भारती
कोष्ठागार बचा पाएँगे निर्बल भंडारण से नष्ट होने वाली फसलों को, जानें क्या है परियोजना

नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में खाद्यान्नों की बर्बादी रोकने के लिए गेहूँ को संग्रहित करने के लिए स्टील कोष्ठागार स्थापित करने के प्रयासों में तेज़ी लाने की पहल है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अब सरकार साल के अंत तक कोष्ठागारों में चावल संग्रहित करने के लिए एक प्रायोगिक परियोजना शुरू करने की तैयारी में है।

गेहूँ और चावल जैसे अनाजों को संग्रहित करने के लिए कोष्ठागार की स्थापना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कटाई के बाद फसल को होने वाले नुकसानों और भंडारण के दौरान बर्बादी से बचने में सहायता करेगा।

भारतीय अनाज भंडारण प्रबंधन और अनुसंधान संस्थान (आईजीएसएमआरआई) के अनुसार, फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान कुल अनाज का 10 प्रतिशत हिस्सा होता है।

वार्षिक भंडारण नुकसान का अनुमान 7,000 करोड़ रुपये लगाया गया है जिसमें से अकेले कीड़े ही 1,300 करोड़ रुपये की बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार हैं। फसल कटाई के बाद के नुकसानों को 2014 के बाद से काफी कम किया गया है जिसका श्रेय केंद्र द्वारा शुरू की गई विभिन्न पहलों को जाता है।

कोष्ठागारों की स्थापना वैज्ञानिक भंडारण का एक प्रमुख तत्व रहेगा जो नुकसान और अपव्यय को रोकेगा। यह महत्व रखता है क्योंकि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के साथ गेहूँ का भंडार 1 जनवरी को 1.38 करोड़ टन के अनिवार्य भंडार मानक के मुकाबले 3.28 करोड़ टन हो गया है।

भारतीय खाद्य निगम की समिति के साथ महाराष्ट्र में एक बैठक

चावल का भंडार भी 76 लाख टन के अनिवार्य मानक से काफी ऊपर है। एफसीआई के गोदामों में 2.788 करोड़ टन के बिना धान वाले चावलों के अलावा 2.371 करोड़ टन चावल का भंडार उपलब्ध है।

अब तक एफसीआई की भंडारण प्रणाली खाद्य आपातकाल और अनाज को राशन की दुकानों के माध्यम से वितरण करने के लिए जो ‘बफर भंडार’ रखती है, उसके लिए सदियों पुराने पारंपरिक गोदामों और आवरण एवं चबूतरा (सीएपी) प्रणाली का उपयोग करती है।

इसके साथ दो परेशानियाँ थीं। पहली, इस तरह के भंडारण से कीट और कृंतक हमलों, चोरी और बारिश जैसी मौसम संबंधी समस्याओं आदि के कारण अपव्यय होता था।

दूसरी, गोदामों में पहले आने वाले अनाज आमतौर पर पहले बाहर नहीं निकल पाते हैं और उनके जूट के थैले नीचे दब जाते हैं। संक्षेप में कहें तो पहले आने वाले अंत में गोदाम से निकलते हैं। इस प्रकार समय के साथ ये दाने सड़ने लगते हैं।

इन समस्याओं के कारण ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार प्रायोगिक परियोजना के साथ सामने आई थी।

भंडारण के लिए कोष्ठागार प्रणाली अनाज को नियंत्रित वातावरण में संरक्षित करने में मदद करती है जिससे कीड़ों, मौसम या कृंतकों के कारण होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि “पहले-आने वाला भंडार ही पहले-जाए”।

प्रायोगिक परियोजना के तहत पंजाब, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 5.5 लाख टन गेहूँ के भंडारण के लिए कोष्ठागारों की स्थापना की गई थी।

पंजाब में कोष्ठागारों की स्थापना करने वाली निजी एजेंसी को भी किसानों से सीधे खरीद की अनुमति मिल गई।

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने प्रायोगिक परियोजना को पूरा तो किया लेकिन उससे आगे काम करने में नाकाम रही।

कटाई के बाद के प्रबंधन के एक विशेषज्ञ वासुदेव मुनीश्वर, जो लोटस हार्वेस्टेक चलाते हैं और प्रायोगिक परियोजना में शामिल थे, के अनुसार भंडारण घाटे में 40 प्रतिशत की बचत हुई।

2014 में मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के सत्ता में लौटने से रुकी हुई कोष्ठागार परियोजना में फिर से जान आई। केंद्र सरकार ने अनाज भंडारण के आधुनिकीकरण के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया था।

इसके बाद कई चीज़ों ने गति पकड़ी। हालांकि कोष्ठागार परियोजना का क्रियान्वयन एक साल से पीछे चल रहा है, लेकिन मुनीश्वर कहते हैं कि अगले साल के अंत तक भारत के कोष्ठागारों में 1 करोड़ टन गेहूँ का भंडारण करने की क्षमता हो सकती है। इसमें राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र द्वारा की गई पहल शामिल रहेगी।

