भारती
पूरे भारत में एनआरसी लाने के लिए कुछ कम पीड़ादायक उपाय

गृह मंत्री अमित शाह लगातार कह रहे हैं कि भारत में देशव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लाया जाएगा। सैद्धांतिक रूप से कोई इस बात का विरोध नहीं कर सकता है कि एक देश अपने नागरिकों को सूचीबद्ध करना चाहता है जिनके दायित्व व अधिकार, दोनों होते हैं। गैर-नागरिकों और अवैध अप्रवासियों का केवल सुरक्षा व स्वतंत्रता और भारत में प्रवास के दौरान मानवीय व्यवहार पर अधिकार रहेगा।

एनआरसी तब ही सार्थक होगी जब यह राष्ट्रव्यापी हो, यह सीख हमें असम एनआरसी की असफलता से मिलती है। यदि असम के सूची से छूटे लोग किसी दूसरे राज्य में जाकर बस जाते हैं तो यह कानून का उपहास ही होगा। गैर-नागरिकों की पहचान हर जगह होनी चाहिए, भले ही उन्हें वापस न भेजा जाए।

इसलिए यदि ममता बनर्जी कहती हैं कि वे पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू नहीं होने देंगी तो या तो वे इसके परिणामों से डरी हुई हैं या जान-बूझकर कानून के आड़े आना चाहती हैं। केंद्र को इसे लागू करने के लिए न्यायालय का द्वार खटखटाना चाहिए।

यदि एनआरसी की संरचना सही नहीं हुई तो पूरे राष्ट्र में इसे लागू करते समय कोलाहल का माहौल रहेगा। यहाँ कुछ तरीके सुझाए गए हैं जिससे यह सहज, शांतिपूर्ण और नागरिकों को पीड़ा पहुँचाए बिना लागू की जा सके।

पहला, सरकार को जल्द से जल्द एक समान छँटाई का वर्ष तय करना चाहिए। मान लीजिए 2014 को छँटाई वर्ष के रूप में चिह्नित किया गया तो 2002 से पहले भारत में जन्म, निवास, संपत्ति अधिकार या शिक्षा का दस्तावेज प्रस्तुत करने वाला स्वतः ही योग्यताओं पर खरा उतरता है। ऐसा इसलिए क्योंकि 12 वर्षों तक भारत में रहने से स्वाभाविक रूप से व्यक्ति नागरिक बन जाता है।

इस छँटाई वर्ष से भले ही लाखों अवैध प्रवासियों को भारत के नागरिक का दर्जा मिल जाएगा क्योंकि कई के पास 2002 से पहले के दस्तावेज हैं लेकिन यह सिर्फ एक मूल्य है जो हमें इस प्रक्रिया की सहजता के लिए चुकाना होगा। एनआरसी का मुख्य उद्देश्य भविष्य में अवैध अप्रवासियों को भारत में बसने से रोकना होना चाहिए।

पहले से आए हुए लोगों को कष्ट दिए बिना और राज्यों में अवैध अप्रवासियों के रहने वाले क्षेत्रों में काम वगैरह की लघु-अर्थव्यवस्थाओं को क्षति पहुँचाए बिना, उन्हें वापस नहीं भेजा जा सकता है। असम में समस्या यह थी कि छँटाई वर्ष 1971 रखा गया था जिस कारण कई लोग इतने पहले के दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए।

दूसरा, जहाँ तक संभव हो, 2021 की जनगणना प्रक्रिया को घरों से एनआरसी के लिए दस्तावेज एकत्रित करने की प्रक्रिया से जोड़ दिया जाए। जनगणना की प्रक्रिया सितंबर 2020 से शुरू होगी, इसलिए लोगों के पास पर्याप्त समय है कि वे अपने दस्तावेज तैयार रखें और जनगणना कार्यकर्ताओं को सौंप दें। वे फिर इसे निर्धारित ट्रिब्युनलों और पीठों को सौंपेगे जो इन दस्तावेजों को सत्यापित करेंगे।

तीसरा, कुछ मामलों में इस प्रक्रिया को दस्तावेज मुक्त बनाया जाए। उदाहरण स्वरूप, 2017 के अंत तक विदेश मंत्रालय ने 7.4 करोड़ नागरिकों को पासपोर्ट जारी किया था, जिनकी नागरिता पर संदेह नहीं होना चाहिए।

इन रिकॉर्डों को सही मानकर पासपोर्ट धारकों से अतिरिक्त दस्तावेजों की मांग नहीं करनी चाहिए। इसी प्रकार पासपोर्ट धारकों के बच्चे बी स्वतः ही नागरिक सिद्ध हो जाते हैं, अगर उनके पास जन्म प्रमाण-पत्र है।

ऐसे ही संपत्ति और विद्यालय-महाविद्यालय में प्रवेश के रिकोर्डों तक एनआरसी अधिकारियों की सीधी पहुँच होनी चाहिए जो उनकी नागरिकता प्रमाणित करें और अतिरिक्त कागज़ों की मांग न करें।

चौथा, प्रमाणीकरण के लिए बड़े पैमाने पर तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। डिजिटल लॉकर होते हैं जिनमें ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर महाविद्यालय की डिग्री व इंश्योरेंस पॉलिसियाँ तक रखी जाती हैं।

यदि नागरिकों से अभी कह दिया जाए कि वे डिजिटल लॉकरों के माध्यम से अपने दस्तावेजों को प्रमाणित करा लें तो जब एनआरसी होगी तब उन्हें सिर्फ इसकी पहुँच अधिकारियों को देनी होगी। वर्तमान में डिजिलॉकर अधिक उपयोग में नहीं है और एनआरसी लागू करने वाले राज्यों से सितंबर 2020 तक उनके दस्तावेज इसमें दर्ज करने के लिए कहा जाना चाहिए।

पाँचवाँ, बांग्लादेश की सहायता लेनी चाहिए जिसमें वे अपने मतदाताओं और नागरिक रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रति हमें सौंपे। यदि शेख हसीना से कहा जाए कि उनकी अनुमति के बिना किसी को वापसे नहीं भेजा जाएगा व भारत में रहने वाले बांग्लादेशियों का नाम सिर्फ मतदाता सूची से हटाया जाएगा और केवल नागरिकों को मिलने वाले लाभ नहीं मिलेंगे, तब वे हमारी सहायता कर सकती हैं।

अवैध अप्रवासियों का सबसे बड़ा स्रोत बांग्लादेश है इसलिए बांग्लादेश से संबंध रखने वालों की जाँच में सबसे अधिक सावधानी बरतनी चाहिए। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डाटा विश्लेषण के उपयोग से बांग्लादेशी नागरिक का संदेह होने वालों को विभिन्न डाटाबेसों के माध्यम से पहचाना जा सकेगा।

एनआरसी के साथ नागरिकता संशोधन विधेयक, जो 2014 तक अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले भारतीय धर्मों के पीड़ित लोगों को नागरिकता देने की बात कहता है, भी लाया जाना चाहिए। यदि एनआरसी लागू करना है तो ऐसे लागू करें कि यह कम कष्टदायक और शांतिपूर्ण हो।