़ा से भी खुद को बचा पाएँगे।

जो विपदाओं से दुखी नहीं होते, वे स्वयं को अहानिकर बना लेते हैं। दुखी न होकर दुर्भाग्य से उबरा जा सकता है। सौभाग्य के सुख में खुद को संभाले रखने से जो शक्ति मिलती है, वही दुर्भाग्य से लड़ने में काम आती है।

शिक्षा

शिक्षा के विषय में जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात कुरल कहते हैं, वह यह है कि ज्ञान को आचरण से जोड़ा जाना चाहिए। इस प्रकार का ज्ञान ही संस्कृति बनता है।

6. जिन चीज़ों को सीखा जाना चाहिए, उनका सही ज्ञान प्राप्त करके उस अनुसार आचरण करें।

7. शिक्षा की दो प्रमुख शाखाएँ हैं- गणित और साहित्य, या यूँ कहें कि संख्या और अक्षर। ये दोनों मनुष्य की दो आँखों के समान ही उपयोगी हैं।

कितने भी संपन्न अशिक्षित मनुष्य का जीवन, किसी अंधे व्यक्ति से शायद ही बेहतर हो।

8. केवल पढ़े-लिखे व्यक्ति को ही आँखों वाला कहा जा सकता है, अनपढ़ व्यक्ति के मुख पर वो दो आँखें नहीं बल्कि दो छेद हैं।

9. शिक्षा को भय और विनम्रता से प्राप्त किया जाना चाहिए। शिक्षा प्राप्त करने वाले को शिक्षित व्यक्ति के समक्ष एक याचक की तरह खड़े होना चाहिए जैसा कोई व्यक्ति धनवान के समक्ष गिड़िगिड़ते-काँपते हुए खड़ा होता है। जो स्वयं पर गर्व महसूस करता है, वह उदासीन ही रह जाता है और जीवन में उसे हीनता का सामना करना पड़ता है।

अनपढ़

तमिल शास्त्रों में शिक्षा पर काफी बल दिया गया है। इसे उतना ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है जितना नैतिक मूल्यों को।

10. अनपढ़ लोग क्षारीय मिट्टी की तरह होते हैं। उनकी अस्तित्व अर्थहीन है।

11. यदि कोई अनपढ़ व्यक्ति अच्छी समझ दिखाता है तब भी उसे शिक्षित लोगों द्वारा सहमति नहीं मिलती है।

यह कथन शिक्षित लोगों पर निशाना नहीं साध रहा, अपितु शिक्षा का महत्त्व बता रहा है।

12. जब बोलने का समय आएगा तो अशिक्षित व्यक्ति का सारा दंभ ओझल हो जाएगा।