एफसीआई नोट के अनुसार, सरकार ने 2016-17 में 5 लाख टन, 2017-18 में 15 लाख टन, 2018-19 में 30 लाख टन और चालू वित्तीय वर्ष के दौरान 50 लाख टन क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य रखा था।

राष्ट्रीय संपार्श्विक प्रबंधन सेवा लिमिटेड (एनसीएमएसएल) के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजय कौल ने कहा, “मैं कहूँगा कि कोष्ठागार परियोजनाओं के क्रियान्वयन में एक साल की देरी है।”

एनसीएमएसएल के अधीन प्रेम वत्स के नेतृत्व वाले फेयरफैक्स समूह ने 8 लाख टन की कुल क्षमता के साथ 16 स्थानों पर स्टील कोष्ठागार स्थापित करने के लिए निविदाएँ जीतीं हैं। एनसीएमएसएल ने उत्तर प्रदेश के बरेली और बिहार के पूर्णिया में 50,000 टन की क्षमता की कोष्ठागार परियोजनाओं का क्रियान्वयन किया है।

बरेली में स्थापित कोष्ठागार

एफसीआई ने अपने नोट में कहा कि कोष्ठागार चालकों के चयन का अधिकांश लक्ष्य प्राप्त किया गया है, लेकिन केवल 25,000 टन नई क्षमता का ही निर्माण हो पाया है।

कौल ने कहा कि कोष्ठागार को स्थापित करने में देरी भंडारण के लिए एक उपयुक्त स्थल खोजने के कारण हुई।

“केवल रेल टर्मिनल सुविधाओं के साथ ही कोष्ठागार की स्थापना की जा सकती है। यह रेलवे स्टेशन के बगल की अतिरिक्त लाइन पर किया जा सकता है। हम दो स्टेशनों के बीच में एक कोष्ठागार स्थापित नहीं कर सकते हैं।”, कोष्ठागारों के निर्माण के लिए निविदाएँ जीतने वाली कंपनियों की समस्याओं के विषय में कौल ने बताया।

कंपनियों को उपयुक्त भूमि ढूंढनी होगी जो भंडारण परिसर और बगल की लाइन को समायोजित कर सके। इसके लिए पर्यावरण और रेलवे की मंजूरी लेनी होगी जिसकी वजह से समय लग रहा है।

वहीं दूसरी ओर, रेलवे स्टेशन के पास ज़मीन का खंड अन्य जगहों की तुलना में महंगा है और इस प्रकार लागत बढ़ती है। उदाहरण के लिए, यदि रेल टर्मिनल सुविधा के बिना कोष्ठागार स्थापित करने की लागत 30 करोड़ रुपये है, तो रेल टर्मिनल के साथ कोष्ठागार की लागत लगभग इसकी दोगुनी है।

राज्य रेल टर्मिनल सुविधाओं के बिना कोष्ठागार का निर्माण कर रहे हैं, अगर राज्य की पहल होती है तो।
मुनीश्वर ने कहा कि कंपनियों को वित्त प्राप्त करने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

“बैंकों ने अपने ऋण देने के नियमों को कड़ा कर दिया है। कंपनियों को ऋण प्राप्त करने के लिए उचित संपार्श्विक की पेशकश करनी होगी। जो पहले फोन कॉल के साथ संभव था, उसके लिए अब और अधिक जमीनी काम करने की ज़रूरत है।”, उन्होंने कहा।

लेकिन पूरे खाद्यान्न क्षेत्र स्टील कोष्ठागार भंडारण की उपयोगिता का एहसास किया है जैसा कि आईटीसी जैसी निजी कंपनियाँ स्टील कोष्ठागार को विशेष रूप से अपने मक्का (मकई) के लिए लाई हैं।

इसके अलावा, एक स्तर वाले गोदामों की क्षमता बढ़ाने के लिए उनकी लंबाई का उपयोग करने पर विचार चल रहा है। मुनीश्वर का कहना है कि ऐसी जगहों पर भंडारण दोगुना हो सकता है।

स्टील कोष्ठागारों में चावल को संग्रहित करने के अपने प्रायोगिक परियोजना के पूरा होने के साथ, भारत का पड़ोसी बांग्लादेश संभवत: इस साल के अंत में इस तरह के भंडारण स्थापित करना शुरू कर देगा।

दूसरी ओर, भारत सरकार ने चावल के लिए देश में ऐसे भंडारण की आवश्यकता को स्वीकार किया है।

मुनीश्वर के अनुसार, चावल हेतु कोष्ठागारों की प्रायोगिक परियोजनाएँ बिहार के बक्सर और कैमूर में 25,000 टन की कुल क्षमता के साथ आएँगी।

कोष्ठागारों में चावल के भंडारण के लिए एक अलग तकनीक की आवश्यकता होती है, लेकिन इसे लाभकारी पाया गया है, मुनीश्वर ने कहा।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।