भारती
मूर्खता और कपटियों से बचने व पति-पत्नी के संबंधों पर तिरुवल्लुवर की अंतर्दृष्टि- भाग 19

मूर्खता

1. सभी मूर्खताओं में से सब,से बड़ी मूर्खता है, उस वस्तु की चाह रखना जो कि वर्जित है।

जब आपकी समझदारी और अंतरात्मा कहे कि कोई वस्तु प्राप्ति योग्य नहीं है तो अपनी मानसिक शक्ति को इसके विचारों में व्यर्थ करना मूर्खता है।

2. उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं है जिसने बहुत विद्या प्राप्त की है और उपदेश भी देता है लेकिन स्वयं को नियंत्रित नहीं करता।

3. एक मूर्ख के पास धन आना किसी पागल द्वारा मादक पदार्थ लिए जाने जैसा ही है क्योंकि पागल होना बुरा है लेकिन उसपर मादक पदार्थ का उपभोग उसे और बुरा बनाता है।

4. मूर्खों की मित्रता सबसे अच्छी है क्योंकि उनसे अलग होकर आपको कोई दुख नहीं होता है।

यहाँ पर तिरवल्लुवर अपने विचार को स्थापित करने के लिए व्यंग्य का उपयोग कर रहे हैं।

5. विद्वानों की सभा में एक मूर्ख का प्रवेश गंदे पैरों के साथ साफ-सुथरे बिछौने पर चढ़ने जैसा है। एक मूर्ख से पूरी सभा का चरित्र खराब हो जाता है।

6. शत्रुओं द्वारा दिए गए कष्ट की पीड़ा से अधिक पीड़ादायक है स्वयं के अज्ञान से मिला कष्ट है।

7. उस मूर्खता से बड़ी कोई मूर्खता नहीं है जिसमें व्यक्ति स्वयं की समझदारी पर गर्व महसूस करता है।

8. जिस बात का ज्ञान न हो, उसका दिखावा करने से व्यक्ति अपने उस ज्ञान की भी विश्वसनीयता खो देता है जो सच में उसके पास है।

इसके बावजूद विद्वान व्यक्तियों की कमज़ोरी है कि वे अपने ज्ञान के दायरे से बाहर के मामलों पर भी अपने विचारों को घुसेड़ते हैं।

9. यह कल्पना करना मूर्खता है कि किसी कपड़े में स्वयं को लपेटकर आप अपनी अभद्रता छुपा सकते हैं, जबकि खराब चरित्र की अभद्रता उजागर हो ही जाती है।

शरीर के किसी अंग के अनावरण से अधिक अभद्र है खराब चरित्र।

कपटियों से स्वयं को बचाएँ

10. सूरज का ताप और पानी हमारे शरीर के लिए अच्छे हैं लेकिन फिर भी कई बार उनसे बचने की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार जब संबंधी कपटी हो जाते हैं तो उन,से भी बचना चाहिए।

11. वह समुदाय कभी भी एकजुट नहीं हो सकता जहाँ एक-दूसरे के लिए मन में घृणा है, उसी प्रकार जैसे एक ढक्कन केवल बरतन को ढँकता है, न कि वे दोनों एक हैं।

चेतावनी

कुरल में पत्नी को उच्च स्थान ही दिया गया है लेकिन निम्न कथनों में पत्नी के शासन को पुरुषों की कमज़ोरी और अपमान का कारण माना गया है। नारीवादियों को इतनी पुरानी पुस्तक के कथनों से आहत नहीं होना चाहिए। वर्तमान समय में भी पत्नी-प्रधानता के अधीन पुरुषों को प्रायः ही सम्मान मिलता व उनमें आत्मविश्वास होता है।

यहाँ जिसकी निंदा की जा रही है वह पति के निर्णय पर पत्नी की प्रबलता है, न कि पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे के लिए प्रेम और सम्मान की। पहले दो दोहों में पत्नी से अत्यधिक अनुराग की निंदा की गई है जो पति का नायकत्व और खतरों से लड़ने की उसकी क्षमता कम करता है, जिसपर किसी व्यक्ति की सफलता निर्भर होती है।

12. पत्नी से असाधारण लगाव न सिर्फ आध्यात्मिक प्राप्ति में बाधा है बल्कि सांसारिक जीवन में भी इससे बचना चाहिए।

13. जो पत्नी से लगाव के कारण अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पाता, वह सार्वजनिक निंदा का पात्र बनता है।

ऐसे लगाव का कम महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है लेकिन सार्वजनिक जीवन में स्थान रखने वालों के लिए एक कलंक होता है।

14. जिनपर उनकी पत्नी का शासन होता है वे बड़े हितों, मित्रों व समाज के लिए उदार व्यवहार नहीं कर पाते हैं। पत्नी द्वारा शासित होना आपको दृष्टिकोण और प्रयास में संकीर्ण बनाता है।

उपरोक्त विचार महिला की गरिमा और समान पद के विरोधाभासी नहीं हैं। न ही यह कहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में महिला की क्षमता कम होती है। ये सिर्फ यह कह रहे हैं कि किसी व्यक्ति को जो कार्य मिला है, उसे वह दूसरों के इशारों पर नहीं करना चाहिए।

अगले अंक में जारी…