भारती
“यह संसार अद्भुत स्थान है, जो कल यहाँ था, हो सकता है आज न हो”- कुरल भाग 13

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा तिरुकुरल से चयनित दोहों की शृंखला में क्षणभंगुर संसार और इसे त्यागने के लाभों के विषय में।

क्षणभंगुर संसार

जैसे किसी नाटक को देखने के लिए भीड़ इकट्ठा हो जाती है, वैसे ही धन आता है। यह उसी प्रकार ओझल हो जाता है जैसे नाटक समाप्त होने के बाद भीड़।

जो सही है उसे करने में देरी न करें। प्राण पखेरु उड़ने से पहले कार्य पूरा कर लें।

यह संसार अद्भुत स्थान है, जो कल यहाँ था, हो सकता है आज न हो।

हम अगले क्षण जीवित रहने के लिए भी आश्वस्त नहीं हो सकते लेकिन हम फिर भी लाखों योजनाएँ बनाने से पीछे नहीं हटते।

आत्मा का शरीर से संबंध वैसा ही है जैसे किसी चिड़िया का अंडे के खोल से। चिड़िया इसे तोड़कर प्रसन्नतापूर्वक आकाश में उड़ जाती है।

आत्मा एक घुमंतु प्राणी है। यह शरीर में थोड़े समय के लिए वैसे ही रहती है जैसे कोई घर-विहीन व्यक्ति थोड़े समय के लिए किसी छत के नीचे आश्रय पाता है।

सन्यास

जैसे-जैसे आप सांसारिक वस्तुओं का त्याग करते जाते हैं, वैसे-वैसे आप स्वयं को इससे होने वाली पीड़ा से बचाते हैं।

अनुरक्ति ही दुख का कारण है, त्याग का उठाया हर एक कदम आपको वास्तविक सुख की ओर ले जाता है। सारी चीज़ों को एक साथ त्यागने की आवश्यकता नहीं है। इसका प्रसार करने से इसका लाभ कहीं नहीं खोता। त्याग के लिए तब तक रुकने की आवश्यकता नहीं है जब आप सब त्यागने के लिए तैयार हो जाएँ।

किसी चीज़ के अभाव में त्याग करना आसान होता है लेकिन यदि कोई वस्तु आपके पास होती है तो वह आपको भ्रमित करती है और सत्य तक पहुँचने से आपको रोकती है।

यह सत्य है कि उसे त्याग नहीं माना जाएगा जब त्याग करने के बाद आपका मस्तिष्क उन त्यागी हुई वस्तुओं पर विचरण करता है। लेकिन शुरुआत वस्तुओं के त्याग से ही करनी चाहिए। नहीं तो हम अपने आप को कोई अवसर नहीं दे पाएँगे।

यदि आपका मन जन्मों के इस फेर से भर गया है तो इच्छाओं को जीवित रखने का कोई औचित्य नहीं है। यहाँ तक कि शरीर भी एक बोझ है जिससे मुक्त हुआ जाएगा।

दुख उसे जकड़े रहता है जो सांसारिक वस्तुओं पर पकड़ बनाए रखना चाहता है।

जिन्होंने पूरी तरह से त्याग कर दिया है यानी कि वस्तुओं के विचारों से भी मुक्त हो गए हैं, उन्होंने खुद को बचा लिया है। दूसरे भ्रमित होकर अभी भी जाल में फँसे हुए हैं।

अनुरक्ति का त्याग करके ही उद्धार होता है। अन्यथा इस क्षणभंगुर संसार में बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

मात्र स्वयं को वंचित करना ही काफी नहीं होगा। इच्छाओं का भी त्याग करना होगा।

केवल ईश्वर से आपकी अनुरक्ति ही एकमात्र अनुरक्ति होनी चाहिए। यह अनुराग आपको अन्य संबंधों से मुक्त होने में सहायता करेगा।

अगले अंक में जारी…